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सीपीआई माओवादी के पांच महासचिवों का संक्षिप्त परिचय

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 19, 2025
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सीपीआई माओवादी के पांच महासचिवों का संक्षिप्त परिचय
सीपीआई माओवादी के पांच महासचिवों का संक्षिप्त परिचय

सीपीआई माओवादी के पांच महासचिवों का संक्षिप्त परिचय भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल है. सीपीआई माओवादी का इतिहास उसके प्रथम संस्थापक महासचिव चारु मजुमदार से शुरु होता है, जिन्होंने भारत में पहली बार सोवियत संघ की अंधकारपूर्ण संशोधनवादी नीतियों से किंकर्तव्यविमूढ़ भारत की क्रांतिकारी जनता के हाथों में संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए क्रांतिकारी मशाल थमाई और चुनाव बहिष्कार को अपना केन्द्रीय नारा बनाते हुए सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया.

जल्दी ही चारु मजुमदार को पुलिस ने पकड़ लिया और कठोर यातना देते हुए उनकी हत्या कर दी. आज जब सीपीआई माओवादी अपने चौथे महासचिव बासवराज की मौत की गम में हैं, तब इनके बीच देव जी जैसे महान क्रांतिकारी नेता ने सीपीआई माओवादी को पांचवें महासचिव के रुप में नेतृत्व दिया है. असल में सीपीआई माओवादी को अब तक अपने चार महासचिवो ने नेतृत्व दिया है, और अब पांचवें महासचिव के रुप में देवजी हैं.

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सीपीआई माओवादी के संस्थापक महासचिव चारु मजुमदार से लेकर अबतक के सभी महासचिवों के बारे में हम यहां एक संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं. लेकिन इससे पहले हम यह जरूर बताना चाहेंगे कि महासचिव बासवराज और महासचिव देव जी समाज के सबसे उत्पीड़ित शोषित और दमित तबके से आते हैं, इसीलिए एक ओर जहां ये समाज के सबसे उत्पीड़ित शोषित जनता के आंखों का तारा बनें तो वहीं मनुस्मृति आधारित शोषणकारी समाज बनाने के लिए हर संभव उपाय करने वाली ब्राह्मणवादी हिन्दू फासिस्ट मोदी सत्ता इनको खत्म करने के लिए पूरी ताकत लगा दिया है.

सीपीआई माओवादी के नये महासचिव देव जी के बारे मे एक और महत्वपूर्ण चीज जो बिहार में इनको लोकप्रिय बनाती है, वह है बिहार की जनता के सबसे लोकप्रिय शहीद माओवादी नेता देव कुमार के नाम को धारण करना. ज्ञात हो कि माओवादियों की क्रांतिकारी धारा में एक परम्परा बनी है कि लोकप्रिय शहीद नेता का नाम उनके बाद के नेता या कार्यकर्ता अपना लेते हैं. तीसरे महासचिव गणपति ने भी ‘गणपति’ नाम एक जुझारू माओवादी नेता की शहादत के बाद अपना लिया था और समूची दुनिया में इसी नाम से मशहूर हुए.

इसी तरह महासचिव देव जी का नाम भी बिहार के जहानाबाद से माओवादी आंदोलन के पोलिट ब्यूरो सदस्य देव कुमार ऊर्फ अरविन्द कुमार के नाम से लिया गया है, जिन्होंने भारत के इतिहास में पहली बार विश्वविख्यात जहानाबाद जेल ब्रेक जैसे सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया था. बहुत बाद में वे 2018 में समुचित इलाज के बगैर वे झारखंड के एक पहाड़ पर युद्ध क्षेत्र में ही गंभीर बीमारी से मौत को प्राप्त हुए. यही कारण है कि वर्तमान माओवादी महासचिव देवजी का सीधा संबंध बिहार की जनता से भी जुड़ जाता है.

आइये, हम एक-एक कर सीपीआई माओवादी के पांचों महासचिवों के बारे मे एक संक्षिप्त परिचय अपने पाठकों को दे रहे हैं. यह परिचय इंटरनेट, सोशल मीडिया और यत्र तत्र प्राप्त जानकारी के आधार पर दे रहे हैं, जिस कारण कुछ कमियां यहां हो सकती है. इसके लिए पाठक हमे क्षमा करेंगे – सम्पादक

1. प्रथम संस्थापक महासचिव चारु मजुमदार

Charu

चारु मजुमदार (जन्म: 15 मई 1918 – मृत्यु: 28 जुलाई 1972) भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे. वे नक्सलवाद के जनक के रूप में जाने जाते हैं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) [CPI(ML)] के संस्थापक एवं महासचिव रहे. एक प्रगतिशील जमींदार परिवार में जन्मे मजुमदार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाया और बाद में नक्सलबाड़ी विद्रोह (1967) के माध्यम से सशस्त्र क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया.

उनका जीवन किसानों के संघर्ष, आर्थिक असमानता के खिलाफ विद्रोह और माओवादी विचारों से प्रेरित क्रांतिकारी गतिविधियों से भरा रहा. उनकी विचारधारा और रणनीति ने भारत की राजनीति में गहरा प्रभाव डाला, जिस कारण एक समय भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सबसे बड़ा आंतरिक संकट बताया तो वहीं अभी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे खतरनाक बताया और उसके गृहमंत्री अमित शाह ने तो एक कदम आगे बढ़कर 31 मार्च, 2026 तक खत्म कर देने का दावा किया है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

चारु मजुमदार का जन्म 15 मई 1918 को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में एक प्रगतिशील जमींदार परिवार में हुआ. उनके पिता एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे, लेकिन परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था. किशोरावस्था से ही मजुमदार सामाजिक असमानताओं से विद्रोह करने लगे.

उन्होंने 1937 में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और पाबना जिले (वर्तमान बांग्लादेश) के एडवर्ड कॉलेज में दाखिला लिया. लेकिन जल्द ही उन्होंने औपचारिक शिक्षा छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. 1936 में विश्वविद्यालय में कम्युनिज्म के संपर्क में आने के बाद वे प्रभावित हुए और 1938 में पड़ोसी जलपाईगुड़ी जिले में संगठित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) में शामिल हो गए. पार्टी तब प्रतिबंधित थी, इसलिए उन्हें छिपकर किसान आंदोलनों में काम करना पड़ा.

