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डिक्टेटरशिप के तहत सांस लेती दुनिया बिना प्रेस की मदद के नहीं आती है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 8, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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रविश कुमार

दुनिया में तानाशाही से जुड़ी इतनी ख़बरें आती हैं कि हम डिक्टेटर न्यूज़ नाम से एक बुलेटिन बनाने की सोचने लगे. इतनी डेमोक्रेसी तो अभी बची ही हुई है कि अच्छा खासा डिक्टेटर न्यूज़ तैयार किया जा सकता है. वैसे भी फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के अनुसार 20 प्रतिशत आबादी ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में रहती है. फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के भीतर यह चार्ट मिला. ऐसा नक्शा भूगोल की किताबों में होता है, जिसमें मिट्टी के स्तरों के बारे में जानकारी दी होती है.

बैंगनी रंग वाले हिस्से के लोग गुलाम का जीवन जी रहे हैं. इससे पता चल रहा है कि 2005 में 46 प्रतिशत आबादी आज़ादी का जीवन जी रही थी जो अब घट कर 20 प्रतिशत हो गई है. पीले रंग वाले हिस्से में वो लोग हैं जो आंशिक आज़ादी में जी रहे हैं. जो 2005 में आंशिक आज़ादी जीने वाली आबादी मात्र 17 प्रतिशत थी लेकिन 2021 में 41 प्रतिशत आबादी आंशिक रुप से आज़ादी में जी रही है.

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इसका मतलब है कि आज की दुनिया तरह-तरह की डिक्टेटरशिप के तहत सांस लेने लगी है. यह सही समय है कि एक ग्लोबल मगर उससे पहले लोकल डिक्टेटर न्यूज़ लांच किया जाए. हम अभी निरंकुशवादी और तानाशाही सरकारों की परिभाषाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते, इनके बीच के अंतरों को आप क्लास रुम में ही समझें, लेकिन इन सभी में इतनी समानताएं हैं कि सुविधा के लिए इनके लिए एक ही कैटगरी का इस्तेमाल किया जा सकता है. हमने डिक्टेटर न्यूज़ के लांच के लिए यह खास एनिमेशन बनाया है. इसमें ऐंकर और रिपोर्टर केवल तानाशाह की भाषा बोलते हैं इसलिए दोनों की शक्ल पर हिटलर का चेहरा लगा दिया है.

आप जानते हैं कि बिना प्रेस की मदद के तानाशाही नहीं आती है तो डिक्टेटर न्यूज़ बिना हिटलर के चेहरे के कैसे बन सकता है ? एक और बात हमने डिक्टेटर न्यूज़ के लांच समारोह के लिए किसी मुख्य अतिथि को नहीं बुलाया है क्योंकि इसके लिए जिस किसी योग्य व्यक्ति को बुलाता, वह बुरा मान जाता. हो सकता है कि डिक्टेटर न्यूज़ देखने के बाद योग्य लोग नाराज़ हो जाएं और कहें कि क्यों नहीं बुलाया, तब मैं उनके लिए एक और लांच समारोह कर दूंगा. डिक्टेटर न्यूज़ दुनिया का पहला न्यूज़ बुलेटिन है,इसलिए आराम से सीट बेल्ट बांध कर देखिए.

हमने डिक्टेटर न्यूज़ के हेडलाइन बार यानी दंडिका के किनारे हिटलर की तस्वीर लगाने का फैसला किया है. डिक्टेटर न्यूज़ की डीपी में हिटलर का फोटो न हो, यह हिटलर का अपमान होगा. तानाशाहों का फोटो भले अलग हो लेकिन हर कोई उनमें झांक कर हिटलर को ही देखता है. डिक्टेटर न्यूज़ में पहली खबर हिटलर से ही जुड़ी हुई है. हिटलर की आत्मा दुनिया भर भटक रही है और उसका सामान नीलाम हुआ जा रहा है. यह उसकी घड़ी है जो अमरीका में नीलाम हुई है. हिटलर जब 44 साल का हुआ तब उसके जन्मदिन पर यह घड़ी तोहफे में दी गई थी. यहूदी नेताओं ने पत्र लिखकर नीलामी रद्द करने की मांग की लेकिन नीलामी करने वाले ने कहा कि इसे खरीदने वाला अपने निजी संग्रह का हिस्सा बनाकर रखेगा. इस तरह से इतिहास का हिस्सा बचा रहेगा. 10 लाख डॉलर में यह घड़ी बिकी है.

