क्रांतिकारी आंदोलन में क्रांतिकारियों द्वारा अपने परिजनों को पत्र लिखने की ऐतिहासिक परम्परा रही है. भगत सिंह ने भी इस परम्परा का पालन किया था. इस परम्परा को निभाते हुए माओवादी आंदोलन के सबसे बड़े गद्दार मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल राव ने भी अपनी मां को पत्र लिखा था, और बाद में ‘अच्छे दिन आ गये’ का जुमला फेंकते हुए सत्ता के चरणों में दण्डवत होकर हथियारों के साथ सरेंडर कर दिये, वहीं दूसरी ओर माओवादी आंदोलन के ही केन्द्रीय कमिटी के नेता गणेन उईके ने माओवादी आंदोलन के दौरान अपनी मां को पत्र लिखे और माओवादी आंदोलन का पताका पूरी शान से फहराते हुए और मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल राव जैसे गद्दारों को पूरी तरह नकारते हुए शहादत को अपनाये.
हमने अवसरवादी गद्दार मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल राव द्वारा अपनी मां को लिखे पत्र को भी प्रकाशित किया था, अब महान माओवादी नेता गणेश उईके के द्वारा अपनी मां को लिखे पत्र को यहां प्रकाशित कर रहे हैं. यह अप्रकाशित लेख पाका हनुमंतरा (गणेश उईके) की मृत्यु के बाद मिला था. गणेश उईके माओवादियों के एक प्रमुख केन्द्रीय कमिटी के नेता थे, जिन्हें 25 दिसंबर को ओडिशा के कंधमाल वन क्षेत्र में पुलिस ने एक फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था.
माना जाता है कि उन्होंने यह लेख सितंबर 2022 में अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनने के बाद लिखा था. उनकी माताजी की भी बाद में गरीबी, बीमारी और वृद्धावस्था के कारण मृत्यु हो गई. यह ज्ञात नहीं है कि उनके जीवित रहते यह पत्र उनकी माताजी तक पहुंचा था या नहीं. हालांकि एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र ने उनकी मृत्यु के समय भी इसे प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था, लेकिन पाठकों तक इसे पहुंचाना आवश्यक समझा गया. – सम्पादक

प्रिय मां,
मैंने कभी नहीं सोचा था कि दुख का यह समय इस तरह आएगा. मैंने अखबार में पढ़ा कि मेरे पिता 30 सितंबर, 2022 को 90 वर्ष की आयु में हमें छोड़कर चले गए. जब मैं क्रांति के मार्ग पर आपसे विदा लेकर निकला था, तब पिता की मृत्यु की खबर ने मुझे चार दशक पुरानी सारी यादें ताजा कर दीं. आपके साथ, पिता के साथ, पूरे परिवार के साथ और गांव के लोगों के साथ बिताए दिन मेरी आंखों के सामने उमड़ रहे हैं.
क्रांति में शामिल होने से पहले आप सभी के प्यार और स्नेह ने ही मुझे इस मार्ग पर चलने की शक्ति दी थी. आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो आपके प्रति मेरा सम्मान और भी गहरा हो जाता है. विशेषकर मेरे पिता. उन्होंने मेरे लिए, मेरे भाई-बहनों के लिए, हमारे परिवार के लिए अथक परिश्रम किया. इस देश में आम आदमी का जीवन ऐसा ही होता है – जिम्मेदारी, प्रेम और कड़ी मेहनत से भरा हुआ.
मेरे बचपन के दिन आज भी बहुत सुहावने हैं. दादा पुलैया और दादी पेद्दम्मा की गोद में खेलना, पिताजी के खेत में काम करना – मिट्टी खोदना, खेती करना, बीज बोना, फसल काटना. चाहे कितनी भी मेहनत करते हों, सब कुछ हमारे लिए ही होता था. आप दोनों ने कितनी कठिनाइयां सहन कीं, गरीबी में हमारा पालन-पोषण करने के लिए कितना कर्ज़ लिया. इतनी मेहनत के बावजूद, ऐसे भी दिन आए जब हमारे परिवार को भूखा रहना पड़ा.
मैं उन दिनों को कभी नहीं भूलूंगा. इस देश में हमारे जैसे लाखों परिवार हैं. आपने खुद खाए बिना हमारा पेट कैसे भरा, यह बात मैं जीवन भर याद रखूंगा. जीवन के विभिन्न अनुभवों से मैंने यह समझा है कि सभी माता-पिता ऐसे ही होते हैं. हमारे लिए आपकी आशा असीम थी. शायद हमारे जीवन में वही आशा आज पूरी मानवता और इस देश के इतिहास के प्रति मेरे आशावाद का रूप ले चुकी है. इसलिए, बचपन में आपने मुझसे जो कहा था, वह मैं कभी नहीं भूलूंगा.
परिवार के सबसे बड़े बेटे के रूप में, आपके अपार प्रेम, स्नेह और विश्वास ने हमेशा मुझे क्रांति के मार्ग पर मार्गदर्शन दिया. उस समय मेरे पास गांव से नालगोंडा शहर तक पढ़ाई के लिए बस का किराया भी नहीं था. आपने जो पैसे दिए, उनसे मैंने एक दिन का राशन खरीदा और दो दिन के लिए निकल पड़ा. आप सभी को लगा कि मैं आगे पढ़ाई करुंगा और परिवार की देखभाल करुंगा. लेकिन मैंने क्रांति का मार्ग चुना. बाद में, जब आपको एहसास हुआ कि मैंने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा, बल्कि सही रास्ते पर चल रहा था, तो मुझे बहुत खुशी हुई.