राजनीतिक करियर और प्रमुख आंदोलन

चारु मजुमदार का राजनीतिक जीवन किसानों के अधिकारों पर केंद्रित रहा. 1940 के दशक में वे तेभागा आंदोलन (Tebhaga Movement) के प्रमुख संगठकों में से एक बने, जो अविभाजित बंगाल में फसलों के दो-तिहाई हिस्से के लिए किसानों का संघर्ष था. इस आंदोलन ने भूमि और फसल अधिकारों पर जोर दिया और मजुमदार ने उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग व जलपाईगुड़ी जिलों में सक्रिय भूमिका निभाई.

1948 में CPI पर प्रतिबंध लगने पर उन्हें तीन साल जेल में रहना पड़ा. जेल से रिहा होने के बाद वे सिलीगुड़ी लौटे और आंदोलन को पुनर्जीवित करने लगे. 1952 में उन्होंने CPI की एक साथी, लीला मजुमदार सेनगुप्ता से विवाह किया, जो भी एक सक्रिय कम्युनिस्ट थीं. लीला एक शिक्षिका और बीमा एजेंट भी थीं, जिन्होंने परिवार का आर्थिक बोझ संभाला. दंपति के तीन बच्चे हुए: दो बेटियां (अनिता और एक अन्य) और एक बेटा (अभिजीत).

1964 में CPI के विभाजन के बाद मजुमदार CPI (मार्क्सवादी) [CPI(M)] में शामिल हुए, लेकिन पार्टी की चुनावी राजनीति और सशस्त्र संघर्ष को स्थगित करने की नीति से असहमत हो गए. 1967 में नक्सलबाड़ी (दार्जिलिंग जिला) में किसानों का विद्रोह हुआ, जहां जमींदारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ. मजुमदार ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया और इसे ‘भारतीय क्रांति का प्रारंभिक बिंदु’ माना. यह विद्रोह माओ त्से-तुंग की चीनी क्रांति से प्रेरित था, जहां किसानों को सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से सत्ता पर कब्जा का आधार बनाया गया.

नक्सलबाड़ी घटना ने ‘नक्सलवाद’ शब्द को जन्म दिया, जो बाद में भारत के कई हिस्सों में फैला. 12-13 नवंबर 1967 को तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के साथियों ने ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑफ रेवोल्यूशनरीज (AICCR) का गठन किया, जो बाद में ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑफ कम्युनिस्ट रेवोल्यूशनरीज बना. 2 अप्रैल 1969 को इसने CPI(ML) की स्थापना की, जिसमें चारु मजुमदार महासचिव बने. उनकी विचारधारा ‘वर्ग-शत्रु की हत्या’ और ‘सशस्त्र विद्रोह’ पर आधारित थी, जिसे उन्होंने ‘आठ दस्तावेजों’ (Historic Eight Documents) में विस्तार से लिखा.

विचारधारा और प्रभाव

मजुमदार की विचारधारा माओवाद से गहराई से प्रभावित थी. वे मानते थे कि भारत में संसदीय लोकतंत्र एक भ्रम है और सच्ची क्रांति केवल सशस्त्र किसान विद्रोह से संभव है. उनका प्रसिद्ध उद्धरण है: ‘जो सपना नहीं देख सकता और दूसरों को सपना नहीं दिखा सकता, वह सच्चा क्रांतिकारी नहीं है.’ नक्सलबाड़ी ने युवाओं को आकर्षित किया, जो गरीबी, जमींदारी और राजनीतिक दलों की विफलता से असंतुष्ट थे.

आंदोलन ने तमिलनाडु से बिहार तक फैलाव किया, लेकिन हिंसक संघर्षों के कारण यह दबा दिया गया. मजुमदार को ‘ड्रीमर रेबेल’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने युवाओं को सपनों के माध्यम से क्रांति के लिए प्रेरित किया. उनकी विरासत आज भी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) जैसे समूहों में जीवित है, जो जुलाई के अंतिम सप्ताह में ‘शहीद सप्ताह’ मनाते हैं. हालांकि, सत्ता उन्हें हिंसा के प्रचारक मानते हैं, जिससे हजारों मौतें हुईं.

गिरफ्तारी और मृत्यु

1970-72 के बीच नक्सल आंदोलन चरम पर था, लेकिन राज्य की कार्रवाई बढ़ गई. 16 जुलाई 1972 को कोलकाता में मजुमदार को गिरफ्तार किया गया. वे छिपे हुए थे और सिगार के शौक के कारण पहचाने गए. 28 जुलाई 1972 को पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई. आधिकारिक रूप से इसे हृदयाघात बताया गया, लेकिन गवाहों के अनुसार पुलिस ने उन्हें यातनाएं दी. शव को परिवार को सौंपे बिना जलाया गया, जिससे विवाद हुआ. उनकी मृत्यु ने आंदोलन को कमजोर किया, लेकिन नक्सलवाद की जड़ें मजबूत रहीं.

विरासत और साहित्यिक योगदान

चारु मजुमदार की विरासत जटिल है: कुछ उन्हें जननायक मानते हैं, तो सत्ता राज्य के लिए खतरा. उनके बेटे अभिजीत मजुमदार ने कहा है कि पिता की विरासत आज भी ‘शहरी नक्सल’ जैसे शब्दों से सताई जाती है. उनकी पत्नी लीला मजुमदार एक स्वतंत्र कार्यकर्ता थीं, जिनकी संस्मरण उनके बच्चे संकलित कर रहे हैं. मजुमदार ने कई लेख लिखे, जैसे ‘1965 का क्या संकेत दे रहा है ?’ और ‘आधुनिक संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष जारी रखें.’

