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वर्तमान का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है – शर्म पर गर्व

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 26, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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रविश कुमार

गर्व और पर्व. भारत में पर्व की कमी नहीं है मगर गर्व की कमी थी. पिछले सात-आठ सालों में व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी में लाखों की संख्या में ऐसे-ऐसे पोस्ट लिखे गए, जिसके ज़रिए रिटायर्ड अंकलों में यह भाव पैदा किया गया कि भारत में गर्व की कमी है. उसके बाद इस कमी का प्रसार घर-घर में हुआ और बात बात में बताया गया कि गर्व करना ज़रूरी है. गर्व करने के लिए अतीत से आइटम जुटाने का प्लान बन गया है. वर्तमान का यह सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है.

कोई काम ऐसा नहीं है जिसमें गर्व को शामिल नहीं किया जा रहा है. हमें नहीं पता कि लोगों का हीनता का बोध इतना बढ़ गया है कि गर्व की सप्लाई बढ़ानी पड़ रही है. रिटायर्ड अंकलों और हाउसिंग सोसायटी के व्हाट्स ऐप ग्रुप में हर दिन ऐसा मैसेज ठेल दिया जाता है जिसका संबंध गर्व बढ़ाने से होता है. बड़ी संख्या में लोग गर्वोत्पादन में लगे हैं इसलिए बाकी चीज़ों से परेशान नज़र नहीं आते हैं.

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आपके समझने के लिए गर्व स्टोर की कल्पना उसी दर्शक ने की है जिसने प्राइम टाइम के पिछले अंक में बुलडोज़र गेम बनाया था. वो बताना चाहते हैं कि व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी ने कई साल लगाकर पहले बेरोज़गारी और आर्थिक तंगी में डूबे लोगों के अतीत की हीन भावना का बोध कराया फिर उन्हें वर्तमान आर्थिक हीनता से निकालने के लिए गर्व का गेम थमा दिया.

लोगों को किसी न किसी बहाने गर्व का डोज़ दिया जाता है. इसके लिए कई महापुरुष खोज कर निकाले गए, कई परंपराएं और कई स्वतंत्रता सेनानियों को भी खोजा जा रहा है. आप मानें या न मानें, भारत में इस वक्त गर्व करना सबसे बड़ा राजनीतिक उद्योग है. तरह-तरह के व्हाट्स एप पोस्ट पढ़कर लगता है कि हैरी पॉटर के किस्से की तरह रात को एक ट्रेन आती है और सबको बिठाकर अतीत के उस स्वर्ण युग में ले जाती है, जहां गर्व स्टोर में गर्व ही गर्व रखा हुआ है. लोग वहां से कपार पर गर्व ढोकर ला रहे हैं.

सारे शहर में नए नए गर्व के लिए जगह बनाई जा रही है. स्कूल के सिलेबस में भी बदलाव किए जा रहे हैं ताकि गर्वों के लिए जगह बन सके. मुगलों के इतिहास ग़ायब किए जा रहे हैं ताकि गर्व के लिए और अधिक प्लॉट मिल सके. ऐसे लोगों की कमी नहीं जो मानते हैं कि फलां कालखंड को पढ़ाने से गर्व की कमी हो गई थी, अब हटा देने से गर्व का उत्पादन और प्रसारण बढ़ जाएगा. जो लोग आर्थिक संकट से परेशान हैं वही लोग इन दिनों गर्व के उत्पादन से काफी खुश हैं.

भारत में इन दिनों में गर्व का पर्व मन रहा है और हर पर्व गर्व के साथ मनाया जा रहा है. गर्व कराने का काम दो तरह से हो रहा है. एक गुप्त रूप से व्हाट्स ऐप पर गर्व कराया जाता है औऱ दूसरा प्रकट रूप से व्हाट्एस ऐप पर एक मैसेज देखकर मैं गर्व खोजने लगा कि अगर आप इस समुदाय के हैं तो उस समुदाय की दुकान से दंतमंजन न खरीदें. अपने समुदाय की दुकान से मंजन और बर्तन ख़रीदें और अपने समुदाय पर गर्व करें.

गर्व की स्थापना और बोध कराने को लेकर कहां से कौन-सा संगठन आपके सामने अवतरित हो जाएगा, पता नहीं चलता. मैं यह पता कर रहा हूं कि अलग-अलग संगठनों में अलग-अलग लोग काम करते हैं या एक ही तरह के लोग इन सभी संगठनों में काम करते हैं. या हर लोग को एक संगठन का नाम दे दिया गया है. आखिर भारत में गर्व कराने के लिए इतने सारे संगठनों की ज़रूरत क्यों पड़ रही है ? कर्नाटक में एक नया संगठन आ गया है. हो सकता है कि यह पुराना संगठन हो लेकिन हमने इसका नाम आज ही सुना.