डिक्टेटर न्यूज़ के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि शुरूआत ही हिटलर के नाम से हो रही है. आज तो ग्रह नक्षत्रों ने बड़ी कृपा बरसा दी. हिटलर की घड़ी नीलाम हुई है मगर उसका समय आज तक दुनिया से नीलाम नहीं हो सका. ऐसा कोई धनवान नहीं जो हिटलर के समय को ही खरीद ले और दुनिया को तानाशाही से मुक्त करा दे. बिल गेट्स और मस्क से ज्यादा उम्मीद न रखें. डिक्टेटर न्यूज़ में दूसरी ख़बर ट्यूनिशिया से है.

ट्यूनिशिया नाम के देश में जहां 2011 में अरब क्रांति हुई थी, उसकी खूब चर्चा हुई थी कि वहां एक तानाशाह आया है, जिसके संविधान संशोधन के समर्थन में 94 प्रतिशत वोट मिलने का दावा किया जा रहा है. इनका नाम राष्ट्रपति कायस साईद है. नए संविधान के अनुसार, अब यही सरकार बनाएंगे, मंत्री चुनेंगे, संसद के अधिकार सीमित होंगे. ये जब चाहते हैं, जजों को पद से हटा देते हैं. इन्होंने चुनाव आयोग पर भी कब्ज़ा जमा लिया है. राजनीतिक दलों को किनारे कर दिया है. ट्यूनिशिया में भी ज़बरदस्त आर्थिक संकट है, लोगों को तनख्वाहें नहीं मिल रही हैं, मगर तानाशाही की मौज चल रही है.

डिक्टेटर न्यूज़ में तीसरी खबर है कि कनाडा के एक प्रोफेसर ने अपने अध्ययन से बताया है कि अमरीका में 2030 में तानाशाही आ जाएगी. डिक्टेटर न्यूज़ की चौथी ख़बर अर्जेंटिना से आने जा रही है. यहां सेना के 19 पूर्व अधिकारियों को जेल की सज़ा सुनाई गई है. इन लोगों ने 70 और 80 के दशकों में बड़ा ज़ुल्म किया था. इस समय अर्जेंटीना में महंगाई 60 फीसदी है और बेरोज़गारी 42 प्रतिशत. लोगों ने काम करना बंद कर दिया है क्योंकि वहां किसी को सैलरी नहीं मिल पा रही है. गनीमत है भारत इससे बचा हुआ है.

डिक्टेटर न्यूज़ की अगली खबर म्यांमार से है. संयुक्त मानवाधिकार आयोग के विशेषज्ञों ने म्यांमार के सैनिक शासन की निंदा की है. कहा है कि इंटरनेट पर अंकुश लगाकर सैनिक शासन डिजिटल डिक्टेटरशिप कायम कर रही है. यह डिक्टेटरों की दुनिया का नया आइटम सांग है. कोई भी कुछ लिख देता है तो पकड़ कर जेल में डाल डेते हैं. जनता की आवाज़ जनता तक न पहुंचे इसके लिए इंटरनेट बंद कर देते हैं. म्यांमार में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले कई कार्यकर्ताओ को फांसी पर लटका दिया गया है.

एक डेमोक्रेटिक कंट्री में डिक्टेटर न्यूज़ सुनना कैसा लगता है, यह वैसा ही सवाल है जैसा टीवी का रिपोर्टर दुर्घटना के वक्त भी पूछता ही पूछता है कि आपको कैसा लगता है ? इसलिए हम यह सवाल नहीं पूछेंगे. डिक्टेटर न्यूज़ में अगली खबर है ज़िम्बाब्वे से, जहां 80 के दशक में एक राष्ट्रपति हुए थे जिनका नाम था कनान बनाना. इनका काम तो ख़राब था ही, लेकिन नाम ऐसा था कि जनता इनके खराब कामों पर अपनी चिढ़ निकालने के लिए नाम का मज़ाक उड़ाती थी. तो बनाना ने एक कानून पास करवा दिया कि कोई भी बनाना का मज़ाक नहीं बनाएगा. बनाएगा तो बनाना जेल भेज देगा. इस कानून को वहां ‘इंसल्ट लॉ’ कहते हैं, आज भी लागू है, पूरा नाम इस तरह से है – insulting or undermining the authority of the president. अगर आपने राष्ट्रपति का इंसल्ट किया तो एक साल तक की जेल हो सकती है. यह कानून अभी तक वजूद में है.

