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Home गेस्ट ब्लॉग

कोराना के नाम पर जांच किट में लूटखसोट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 28, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोरोना ने दुनिया भर के शासकों के विरूद्ध पनप रहे जनान्दोलनों को खत्म करने के साथ ही दुनिया भर के मुनाफाखोरों के लिए जनता की लूट-खसोट का बहुत बड़ा अवसर पैदा कर दिया है. एक ओर भारत सरकार भूख से मर रहे लोगों के बीच 90 लाख टन अनाज को मुफ्त बांटने के बजाय, उसे सेनेटाइजर के नाम पर शराब बनाने वाली कम्पनियों को दे रही है ताकि उसके जरिए अकूत मुनाफा कमाया जा सके, वहीं दूसरी ओर कोराना के नाम पर जांच किट व दवाईयों में लूटखसोट मचाई जा रही है. कोराना के नाम पर चीन से खरीदे गये जांच किट के घपले पर पत्रकार गिरीश मालवीय की तथ्यपरक रिपोर्ट.

कोराना के नाम पर जांच किट में लूटखसोट

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रैपिड एंटी बॉडी टेस्ट की खरीदी में बहुत बड़ा घपला पकड़ा गया है और यह घपला कांग्रेस या अन्य किसी विपक्षी दल ने नहीं पकड़ा है बल्कि तीन कंपनियों के आपसी विवाद को कोर्ट में ले जाने, और वहांं सुनवाई होने के दौरान पकड़ा गया है.

हम शुरू से ही कहते आए है कि यह ‘न खाऊंंगा और न खाने दूंंगा’ कहने वाली की सरकार नहीं है बल्कि ‘तू भी खा और मुझे भी खिला’ वालों की सरकार है, आज यह बात साबित हो गयी है.

अब पूरा मामला आसान शब्दों में समझिए. दरअसल आईसीएमआर जो कोविड 19 से लड़ रही सबसे प्रमुख सरकारी नोडल एजेंसी है, उसने कोरोना की रैपिड टेस्ट किट खरीदने के लिए रेयर मेटाबॉलिक्स से 30 करोड़ का समझौता किया. यानी पहले ही आईसीएमआर ने अपने आपको बांंध लिया कि जो भी टेस्ट किट आएगी, रेयर मेटाबॉलिक्स के जरिए ही आएगी !

अब रेयर मेटाबॉलिक्स ने एक और कम्पनी को अपने साथ में मिलाया, जिसका नाम है आर्क फार्मास्यूटिकल्स. इन दोनों कंपनियों ने मिलकर कोविड 19 टेस्ट किट को भारत में लाने के लिए एक तीसरी कम्पनी मैट्रिक्सलेब को ठेका दिया. मैट्रिक्स लैब ने कुल 7 लाख 24 हजार कोविड-19 टेस्ट किट चीन से मंगा ली.

दोनों के बीच समझौता यह हुआ था कि रेयर मेटाबॉलिक, मैट्रिक्स लैब को शुरुआती 5 लाख किट के पैसे का भुगतान करेगी. 5 लाख किट की कुल कीमत बनी 12 करोड़ 25 लाख.

रेयर मेटाबॉलिक के मुताबिक उन्होंने किट की कुल कीमत के बराबर यानी 12 करोड़ 25 लाख की कीमत मैट्रिक्स लैब को अदा भी कर दी है.

मैट्रिक्स लैब का कहना है कि उसके मुताबिक रेयर मेटाबॉलिक 5 लाख किट की पूरी कीमत जो 21 करोड़ होती है, वह पहले उपलब्ध कराए.

रेयर मेटाबॉलिक का कहना था करार के मुताबिक किट की कीमत का पैसा पहले देना था और बाकी जो मुनाफे का पैसा था, वह जब आईसीएमआर जिसको कि रेयर मेटाबॉलिक्स को सप्लाई करनी थी, उससे पैसा मिलने के बाद में दिया जाना था. लेकिन मैट्रिक्स लैब का कहना है कि उनको पूरा 21 करोड़ रुपए शुरुआत में ही मिलना था, जो अब तक रेयर मेटाबॉलिक्स नहीं दे रही है.

यहांं से इन दोनों पक्षों में विवाद हो गया और मामला दिल्ली हाईकोर्ट के सामने आ गया. सुनवाई में सारे तथ्य सामने आ गए और पता चला कि मैट्रिक्स लैब ने 3 डॉलर की कीमत वाली रैपिड टेस्ट किट मंगाई है जिसकी कीमत लगभग 225 रुपये होती है. और इस हिसाब से उसे 75×3× 5 लाख = 11 करोड़ 25 लाख, और इसमें अगर भारत तक लाने का खर्चा भी जोड़ दिया जाए जो कि 5 लाख किट का करीब 1 करोड़ रुपये बनते हैं, तो भी कुल कीमत बनती है 12 करोड़ 25 लाख. जो रेयर मेटाबॉलिक्स ने मैट्रिक्स लैब को दे दिए है लेकिन उसे अब 21 करोड़ रुपये ही चाहिए.

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अब यह तथ्य भी आ गया कि भाड़ा मिलाकर जो कि लगभग 245 रुपये की पड़ रही है उसे रेयर मेटाबॉलिक्स 600 रु. की कीमत पर ICMR को बेच रहा है.

चूंकि आईसीएमआर ने रैपिड टेस्ट किट की जांच पर सवाल उठने के बाद फिलहाल के लिए रैपिड टेस्ट पर रोक लगा दी, इस वजह से अभी आईसीएमआर से कंपनी को जो पैसा मिलना था, वह नहीं मिला. यही कारण है कि अभी तक मैट्रिक्स लैब को उसके मुनाफे का करीबन 8.75 करोड़ रुपए नहीं दिए जा सके हैं, इसलिए यह सारा झगड़ा शुरू हुआ.

इस घटनाक्रम से इस बात की पोल खुल गयी कि आईसीएमआर रैपिड टेस्ट किट की मूल कीमत से करीबन ढ़ाई गुना की कीमत में ये किट भारतीय कंपनियों से ही खरीद रहा है. अब यह कितना बड़ा घोटाला है, आप स्वयं समझिए.

कुछ लोग यह भी तर्क दे सकते हैं कि ऐसा तो व्यापारी करता ही है लेकिन यहांं मौका व्यापार वाला नहीं था, किसी की जान बचाने वाला था.

कुछ दिनों पहले ऐसे ही जब थर्मल स्कैनर की बड़े पैमाने पर कालाबाजारी होने लगी और सरकार को भी व्यापारी यह स्कैनर महंगे दामों में सप्लाई करने लगे, तब गुरुग्राम के जिला ड्रग कंट्रोलर और पुलिस ने छापेमारी कर 11 अप्रैल को 5800 थर्मल स्कैनर पकड़े. कंपनी संचालक को मजबूरन आयात के दस्तावेज दिखाने पड़े तो जिला उपायुक्त के आदेश पर इन्हें प्रिंट रेट पर सरकार ने ही अपने लिए खरीद लिया गया. अब सरकार स्वास्थ्य विभाग के जरिए जिलों में इनका वितरण कर रही है.

यानी वहांं ड्रग कंट्रोलर काम कर सकता है लेकिन यहांं नहीं कर सकता क्योंकि उसके हाथ सरकार ने ही बांंध रखे होंगे ? अगर तीन कंपनियों में डिस्प्यूट नहीं होता तो यह सब हमें पता भी नही चल पाता ! अब तो मानेंगे कि यह घोटालेबाज सरकार है ?

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