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केला बागान मज़दूरों के क़त्लेआम के 90 साल पूरे होने पर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 9, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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दिन में सिपाही पतलून के पांयचे मोड़कर गलियों में बहती पानी की धार में घूमते थे और बच्चों के साथ नावें दौड़ाते थे. रातों को सबके सोने के बाद, वे अपनी रायफल के कुन्दों से दरवाज़े तोड़कर गिरा देते, सन्दिग्ध लोगों को बिस्तरों से घसीटकर उठाते और उन्हें ऐसी यात्राओं पर लेकर जाते जहां से कोई वापस नहीं आता था. आदेश संख्या-4 के मुताबिक गुण्डों, हत्यारों, आगज़नी करने वालों और बाग़ि‍यों की खोज और उनका सफाया अब भी जारी था, लेकिन सेना पीड़ितों के रिश्तेदारों तक के सामने इससे इंकार करती थी जो किसी ख़बर की तलाश में कमाण्डेण्ट के दफ्तर में जुटे रहते थे. “तुम ज़रूर सपना देख रहे होगे,” अफ़सर ज़ोर देकर कहते. “माकोन्दो में कुछ नहीं हुआ है, कभी भी कुछ भी नहीं हुआ है, और कभी कुछ नहीं होगा. यह एक प्रसन्न शहर है.” और इस तरह आखि़रकार वे यूनियन के नेताओं का सफ़ाया करने में कामयाब हो गये.

जब पूंजीपतियों के हितों की बारी आती है तो देश का शासक वर्ग किसी भी हद तक कत्लेआम कर सकता है. क्या आपको याद नहीं कि 2012 में एक मैनेजर की मौत का बहाना बनाकर Maruti Suzuki हरियाणा में किस तरह ढाई हजार मजदूरों को काम से निकाल दिया गया था और 148 मजदूरों को 4 साल तक बिना जमानत के जेल में सड़ाया गया था ? क्या आपको याद नहीं कि 1984 में भोपाल में हजारों लोगों को वारेन एंडरसन ने मौत की नींद सुला दिया था और उसके बावजूद कांग्रेस की सरकार ने उसको देश से बाहर जाने दिया ? क्या आपको जलियांवाला बाग हत्याकांड याद है ? और आजाद भारत में अरवल नरसंहार तो याद होगी न आपको ?

जब आप ऐसे हत्याकांड सुनते हैं तो आप का रोम-रोम कांप उठता है. देश दुनिया में जहां कहीं भी मजदूर अपने हकों-अधिकारों के लिए उठते हैं, उनके ऊपर गोलियां बरसाई जाती है. 1 मई के शहीदों की बात हो या फिर उसके बाद पूरी दुनिया भर में हर रोज हो रहे हत्याकांडों की बात हो. आज आपको एक ऐसे ही हत्याकांड के बारे में बताएंगे. इस हत्याकांड को केला बागान नरसंहार के नाम से जाना जाता है और यह 5 से 6 दिसंबर 1928 में कोलंबिया के सिनेगा शहर के पास हुआ.

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दिसंबर 1928 में यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के केला बागान मजदूर हड़ताल पर थे. उनकी मांग थी कि उन्हें लिखित कॉन्ट्रैक्ट दिया जाए, 8 घंटे का कार्यदिवस लागू किया जाए, हफ्ते में 6 दिन ही काम हो और फूड कूपन हटाए जाएं. अमेरिका की शह पर वहां की सरकार ने मजदूरों को दबाने के लिए आर्मी भेजी और उसके बाद जो हत्याकांड हुआ वह दुनिया के सबसे खतरनाक हत्याकांडों में शुमार है. कहा जाता है कि इसमें 3000 से ज्यादा मजदूर मारे गए. गैब्रियल गार्सिया मार्केज ने अपने उपन्यास one hundred years of solitude में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है. आज आपको उसी उपन्यास का अंश हिंदी में भेज रहे हैं. इसका अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद सत्यम ने किया है.

