Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

जिन ताकतों की मजबूती बन हम खड़े हैं, वे हमारे बच्चों को बंधुआ बनाने को तत्पर है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 13, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

जिन ताकतों की मजबूती बन हम खड़े हैं, वे हमारे बच्चों को बंधुआ बनाने को तत्पर है

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
जो सोच सकते हैं, वे अपने बाल-बच्चों के बारे में भी नहीं सोचना चाहते कि जिन ताकतों की मजबूती बन कर हम खड़े हैं, वे हमारे बच्चों को बंधुआ बनाने को तत्पर हैं.

हमने देखा है बाबू ग्रेड की नौकरी करने वालों के ग्रेजुएट बेटों को स्विगी और जोमैटो में डिलीवरी ब्वाय की नौकरी करते, जो पैकेट डिलीवर करते वक्त अपने सिर से हेलमेट नहीं उतारते. हमने यह भी देखा है कि गांव में ऐंठ कर चलने वाले लोग महानगरों में दिहाड़ी की लाइन में लग कर खड़े हैं और दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद अपने कई-कई साथियों के साथ 10 बाय 8 के सीलन भरे अंधेरे कमरों को साझा करते हैं. इस मुकाम पर पहुंचने के बाद सब समान होते हैं, क्या जाति, क्या धर्म, क्या इलाका, क्या गोरा, क्या सांवला.!

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

ज़माना तेजी से बदला है और उससे भी तेजी से बदलता जा रहा है जीवनशैली. रोजगार का संकट और जीवन की अनिवार्यताओं से सामंजस्य बिठाते लोग मशीन बन कर रह गए हैं, जिन्हें चलाने वाले हाथों में संवेदना नाम की कोई चीज बाकी नहीं रह गई है. काहे की संवेदना…??? वे मुनाफे के लिये फैक्ट्री चला रहे हैं, न कि मनुष्यता की रक्षा के लिये ?

देखने की बात यह है कि कोरोना त्रासदी की आड़ में बचे-खुचे श्रम कानूनों का भी लोप कर कामगारों को फैक्ट्री मालिकों का बंधुआ बना देने वाले सरकारी फैसलों पर ऑफिसों में काम करने वाले बाबू ग्रेड के लोग क्या सोचते हैं ? गांवों में ऐंठ कर चलने वाले बबुआन क्या सोचते हैं ?

हालात जितने भी बदतर हों, महामारी फैल रही हो, लोग मौत के खौफ़ में जी रहे हों, बुधियार लोग हर हाल में लाभ उठाने की जुगत लगा ही लेते हैं. कोरोना की अफरातफरी का लाभ उठा कर पूंंजी के प्रभुओं के लिये मैदान साफ न किया तो खून में व्यापार कैसा ?

तो, जो सीधे रास्ते नहीं हो सकता था उसे महामारी के साये में करने का मौका मिल गया. न्यूनतम मजदूरी की बाध्यता खत्म, काम के घण्टे 8 के बदले 12, कामगारों का रिकार्ड रखने की कोई जरूरत नहीं. कोई चूं चपड़ करे, लात मार कर फैक्ट्री के गेट से बाहर करो. सत्ता सेवा में है, कानून कदमों में है.

पूंजी के प्रभु मां भारती की दुलारी औलादें हैं. विकास के वाहक भी, उसके असल उपभोक्ता भी. राष्ट्रवाद के असल लाभार्थी, जिनकी गिरफ्त में राष्ट्र के संसाधन हैं, जिनकी सहूलियत के लिये राष्ट्र के कानून हैं, जिनकी राहों को बुहारने के लिये राष्ट्र के नेता हैं – उनके लिये पैकेज है, टैक्स में छूट है, सस्ती दरों पर लोन है, थोड़ा बदनाम होने को तैयार हों तो लोन ले कर पचा जाने की सुविधा भी है.

उन्हीं में से किसी का प्यारा-सा डॉगी विदेश से हवाई जहाज से आया तो हवाई अड्डा पर खीसें निपोड़ते हुए डीएम साहब उसके लिये बिस्कुट लिये खड़े नजर आए. पता नहीं, किस मरदूद फोटोग्राफर ने फोटो खींच ली और वह वायरल भी हो गया.

