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‘अंध-धार्मिकता’ एक मनोवैज्ञानिक बीमारी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 7, 2019
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अंध-धार्मिकता 21वीं सदी के लोकतांत्रिक मानव समाज पर एक महामारी की तरह टुट पड़ा है. ऐसे अंध-धार्मिक लोग अपनी थोथी धार्मिक बकबास के लिए न केवल दूसरों का ही जीवन समाप्त कर देते हैं, बल्कि खुद का भी जीवन समाप्त करने में यकीन करते हैं. आज इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ही कहा जा सकता है, जब ऐसे ही अंध-धार्मिक लोग सत्ता पर काबिज हो गये हैं और अपनी अंध-धार्मिक बकबास को सही ठहराने के लिए न्यूटन, आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों को बेवकूफ और डार्विन को ठग बतला रहे हैं.

दुनिया का हर धर्म अपनी अंध-भक्ति के लिए मानव समाज को कुंआ में धकेलने पर आमदा है. परन्तु मुसलमान अंध-धार्मिक अपनी कट्टरपंथी सोच के कारण आज समूची दुनिया में बदनाम किया जा रहा है. यही कारण है कि इन तमाम अंध-धार्मिक कट्टरपंथी बीमारियों से पीड़ितों का समयोचित इलाज बेहद जरूरी है. चाइना इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है. हर धर्म के तमाम अंध-धार्मिक कट्टरपंथी को इस इलाज की जरूरत है. बता रहे हैं ताबिश सिद्दीकी. 

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'अंध-धार्मिकता' एक मनोवैज्ञानिक बीमारी

चाइना पर इल्ज़ाम है कि उसने अपने यहां के क़रीब दस लाख ‘वीगर’ (Uighur) मुसलमानों को ‘प्रताड़ना शिविर’ में बंद कर के रखा हुआ है. अमेरिका समेत कई देशों ने इसकी कड़ी निंदा की है. मगर चीन ये कह रहा है कि वो अपने देश के इन मुसलमानों को धर्मांधता से बाहर निकालने के लिए उन्हें विभिन्न व्यवसाय और कला की शिक्षा दे रहा है. चीन ने इन प्रशिक्षणों का वीडियो और फ़ोटो भी जारी किया है, जिसमें वीगर समुदाय के लोग नाचते-गाते, कला और विज्ञान सीखते दिख रहे हैं. मगर सारी दुनिया के मुसलमान इंटरनेट पर इसकी भर्त्सना कर रहे हैं. वो चीन पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि चीन उन मुसलमानों का ‘ब्रेन-वाश’ कर के उन्हें ‘इस्लाम’ से दूर कर रहा है.

जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प तक ने चीन की इस मामले में आलोचना की है, वहीं एक ऐसे व्यक्ति ने चीन के इस कार्य को समर्थन दिया है, जिससे दुनिया के किसी भी इंसान को उम्मीद नहीं थी. सऊदी के प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने चीन के इस कार्य को अपना समर्थन जताते हुये कहा है कि ‘चीन को पूरा अधिकार है कि वो अपने यहां आतंकवाद और धर्मांधता के विरुद्ध कार्य करे इसलिए सऊदी अरब चीन के इस कार्य को समर्थन देता है और उस से पूरे सहयोग का वादा भी करता है.’




बिन सलमान का ये बयान अपने आप मे चौंकाने वाला है. और दुनिया भर से मुसलमान ‘बिन सलमान’ को कह रहे हैं कि ये इंसान मुसलमान ही नहीं है और इसे मुसलमान बने रहने का कोई हक़ नहीं है.

चीन ने ‘अंध इस्लामिक’ लोगों को ‘मानसिक विक्षिप्त’ व्यक्तियों की श्रेणी में रख दिया है और चीन ये कहता है कि जो भी इस बीमारी से ग्रस्त है, उसका इलाज होना चाहिए. चीन अपने यहांं इन शिविरों में बड़े पैमाने पर मुसलमानों को रखकर उन्हें कला, विज्ञान, नाच, गाना और हर उस चीज़ की ट्रेनिंग दे रहा है, जिसे आम मुसलमान ‘हराम’ की श्रेणी में रखता है.