यदि आप गर्व नहीं कर पा रहे हैं तो इन संगठनों से संपर्क करें. देश भर में इनकी संख्या हज़ारों में हैं. गर्व कराने वाले संगठनों ने इतना डरा दिया है कि कुछ दिनों में लोग दूसरे धर्म के लोगों को देखते ही बैक गियर में भागने लगेंगे या फिर हमला करने लगेंगे. दूसरे धर्म से डरना, नफरत करना सिखाते सिखाते ये संगठन इतिहास भी पढ़ना सिखाते हैं. यही इनकी क्वालिटी है. ये इतिहास के सबसे बड़े जानकार होते हैं. जो नहीं जानते हैं, वो किताब ही बदलवा देते हैं.

जब भी लगे कि आप गर्व नहीं कर पा रहे हैं, काम नहीं है, कमाई कम है, शर्म आ रही है तो इन गर्व करने वालों से मिलें. और चाहें तूफान आए या चक्रवात, अपने अपने व्हाट्स ऐप ग्रुप से बाहर न निकलें, वहां मौजूद रिटायर्ड अंकल दूसरे धर्म से घृणा सिखाते-सिखाते आपके भीतर गर्व ठूंस देंगे. आप गर्व से फूलकर गोलगप्पा हो जाएंगे. कर्नाटक में एक धर्म गुरु ने आरोप लगाया है कि वहां 30 प्रतिशत कमीशन चलता है लेकिन इन बातों से गर्व के उत्पादन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. जहांगीरपुरी से परिमल की रिपोर्ट बताती है कि गर्व करने के इस उद्योग के लिए ज़रूरी है कि ग़रीब लोग कुर्बानी दें.

बिना धर्म के आप गर्व नहीं कर सकते. गर्व के लिए दो धर्म चाहिए. अपना धर्म और उनका धर्म. याद रखें उनके धर्म से नफ़रत के बिना अपने धर्म से प्यार नहीं कर सकते. इस लेवल पर ये संगठन आपको ले आए हैं. पता नहीं आप कब समझेंगे. व्हाट्एस ऐप यूनिवर्सिटी ने इस देश के युवाओं को उस तरफ नहीं धकेला होता तो आज बेरोज़गार युवा नौकरी की मांग को लेकर सबको धकेल रहे होते. इतने भयंकर मैसेज होते हैं अगर कानून की बंदिश न होती तो यहां दिखाता कि गर्व के लिए घृणा कितनी ज़रूरी है.

सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकानमी की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2022 के बीच श्रम भागीदारी की दर 46 प्रतिशत से घट कर 40 प्रतिशत हो गई है. काम नहीं मिलने से लोग इतने हताश हो गए हैं कि लेबर मार्केट में काम मांगने नहीं आ रहे हैं. इस दौरान दो करोड़ से अधिक महिलाएं लेबर मार्केट से गा़यब हो चुकी हैं.

मेरा मानना है कि काम न मिलने से हताश इन लोगों में अगर धर्म का गर्व भर दिया जाए तब इन्हें पता भी नहीं चलेगा कि काम नहीं मिला है. कई बार लगता है कि इसीलिए धर्म को लेकर तरह-तरह से टकराव हो रहा है. भारत का युवा गर्व ढूंढने में परेशान है, गर्मी से परेशान नहीं है, जिसके कारण खेत में गेहूं जल गया. किसानों की कमाई घट गई. मार्च और अप्रैल के महीने में जब अनेक संगठन गर्व के लिए दूसरे समुदाय के धर्मस्थलों के सामने से मार्च कर रहे थे, मार्च में गर्मी खेतों को जला रही थी.

बढ़ती गर्मी सूखता गेहूं

कई जगहों पर तापमान के कारण गेहूं का दाना सूख भी गया और उत्पादन भी घट गया है. प्रति एकड़ गेहूं का उत्पादन 4 से 8 क्विंटल कम हो गया है. इस कारण सूखा चारे की समस्या पैदा हो गई है. हरियाणा में सूखा चारा 300 रुपये क्विंटल से बढ़कर 700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है. डबल से भी ज़्यादा. हरियाणा के महेंद्र गढ़ से सांसद धर्मवीर सिंह ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टकर को पत्र लिखा है.