हाल ही में 2022 में अशोक मुखोपाध्याय की पुस्तक ‘चारु मजुमदार: द ड्रीमर रेबेल’ प्रकाशित हुई, जो उनके जीवन पर आधारित है. चारु मजुमदार का जीवन ‘धन से दरिद्रता’ की कहानी है – एक संपन्न परिवार से निकलकर क्रांति के लिए सब कुछ त्याग दिया. उनकी विचारधारा आज भी भारत के ग्रामीण संघर्षों को प्रभावित करती है.

2. द्वितीय महासचिव कोंडापल्ली सीतारमैय्या

Sitaramaiya

कोंडापल्ली सीतारमैय्या (तेलुगु: కొండపల్లి సీతారామయ్య; जन्म: 1914 – मृत्यु: 12 अप्रैल 2002) भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के एक प्रमुख माओवादी नेता और संगठक थे. वे नक्सलवाद के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों में से एक थे और सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वार (CI-ML-PW) के संस्थापक थे, जो बाद में भारत के सबसे प्रभावशाली नक्सली संगठनों में से एक बन गया.

एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में जन्मे सीतारमैय्या ने अपने जीवन को किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए सशस्त्र संघर्ष को समर्पित कर दिया. उनकी विचारधारा माओ त्से-तुंग की चीनी क्रांति से प्रेरित थी, और उन्होंने भारत में ‘जनयुद्ध’ (People’s War) की अवधारणा को लागू करने का प्रयास किया. हालांकि, उनकी गतिविधियों ने हिंसक संघर्षों को जन्म दिया, जिससे वे राज्य के लिए एक प्रमुख खतरे के रूप में देखे गए. उनकी विरासत आज भी भारत के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सल आंदोलन को प्रभावित करती है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

कोंडापल्ली सीतारमैय्या का जन्म 1914 में आंध्र प्रदेश के गुडिवाड़ा राजस्व मंडल के नंदिवाड़ा मंडल में लिंगावरम गांव में एक धनी किसान परिवार में हुआ. उनका परिवार मध्यम वर्गीय था, लेकिन सामाजिक असमानताओं से प्रभावित था. बचपन से ही वे कम्युनिस्ट विचारधारा से आकर्षित हुए, जो उस समय भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकप्रिय हो रही थी. उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर प्राप्त की, लेकिन औपचारिक शिक्षा को पूरा नहीं किया.

युवावस्था में वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़ गए और किसान आंदोलनों में सक्रिय हो गए. 1940 के दशक में वे तेलंगाना किसान विद्रोह (Telangana Peasant Revolt, 1946-1951) में शामिल हुए, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक प्रमुख सशस्त्र संघर्ष था. इस विद्रोह में उन्होंने किसानों को संगठित करने और जमींदारों के खिलाफ लड़ाई लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विद्रोह के दमन के बाद उन्हें जेल की सजा मिली, लेकिन जेल से रिहा होने के बाद भी वे भूमिगत गतिविधियों में शामिल हो गये.

राजनीतिक करियर और प्रमुख आंदोलन

सीतारमैय्या का राजनीतिक सफर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) [CPI(M)] से शुरू हुआ, लेकिन 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह (पश्चिम बंगाल) ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. चारु मजुमदार जैसे नेताओं की माओवादी विचारधारा से प्रेरित होकर वे मानने लगे कि भारत में सच्ची क्रांति केवल सशस्त्र किसान विद्रोह से ही संभव है.

1969 में CPI(ML) के गठन के समय वे आंध्र प्रदेश में सक्रिय थे, लेकिन पार्टी के आंतरिक विभाजन और दमन के कारण 1980 में उन्होंने सीपीआई-एमएल-पीपुल्स वार ग्रुप (CPI-ML-PW) की स्थापना की. PW का उद्देश्य माओ के ‘जनयुद्ध’ सिद्धांत को लागू करना था, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में आधार बनाकर शहरों पर कब्जा करने की रणनीति अपनाई गई.

PW ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में तेजी से फैलाव किया. संगठन ने जमींदारों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ हमले किए, जिससे हजारों मौतें हुईं. सीतारमैय्या ने PWG को एक सैन्यीकृत संगठन बनाया, जिसमें “गुरिल्ला वारफेयर” (Guerilla Warfare) की ट्रेनिंग दी जाती थी.

1980 के दशक में PW ने कई प्रमुख घटनाओं को अंजाम दिया, जैसे कि पुलिस स्टेशनों पर हमले और भूमि सुधार के लिए हिंसक कार्रवाई. उनकी रणनीति में महिलाओं और आदिवासियों को शामिल करना भी प्रमुख था, जिससे संगठन को ग्रामीण समर्थन मिला. हालांकि, राज्य सरकारों ने PW को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, और सीतारमैय्या पर कई इनाम घोषित किए गए.

विचारधारा और प्रभाव

सीतारमैय्या की विचारधारा पूरी तरह माओवादी थी. वे मानते थे कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र एक ‘झूठा प्रणाली’ है और सत्ता को केवल सशस्त्र विद्रोह से ही उखाड़ा जा सकता है. उन्होंने ‘जनयुद्ध’ को भारत की परिस्थितियों के अनुकूल बताया, जहां किसान और मजदूर वर्ग को नेतृत्व करना चाहिए. PWG के माध्यम से उन्होंने आदिवासी अधिकारों, भूमि वितरण और सामाजिक न्याय पर जोर दिया.

उनके नेतृत्व में PWG ने 1980-1990 के दशक में भारत के ‘रेड कॉरिडोर’ (Red Corridor) को मजबूत किया, जो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का नाम है. उनकी विरासत विवादास्पद है. समर्थक उन्हें किसानों का मसीहा मानते हैं, जिन्होंने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन आलोचक उन्हें हिंसा के प्रचारक कहते हैं, जिससे विकास रुका और निर्दोष लोगों की मौत हुई.

PW 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) [CPI(Maoist)] में विलय हो गया, जो आज भी सक्रिय है। सीतारमैय्या की मृत्यु के बाद भी उनके विचार नक्सल आंदोलन को प्रेरित करते हैं.