ज़िम्बाब्वे के मौजूदा राष्ट्रपति मंगाग्वा ने एक पत्रकार को जेल में डाल दिया है क्योंकि पत्रकार ने उनके खिलाफ टिप्पणी कर दी थी. पत्रकार के खिलाफ ‘इंसल्ट लॉ’ का इस्तेमाल किया गया है. आप गूगल सर्च कीजिए कि क्या भारत में प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने वालों या मज़ाक करने वालों को कभी गिरफ्तार किया गया है ? यह काम आप खुद से करें. जब दुनिया तानाशाही की भांति-भांति ख़बरों से भरी हो तो डिक्टेटर न्यूज़ के बारे में किसी ने क्यों नहीं सोचा ?

तानाशाही ही की कुछ आदतें फिक्स हैं लेकिन इसी दुनिया में तानाशाही व्यवस्था के दौर से जुड़े अधिकारियों, कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई भी चलती रहती है, बीस-बीस साल पुराने गुनाहों के लिए. डिक्टेटर न्यूज़ की यह खबर इसी साल जून की है. ब्राज़ील की अदालत में सुनवाई चल रही है कि जर्मनी की कार कंपनी ने ब्राज़ील में सैनिक तानाशाही के दौर में कारख़ाना लगाया था, जहां पर बंधुआ मज़दूरी कराई जाती थी. महिला मज़दूरों का बलात्कार किया गया और उन्हें मारा गया है. फॉक्सवैगन के खिलाफ यह मामला 70 और 80 के दशक का है.

फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल रामोस का 94 साल की उम्र में निधन हो गया, जिन्होंने 1982 में वहां की तानाशाही को उखाड़ फेंका था. उसके बाद फिलीपींस फिर से तानाशाही की चपेट में चला गया. बस आज की कई तानाशाहियां और मज़बूत नेता थोड़े अलग हैं. वे सीधे-सीधे हिंसा का सहारा नहीं लेते हैं. पूरी तरह से सेंसरशिप नहीं लगाते हैं. लोकतंत्र का नाटक करते हैं. न्यायपालिका में अपने जजों को भर देते हैं और उनके सहारे अपने हर क्रूर फैसले को कानूनी जामा पहनाते रहते हैं.

मीडिया पर कंट्रोल करते हैं ताकि जनता कंट्रोल में रहे. इन्हें स्पिन डाक्टर कहा जाता है, बात घुमा-घुमा कर जनता की गर्दन घुमाते रहते हैं. जनता घूमती रहती है और तानाशाह कुर्सी पर स्थिर बैठा रहता है. तानाशाही पर काम करने वाले कई प्रोफेसरों ने अपने रिसर्च में बताया है. इन तानाशाही सरकारों में जेल भेजना आम है. हमने जानबूझ कर पहले दिन जेल वाले कम उदाहरण दिए क्योंकि जेल में डालने वाला उदाहरण देते ही लोग भारत से मिलाने लग जाते हैं, जो कि मैं नहीं चाहता हूं. पर आप तो वही चाहते हैं जो मैं नहीं चाहता हूं. इसलिए ग्लोबल डिक्टेटर न्यूज़ मे अभी इतना ही रहने देते हैं वर्ना मदर आफ डेमोक्रेसी, लोकतंत्र की जननी यानी भारत की ख़बरें छूट जाएगी.

दुनिया का हाल अच्छा नहीं है इसका मतलब यह नहीं कि हमारा भी हाल अच्छा नहीं है. वैसे प्रधानमंत्री मोदी को भी भारत में तानाशाही का रुप नज़र आता है तो उनके विरोधियों को भी. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अपने कई भाषणों में परिवारवाद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं. परिवारवाद को तानाशाही से भी बड़ा खतरा बताया गया है. विरोधी दल के नेता भी प्रधानमंत्री मोदी पर तानाशाह होने का आरोप लगाते रहते हैं. राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी तक सभी ने आरोप लगाए हैं. भारत में भले लोकतंत्र हैं लेकिन आरोपों में तानाशाही का इस्तेमाल कुछ कम नहीं होता है. आज ही जया बच्चन ने तानाशाही का ज़िक्र कर दिया.

अगर परिवारवाद को ही तानाशाही का रुप मान लें तब यह सवाल उठता है कि इसकी किसी भी संभावना को खत्म करने के लिए बीजेपी अपने भीतर क्या कर रही है ? क्या वही तय कर पाई है कि परिवारवाद को बिल्कुल जगह नहीं देनी है ? मध्यप्रदेश में पंचायत चुनाव हुआ. यहां तानाशाही का एक रुप परिवारवाद चुपके-चुपके नहीं खुलेआम बीजेपी के भीतर सैर करता दिखाई दे गया. अब हम लोग डिक्टेटर न्यूज़ से डेमोक्रेसी न्यूज़ पर शिफ्ट हो चुके हैं.

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