पत्र में उन्होंने भिवानी में सूखे चारे का भाव 1200 रुपये प्रति क्विंटल बताया है. वे अपने पत्र में कहते हैं कि राज्य सरकार की नीतियों से प्रेरित होकर उनके ज़िले में किसानों ने गेहूं की बुवाई कम की, सरसों और तेलहन की बुवाई ज़्यादा की. अब चार ज़िलों ने अपने ज़िले से बाहर सूखा चारा बेचने पर रोक लगा दी है. यही नहीं, कार्डबोर्ड और ईंट भट्टा बनाने वाली फैक्ट्री को भी सूखा चारा बेचने से मना कर दिया गया है. इससे एक अलग ही समस्या पैदा हो गई है.

अब अगर दूसरे ज़िले से गेहूं नहीं आएगा, सूखा चारा नहीं आएगा तब तो उनके ज़िले में चारे की समस्या भयंकर हो जाएगी. सांसद ने अपने पत्र में लिखा है कि सूखे चारे पर रोक लगी रही तो हमारे ज़िले की गौशालाओं में रहने वाले गौवंश भूखे मरने की कगार पर पहुंच जांएगे. हमारा प्रदेश एक है, गौवंश को बचाना भी हमारा धर्म बनता है. इसलिए ज़िले से बाहर सूखा चारा ले जाने पर जो रोक लगी है, उसे तुरंत हटाई जाए.

हरियाणा ही नहीं, दूसरे राज्यों में भी गर्मी के कारण गेहूं का उत्पादन कम होने की ख़बरें छपी हैं. 23 अप्रैल के अमर उजाला की खबर है कि हापुड़ में गेहूं का उत्पादन बीस प्रतिशत कम हुआ है और चारे का भाव 800 रुपया प्रति क्विंटल हो गया है. अखबार को किसानों ने बताया है कि एक बीघा में कम से कम 320 किलोग्राम गेहूं का उत्पादन हो ही जाता है लेकिन अब तो 300 किलोग्राम तक भी एक बीघा में नहीं हो रहा है.

भारत में गर्मी और तापमान का मुद्दा तभी तक रहता है जब तक बारिश नहीं होती, बारिश होते ही तापमान के मुद्दे को लोग भूल जाते हैं. 2019 के साल भी कम गर्मी नहीं पड़ी थी, 2020 भी पड़ी लेकिन हम सब भूल गए. इस साल मार्च की गर्मी के कारण गेहूं के दाने सूख गए और उत्पादन भी घट गया है. सूखे दाने वाले गेहूं को सरकार भी नहीं ख़रीदती और बाज़ार भी नहीं खरीदता है. ज़ाहिर है यूक्रेन संकट के कारण गेहूं के किसानों के मुनाफे का जो ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वह पूरी सच्चाई नहीं है.

ट्रिब्यून की इस रिपोर्ट को पढ़ सकते हैं. पंजाब में भी एक एक़ड़ में पांच क्विंटल गेहूं कम हुआ है. इस रिपोर्ट में लुधियाने के कृषि अर्थशास्त्री एम. एस. सिद्धू का बयान छपा है कि पिछले छह साल में गेहूं का उत्पादन एक हेक्टेयर में 45 क्विंटल से कम कभी नहीं हुआ. सबसे ज्यादा असर बठिंडा और मानसा ज़िल में पड़ा है, यहां गेहूं का उत्पादन कम होने के कारण कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है.

गेहूं का उत्पादन कम हुआ और जो हुआ उसमें से भी दाने सूख गए तो नहीं बिका. इस हिसाब से किसान को काफी घाटा हुआ है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस वजह से पंजाब में 14 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. हम और आप देख पा रहे हैं कि तापमान ने युद्ध से ज्यादा भारत के किसानों को प्रभावित किया है. किसान सरकार से 500 रुपया प्रति क्विंटल बोनस मांग रहे हैं.

गेहूं के निर्यात को लेकर तरह-तरह के बयान आ रहे हैं. 15 अप्रैल को पीयूष गोयल का बयान है कि भारत इस साल 100-150 लाख टन गेहूं का निर्यात करेगा लेकिन दो दिन पहले वित्त मंत्री का बयान छपता है कि WTO की शर्तों के कारण भारत को अनाज के निर्यात में दिक्कतें आ रही हैं. यह भी जानना ज़रूरी है कि जो प्राइवेट प्लेयर निर्यात कर रहे हैं वो प्रति क्विंटल किस भाव पर कर रहे हैं और कितना कमा रहे हैं, जो किसान प्राइवेट प्लेयर को बेच रहे हैं उन्हें प्रति क्विंटल भाव कितना मिल रहा है. क्या प्राइवेट खरीदारों से जो भाव मिला है वह लागत निकालने के लिए काफी है ? क्या सरकार किसानों से अधिक रेट पर गेहूं नहीं ख़रीद सकती थी ?