केला बागान मज़दूरों के क़त्लेआम के 90 साल पूरे होने पर

नया औरेलियानो अभी एक वर्ष का था जब लोगों के बीच मौजूद तनाव बिना किसी पूर्व चेतावनी के फूट पड़ा. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो और अन्य यूनियन नेता जो अभी तक भूमिगत थे, एक सप्ताहान्त को अचानक प्रकट हुए और पूरे केला क्षेत्र के कस्बों में उन्होंने प्रदर्शन आयोजित किये. पुलिस बस सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखती रही लेकिन सोमवार की रात को यूनियन नेताओं को उनके घरों से उठा लिया गया और उनके पैरों में दो-दो पाउण्ड लोहे की बेड़ियां डालकर प्रान्त की राजधानी में जेल भेज दिया गया. पकड़े गये लोगों में खोसे आर्केदियो सेगुन्दो और लोरेंज़ो गाविलान भी थे. गाविलान मेक्सिको की क्रान्ति में कर्नल रहा था, जिसे माकोन्दो में निर्वासित किया गया था. उसका कहना था कि वह अपने साथी आर्तेमियो क्रुज़ की बहादुरी का साक्षी रहा था लेकिन उन्हें तीन महीने के भीतर छोड़ दिया गया क्योंकि सरकार और केला कम्पनी के बीच इस बात पर समझौता नहीं हो सका कि जेल में उन्हें खिलायेगा कौन. इस बार मज़दूरों का विरोध उनके रिहायशी इलाक़ों में साफ-सफाई की सुविधाओं की कमी, चिकित्सा सेवाओं के न होने और काम की भयंकर स्थितियों को लेकर था. इसके अलावा उनका कहना था कि उन्हें वास्तविक पैसों के रूप में नहीं बल्कि पर्चियों के रूप में भुगतान किया जाता है जिससे वे सिर्फ़ कम्पनी की दुकानों से वर्जीनिया हैम ख़रीद सकते थे. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को इसलिए जेल भेज दिया गया क्योंकि उसने यह भण्डाफोड़ किया कि पर्चियों की व्यवस्था के ज़रिए कम्पनी फलों से लदे अपने जहाज़ों के लिए धन जुटाती थी; ऐसा न होने पर कमीसरी का माल लेकर जाने वाले जहाज़ों को न्यू और्लियंस से केला बन्दरगाहों तक खाली लौटना पड़ता. अन्य शिकायतों के बारे में सब जानते थे.




कम्पनी के डाक्टर बीमारों की जांच नहीं करते थे बल्कि डिस्पेन्सरियों में उन्हें एक के पीछे एक लाइन लगाकर खड़ा कर दिया जाता था और एक नर्स उनकी जीभ पर तूतिया के रंग की गोली रख देती थी, चाहे उन्हें मलेरिया हो, गनोरिया या कब्ज़. यह इलाज इतना प्रचलित था कि बच्चे कई-कई बार लाइन में खड़े हो जाते थे और गोलियों को निगलने के बजाय खेलने के लिए उन्हें घर ले आते थे. कम्पनी के मज़दूर खस्ताहाल बैरकों में ठूंसकर रखे जाते थे. इंजीनियर शौचालय बनाने के बजाय क्रिसमस के समय कैम्पों में लाये जाने वाले हर पचास आदमियों पर एक सचल शौचालय खड़ा कर देते और इस बात का सार्वजनिक प्रदर्शन करके दिखाते कि उनका इस्तेमाल कैसे करें जिससे कि वे ज़्यादा समय तक चल सकें. काले कपड़ों में खस्ताहाल वकील जिन्होंने किसी समय कर्नल औरेलियानो बुएन्दिया को घेरकर सज़ा दिलायी थी अब केला कम्पनी द्वारा नियंत्रित थे और इन मांगों को ऐसे फैसलों से खारिज कर देते थे जो जादू का कारनामा प्रतीत होते थे. जब मज़दूरों ने सर्वसम्मति से याचिकाओं की एक सूची तैयार की तो उन्हें केला कम्पनी तक इसकी आधिकारिक सूचना पहुंचाने में लम्बा समय लग गया.

जैसे ही मि. ब्राउन को समझौते के बारे में पता चला उसने कांच से सजा अपना शानदार कोच ट्रेन से जोड़ा और अपनी कम्पनी के खास-खास प्रतिनिधियों को लेकर माकोन्दो से ग़ायब हो गया. फिर भी कुछ मज़दूरों ने उनमें से एक को अगले शनिवार को एक चकलाघर से ढूंढ़ निकाला और उसे मांगपत्रक की एक प्रति पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया. उस समय वह उस औरत के साथ नंगा ही था जिसने उसे फंसाने में मदद की थी. मनहूस वकीलों ने अदालत में दिखाया कि उस आदमी का कम्पनी से कोई लेना-देना नहीं था और किसी को उनकी दलीलों पर सन्देह न हो इसलिए उन्होंने जालसाज़ बताकर उसे जेल भिजवा दिया. बाद में, मि. ब्राउन को तीसरे दर्जे की कोच में भेष बदलकर यात्रा करते हुए अचानक पकड़ा गया और उन्होंने उससे मांगपत्रक की एक और प्रति पर हस्ताक्षर करवा लिये.




