
देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी की तरह काम रहे बैंकों का जब राष्ट्रीयकरण किया गया था तब बैंकों की हालत बेहद ही खास्ता हुआ करती थी. बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद देश की जनता की गाढ़ी पूंजी को बैंकों में झोंक कर बैंक को मजबूत हालत में खड़ा किया गया ताकि देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में बैंक अपनी कारगर भूमिका अदा कर सके. परन्तु बदलते समय में बैंक आज अपनी भूमिका को बदल चुकी है और वह अब देश की जनता की गाढ़ी कमाई को चूस कर अंबानी-अदानी जैसे काॅरपोरेट घरानों के खजानों को भरने खातिर एक गुण्डे गिरोह में तब्दील हो चुका है.
बैंकों और काॅरपोरेट घरानों ने मिलकर आम जनता को लूटने का यह एक नयाब तरीका ढूंढ़ निकाला है और भारत सरकार इस लूट को कारगर बनाने में अपनी पूरी सैन्य मिशनरी सहित सारी ताकत झोंके हुए है. एक तरफ सरकार जहां हर आदमी को बैंकों में अपना अकाउंट खोलवाने के लिए बाध्य कर रही है, वहीं बैंकों के माध्यम से आम गरीब आदमी को लूटने के लिए मासिक औसत बैंलेंस मेंटेन न रखने के नाम पर भारी भरकम राशि हर माह अकांउट से ही काट ले रही है. यह देश की आम गरीब आबादी की कमाई पर सीधे तौर पर डकैती है.
एक आरटीआई के जबाव में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने बताया कि 30 जून को खत्म होने वाली पहली तिमाही में 388.74 लाख अकाउंट्स से 235.06 करोड़ रूपये की भारी राशि बतौर जुर्माने वसूल की गई है. यह जुर्माने की राशि बैंक में मासिक औसत बैलेंस मेंटेन न रखने के नाम पर वसूली गई है. इतना ही नहीं जहां महज औसत मासिक बैंलेंस न रखने के नाम पर आम गरीब आदमी के अकाउंट्स से पैसे काटे जा रहे हैं वहीं काॅरपोरेट घरानों के हजारों-लाखों करोड़ रूपये पलक झपकते माफ किये जा रहे हैं.
माना तो यह भी जा रहा है कि काॅरपोरेट घरानों के कर्जों को माफ करने की परम्परा विकसित किये जाने के बाद जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले डिफाॅल्टर्स की संख्या में सलाना करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वित्त वर्ष 2015-16 में ऐसे लोगों की संख्या 8,167 थी जो वित्त वर्ष 2016-17 में बढ़कर 8,915 पहुंच गई है जिसकी बकाया राशि 32,484 करोड़ रूपया है.
नोटबंदी जैसे घातक निर्णय जहां केवल काॅरपोरेट घरानों के खजानों को भरने से खाली हुए बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए लिया गया था तो वहीं अब जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले डिफाॅल्टर्स के बकाया राशि को पाटने की एक कोशिश है. 31 मार्च, 2017 के आंकड़ों के मुताबिक 1,762 जानबूझकर कर्ज ने चुकाने वाले डिफाॅल्टर्स पर केवल स्टेट बैंक आॅफ इंडिया का ही 25,104 करोड़ रूपया बकाया है. जिस रकम की वसूली के लिए बैंक बजाय उस डिफाॅल्टर्स पर कार्रवाई करने के आम गरीब आदमी के अकाउंट्स से ही औसत मासिक बैंलेंस न रखने के नाम पर काट रही है. इतना ही नहीं आम आदमी के सेविंग अकाउंट्स पर मिलने वाले ब्याज की दरों में 0.5 प्रतिशत की कटौती कर बैंक ने अपनी मंशा जगजाहिर कर दिया कि वह केवल अमीरों का हित साधनेवाली एक एजेंड के अलावे और कुछ नहीं है.
बैंक देश की जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने का एक यंत्र बनता जा रहा है.
माल्या का 9000 करोड हमें ही तो चुकाना है।
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