सितंबर के महीने में 40 रुपया प्रति क्विंटल न्यूनतम ख़रीद मूल्य बढ़ा दिया गया, 2105 रुपये प्रति क्विंटल हुआ लेकिन जब निर्यात की मांग बढ़ी तब दाम बढ़ा कर किसानों को राहत नहीं दी जा सकती थी ? सरकार को एक डेटा देना चाहिए. प्रति क्विंटल गेहूं की बिक्री पर किसानों के हाथ में कितना अधिक पैसा आया और प्राइवेट प्लेयरों के हाथ में कितना पैसा आया. यह भी आशंका जताई जा रही है कि गेहूं के निर्यात होने और भंडारण कम होने से भारत में गेहूं महंगा होने लगेगा और भारत की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है.

लू लहर की चपेट और बढ़ती मंहगाई

इस साल फरवरी तक गेहूं के रिकार्ड उत्पादन की सूरत नज़र आ रही थी, मगर मार्च की गर्मी ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. पकने के समय गेहूं को 30 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान की ज़रूरत होती है, मगर उस दौरान तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक पहुंच गया. 10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा. डाउन टू अर्थ ने पूरे उप महाद्वीप ने 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान को मैपिंग की है और उसके आधार पर बताया है कि उत्तरी और पश्चिमी भारत में मार्च के महीने में 14 बार लू की लहर चली है.

पिछले साल एक ही लू की लहर थी. 10 बार भयंकर लू की लहर चली है. अंग्रेज़ी में severe heat wave कहते हैं. 15 राज्य लू की लहरों की चपेट में थे. सबसे अधिक मध्य प्रदेश और राजस्थान प्रभावति रहे, वहां 25 दिन लू की लहर चली है. पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर भी लू की लहरों की चपेट में रहे. हिमाचल प्रदेश में 21 दिन लू की लहर चली. इसके कारण ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया तेज़ हो जाएगी और पानी का संकट पैदा होने लगेगा. जो सूखा लेकर आ सकता है.

मौसम विभाग का कहना है कि 122 वर्षो में इस बार का मार्च सबसे गर्म रहा है. इस साल 6 अप्रैल को विज्ञान और प्रोद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि देश भर में मार्च महीने के दौरान सामान्य से चार से छह डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया था. 11 मार्च को पहला हीट-वेव रिकार्ड किया गया था. डाउन टू अर्थ का यह कवर 2019 का है. इस पत्रिका ने समय समय पर जलवायु संकट के ख़तरों को लेकर आगाह किया है, बताया था कि कैसे भारत का करीब करीब 90 प्रतिशत हिस्सा लू की लहरों की चपेट में है औऱ हम इसके असर से अनजान हैं.

डाउन टू अर्थ ने अपने कई अंकों में लू की लहरों को लेकर विस्तार से लिखा है. डाउन टू अर्थ ने अपने अंक में बताया है कि 2019 में जून के पहले सप्ताह तक लू की लहरों की संख्या 73 हो गई थी. महाराष्ट्र में तो 28 मार्च से लेकर 20 जून के बीच हर दूसरे दिन लू की लहर रिकार्ड की गई थी. 47 दिनों तक महाराष्ट्र लू की चपेट में रहा था. 2013 से 2017 के बीच लू की लहरों से देश भर में 4800 से अधिक लोग मारे गए थे. 2018 में लू की लहरों से 19 राज्य प्रभावित थे जिसकी संख्या 2019 में 23 हो गई थी. इस संख्या को आप ऐसे समझिए. 1961 से 2005 के बीच भारत में लू की लहरों की संख्या 54 थी लेकिन 2019 में यह संख्या 73 हो गई. डाउन टू अर्थ की इस रिपोर्ट में लिखा है कि Indian Institute of Tropical Meteorology के अनुसार 2020 से 2064 के बीच लू की लहरों की संख्या 138 तक हो जाएगी.

यह बात पूरी तरह से सही है कि हम लू की लहरों के असर को लेकर सामान्य हो चुके हैं. इस बात से खुश हो जाते हैं कि एसी की बिक्री बढ़ गई है. गुजरात और बिहार सहित देश के कई राज्यों में मार्च और अप्रैल का महीना तेज़ गर्मी के कारण तवा होता जा रहा है. अभी मई और जून का आगमन नहीं हुआ है. 2019 में बिहार के गया में 144 लगानी पड़ी थी ताकि लोग घरों में रहें. 2019 में चुरू और श्रीगंगानगर में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया था.