अगले दिन वह बाल काले करके और विशुद्ध स्पेनी बोलते हुए जजों के सामने प्रकट हुआ. वकीलों ने साबित कर दिया कि वह आदमी प्रैटविले, अलाबामा में जन्मा मि. जैक ब्राउन, केला कम्पनी का सुपरिटेन्डेन्ट नहीं बल्कि औषधीय जड़ी-बूटियां बेचने वाला एक बेचारा विक्रेता है, जो माकोन्दो में पैदा हुआ और जिसका नाम दागोबेर्तो फोन्सेका है. कुछ समय बाद मज़दूरों की नयी कोशिश को देखते हुए वकीलों ने मि. ब्राउन का मृत्यु प्रमाणपत्र सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया, जिस पर वाणिज्य दूतों और विदेश मंत्रियों के हस्ताक्षर थे और जो इस बात की गवाही देता था कि पिछली नौ जून को शिकागो में एक दमकल वाहन से कुचलकर उसकी मौत हो गयी थी. ऐसे शब्दजालों की भ्रान्तियों से थककर मज़दूरों ने माकोन्दो के अफसरों को छोड़ दिया और अपनी शिकायतों को ऊपर की अदालतों में ले गये. वहां पर हाथ की सफाई में माहिर वकीलों ने यह साबित कर दिया कि इन मांगों में सिर्फ़ इस वजह से कोई दम नहीं है कि केला कम्पनी की सेवा में कोई भी मज़दूर न तो है, न कभी था और न कभी होगा क्योंकि उन सभी को अस्थायी तौर पर और समय-समय पर भाड़े पर लिया जाता था. इसलिए वर्जीनिया हैम की कहानी बकवास थी, वैसे ही जैसे कि जादुई गोलियों और क्रिसमस के समय लगाये जाने वाले शौचालयों की बात बकवास थी, और अदालत के फैसले में यह तय पाया गया तथा गम्भीर आदेशों में इसे दर्ज कर दिया गया कि मज़दूरों का अस्तित्व ही नहीं था.

व्यापक हड़ताल शुरू हो गयी. बागानों में सारा काम बीच में रुक गया, फल पेड़ों पर सड़ने लगे और 120 डिब्बों वाली रेलगाड़ियां साइडिंग में खड़ी-की-खड़ी रहीं. काम से खाली मज़दूरों से कस्बों की सड़कें भर गयीं. ‘तुर्कों की सड़क’ पर शनिवार जैसे शोर-शराबे की गूंज कई दिनों तक चलती रही और होटल जेकब के पूल रूम में उन्हें चौबीस घण्टे की पालियों की व्यवस्था करनी पड़ी. जिस दिन यह घोषणा की गयी कि सेना को सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने की ज़िम्मेदारी दी गयी है, उस दिन खोसे आर्केदियो सेगुन्दो वहीं पर था. हालांकि वह अशुभ संकेतों में विश्वास करने वाला व्यक्ति नहीं था, लेकिन यह ख़बर उसके लिए एक ऐसी मृत्यु घोषणा के समान थी, जिसका इन्तज़ार वह बहुत पहले की उस सुबह से कर रहा था जब कर्नल जेरीनेल्डो मार्केस ने उसे एक व्यक्ति को मृत्युदण्ड दिये जाते हुए दिखाया था.




लेकिन इस अशुभ संकेत से उसकी गम्भीरता में कोई बदलाव नहीं आया. उसने तय योजना के अनुसार कार्रवाई की और वह निशाने पर बैठी. कुछ ही देर बाद नगाड़ों की आवाज़ों, बिगुल के तीखे स्वर और लोगों के चीखने और दौड़ने की ध्वनियों से उसे पता चल गया कि न सिर्फ पूल का गेम ख़त्म हो गया है बल्कि वह निःशब्द और एकाकी खेल भी पूरा हो चुका है, जो वह उस दिन भोर में हुए मृत्युदण्ड के बाद से अपने-आप से खेल रहा था. फिर वह बाहर सड़क पर चला गया और उन्हें देखा. वहां तीन रेजीमेण्टें थीं और गैली ड्रम की थाप पर उनके कदम मिलाकर चलने से धरती कांप रही थी. कई सिर वाले ड्रैगन की तरह उनके फुफकारने से दोपहर की चमक एक ज़हरीली वाष्प से भर गयी थी. वे कद में छोटे, दोहरे बदन के पशुवत लोग थे. घोड़े की तरह उनका पसीना बह रहा था और उनमें धूप में कमाये हुए चमड़े की गन्ध और पहाड़ी लोगों जैसी ख़ामोश और अभेद्य दृढ़ता का पता चल रहा था.

