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Home कविताएं

अदिति…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 29, 2024
in कविताएं
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अदिति...
अदिति…

धीरे धीरे
मेरी बांई आंख की रोशनी जा रही है
मेरी वामा अब दक्षिणावर्त है

सूर्य के उत्तरायण होने का इंतज़ार
अब नहीं है मुझे

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कौन है श्रेष्ठ ?

स्वप्न

इच्छा मृत्यु से श्रापित
कोई भीष्म नहीं हूं मैं

मैं आज भी
तुम्हारे सोते हुए
संपृक्त चेहरे से प्यार करता हूं अदिति

मेरे नाक की लंबाई
समुद्र तल से बहुत अधिक है

मैं आज भी सांसें ले रहा हूं

बस यही एक प्रमाण बचा है
मेरे बचे रहने का

तुम्हारे पास
वजहों की कोई कमी नहीं है

उनमें से एक
मुझे ज़िंदा रहते देखना भी है

जानता हूं
तुम्हें मुझे किसी थके हुए कैनवास पर
रंगों सा मरते हुए देखना पसंद नहीं है

गर्भवती बादलों के पीछे से
तुम्हें मेरा सूरज सा निकलना पसंद है

लेकिन मैं अथाह जल में हूं

नहीं
नाज़िम हिकमत की तरह
अटलांटिक के गहरे नहीं
युद्ध पोतों को पनडुब्बियों का
शिकार होते देखते हुए

मैं बस एक बर्बर पहाड़ हूं
जो पानी में डूबा हुआ है

मेरे जिस्म पर
अभी तक उगते हैं सब्जां
और रात के तीसरे पहर में
घर लौटते किसी हारे हुए शायर के
दिलोदिमाग़ पर फैल जाता हूं
उस आदिम शैवाल की तरह
जिसके साथ संवाद करने के लिए
तुम्हारे पास कोई
भाषा नहीं है अदिति

तुम्हारे चेहरे का आधा हिस्सा
अंधेरे में डूबा है
और इसलिए शायद मैं तुम्हें आज तक
चाँद समझता रहा

जबकि तुम वाक़ई में एक चवन्नी हो
चलन से बाहर

मैं इस चवन्नी को ले कर
बाज़ार में उतरा हूं
ये जानते हुए कि
वे मुझे हिक़ारत से देखेंगे
मुझ पर हंसने के लिए
वे मेरी पीठ का इंतज़ार नहीं करेंगे

और
जंगल में खोते हुए
घोड़ों की टाप की तरह
मैं चला जाऊंगा उनसे
बहुत दूर

बहुत दूर तक पीछा करेंगी मेरा
उनकी हंसी
जो समय के पोपले मुंह में
आख़िरी दांत सा बचा है

दुर्गंध
ओह !
ज़िंदा दिखते हुए लोगों के पोपले मुंह से
मृत्यु का दुर्गंध
झरे हुए शब्दों के हरसिंगार कहां चले गए अदिति

सड़न के बीज
गतानुगतिक के ताच्छिल्य के पेंदे में बैठे
उगाते रहे मनी प्लांट

उनकी उंगलियों की जुंबिश में
तलाश रही
रोशनी की
जो उनके ड्रॉईंग रूम की सज्जा के साथ
ताल बैठा सके
बीथहोवेन की सिंफ़नी की तरह

कहीं पर
पर्दे का रंग दीवारों के साथ मैच नहीं करता

कहीं पर खिड़कियों की ऊंचाई
उनसे बाहर झांकने वालों से कम है

अजीब जंगल है
जो उनके घर के अंदर है

इतना कुछ टुकड़ों में समेटने की कोशिश है कि
मैंने अपनी हार मान ली है
और चल पड़ा हूं मैं
उस मिट्टी के दुमंज़िला मकान के उपरी तल्ले पर बने
एक कंकाल की आंखों के खोह में बनी
खिड़की के बाहर बहती हुई
धान के हरे खेतों के पार एक नदी
जिसके किनारे किसी स्थित प्रज्ञ योगी सा
खड़ा है सर्प दंश के इलाज सा वह
छोटा सा मंदिर

जिस खोह से गुजरती हुई
सावन की हवा ने मुझे पहली बार सिखाया था
विरह का अर्थ
तुम्हारे प्रेम में पड़ने के बहुत पहले अदिति

ओह
फिर वही दुर्गंध
जलीय चराचर के शताब्दी की यात्रा से
आता हुआ दुर्गंध

क्या सारे बारूदी सुरंगों के फटने के बाद
मेरे कटे हुए पैर के छोर से उठेगा यही दुर्गंध
बताओ न अदिति
मेरे घुटने के नीचे
कृत्रिम पैर को रोपते हुए
तुम मुझे किसी खेत में
धान रोपती हुई उस लड़की की तरह क्यों दिखती हो
जिसके घुटने तक उठी हुई साड़ी
मुझे उत्तेजित नहीं करता