गिरफ्तारी, समर्पण और मृत्यु

1990 के दशक में PW पर दबाव बढ़ गया. 1993 में स्वास्थ्य समस्याओं के कारण सीतारमैय्या ने सरेंडर कर दिया. उन्होंने ‘शांतिपूर्ण’ जीवन जीने का वादा किया, लेकिन बाद में फिर से भूमिगत हो गए. वास्तव में, 1993 में उन्होंने तेलंगाना में सरेंडर किया, लेकिन यह एक रणनीतिक कदम था. वे कई वर्षों तक भूमिगत रहे और PWG का नेतृत्व करते रहे. अंततः, 12 अप्रैल 2002 को हैदराबाद में उनकी मृत्यु हो गई.

उनकी मृत्यु का आधिकारिक कारण बुढ़ापे से संबंधित बीमारियां बताई गईं, लेकिन कुछ स्रोतों के अनुसार पुलिस कार्रवाई और स्वास्थ्य समस्याओं का प्रभाव था. उनकी मृत्यु ने PWG को कमजोर किया, लेकिन संगठन ने अपना संघर्ष जारी रखा.

विरासत और साहित्यिक योगदान

कोंडापल्ली सीतारमैय्या की विरासत नक्सल आंदोलन में अमिट है. PW ने भारत के ग्रामीण विकास और आदिवासी मुद्दों पर बहस छेड़ी. भारत की क्रांतिकारी जनता आज भी उन्हें ‘क्रांतिकारी नेता’ के रूप में याद करते हैं. साहित्यिक रूप से, उन्होंने कई लेख और दस्तावेज लिखे, जो माओवादी सिद्धांतों पर आधारित थे, जैसे कि ‘जनयुद्ध की रणनीति’ पर नोट्स.

हाल के वर्षों में, उनके जीवन पर कई किताबें और डॉक्यूमेंट्री बनी हैं, जो नक्सलवाद के इतिहास को समझने में मदद करती हैं. सीतारमैय्या का जीवन एक साधारण किसान से क्रांतिकारी बनने की प्रेरणादायक कहानी है, लेकिन यह हिंसा और संघर्ष से भरा भी रहा. उनकी विचारधारा आज भी भारत के सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को संबोधित करने के संदर्भ में प्रासंगिक बनी हुई है.

तृतीय महासचिव गणपति

Ganpati

गणपति (अन्य नाम: गणपति या गणपथी), जिनका वास्तविक नाम मुप्पला लक्ष्मणा राव (मुपल्ला लक्ष्मण राव) है, भारतीय माओवादी आंदोलन के एक प्रमुख और लंबे समय तक सक्रिय नेता रहे हैं. वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) [CPI(माओइस्ट)] के पूर्व महासचिव थे, जो भारत में एक प्रतिबंधित माओवादी क्रांतिकारी संगठन है.

गणपति का जन्म 16 जून 1949 को तेलंगाना (तत्कालीन आंध्र प्रदेश) के करीमनगर जिले के बीरपुर गांव में एक जमींदार किसान परिवार में हुए गणपति ने अपने जीवन को किसानों और मजदूरों के सशस्त्र संघर्ष को समर्पित कर दिया. उनकी विचारधारा माओ त्से-तुंग की चीनी क्रांति से प्रेरित थी, और उन्होंने नक्सलवाद के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

गणपति को भारत के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में गिना जाता था, जिनके सिर पर सबसे अधिक इनाम (लगभग 3.6 करोड़ रुपये) है. हालांकि, 2018 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया, और उसके बाद उनकी गतिविधियां सीमित हो गईं. 2025 तक, वे सक्रिय भूमिका में नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत नक्सल आंदोलन में जीवित है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मुप्पला लक्ष्मणा राव का जन्म 16 जून 1949 को तेलंगाना के जगतियाल जिले (तत्कालीन करीमनगर) के बीरपुर गांव में गोपाल राव के परिवार में हुआ. उनका परिवार एक संपन्न जमींदार किसान परिवार था, लेकिन सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से प्रभावित था. बचपन से ही वे सामाजिक न्याय और किसान अधिकारों के प्रति जागरूक थे.

उन्होंने विज्ञान में स्नातक (B.Sc.) और शिक्षा स्नातक (B.Ed.) की डिग्री प्राप्त की. शिक्षा पूरी करने के बाद, वे करीमनगर जिले के एलीगेडु गांव में एक स्कूल शिक्षक के रूप में कार्यरत हुए. इस दौरान वे छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाते थे.

1970 के दशक में, जब वे वारंगल में उच्च शिक्षा के लिए गए, तो वे नक्सली आंदोलन के संपर्क में आए. वहां उन्होंने नल्ला आदि रेड्डी और कोंडापल्ली सीतारमैय्या जैसे प्रमुख माओवादी नेताओं से मुलाकात की. सीतारमैय्या, जो सीपीआई-एमएल-पीपुल्स वार (CPI -ML-PW) के संस्थापक थे, ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया.

1974 में, गणपति ने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूर्णकालिक रूप से नक्सली आंदोलन में शामिल हो गए. यह निर्णय उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, क्योंकि इससे पहले वे ग्रामीण युवाओं को संगठित करने में सक्रिय थे.

राजनीतिक करियर और प्रमुख आंदोलन

गणपति का राजनीतिक सफर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वार [CPI(ML) PW] से शुरू हुआ, जो कोंडापल्ली सीतारमैय्या द्वारा 1980 में स्थापित किया गया था. वे PW के प्रारंभिक सदस्यों में से एक थे और जल्द ही संगठन में ऊंचे पदों पर पहुंच गए. 1970 के दशक के अंत में, वे पेद्दापल्ली दलम (सशस्त्र दस्ता) के कमांडर बने, जो करीमनगर जिले में सक्रिय था. बाद में, वे करीमनगर जिला समिति के सचिव बने और आंध्र प्रदेश राज्य समिति तथा सेंट्रल ऑर्गनाइजिंग कमिटी (COC) के सदस्य चुने गए.

1980 के दशक में, गणपति ने PW को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे जमींदारों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाइयों के प्रणेता थे. 1991 में, जब कोंडापल्ली सीतारमैय्या का निधन हुआ, तो पार्टी में वैचारिक विभाजन हुआ. गणपति ने सीतारमैय्या के उत्तराधिकारी चेरुकुरी राजकुमार (अजय) को हटाकर PW के महासचिव का पद संभाला.