हालांकि उन्हें गुज़रने में एक घण्टे से अधिक निकल गया, मगर कोई यह सोच सकता था कि वास्तव में कुछ दस्ते ही गोल दायरे में मार्च कर रहे थे क्योंकि वे सब बिल्कुल एक जैसे, एक ही कुतिया के ज़ाये हुए दिखते थे, और बिल्कुल एक जैसी उदासीनता के साथ वे अपने थैलों और पानी के कैन का बोझ, संगीन लगी हुई अपनी रायफलों की शर्म और अन्ध आदेशपालन तथा गौरव की भावना को लादे हुए थे. आर्सुला ने छाया में लगे अपने बिस्तर से उन्हें गुज़रते हुए सुना और उसने उंगलियों से सलीब का निशान बनाया. सान्ता सोफिया दे ला पिएदाद क्षण भर के लिए कढ़ाईदार मेज़पोश पर इस्तरी करते हुए झुकी और अपने बेटे खोसे अर्कादियो सेगुन्दो के बारे में सोचा जो कि चेहरे का भाव बदले बिना होटल जेकब के दरवाज़े से गुज़रते हुए अन्तिम सिपाहियों को देख रहा था.




मार्शल-लॉ से सेना को विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अधिकार मिल गया, लेकिन समझौते की कोई कोशिश नहीं की गयी. माकोन्दो में पहुंचने के साथ ही सिपाहियों ने अपनी रायफलें रख दीं और केले काटकर लादने शुरू कर दिये और रेलगाड़ियों को चालू कर दिया. मज़दूर अब तक बस उन्हें देख ही रहे थे पर अब वे बस अपने कटाई के हंसुओं को लेकर जंगल में चले गये और उन्होंने हड़ताल तोड़ने की कोशिशों के ख़लिफ़ तोड़फोड़ शुरू कर दी. उन्होंने बागानों और कमिसारियों में आग लगा दी, मशीनगनों से गोलियां बरसाते हुए रास्ता खोल रही रेलगाड़ियों की आवाजाही बाधित करने के लिए पटरियों को उखाड़ फेंका और टेलीग्राफ तथा टेलीफोन के तार काट दिये. सिंचाई की नालियां खून से लाल हो गयीं. मि. ब्राउन, जो कि बिजली के तारों से घिरे हुए मुर्गीबाड़े में छिपे थे, उन्हें उनके तथा उनके अन्य देशवासियों के परिवारों सहित माकोन्दो से निकालकर सेना के पहरे में सुरक्षित जगह पर भेज दिया गया. हालात ख़ूनी और असमान गृहयुद्ध की ओर बढ़ने का संकेत दे रहे थे जब अधिकारियों ने मज़दूरों से माकोन्दो में इकट्ठा होने के लिए कहा. बुलावे में घोषणा की गयी कि प्रान्त के नागरिक और सैनिक नेता संघर्ष में हस्तक्षेप करने के लिए अगले शुक्रवार की सुबह पहुंचेंगे.

खोसे आर्केदियो सेगुन्दो उस भीड़ में मौजूद था जो शुक्रवार की अलस्सुबह से ही स्टेशन पर जमा हो गयी थी. उसने यूनियन के नेताओं की एक बैठक में भाग लिया था और उसे कर्नल गाविलान के साथ यह ज़िम्मेदारी दी गयी थी कि भीड़ में घुले-मिले और घटनाएं जो भी मोड़ लें उसके मुताबिक भीड़ को दिशा दे. उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही थी और उसकी ज़ुबान पर नमकीन-सी परत जमने लगी थी, जब उसका ध्यान गया कि सेना ने छोटे-से चौक के चारों तरफ़ मशीनगनें तैनात कर दी थीं और तारों से घिरे केला कम्पनी के इलाक़े की रक्षा के लिए तोपें लगा दी गयी थीं. क़रीब 12 बजे थे, एक ऐसी ट्रेन का इन्तज़ार करते हुए, जो आ ही नहीं रही थी, तीन हज़ार से ज़्यादा लोग, मज़दूर, औरतें और बच्चे स्टेशन के सामने की खुली जगह में न समाकर आसपास की सड़कों में जाने की ठेलमठेल कर रहे थे, जिन्हें सेना ने मशीनगनों की कतारों से बन्द कर दिया था.




उस समय यह सब प्रतीक्षारत भीड़ से कहीं अधिक मौज-मस्ती वाले मेले जैसा लग रहा था. तुर्कों की सड़क से पकौड़ों और शर्बत का स्टैंड चौक में ले आया गया था और इन्तज़ार की ऊब और चिलचिलाती धूप का सामना कर रहे लोग खुश नज़र आ रहे थे. तीन बजे के कुछ पहले यह अफ़वाह फैल गयी कि सरकारी गाड़ी अगले दिन से पहले नहीं आने वाली. भीड़ से निराशा की एक आह उभरी. इसके बाद सेना का एक लेफ्टीनेण्ट स्टेशन की छत पर चढ़ गया जहां भीड़ पर निशाना साधे हुए चार मशीनगनें तैनात थीं और चिल्लाकर लोगों से चुप रहने के लिए कहा. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो के बगल में एक बहुत मोटी नंगे पांव औरत थी जिसके साथ चार और सात साल के बीच की उम्र के दो बच्चे थे. छोटे बच्चे को उसने गोद में उठा रखा था और खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को बिना पहचाने उसने पूछा कि क्या वह दूसरे वाले को उठा लेगा ताकि वह ठीक से सुन सके. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो ने बच्चे को अपने कन्धों पर उठा लिया.

