Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

आखिर क्यों हम इन केंद्रीय बैंकरों के गुलाम बने बैठे हैं?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 14, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

[ जब अंकल सैम के सेंटा क्लॉज का हैदराबाद में स्वागत किया जा रहा था तब हमने आपसे एक सवाल पूछा था: “जब बोलीविया जैसे देश केंद्रीय बैंकरों से स्वतंत्रता की घोषणा कर सकते हैं तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता है? कृपया मुझे बताएं कि हम केंद्रीय बैंकरों के दास क्यों बने बैठे है ?” इस लेख में इसी सवाल पर शेली कसली द्वारा प्रकाश डाला गया है ]

आखिर क्यों हम इन केंद्रीय बैंकरों के गुलाम बने बैठे हैं?

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

बोलीविया के राष्ट्रपति ईवो मोरालेस ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा ऋण संगठनों से अपनी सरकार की स्वतंत्रता की घोषणा की है. साथ ही साथ उन्होंने राष्ट्र पर उनके हानिकारक प्रभाव को भी उजागर किया है.

“1944 में आज की तरह एक दिन ब्रेटन वुड्स इकोनॉमिक कॉन्फ्रेंस (USA) समाप्त हुआ, जिसमें IMF और विश्व बैंक स्थापित हुए थे” मोरालेस ने ट्वीट किया. “ये संगठन बोलिविया और विश्व के आर्थिक भाग्य को नियंत्रित करते हैं. आज हम यह कह सकते हैं कि हम उनसे पूरी तरह से स्वतंत्र हैं.“

मोरालेस ने यह भी कहा कि इन सेंट्रल बैंकरों पर बोलीविया की निर्भरता इतनी ज़्यादा थी कि IMF का सरकारी मुख्यालय में कार्यालय हुआ करता था और यहां तक ​​कि उनकी बैठकों में भी हिस्सा लिया करता था.

बोलिविया अब सेंट्रल बैंकरों की पकड़ से मुक्त दक्षिण कॉमन मार्केट का सदस्य बनने की प्रक्रिया में है.

कोचाबम्बा जल युद्ध : 2000 में अमेरिका स्थित बेचटेल कॉरपोरेशन के खिलाफ पानी निजीकरण और संयोजित विश्व बैंक की नीतियों के विरुद्ध बोलीविया का लोकप्रिय विद्रोह कोचाबम्बा जल युद्ध के रूप में जाना जाता है। इस युद्ध ने क्षेत्र के सामने आने वाले कुछ ऋण संबंधी मुद्दों पर प्रकाश डाला. दुर्भाग्य से भारत भी (अपने स्मार्ट सिटी कार्यक्रम से) उसी मार्ग का अनुसरण कर रहा है.

“विश्व बैंक और IMF इन देशों (वैश्विक दक्षिण) को “संरचनात्मक समायोजन (structural adjustment)” स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. इसमें विदेशी कंपनियों के लिए देशी बाजारों को खोलना और राज्य संपत्तियों का निजीकरण भी शामिल है”, न्यू यॉर्कर की रिपोर्ट.

पिछले 60 वर्षों में बोलीविया के सब्से बड़े प्रतिरोध संघर्ष ने IMF और विश्व बैंक द्वारा लागू कि जाने वाली आर्थिक नीतियों को लक्षित किया है. अधिकांश विरोध सार्वजनिककरण, निजीकरण के फैसले, मजदूरी में कटौती और साथ ही साथ श्रम अधिकारों के कमजोर होने पर केंद्रित था.

2006 के बाद, मोरालेस सत्ता में आने के एक साल बाद, स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी के कार्यक्रमों पर सामाजिक खर्च 45% से अधिक बढ़ा है.

क्या भारत भी बोलीविया की तरह केंद्रीय बैंकरों से स्वतंत्रता की घोषणा कर सकता है ?

जबकि बोलीविया ने अपने देश से केंद्रीय बैंकरों को निकाल फेंका है और अपने सबसे मूल्यवान राष्ट्रीय संसाधन ‘जल’ को वापस ले लिया है, भारत सरकार इनही केंद्रीय बैंकरों को खुली बाहों के साथ देश में आमंत्रित कर रही है. यहाँ तक की भारत सरकार हमारी अपनी नदियों और पीने के पानी को बेचने के लिए भी तैयार है.

भयानक जल संकट जिसने भारत के कई हिस्सों को प्रभावित करना शुरू कर दिया था, को हल करने के लिए सरकार ने 10 करोड़ रुपये का अनुदान प्रदान किया. यह अनुदान अग्रणी धारवाड़ विश्वविद्यालय को जल संकट का हल खोजने के लिए आवंटित किया गया था. भारतीय वैज्ञानिकों ने भारतीय धन के साथ काम किया और विश्वविद्यालय ने एक उत्कृष्ट अलवणीकरण प्रौद्योगिकी का उत्पादन किया.

लेकिन जैसे ही इस सरल तकनीक की खोज की गई, यह तकनीक सऊदी अरब को 100 से भी अधिक करोड़ रुपए में बेच दि गई. सऊदी अरब ने अपनी जल अलवणीकरण को लागू करने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया है लेकिन भारत ने आज तक अपने वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई इस तकनीक को लागू नहीं किया है – जो वैसे भी पीने के पानी के लिए आर्कटिक हिमशैल के टुकड़े को अरब देशों में लाने की तुलना में काफी कम है.

सार्वजनिक धन के इस अपव्यय के लिए कोई याचिका दायर नहीं की गई. हमारे देश के सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के महत्वपूर्ण क्षेत्र में विश्वास का विश्वासघात करने के लिए कोई याचिका दायर नहीं की गई. दोषी को दंडित करने के लिए कोई जांच नहीं की गई और न ही इस मामले में कोई सुओ-मोटो मुक़दमा दायर किया गया.