2004 में, CPI-ML-PW और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) के विलय से CPI (माओइस्ट) का गठन हुआ, और गणपति इसके पहले महासचिव बने. उन्होंने संगठन को ‘जनयुद्ध’ (पीपुल्स वॉर) की रणनीति पर चलाया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में आधार बनाकर शहरी क्षेत्रों पर कब्जा करने पर आधारित थी.

गणपति के नेतृत्व में CPI (माओइस्ट) ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र, आंध्र-ओडिशा सीमा, झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र के “रेड कॉरिडोर” में तेजी से विस्तार किया. प्रमुख घटनाओं में 2010 का दंतेवाड़ा हमला और विभिन्न पुलिस स्टेशनों पर हमले शामिल हैं. 2004-2018 के दौरान, संगठन ने कई बड़ी कार्रवाइयां कीं, जिससे हजारों खूंखार पुलिसकर्मियों की मौतें हुईं.

इससे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया. गणपति ने कई शांति वार्ताओं को अस्वीकार किया, क्योंकि सरकार शांति वर्ताओं के नाम पर माओवादियों के हत्या का अभियान चलाती थी. लेकिन 2004 में आंध्र प्रदेश सरकार के साथ बातचीत की कोशिश की, हालांकि वे स्वयं शामिल नहीं हुए.

विचारधारा और प्रभाव

गणपति की विचारधारा पूरी तरह माओवादी थी. वे मानते थे कि भारतीय लोकतंत्र एक ‘झूठी व्यवस्था’ है और सच्ची क्रांति केवल सशस्त्र किसान विद्रोह से संभव है. उन्होंने माओ के ‘जनयुद्ध’ सिद्धांत को भारत की परिस्थितियों के अनुकूल बनाया, जिसमें आदिवासियों, किसानों और मजदूरों को मुख्य भूमिका दी गई. 2010 में, उन्होंने यान मिर्डल और गौतम नवलखा को दिए साक्षात्कार में कहा कि उनकी पार्टी का इतिहास नक्सलबाड़ी विद्रोह (1967) से जुड़ा है और वे संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.

गणपति ने कई लेख और दस्तावेज लिखे, जो माओवादी सिद्धांतों पर आधारित थे, जैसे कि पार्टी के गठन और रणनीति पर. भारत की क्रांतिकारी जनता उन्हें शोषित वर्गों का मसीहा मानते हैं, जिन्होंने भूमि सुधार और सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ी. लेकिन सरकार और आलोचक उन्हें हिंसा के प्रचारक कहते हैं. गणपति के नेतृत्व ने नक्सल आंदोलन को एकीकृत किया, और इसमें हजारों खूंखार पुलिसकर्मी और मुखबिर मारे गए.

गिरफ्तारी, इस्तीफा और वर्तमान स्थिति

गणपति का जीवन भूमिगत रहा. 1977 में उन्हें हिंसा और आगजनी के आरोप में गिरफ्तार किया गया, लेकिन 1979 में जमानत पर रिहा होने के बाद वे फरार हो गए. उसके बाद 30 वर्षों से अधिक समय तक वे कानून से बचते रहे. उनके सिर पर विभिन्न राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा कुल 3.6 करोड़ रुपये का इनाम था. नवंबर 2018 में, स्वास्थ्य समस्याओं (उम्र से संबंधित बीमारियां) के कारण गणपति ने महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया. उनके स्थान पर नंबाला केशव राव (उर्फ बसवराज) को नियुक्त किया गया, जो संगठन के सैन्य प्रमुख थे.

उनके इस्तीफे के बाद, खबरें आईं कि गणपति नेपाल के रास्ते फिलीपींस भाग गए हैं. 2020 में, मीडिया में सरेंडर की अफवाहें उड़ीं, लेकिन CPI (माओइस्ट) ने इन्हें खारिज कर दिया और कहा कि यह सरकार की साजिश है. 2025 तक, कोई पुष्टि नहीं है कि वे सरेंडर कर चुके हैं या गिरफ्तार हुए हैं, या कहां हैं. वे छत्तीसगढ़ के नारायणपुर, बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों या आंध्र-ओडिशा सीमा पर भूमिगत हो सकते हैं, लेकिन उनकी सक्रियता कम हो गई है.

विरासत और साहित्यिक योगदान

गणपति की विरासत भारतीय नक्सल आंदोलन में अमिट है. उन्होंने PW से CPI (माओइस्ट) तक संगठन को मजबूत किया और माओवाद को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया. उनके अनुयायी उन्हें ‘क्रांतिकारी विचारक’ मानते हैं, जबकि सरकार उन्हें खतरनाक आतंकवादी. साहित्यिक रूप से, उन्होंने कई साक्षात्कार और दस्तावेज दिए, जैसे 2010 का साक्षात्कार जहां उन्होंने पार्टी के इतिहास और सरकार की नीतियों की आलोचना की.

उनके जीवन पर कई किताबें और डॉक्यूमेंट्री बनी हैं, जो नक्सलवाद के इतिहास को समझने में मदद करती हैं. गणपति का जीवन एक शिक्षक से माओवादी नेता बनने की प्रेरणादायक (या विवादास्पद) कहानी है. उनकी उम्र (2025 में लगभग 76 वर्ष) और स्वास्थ्य के कारण अब वे सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी ‘रेड कॉरिडोर’ के संघर्षों को प्रभावित करते हैं.

4. चतुर्थ महासचिव बासवराज

Basavrajमाओवादी महासचिव बासवराज, जिनका वास्तविक नाम नंबाला केशव राव (नंबाला केशवा राव) था, भारतीय माओवादी आंदोलन के एक प्रमुख सैन्य रणनीतिकार और नेता थे. वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) [CPI (माओइस्ट)] के महासचिव और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के प्रमुख रहे.