कई साल बाद भी वह बच्चा बताता था, हालांकि लोग विश्वास नहीं करते थे, कि उसने लेफ्टीनेण्ट को एक पुराने फोनोग्राफ हॉर्न के ज़रिए प्रान्त के नागरिक एवं सैनिक नेता के आदेश संख्या-4 को पढ़कर सुनाते हुए सुना था. उस पर जनरल कार्लोस कोर्तेस वार्गास और उसके सेक्रेटरी मेजर एनरिक गार्सिया इसाज़ा के हस्ताक्षर थे, और अस्सी शब्दों के तीन अनुच्छेदों में उसने हड़तालियों को “गुण्डों की जमात” घोषित किया था और सेना को जान लेने के इरादे से गोली चलाने का अधिकार दे दिया था.




आदेश पढ़े जाने के बाद, विरोध के ज़बर्दस्त शोर के बीच ही, एक कैप्टन ने स्टेशन की छत पर लेफ्टीनेण्ट की जगह ले ली और उसी हॉर्न से उसने इशारा किया कि वह बोलना चाहता है. भीड़ फिर ख़ामोश हो गयी.

“देवियो और सज्जनो,” कैप्टन ने धीमी और थकी-सी आवाज़ में कहा, “आपके पास यहां से हट जाने के लिए पांच मिनट हैं.”

दोगुने ज़ोर से होने वाले शोर और चिल्लाहटों में गिनती की शुरुआत की घोषणा करने वाले बिगुल की आवाज़ खो गयी. कोई अपनी जगह से हिला नहीं.

“पांच मिनट बीत चुके हैं,” कैप्टन ने उसी स्वर में कहा. “एक और मिनट के बाद हम गोली चलाना शुरू कर देंगे.”




खोसे आर्केदियो सेगुन्दो, जिसे ठण्डे पसीने छूट रहे थे, ने बच्चे को नीचे उतारकर उस औरत को दे दिया. “ये हरामी सच में गोली चला सकते हैं,” वह बुदबुदायी. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को बोलने का मौक़ा नहीं मिला क्योंकि उसी क्षण उसने कर्नल गाविलान की भर्रायी आवाज़ को पहचान लिया जो उस औरत के शब्दों को चीखते हुए दोहरा रहा था. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो उस तनाव और ख़ामोशी की चमत्कारी गहराई से उन्मत्त-सा था और उसे इस बात का यकीन हो गया था कि कोई भी बात उस भीड़ को टस-से-मस नहीं कर सकती थी, जिसे मौत के मुग्धकारी आकर्षण ने आगोश में ले रखा था. वह अपने सामने वाले सिरों से ऊपर उचका और जीवन में पहली बार ऊँची आवाज़ में बोला :

“हरामज़ादो!” वह चिल्लाया. “उस एक और मिनट को लेकर अपने पिछवाड़े में घुसेड़ लो !”

उसके चिल्लाने के बाद कुछ ऐसा हुआ जिससे डर नहीं बल्कि एक तरह का मतिभ्रम पैदा हुआ. कैप्टन ने गोली चलाने का हुक़्म दिया और चौदह मशीनगनों ने एक साथ उसकी तामील की लेकिन यह सब किसी स्वांग जैसा लग रहा था. मानो मशीनगनों में खाली खोखे भरे हों, क्योंकि उनकी हांफती तड़तड़ाहट तो सुनायी देती थी और उनका आग उगलना भी चमक के साथ दिख रहा था, लेकिन हल्की-सी भी प्रतिक्रिया नज़र नहीं आ रही थी, कोई चीख़ नहीं, सटकर खड़ी भीड़ के बीच से कोई आह तक नहीं. लगता था जैसे भीड़ अचानक मिली अभेद्यता के कारण पथरा गयी हो. अचानक, स्टेशन के एक ओर से, मौत की एक चीख जादू के असर को फाड़कर गूंज उठीः “आ … आह, माँ !” भीड़ के केन्द्र में धरती को हिलाती हुई एक आवाज़, ज्वालामुखी का उच्छवास, महाविपदा का शोर फूट पड़ा जिसे तेज़ी से फैलते जाना था. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को मुश्किल से बच्चे को उठाने का समय मिला जबकि दूसरे बच्चे के साथ मां भीड़ में उठी दहशत की भंवर में समा गयी.