क्या मैं मृतात्मा ढोते हुए किसी
ज़िंदा बदन सा हूं अदिति

बहस जारी है

जब तक अदालतें हैं
वकील भी हैं और मुवक्किल भी
मी लॉर्ड भी और बहस भी

जेरे बहस ए मुद्दआ
बस एक चेहरा है
और उस चेहरे के मुनासिब एक दुनिया

या इस दुनिया के मुनासिब एक चेहरा

फ़ैसला जिसके हाथ में है
उस मुंसिफ़ की आंखों में नींद है
और उसके कानों में पिघले हुए सीसे हैं

ठंडा पड़ जाने के बाद
सीसा निस्पृह है

लेकिन मैं इन सबके वावजूद
तुम्हारी तलाश में हूं अदिति…

2

धीरे धीरे
अपना साया समेट कर
क्षितिज पार सो गई
रोशनी
मोरपंखी रात
समंदर पर लुटने से पहले
ठिठकी थी
पल दो पल
एक विच्छिन्न लाली
कहीं से टपक पड़ी
जैसे
खून का आख़िरी कतरा
चू गया हो
एक बूंद
आंसू की तरह

प्रमाद का विस्तार
रुपहली बर्छियों से जब
छेदा जा रहा था
निकुंज के मर्म में
तुम गुनगुना रही थी
किसी अबोध्य भाषा में गीत

चांद के डैने
जब भोर रात को खुले
तब तक
बर्फ़ की लड़ियों में
ढल गए थे
अहेतुक कई सवाल
उपेक्षा की निरंतरता में
क्रमशः पलता एक ज्वार
सफ़र में जले पैरों से लिपट कर
कुछ कह गया

मैं जानता हूं तुम्हारी सीमाएं
अदिति
दूर्ब शीर्ष पर अविचल
काल के अश्रु सा
निर्मम.

3

एक टुकड़ा बादल
भटके हुए पाल नौका सा
आकाश पर उभरा
और तेज बहती हवाओं के आग़ोश में आकर
जब खो गया अनंत मे
याद आई थी तुम
थर्रा उठा था एक जंगल
आग की आशंका से
पहाड़ी के टखनों में
अग्नि माल का पायल
नि:शब्द जल उठा
रात की बज़्म में

मेरे कुछ समझने
कहने सुनने के पहले
घटित हो जाता है इतना कुछ
और, भूकंप से हुई समूची क्षति का हिसाब
कौन रख पाया है आज तक

किन सपनों के उपर
कौन सी ख़्वाहिशें हावी हो गई
कौन कौन सी ख्वाहिशें
दफ़्न हुई किन मजबूरियों के तले
कौन रखता है हिसाब

यहां मृत्यु प्रायोजित है
यहां जीवन
नाली किनारे उगा थेथर है

तुम्हें याद होगा अदिति
तुम्हारे साथ समंदर की तरफ़ पीठ किए
देखते हुए शहर
हम कैसे खो जाते थे कभी
रंग, रोशनी और चेहरों की भीड़ में
और हमारे सर के उपर से
चुपचाप गुज़र जाता था
प्रेम का मौसम
बादल, रात, चांदनी और हवा बन कर

देर रात
जब हम लौटते थे
तुम्हारे हाथ कस कर थाम लेते थे मेरे हाथ
गो के तुम्हें डर था साथ छूटने का मेरा

मैं जानता हूं
उन क्षणों में तुम बहक जाती थी
एक पाल नौका की तरह
खुले समंदर में
और हवाओं सा पीछा करता था मैं तुम्हारा
ये जानते हुए भी कि
जितना तेज बहूंगा मैं तुम्हारी तरफ़
उतनी ही तेज़ी से दूर हो जाओगी
मुझसे तुम

हमारे मन और शरीर का अवसान
प्रायोजित था अदिति

अब तुम दूर कहीं जा कर बरसो
या फ़ना हो जाओ
मैं ढूंढ लूंगा और एक भीड़
खोने के लिए
एक बिना चेहरे की भीड़.

4

मैं आज गया था
तुम्हारे शहर में
आंखों पर पट्टियां बांधे
बड़ा खूबसूरत नज़ारा था
हर शख्स अपने आप में गुम
हर तरफ तरक्की
रोशनी
संगीत
सुगंध
छतों पर उड़ते पतंग
पतंग के पीछा करती
उनकी आंखें, रुह
आने वाले कल के ख़्वाब
और ख़्वाब भी ऐसे कि
हल्के हवा के झोंको से
सिहर कर संगीत पैदा करते
उनके दरवाजों पर टंगे
विंडचाईम की तरह
गमलों में सिमटा जंगल
ले जाता है तुम्हें
न जाने कहां
दफ़्तर से लौटने के बाद
देर रात को
मेरी आंखों पर बंधी पट्टियां भी
छुपा नहीं पाता है
पीली रोशनी में तैरता
तुम्हारे शहर का उदास चेहरा

  • सुब्रतो चटर्जी

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