1955 में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जियानापेट गांव में एक साधारण परिवार में जन्म लिये बासवराज ने इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने के बाद नक्सली आंदोलन में कूद पड़े. उनकी विचारधारा माओ त्से-तुंग की ‘जनयुद्ध’ (पीपुल्स वॉर) से प्रेरित थी, और उन्होंने कई प्रमुख हमलों का मास्टरमाइंड रहने के साथ-साथ संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बासवराज को भारत के सबसे वांछित ‘आतंकवादियों’ में गिना जाता था, जिनके सिर पर लगभग 1.5 करोड़ रुपये का इनाम था. हालांकि, 21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ के अबुझमढ़ क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई, जिसमें 27 अन्य नक्सली भी मारे गए. यह घटना नक्सल आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका मानी जाती है, क्योंकि वे चार दशकों के विद्रोह में वे पहले सक्रिय महासचिव थे, जिन्हें सुरक्षा बलों ने मार गिराया. उनकी मृत्यु के बाद संगठन ने थिप्पिरी तिरुपति (उर्फ देवजी) को नया महासचिव नियुक्त किया.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

नंबाला केशव राव का जन्म 10 जुलाई 1955 को आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जियानापेट गांव में एक स्कूल शिक्षक के परिवार में हुआ. उनका परिवार साधारण था, लेकिन सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से प्रभावित था. बचपन से ही वे सामाजिक न्याय के प्रति जागरूक थे. उन्होंने वारंगल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (वर्तमान में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, वारंगल) से बी.टेक. (इंजीनियरिंग) की डिग्री प्राप्त की. कॉलेज के दौरान वे कबड्डी खिलाड़ी भी थे और रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन (RSU) के सदस्य बने, जो वामपंथी छात्र संगठन था.

1970 के दशक के अंत में, वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वार [CPI(ML) PW] से जुड़े, जो कोंडापल्ली सीतारमैय्या द्वारा स्थापित था. 1980 में, RSU और RSS के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बीच संघर्ष के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया. जमानत पर रिहा होने के बाद वे भूमिगत हो गए और पूर्णकालिक रूप से नक्सली आंदोलन में शामिल हो गए.

इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि ने उन्हें सैन्य रणनीति, गुरिल्ला युद्ध और आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाने में विशेषज्ञता प्रदान की. 1987 में, उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) से जंगल युद्ध और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया, जो बाद में उनके हमलों में उपयोगी साबित हुआ.

राजनीतिक करियर और प्रमुख आंदोलन

बासवराज का राजनीतिक सफर 1980 के दशक में CPI(ML) पीपुल्स वार से शुरू हुआ. वे जल्द ही संगठन के सैन्य विंग में प्रमुख भूमिका निभाने लगे. 1991 में, वे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के सदस्य बने और 2001 में इसके प्रमुख चुने गए. 2004 में, CPI (ML) PW और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) के विलय से CPI (माओइस्ट) का गठन हुआ, जिसमें बासवराज CMC के सचिव बने. उन्होंने संगठन को ‘जनयुद्ध’ की रणनीति पर चलाया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में आधार बनाकर शहरी क्षेत्रों पर कब्जा करने पर आधारित थी.

2018 में, स्वास्थ्य कारणों से मुप्पला लक्ष्मणा राव (गणपति) के इस्तीफे के बाद बासवराज CPI (माओइस्ट) के महासचिव बने. उनके नेतृत्व में संगठन ने ‘रेड कॉरिडोर’ (छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड आदि) में विस्तार किया. वे आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में कई वर्षों तक छिपे रहे. वे जिन प्रमुख घटनाओं में शामिल थे, वे इस प्रकार हैं –

  • 2010 दंतेवाड़ा हमला: 76 सीआरपीएफ जवान मारे गए.
  • 2013 झीरम घाटी हमला: 27 लोग मारे गए, जिसमें पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा और कांग्रेस नेता नंद कुमार पटेल शामिल थे.
  • 2013 लातेहार एम्बुश: झारखंड में आईईडी हमला.
  • 2018 सुकमा आईईडी हमला: 9 जवान मारे गए.
  • 2019 गढ़चिरोली लैंडमाइन ब्लास्ट.
  • 2021 सुकमा-बीजापुर एम्बुश.
  • 2023 दंतेवाड़ा आईईडी ब्लास्ट.
  • 2025 बीजापुर आईईडी हमला: 8 डीआरजी जवान और एक चालक मारे गए.

बासवराज ने संगठन को पुनर्गठित किया, सशस्त्र दलों को मजबूत किया और राज्य की निगरानी का मुकाबला करने के लिए केंद्रीकृत निर्णय लेने की प्रक्रिया अपनाई. वे तेलुगु, हिंदी, अंग्रेजी और गोंडी भाषाओं में पारंगत थे और हमेशा एलीट गार्ड ‘कंपनी 7’ के साथ रहते थे.

विचारधारा और प्रभाव

बासवराज की विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर आधारित थी. वे मानते थे कि भारतीय लोकतंत्र ‘झूठी व्यवस्था’ है और सच्ची क्रांति केवल सशस्त्र किसान विद्रोह से संभव है. उन्होंने माओ के सिद्धांतों को भारत की परिस्थितियों के अनुकूल बनाया, जिसमें आदिवासियों, किसानों और मजदूरों को मुख्य भूमिका दी गई. उनके नेतृत्व में CPI (माओइस्ट) ने भूमि सुधार, आदिवासी अधिकारों और सामाजिक न्याय पर जोर दिया. क्रांतिकारी जनता उन्हें शोषित वर्गों का योद्धा मानते हैं, जिन्होंने कॉर्पोरेट शोषण और सरकारी दमन के खिलाफ लड़ाई लड़ी. लेकिन सरकार और आलोचक उन्हें हिंसा के प्रचारक कहते हैं, जिससे हजारों मौतें हुईं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा माओवादियों को ‘भारत की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा’ बताने के बाद भी बासवराज ने शांति वार्ताओं को अस्वीकार किया. उनकी मृत्यु ने नक्सल आंदोलन को कमजोर किया, लेकिन संगठन ने इसे ‘फासीवादी दमन’ बताते हुए संघर्ष जारी रखने का वादा किया. वामपंथी दल जैसे CPI, CPI(M) और CPI(ML) लिबरेशन ने उनकी मृत्यु की निंदा की और संवाद की मांग की.