बहुत साल बाद भी वह बच्चा लोगों को बताता था कि किस तरह खोसे आर्केदियो सेगुन्दो ने उसे अपने सिर के ऊपर उठा लिया था और वह मानो भीड़ की दहशत पर तैरते हुए पास की गली में ले जाया गया था. हालांकि इसे सुनकर लोग उसे सनकी बूढ़ा समझते थे. उस खास स्थिति से बच्चा यह देख सकता था कि उन्मत्त भीड़ कोने की ओर जाने की कोशिश कर रही थी और मशीनगनों की कतार ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं.

एक साथ कई आवाजें चीख उठीं : “लेट जाओ ! लेट जाओ !”

गोलियों की लहर ने आगे वाले लोगों को पहले ही सुला दिया था. बचे हुए लोग लेटने के बजाय वापस छोटे चौक में जाने की कोशिश करने लगे और दहशत ड्रैगन की फटकारती पूंछ की तरह भीड़ को एक के बाद एक लहरों में रास्ते के दूसरी ओर दूसरे ड्रैगन की पूंछ की ओर धकेलने लगी, जहां मशीनगनें बिना रुके आग उगल रही थीं. वे चारों ओर से घिर गये थे, और एक विराट भंवर की तरह चक्कर काट रहे थे जो धीरे-धीरे अपने उत्केन्द्र तक सिमटता जा रहा था क्योंकि मशीनगनों की भूखी और क्रमबद्ध कैंचियां प्याज़ छीलने की तरह भंवर के किनारों को व्यवस्थित ढंग से काटती जा रही थीं. बच्चे ने देखा कि एक औरत भगदड़ के बीच रहस्यमय ढंग से खाली जगह में सलीब की तरह बांहें फैलाये हुए घुटनों के बल झुकी थी. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो ने बच्चे को ऊपर बिठाया ही था कि वह ख़ून से सना चेहरा लिये गिर पड़ा, और ठीक इसके बाद सैनिकों की भारी टुकड़ी ने खाली जगह, घुटनों पर झुकी औरत, ऊंचे, सूखाग्रस्त आसमान की रोशनी और उस छिनाल दुनिया को मिटा डाला जहां उर्सुला इग्वारान ने इतने ढेर सारे मिठाई के जानवर बेचे थे.




जब खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को होश आया तो वह अंधेरे में पीठ के बल लेटा था. उसे अहसास हुआ कि वह एक अन्तहीन और बेआवाज़ रेलगाड़ी में सवार था और उसका सिर सूखे ख़ून से सना था और उसकी तमाम हड्डियों में दर्द समाया था. उसे सो जाने की असहनीय इच्छा हो रही थी. वह दहशत और भयावह आतंक से सुरक्षित कई घण्टों तक सोने को तैयार था, और उसने जिस करवट दर्द कम था उस तरफ होकर खुद को सुविधाजनक बनाया, और तभी उसे पता चला कि वह मृत लोगों की बगल में लेटा हुआ है. गाड़ी के डिब्बे में बीच के गलियारे के अलावा ज़रा भी ख़ाली जगह नहीं थी. हत्याकाण्ड के बाद से निश्चित ही कई घण्टे बीत चुके थे क्योंकि लाशों का तापमान शिशिर ऋतु में प्लास्टर जैसा था और वे पथराये फोम जैसी ही हो गयी थीं, और जिन लोगों ने उन्हें डिब्बे में डाला था, उनके पास उसी ढंग से लाशों की ढेरियां लगाने का समय था, जिस ढंग से वे केलों के गुच्छों को लदवाते थे.

इस दुःस्वप्न से भाग निकलने की कोशिश में खोसे आर्केदियो सेगुन्दो गाड़ी के चलने की दिशा में एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में खुद को घसीटकर ले जाता रहा, और सोये हुए कस्बों से होकर गुज़रते हुए लकड़ी के पटरों के बीच से छनकर आती रोशनी में उसने देखी पुरुषों की लाशें, औरतों की लाशें, बच्चों की लाशें जिन्हें खराब केलों की तरह समुद्र में फेंक दिया जाना था. वह सिर्फ चौक में शर्बत बेचने वाली एक औरत और कर्नल गाविलान को पहचान सका जिसके हाथ में अब भी मोरेलिया सिल्वर के बकलस वाली पेटी लिपटी थी, जिसकी मदद से उसने दहशत के बीच से रास्ता बनाने की कोशिश की थी.




जब वह पहले डिब्बे में पहुंचा तो अंधेरे में कूद गया और गाड़ी के गुज़रने तक पटरियों के किनारे लेटा रहा. इतनी लम्बी गाड़ी उसने पहले नहीं देखी थी जिसमें लगभग दो सौ माल ढोने के डिब्बे थे और दोनों सिरों के अलावा बीच में भी एक इंजन लगा था. उसमें कोई रोशनी नहीं थी, लाल और हरी संचालन बत्तियां भी नहीं थीं और वह एक निशाचरी और गुपचुप वेग से सरसराती चली जा रही थी. डिब्बों के ऊपर अपनी मशीनगनों के साथ तैनात सैनिकों की काली आकृतियां दिख रही थीं.