हिमाचल प्रदेश के ऊना में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक चला गया था. 2019 में बिहार में लू की लहरों से 121 लोग मारे गए थे. लू और तेज़ गर्मी के असर को हम केवल मरने वालों की संख्या से नहीं समझ सकते हैं. बढ़ता तापमान अलग-अलग इलाके में अलग अलग तरीके से जनजीवन को प्रभावित करता है. कहीं महंगाई बढ़ती है तो कहीं कमाई घटती है और पलायन बढ़ता है. हम केवल गेहूं की बात कर रहे हैं लेकिन तेंदू पत्ता से लेकर मछली उत्पादन में लगे लाखों लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं.

पहला सवाल- 2019 का हीट वेव और अब 2022 का. लू की लहरों को हम मरने वालों की संख्या से ही गंभीर समझते हैं मगर मार्च का डेटा बता रहा है कि लू की लहर का असर एक समान नहीं होता है. इस दौरान भले लोग न मरे हों, या कम मरें हो, मगर इसके असर में वे भूखमरी के कगार पर पहुंच गए. उनकी कमाई घट गई.

दूसरा सवाल- तापमान रोकने के लिए जो किया गया है, या जो किया जाता है क्या वो उस दिशा में है, खासकर वृक्षारोपण को लेकर अजीब से होड़ शुरू हो जाती है, छह करोड़ पेड़ लगाएंगे तो दस करोड़ लगाएंगे. ऐसे वृक्षारोपण को लेकर क्या कोई अध्ययन है ?

मार्च के दौरान महंगाई का भी तापमान 17 महीनों में सबसे अधिक था. एक अध्ययन के मुताबिक गांवों में महंगाई का ज़्यादा बुरा असर है. कई ज़रूरी चीज़ों के दाम बीस प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. इंडोनेशिया ने पाम ऑयल के निर्यात पर रोक लगा दी है जिसके कारण खाद्य तेलों के दाम और भी बढ़ सकते हैं.

भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय ने एक डेटा जारी किया है जिसके मुताबिक 10 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच भारत के सात शहरों में वनस्पति तेलों के दाम में 13 से 16 रुपये की वृद्धि आई है. वनस्पति तेल का भाव 158 रुपया किलो से लेकर 182 रुपया किलो हो गया है. महंगाई लू बनकर चल रही है. पर आप सभी महंगाई का बहादुरी से सामना कर रहे हैं. महाराष्ट्र के राजनीतिक दल भी बहुत बहादुरी से एक दूसरे का सामना कर रहे हैं. इस युद्ध में केंद्र राज्य संबंधों की बलि दी जा रही है.

सत्ता का टकराव

यह टकराव वहीं क्यों हैं जहां गैर बीजेपी की सरकारें हैं. कई गैर बीजेपी शासित राज्यों में वाइस चांसलर की नियुक्ति को लेकर टकराव हो रहा है. राज्य सरकारें राज्यपालों पर एकतरफा फैसला करने के आरोप लगाने लगी हैं. आज तमिलनाडू विधानसभा में एक बिल पास हुआ कि विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर नियुक्त करने का अधिकार राज्य सरकार के पास होगा. राज्यपाल के पास नहीं होगा.

एम के स्टालिन ने कहा कि 2010 में पूर्व चीफ जस्टिस एम एम पुंछी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के चांसलर पद से हटा देना चाहिए. इसी समय राज्य के राज्यपाल ऊटी में केंद्र, राज्य के विश्वविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर के साथ सम्मेलन कर रहे हैं. यह बिल भी टकराव का नया कारण बनेगा. विधानसभा से पास दस विधेयक राज्यपाल की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहे हैं. अब इस बिल को लेकर भी बयानबाज़ी होती रहेगी. केंद्र और राज्य टकराते रहेंगे.

इस बीच आपको संघवाद पर लंबा-लंबा लेक्चर भी सुनाया जाएगा ताकि आप गर्व करते रहें. बलिया में गिरफ्तार तीन पत्रकारों को ज़मानत मिल गई है. गुजरात से गिरफ्तार कर असम ले जाए गए जिग्नेश मेवाणी को ज़मानत मिली लेकिन किसी और मामले में गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन एक समुदाय की महिलाओं का बलात्कार करने की धमकी देने वाले बजरंग मुनि को ज़मानत मिल गई है.

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