मृत्यु और उसके बाद

21 मई 2025 को, छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबुझमढ़ के घने जंगलों में ‘ऑपरेशन कागर’ के दौरान डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG), सीआरपीएफ और अन्य बलों ने बासवराज और 27 अन्य नक्सलियों को मार गिराया. यह 50 घंटे लंबी मुठभेड़ थी, जिसमें खुफिया जानकारी के आधार पर वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया गया. गृह मंत्री अमित शाह ने इसे ‘नक्सलवाद के खिलाफ ऐतिहासिक सफलता’ बताया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘उल्लेखनीय सफलता’ कहा.

बासवराज के शव से AK-47, आईईडी सामग्री और दस्तावेज बरामद हुए. उनकी मृत्यु के बाद, परिवार ने शव सौंपने की मांग की, लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने 26 मई 2025 को नारायणपुर में ही अंतिम संस्कार कर दिया, दावा करते हुए कि कोई दावेदार नहीं आया. परिवार ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन पुलिस ने शव सौंपने से इनकार कर दिया. यह घटना विवादास्पद रही, और परिवार ने अवमानना याचिका दायर की. बासवराज की मृत्यु ने संगठन में नेतृत्व का वैक्यूम पैदा किया, जिसे सितंबर 2025 में थिप्पिरी तिरुपति (देवजी) ने भरा.

विरासत और साहित्यिक योगदान

बासवराज की विरासत नक्सल आंदोलन में अमिट है. उन्होंने संगठन को एकीकृत किया और सैन्य क्षमता बढ़ाई, लेकिन इससे हिंसक संघर्ष बढ़े. उनके अनुयायी उन्हें ‘क्रांतिकारी रणनीतिकार’ मानते हैं, जबकि राज्य उन्हें ‘आतंकवादी’. साहित्यिक रूप से, उन्होंने कई दस्तावेज और लेख लिखे, जो माओवादी सिद्धांतों पर आधारित थे.

उनकी मृत्यु के बाद, अंतरराष्ट्रीय माओवादी समूहों (जैसे ब्राजील, स्विट्जरलैंड, बांग्लादेश) ने शोक सभाएं कीं और भारत में जनयुद्ध का समर्थन किया. बासवराज का जीवन एक इंजीनियर से माओवादी नेता बनने की कहानी है, जो हिंसा और संघर्ष से भरा रहा. उनकी मृत्यु ने नक्सलवाद को कमजोर किया, लेकिन सामाजिक-आर्थिक मुद्दे आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं.

5. पांचवें और कार्यरत महासचिव देवजी

Dev ji

माओवादी महासचिव देवजी, जिनका वास्तविक नाम थिप्पिरि तिरुपति (Thippiri Tirupati) है, भारतीय माओवादी आंदोलन के एक वरिष्ठ और कट्टरपंथी नेता हैं. वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) [CPI (माओइस्ट)] के पोलितब्यूरो सदस्य और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के प्रमुख रहे हैं. सितंबर 2025 में, नंबाला केशव राव (बासवराज) की मृत्यु के बाद वे पार्टी के नए महासचिव बने.

तेलंगाना के एक दलित (मादिगा समुदाय) परिवार से आने वाले देवजी ने 1983 में माओवादी आंदोलन में प्रवेश किया और चार दशकों से अधिक समय से भूमिगत जीवन जी रहे हैं. उनकी रणनीतिक क्षमता, विशेष रूप से गुरिल्ला युद्ध और सशस्त्र हमलों में, उन्हें संगठन का एक प्रमुख स्तंभ बनाती है. देवजी को भारत के सबसे वांछित नक्सली नेताओं में गिना जाता है, जिनके सिर पर केंद्र सरकार द्वारा 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित है. उनकी नियुक्ति नक्सल आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो वर्तमान में संगठनात्मक संकट और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों से जूझ रहा है. देवजी की उम्र लगभग 60 वर्ष है, और वे दंडकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़ का बस्तर) में सक्रिय माने जाते हैं.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

थिप्पिरि तिरुपति का जन्म 1960 के दशक के प्रारंभ में तेलंगाना के जगतियाल जिले (तत्कालीन करीमनगर जिला) के कोरुटला कस्बे के अंबेडकर नगर कॉलोनी में एक साधारण दलित परिवार में हुआ. उनके पिता का नाम वेंकट नरसैया था, और परिवार मादिगा समुदाय (अनुसूचित जाति का एक उप-समूह) से संबंधित था.

बचपन से ही सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और जातिगत भेदभाव से प्रभावित होने के कारण वे वामपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए. उन्होंने स्थानीय स्तर पर प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और डिग्री (स्नातक) करने के दौरान रैडिकल स्टूडेंट्स यूनियन (RSU) से जुड़े, जो माओवादी प्रभावित छात्र संगठन था.

1983 में, जब वे डिग्री कर रहे थे, तिरुपति RSU की विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए. उस समय ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) और RSU के बीच छात्र संघर्ष आम थे, और इनमें भाग लेने के कारण उनके खिलाफ कई पुलिस मामले दर्ज हुए. वर्ष के अंत तक, वे भूमिगत हो गए और पूर्णकालिक रूप से माओवादी आंदोलन में शामिल हो गए. उनकी पृष्ठभूमि ने उन्हें दलित और आदिवासी मुद्दों पर विशेष ध्यान देने वाला नेता बनाया, जो नक्सलवाद के ग्रामीण आधार को मजबूत करने में सहायक साबित हुई.

राजनीतिक करियर और प्रमुख आंदोलन

देवजी का राजनीतिक सफर 1983 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वार [CPI(ML) PW] से शुरू हुआ, जो बाद में CPI (माओइस्ट) का हिस्सा बना. वे जल्द ही संगठन के सैन्य विंग में प्रमुख भूमिका निभाने लगे. 2004 में PWG और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) के विलय से CPI (माओइस्ट) के गठन के समय वे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के सदस्य बने. उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो माओवादियों का सशस्त्र दस्ता है.