आधी रात के बाद बादल फट पड़ा और मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी. खोसे आर्केदियो सेगुन्दो को पता नहीं था कि वह किस जगह पर कूदा था लेकिन उसे मालूम था कि गाड़ी के विपरीत दिशा में चलते जाने से वह माकोन्दो पहुंच जायेगा. तीन घण्टे से अधिक चलते रहने के बाद उसे भोर की रोशनी में पहले घर दिखने लगे. वह बुरी तरह भीगा था और उसका सिर दर्द से फट रहा था. कॉफी की महक से आकर्षित होकर वह एक रसोई में चला गया जहां एक औरत गोद में बच्चे को लिये हुए चूल्हे पर झुकी हुई थी.




“हेलो,” बुरी तरह थके स्वर में उसने कहा. “मैं खोसे आर्केदियो सेगुन्दो बुएन्दिया हूं.” उसने एक-एक स्वर पर बल देकर अपना पूरा नाम बोला ताकि औरत को यकीन दिला सके कि वह ज़िन्दा है. ऐसा करके उसने अक्लमन्दी दिखाई क्योंकि ख़ून से सने सिर और कपड़ों तथा मौत की गम्भीर छाया में लिपटी गन्दी और भुतहा-सी आकृति को दरवाजे़ से आते देखकर औरत ने सोचा था कि वह कोई भूत है. उसने उसे पहचान लिया. उसने शरीर पर लपेटने के लिए उसे एक कम्बल दिया ताकि उसके कपड़े सुखाये जा सकें. थोड़ा पानी गरम करके उसने उसके घाव को साफ किया, जो सिर्फ मांस में था और सिर पर पट्टी बांधने के लिए बच्चे का एक साफ़ लंगोट दिया. फिर उसने उसे बिना चीनी वाली कॉफी का प्याला दिया क्योंकि उसने सुना था कि बुएन्दिया परिवार में इसी तरह कॉफी पी जाती थी और उसके कपड़े आग के पास पसार दिये.

खोसे आर्केदियो सेगुन्दो कॉफी खत्म करने तक कुछ नहीं बोला.

“वे कम से कम तीन हज़ार रहे होंगे,” वह बुदबुदाया.

“क्या ?”

“मरने वाले,” उसने साफ किया. “वे सारे के सारे लोग रहे होंगे जो स्टेशन पर थे.”




औरत ने दया भरी नज़र से उसे ऊपर से नीचे तक देखा. “यहां कोई नहीं मरा है,” वह बोली. “आपके चाचा, कर्नल साहब, के समय से माकोन्दो में कुछ नहीं हुआ है.” खोसे आर्केदियो सेगुन्दो घर पहुंचने से पहले जिन तीन रसोईघरों में रुका वहां उसे यही बात बतायी गयी. “किसी की मौत नहीं हुई थी.” वह स्टेशन के पास वाले छोटे चौक में गया और उसने एक के ऊपर एक रखे पकौड़े के खोमचों को देखा और उसे हत्याकाण्ड का कोई सुराग़ भी नहीं मिला. लगातार बारिश में सड़कें वीरान थीं और घरों के दरवाजे़ बन्द थे, भीतर जीवन का कोई निशान नहीं था. इन्सान का सिर्फ़ एक संकेत था गिरजे की घण्टियों की आवाज़. उसने कर्नल गाविलान का दरवाज़ा खटखटाया. एक गर्भवती औरत जिसे उसने कई बार देखा था, ने उसे देखते ही दरवाज़ा बन्द कर दिया. “वह चले गये,” डरे हुए स्वर में वह बोली. “वह अपने देश वापस लौट गये.” तार की जाली वाले मुर्गीबाड़े के मुख्य प्रवेशद्वार पर हमेशा की तरह दो स्थानीय पुलिस वाले तैनात थे, जो बारिश में बरसाती और रबर के बूट पहने हुए पत्थर के बने दिख रहे थे. किनारे वाली अपनी गली में वेस्टइंडीज के हब्शी शनिवारी भक्तिगीत गा रहे थे.




खोसे आर्केदियो सेगुन्दो आंगन की दीवार फांदकर रसोई के रास्ते घर में चला गया. सान्ता सोफिया दे ला पिएदाद मुश्किल से बोल पायी. “फर्नान्दा के सामने मत आना,” वह बोली. “वह बस अभी उठ ही रही है.” वह अपने बेटे को प्रसाधन कक्ष में लेती गयीं मानो पहले से तय किसी समझौते को लागू कर रही हों, उसके लिए मेलक्यादेस की टूटी खाट बिछा दी और दोपहर में दो बजे जब फर्नान्दा सो रही थी, उन्होंने खिड़की के जरिए उसे खाने की थाली पकड़ायी.