इसके बजाय हम खुशी से कहते हैं: “भारत की अपनी नदियां और पेयजल, पेप्सी और कोकाकोला के लिए है” – जिनको एक दशक पहले बोलीविया सहित कई छोटे देशों में से निकाल दिया गया है. ये वही कंपनियां हैं जिन्होंने बोलिविया के समस्त पानी का स्वामी होने का दावा किया था, जिसमें बारिश का पानी भी शामिल था और बेशर्म होकर हम अपनी ही नदियों को इनही कंपनियों को बेच रहे हैं. कृपया मुझे बताएं कि हम इन कंपनियों के ग़ुलाम क्यों बने बैठे है ? क्या आपको गुलामी करने में मजा आता है ? अपना नहीं तो कम से कम अपने बच्चों के बारे में सोचें. क्या आप अपने बच्चों को गुलामी करते देखना चाहते हैं ?

क्या आपको पता है कि छत्तीसगढ़ में 22 साल के लिए नदी को किराए पर ले सकते हैं ? वह भी सिर्फ 1 रुपये प्रति वर्ष की कीमत पर, जबकि हजारों लोग प्यास से मर रहे हैं. क्या आपको पता है मदुरई की पीठ के उच्च न्यायालयने स्थानीय लोगों के खिलाफ थिमिरबारनी नदी से पानी की आपूर्ति करने के लिए तिरुनेलवेली जिले में कोका कोला और पेप्सी के पक्ष में फैसला सुनाया है ? क्या आपको पता है अगस्त 2016 में, कर्नाटक सरकार ने अबू धाबी-आधारित व्यापारी बीआर शेट्टी को 450 करोड़ रुपये में जोग फॉल्स को पर्यटक हॉटस्पॉट में बदलने के लिए बेचने की अनुमति दी हैं ? क्या आप कम से कम अब शर्म महसूस कर सकते हैं या नहीं ?

उसी समय जब बोलीविया ने अपने देश से इन केंद्रीय बैंकरों को निकाल दिया है तो हम भारत में राष्ट्र की हर संपत्ति को उन्हें बेचने के लिए तैयार हो रहे हैं. देश की हर एक संपत्ति बेचने के लिए एक सेंट्रल बैंक बनाया जा रहा है जो कि PARA (सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति पुनर्वास एजेंसी) के नाम से जाना जाता है. यह विचार भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर, विरल आचार्य ने प्रस्तावित किया था. डिप्टी गवर्नर के रूप में नियुक्त करने से पहले, आचार्य न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस में एक प्रोफेसर थे. यही स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस में श्री आचार्य को भारत की थोक बिक्री का विचार आया जो उन्होंने एक शोध पत्र में प्रकाशित किया.

क्या यह विडंबना नहीं है कि आजादी के बाद गत 70 सालों से, यह भारत है जो विश्व बैंक का सबसे बड़ा ऋण प्राप्तकर्ता है – जो अब 102.1 अरब डॉलर तक बढ़ चुका है – 1945 और 2015 के बीच (जुलाई 21, 2015 तक), बैंक की ऋण रिपोर्ट के मुताबिक. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मुताबिक मार्च 2016 के अंत तक हमारे ऊपर 485.6 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है.

हम इन ऋणों को कैसे चुकेंगे ? क्या हम कभी भी इन ऋणों का भुगतान करने में सक्षम होंगे ? अगर हां, तो कब तक ? क्या है किसी के पास इस सवाल का जवाब पुरे भारत मै ? देरी या डिफ़ॉल्ट के मामले में इन ऋणों से जुड़ी शर्तें क्या हैं ? क्या आपको कभी सरकार ने इन शर्तों के बारे में बताया है ? अगर नहीं, तो क्या कभी आपने ये सवाल उठाये है ? ट्रोइका (विश्व बैंक, IMF और ECB) द्वारा ऋणग्रस्त ग्रीस, साइप्रस, आयरलैंड, पुर्तगाल, स्पेन और वेनेजुएला की लूट की हालिया घटनाएं सो रहे भारतीयों के लिए एक चेतावनी घंटी होना चाहिए. क्या यह है वो नया भारत जिसका सपना हमें दिन-रात बेचा जा रहा है ? क्या हाल की स्वयं-घोषित राष्ट्रवादी सरकार बोलीविया की तरह इन केंद्रीय बैंकरों की ताकत के सामने निडर होकर खड़े होने का जिगर रखती हैं ? मैं एक बार फिर से आप सभी से पूछता हूँ, आखिर क्यों हम इन केंद्रीय बैंकरों के गुलाम बने बैठे हैं ?

Read Also –

हिन्दुत्व की आड़ में देश में फैलता आतंकवाद
साम्प्रदायिक फासीवादी भाजपा सरकार की भंवर में डुबती आम मेहनतकश जनता
कालजयी अरविन्द : जिसने अंतिम सांस तक जनता की सेवा की

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

आधार : स्कायनेट के खूनी शिकंजे में

Next Post

संसदीय वामपंथी : भारतीय सत्ताधारियों के सेफ्टी वॉल्व

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

संसदीय वामपंथी : भारतीय सत्ताधारियों के सेफ्टी वॉल्व

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

बांग्लादेश से आदर्श संबंध : जब सरकार ही आदर्श बोल रही है तो हम आप क्या बोलेंगे ?

October 29, 2021

बैंककर्मियों का हड़ताल : नफरत से भरा नागरिक निजीकरण का विरोध नहीं कर सकता है

December 17, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.