बीबीसी हिंदी से साभार

सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की तरह मैं भी चीन के इस क़दम का समर्थन करता हूंं. मेरे हिसाब से भी ‘अंध धार्मिकता’ एक मनोवैज्ञानिक बीमारी है, जिसका इलाज बहुत आवश्यक है. और जो लोग चीन के इन शिविरों को यातना शिविर कह रहे हैं, उन्हें अपने यहां के धार्मिक विद्यालय और ‘धार्मिक सामाजिक परिवेश’ क्या लगते हैं, ये उन्हें बताना होगा.

जो चीन के इस क़दम को यातना शिविर बता रहे हैं, वो मुझे बताएं कि ‘मदरसे’ आख़िर किस तरह के शिविर होते हैं ? जो चीन पर ‘वीगर’ लोगों के ब्रेन वाश का इल्ज़ाम लगा रहे हैं, वो ये बताएं कि वो अपने मासूम बच्चों के साथ क्या करते हैं ? वो मुझे बताएं कि उनके घर की औरतें पचास डिग्री सेल्सियस में काले लबादे के भीतर किस ब्रेन वाशिंग के तहत घूमती हैं ? वो मुझे बताएं कि ये किस तरह की ब्रेन वाशिंग के अंतर्गत आता है जहांं नाचना, हंसना, अभिनय करना, खुश रहना को एक बिमारी समझा जाए और लोगों का गला काटने और बम फोड़ने को धर्म की रक्षा ? वो मुझे बताएं कि किस ब्रेन वाशिंग के तहत आपको होली के रंग नापाक और बखरीद में काटे गए जानवरों के खून पाक दिखते हैं ? वो मुझे बताएं कि ज़ायरा वसीम जैसी अभिनेत्री किस ब्रेन वाशिंग के तहत फिल्मों को अलविदा बोल देती हैं ?




एक अंध धार्मिक समाज, आलिम, मौलाना, परिवार जिस तरह की ब्रेन वाशिंग करता है, वैसा तो शायद ही दुनिया में कहीं होती होगी. और मदरसों से बड़े यातना शिविर मेरे हिसाब से दुनिया में और कोई नहीं होते हैं, जहां आप मासूमों को बीसों साल बन्द रख कर “हिल-हिल” कर अरबी भाषा की एक किताब रटने को बाध्य करते हैं, जिसका आज के सभ्य और इक्कीसवीं सदी के समाज से दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं होता है. जहां से निकले ज़्यादातर बच्चे सारी उम्र ऐसी निम्न स्तर की ज़िन्दगी जीते हैं, जो आप ख़ुद कभी जीना पसंद नहीं करते हैं. और ताज्जुब तो तब होता है जब अपने बच्चों को विदेश पढ़ने भेजने वाले मुसलमान मदरसों की वक़ालत करते हैं, ये किस तरह की ब्रेन वाशिंग के अंतर्गत आता है ?

मेरे हिसाब से हर देश को इस तरह के शिविरों की ज़रूरत है, जहां इंसानों को अंध-धार्मिकता से निकाल कर समाज के मूल वर्ग से जोड़ने का काम करना चाहिए. जहां लोगों को भर्ती कर के ये एहसास दिलाना ज़रूरी हो कि तुम जो मानते हो और समझते हो, वो सिर्फ़ हवाई और कोरी कल्पनाएं हैं और उन कल्पनाओं और कथाओं की वजह से तुम किसी भी व्यक्ति से नफ़रत नहीं कर सकते हो. जहां लोगों को ख़ूब ज़्यादा कला, नृत्य, अभिनय और विज्ञान की शिक्षा दी जाए और उनके जीने का मक़सद कला और विज्ञान बनाया जाय. जिनका जीने का मक़सद मरने के बाद स्वर्ग और हूरें हों, उनका इलाज कर के उन्हें दुनिया की ख़ूबसूरती देखने के लिए दृष्टि प्रदान की जाय. जो छुआछूत और जाति की बीमारी से ग्रस्त हैं, उन्हें सालों साल इन शिविरों में रखा जाय ताकि उनकी नस्लों से ये बीमारी निकाली जा सके.

असल तरीके से आतंकवाद से कैसे निपटा जाए ? मेरे हिसाब से इसे चीन से बेहतर कोई नहीं जानता है. चीन दरअसल मुसलमानों का भला कर रहा है और एक पूरी नस्ल को मिटने से बचा रहा है.




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Tags: अंध-धार्मिकताआतंकवादकट्टरपंथीचीनबिन सलमानमदरसेमनोवैज्ञानिक बीमारी
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