औरेलियानो सेगुन्दो घर पर ही सोया था क्योंकि बारिश ने उसे रोक दिया था और दोपहर के तीन बजे भी वह उसके रुकने का इन्तज़ार कर रहा था. सान्ता सोफिया दे ला पिएदाद से गुपचुप मिली सूचना पर वह उसी समय मेलक्वादेस के कमरे में अपने भाई से मिलने आया. उसने भी हत्याकाण्ड या समुद्र की ओर जा रही लाशों से भरी रेलगाड़ी की दुःस्वप्न जैसी यात्रा पर विश्वास नहीं किया. पिछली रात को उसने राष्ट्र के नाम एक असाधारण उद्घोषणा पढ़ी थी जिसमें कहा गया था कि मज़दूर स्टेशन से हट गये थे और शान्तिपूर्ण समूहों में अपने-अपने घर लौट गये थे.




उद्घोषणा में यह भी कहा गया था कि यूनियन के नेताओं ने महान देशभक्तिपूर्ण भावना दर्शाते हुए अपनी मांगों को दो बिन्दुओं में समेट दिया था : चिकित्सा सेवाओं में सुधार और रिहायशी बस्तियों में शौचालयों का निर्माण. बाद में कहा गया कि जब सैनिक अधिकारियों को मज़दूरों के साथ समझौते की प्रति मिली तो उन्होंने फौरन मि. ब्राउन को इसकी जानकारी दी तो उसने न केवल नयी शर्तों को स्वीकार कर लिया बल्कि टकराव के अन्त का जश्न मनाने के लिए तीन दिन के सार्वजनिक समारोह का पैसा देने का भी प्रस्ताव किया. बस जब सेना ने उससे पूछा कि वे समझौते पर हस्ताक्षर की घोषणा किस तारीख को कर सकते हैं, तो उसने खिड़की से आसमान में चमकती बिजली को देखा और इशारे से शक ज़ाहिर किया.

“जब बारिश रुक जाये,” उसने कहा. “जब तक बारिश हो रही है हम सारी गतिविधियां स्थगित कर रहे हैं.”




तीन महीने से बारिश नहीं हुई थी और सूखा पड़ा हुआ था. लेकिन जब मि. ब्राउन ने अपने फैसले की घोषणा की तो पूरे केला बागान क्षेत्र में मूसलाधार बारिश फैल गयी. माकोन्दो लौट रहे खोसे आर्केदियो सेगुन्दो का सामना इसी बारिश से हुआ था. एक सप्ताह बाद भी बारिश जारी थी. आधिकारिक बयान, जिसे सरकार के हाथ में संचार के हर माध्यम के ज़रिए हज़ारों बार दोहराया और पूरे देश में तरह-तरह से पेश किया गया था, आखिरकार स्वीकार कर लिया गया : किसी की मौत नहीं हुई थी, सन्तुष्ट मज़दूर अपने परिवारों के पास लौट गये थे, और केला कम्पनी बारिश रुकने तक समस्त गतिविधियां स्थगित कर रही थी.




अन्तहीन बारिश के कारण होने वाली आपदा के चलते आपातकालीन कदम उठाने की ज़रूरत को देखते हुए मार्शल-लॉ जारी रहा लेकिन सैनिक बैरकों में ही रहे. दिन में सिपाही पतलून के पांयचे मोड़कर गलियों में बहती पानी की धार में घूमते थे और बच्चों के साथ नावें दौड़ाते थे. रातों को सबके सोने के बाद, वे अपनी रायफल के कुन्दों से दरवाज़े तोड़कर गिरा देते, सन्दिग्ध लोगों को बिस्तरों से घसीटकर उठाते और उन्हें ऐसी यात्राओं पर लेकर जाते जहां से कोई वापस नहीं आता था. आदेश संख्या-4 के मुताबिक गुण्डों, हत्यारों, आगज़नी करने वालों और बाग़ि‍यों की खोज और उनका सफाया अब भी जारी था, लेकिन सेना पीड़ितों के रिश्तेदारों तक के सामने इससे इंकार करती थी जो किसी ख़बर की तलाश में कमाण्डेण्ट के दफ्तर में जुटे रहते थे. “तुम ज़रूर सपना देख रहे होगे,” अफ़सर ज़ोर देकर कहते. “माकोन्दो में कुछ नहीं हुआ है, कभी भी कुछ भी नहीं हुआ है, और कभी कुछ नहीं होगा. यह एक प्रसन्न शहर है.” और इस तरह आखि़रकार वे यूनियन के नेताओं का सफ़ाया करने में कामयाब हो गये.

  • यूनाईटिंग वर्किंग क्लास से साभार





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