अपने-अपने फ़्लैट्स की बालकनी में खड़े, लाकडाउन की बोरियत मिटाने को म्यूजिक सुनते बाबू लोग श्रम कानूनों को अगले तीन साल तक सस्पेंड किये जाने पर क्या सोच रहे होंगे ? गांवों के बबुआन क्या सोच रहे होंगे ?

लेकिन, हम क्यों यह उम्मीद करें कि वे सब इस पर सोच भी रहे होंगे. सोचने वाली नस्ल होती तो सरकारों की इतनी हिम्मत ही नहीं होती. आर्थिक विकास का पहिया तेज चले, इसके लिये कामगारों का खून चूसने वाली व्यवस्था एकाएक तो खड़ी नहीं हो गई. यह इसलिये खड़ी होती गई, क्योंकि सोचने वाले लोगों की कमी होती गई.

जो सोच सकते हैं, उन्हें अकेले कर देने की कोशिशों में व्यवस्था के पीछे वे लोग खड़े होते गए जो खुद के आगे सोचना ही नहीं चाहते कुछ. यहां तक कि अपने बाल-बच्चों के बारे में भी नहीं सोच सकते कि जिन ताकतों की मजबूती बन कर हम खड़े हैं, वे हमारे बच्चों को बंधुआ बनाने को तत्पर हैं.

कामगारों को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिये कि उनके साथ जो अन्याय हो रहा है, उसमें इस देश का खाता-पीता वर्ग कुछ भी सहानुभूति दिखाएगा. उनका मन मानवता के लिये बंजर हो चुका है.

कामगारों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी. अतीत में जिनके लिये लड़े, वे तमाम अधिकार खतरे में हैं. बहुत कुछ तो छिन चुका है. बचा-खुचा भी छीनने को तैयार है व्यवस्था.

हालांकि जो टीवी पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान देखते मुतमईन हैं, निश्चिंत वे भी नहीं रह पाएंगे. आग उनकी हदों तक भी जाएगी. लपटों की तपिश पहुंचने लगी है उन तक भी.

कोई नहीं बचने वाला है. जो भी कामगार है, छोटा हो या बड़ा हो, सरकारी हो कि प्राइवेट हो, मानवद्रोही व्यवस्था सबका लहू निचोड़ेगी. इसी लहू को पीकर तो पूंजी के पिशाच अतिरिक्त तंदुरुस्ती हासिल करते रहे हैं.

कोरोना ने अवसर दिया है तो सत्ता क्यों न अपना चरित्र दिखाए ? डर किस बात का ? शर्म किस बात की ? आखिर देश पर आपदा आई है और इस त्रासदी के वक्त में आप काम के घण्टे गिनते हैं ? मिनिमम वेजेज की उम्मीद करते हैं ? महंगाई भत्ते का हिसाब जोड़ते हैं ? जो कुछ आपका है वह देश का है और जो देश का है …? वह तो कब का उनकी जेब में जा चुका जिनके हितों के लिये श्रम कानूनों को सस्पेंड किया जा रहा है.

Read Also –

कोरोना काल : घुटनों पर मोदी का गुजरात मॉडल
हिन्दुत्व का रामराज्य : हत्या, बलात्कार और अपमानित करने का कारोबार
हिन्दुत्व का रामराज्य : हत्या, बलात्कार और अपमानित करने का कारोबार
पागल मोदी का पुष्पवर्षा और मजदूरों से वसूलता किराया
गोदामों में भरा है अनाज, पर लोग भूख से मर रहे हैं
हर संघी ब्राह्मणवाद और सामंतवाद का लठैत मात्र है 

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

आरएसएस का ‘राष्ट्रवादी मदरसा’

Next Post

मजदूरों का लोंग मार्च राजनीतिक प्रतिरोध नहीं है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

मजदूरों का लोंग मार्च राजनीतिक प्रतिरोध नहीं है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

जलभूमि

April 24, 2024

हमारा समाज और हमारा घर बच्चों का कत्लगाह बनता जा रहा है

September 19, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.