करोना काल में प्रवासी मजदूर
हम नहीं चाहते थे मरना डंगर/बाड़ों में तूड़ी के ढेरों में ट्यूबवेल के कोठों में होटलों में /ढाबों में तहखानों ...
हम नहीं चाहते थे मरना डंगर/बाड़ों में तूड़ी के ढेरों में ट्यूबवेल के कोठों में होटलों में /ढाबों में तहखानों ...
'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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