देवजी दंडकारण्य वन क्षेत्र (छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा) में गुरिल्ला युद्ध के विशेषज्ञ माने जाते हैं. उन्होंने नए भर्तियों के लिए बुनियादी कम्युनिस्ट ट्रेनिंग स्कूल (Buniyadi Communist Training School) की स्थापना में योगदान दिया, जो 2009 की सेंट्रल कमिटी बैठक में निर्णय लिया गया था.

प्रमुख घटनाओं में उनकी भूमिका:

  • 2010 दंतेवाड़ा हमला : पुलिस के अनुसार, देवजी इस हमले के मास्टरमाइंड थे, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान मारे गए. यह नक्सलवाद का एक विश्व विख्यात हमला था.
  • लालगढ़ आंदोलन (2009) : किशनजी (मल्लोजुला कोटेश्वर राव) की मृत्यु के बाद, देवजी को पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान नेतृत्व सौंपा गया.
  • अन्य हमले : वे छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा में भर्ती, सैन्य प्रशिक्षण शिविरों और आईईडी हमलों के पीछे माने जाते हैं.

2018 में गणपति के इस्तीफे के बाद बासवराज महासचिव बने, लेकिन देवजी CMC के प्रमुख बने रहे. सितंबर 2025 में, बासवराज की मृत्यु (21 मई 2025, नारायणपुर मुठभेड़) के बाद इंद्रावती एरिया कमिटी की बैठक में देवजी को नया महासचिव नियुक्त किया गया. यह तीसरा तेलुगु नेता हैं जो इस पद पर पहुंचे (पहले गणपति और बासवराज). साथ ही, माडवी हिड़मा को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (DKZC) का सचिव बनाया गया. देवजी की नियुक्ति संगठन के संकटपूर्ण दौर में हुई, जब ऑपरेशन कागर के तहत नेताओं पर दबाव बढ़ा है.

विचारधारा और प्रभाव

देवजी की विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर आधारित है. वे भारतीय लोकतंत्र को ‘झूठी व्यवस्था’ मानते हैं और सशस्त्र ‘जनयुद्ध’ को क्रांति का एकमात्र मार्ग बताते हैं. उन्होंने माओ के गुरिल्ला युद्ध सिद्धांतों को दंडकारण्य की परिस्थितियों के अनुकूल बनाया, जिसमें आदिवासियों, दलितों और किसानों को मुख्य भूमिका दी गई. देवजी ने भूमि सुधार, जातिगत न्याय, आदिवासी अधिकारों और कॉर्पोरेट शोषण के खिलाफ संघर्ष पर जोर दिया. उनकी रणनीति में दक्षिण भारत (तेलंगाना, आंध्र) से भर्ती और सैन्य प्रशिक्षण प्रमुख हैं.

उनकी विरासत विवादास्पद है. क्रांतिकारी जनता उन्हें दलित-आदिवासी संघर्ष का प्रतीक मानते हैं, जिन्होंने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई. लेकिन सुरक्षा एजेंसियां उन्हें हिंसा के प्रचारक कहती हैं, जिससे हजारों मौतें हुईं. देवजी की नियुक्ति ने माओवादियों को नई ऊर्जा दी, लेकिन संगठन में आंतरिक कलह (जैसे सोनू के साथ प्रतिस्पर्धा) और नेतृत्व के वैक्यूम का सामना करना पड़ा.

व्यक्तिगत जीवन और वर्तमान स्थिति

देवजी का वैवाहिक जीवन दुखद रहा. उन्होंने छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला सृजना से विवाह किया, जो माओवादी संगठन की जिला सचिव थीं. सृजना की मृत्यु महाराष्ट्र के गढ़चिरोली क्षेत्र में एक मुठभेड़ में कोरोना महामारी के दौरान हो गई. देवजी का जीवन पूरी तरह भूमिगत है, और वे दंडकारण्य के घने जंगलों में छिपे रहते हैं. उनके सिर पर 1 करोड़ रुपये का इनाम है, और वे तेलुगु, हिंदी और स्थानीय बोलियों में पारंगत हैं.

सितंबर 2025 तक, देवजी सक्रिय महासचिव हैं, लेकिन ऑपरेशन कागर के कारण संगठन के कोर कमिटी की बैठकें बाधित हैं. खुफिया एजेंसियां उन्हें दक्षिण छत्तीसगढ़ (बस्तर, दंतेवाड़ा) में सक्रिय मानती हैं. कोई गिरफ्तारी या सरेंडर की खबर नहीं है, लेकिन सुरक्षा बलों ने उनकी तलाश तेज कर दी है.

विरासत और साहित्यिक योगदान

देवजी की विरासत नक्सल आंदोलन में सैन्य रणनीति और दलित नेतृत्व के रूप में अमिट है. उन्होंने PLGA को मजबूत किया और दंडकारण्य को माओवादी गढ़ बनाया. क्रांतिकारी जनता उन्हें ‘क्रांतिकारी रणनीतिकार’ कहते हैं, जबकि राज्य उन्हें ‘आतंकवादी.’ साहित्यिक रूप से, उन्होंने माओवादी दस्तावेजों और लेखों में योगदान दिया, जो गुरिल्ला युद्ध और जनयुद्ध पर आधारित हैं. उनकी नियुक्ति के बाद, संगठन ने संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया, लेकिन हिंसा में कमी (2025 में नक्सली घटनाएं घटीं) ने माओवाद को कमजोर किया है.

देवजी का जीवन एक दलित युवा से माओवादी महासचिव बनने की कहानी है, जो सामाजिक न्याय की खोज में हिंसा की राह पर चला. उनकी विचारधारा आज भी भारत के ग्रामीण-आदिवासी संघर्षों को प्रभावित करती है, लेकिन राज्य की कार्रवाइयों से खतरा बढ़ा है तो वहीं देश भर के दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, शोषितों के आंखों में उम्मीद की चिनगारियां भड़का्ने लगी है.

यह था सीपीआई माओवादी के सभी पांचों महासचिवों का संक्षिप्त परिचय, जिसे हम निकाल कर अपने पाठकों के सामने रख पाये हैं. उम्मीद है हमारे पाठकों को बेहतर लगेगा.

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