जब मैं स्कूल में पढ़ता था, दादा पुल्लैया मुझे 1940 के दशक में नालगोंडा जिले में हुए सशस्त्र किसान संघर्ष की कहानियां सुनाया करते थे. वे मुझे निज़ाम की पुलिस, रजाकारों के अत्याचारों और नेहरू-पटेल के नेतृत्व वाली भारतीय सेना द्वारा कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं के दमन के बारे में बताते थे. गरीबों के घर जलाने, लूटपाट और महिलाओं पर अत्याचार की उन दुखद कहानियों ने मेरे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा.
जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे पता चला कि हमारे गांव में मेरे दादाजी जैसे कई अन्य बुजुर्ग थे जिन्होंने तेलंगाना में सशस्त्र किसान संघर्ष में भाग लिया था. नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के लड़ाके भी उसी क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. मेरे दादाजी ने अपने अनुभवों से मुझ पर अमिट छाप छोड़ी.
उनके शब्दों ने मुझे युवावस्था में समाज के शोषण और भेदभाव पर गहराई से सोचने की प्रेरणा दी. क्रांतिकारी राजनीति से प्रेरित होकर मैं प्रगतिशील छात्र संघ का सदस्य बना और जिला समिति में काम करने लगा. 1981 में, कॉलेज की डिग्री पूरी किए बिना ही, मैं क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गया. लक्ष्य एक ही था – हम जैसे लाखों गरीब किसानों, आप जैसे माता-पिता, सभी लोगों को शोषण और उत्पीड़न से मुक्त करना और महिलाओं को पितृसत्ता के दुष्चक्र से मुक्ति दिलाना.
ईमानदारी, मेहनत और संघर्ष के वे मूल्य जो आपने और मेरे पिता ने मुझे सिखाए, आज भी मेरा मार्गदर्शन करते हैं. मैं गर्व से कह सकता हूं कि आपने जो नैतिक शिक्षा मुझे दी, वह आज मुझमें सामाजिक जिम्मेदारी, क्रांतिकारी आदर्श और व्यवहार का आधार है. निस्वार्थ जीवन जीने के दर्शन ने मेरे क्रांतिकारी मार्ग को निरंतर मजबूत किया है.
इन चालीस वर्षों में पुलिस ने कई बार हमारे घर पर छापा मारा और आपको परेशान किया. खासकर, मुझे ढूंढते हुए वे मेरे पिता को चंदूर पुलिस स्टेशन ले गए और उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया. हालांकि उन्होंने अखबारों के जरिए कई बार मुझे आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव डाला, मेरे पिता ने कभी सिर नहीं झुकाया. उन्होंने इस सिद्धांत को अपने जीवन भर निभाया कि अगर किसी बात पर दृढ़ विश्वास हो, तो चाहे कितना भी कष्ट हो, उसके लिए डटे रहना चाहिए.
मेरे कारण उन पर जो अत्याचार हुए, उनमें भी वे अडिग रहे. यह जानकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई कि वे गर्व से कहते थे कि उनका बेटा मजदूरों, किसानों, दलितों और महिलाओं की मुक्ति के लिए एक क्रांतिकारी के रूप में काम कर रहा है, यह उनके लिए गर्व की बात है. इस देश में आप जैसे हजारों माता-पिता हैं. ऐसे माता-पिता की इच्छा भी देश भर में क्रांतिकारी आंदोलन की प्रगति का एक कारण है. मुझे विश्वास है कि अंतिम सांस लेते समय मेरे पिता के मन में भी यही विचार रहे होंगे.
आज अनेक क्रांतिकारी अपने प्रिय माता-पिता, भाई-बहनों को याद तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे मिल नहीं सकते. इस शोषक राज्य ने ऐसी पाबंदियां लगा रखी हैं. इस राज्य ने क्रांतिकारियों को मारने के लिए इनाम घोषित करने में भी संकोच नहीं किया, यहां तक कि हमारे हथियारों के लिए भी इनाम की घोषणा की है.
देश भर में तरह-तरह के हथकंडों और षड्यंत्रों के ज़रिए एक व्यापक युद्ध छेड़ा जा रहा है. बिहार-झारखंड से लेकर दंडकारण्य, ओडिशा और तेलंगाना तक, केंद्र और राज्य सरकारों ने लगभग सात लाख पुलिस, कमांडो और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है और ‘ऑपरेशन समाधान’ नामक एक व्यापक दमनकारी नीति चलाई है. इसका उद्देश्य 2022 तक देश से क्रांतिकारी आंदोलन को जड़ से उखाड़ फेंकना था.
शहरी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और क्रांतिकारी संगठनों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के खिलाफ मोदी सरकार की दमनकारी नीति जारी है. तेलंगाना सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें केंद्र के सहयोग से ‘शहरी नक्सलियों’ के नाम पर लोगों को गिरफ्तार कर रही हैं. अर्धसैनिक बल और पुलिस कमांडो उन आदिवासी लोगों पर अत्याचार कर रहे हैं जो घरेलू और विदेशी कॉरपोरेट लुटेरों की नीतियों के खिलाफ लड़ रहे हैं. बम गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस फासीवादी दमनकारी नीति के कारण, हम अपने प्रियजनों की मृत्यु के समय भी आपके पास नहीं आ सकते.
जब कोई क्रांतिकारी शहीद हो जाता है, या उसके परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है, तो आम लोगों और जन संगठनों के सदस्यों द्वारा अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है. मुझे यह जानकर खुशी हुई कि बाबा को भी इसी प्रकार सम्मानजनक अंतिम विदाई दी गई. मैं उन सभी को अपनी क्रांतिकारी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं.
आपके बच्चे
पी. हनुमन्त्र (गणेश उईके)
केंद्रीय समिति के सदस्य
15 नवंबर, 2022
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