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जातियां चोर नहीं बनाती, परिस्थितियां चोर बनाती हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 10, 2021
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जातियां चोर नहीं बनाती, परिस्थितियां चोर बनाती हैं

faridi al hasan tanveerफरीदी अल हसन तनवीर

देश : हत्यारों के पैरोकार बता रहे हैं कि तबरेज़ बाइक चोर था इसलिए ‘जय श्री राम’ के नारे लगवा कर पीट-पीट कर भीड़ द्वारा मार दिया गया.

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दोस्त : अभी कल मेरी महिला मित्र जो उच्चवर्णीय मध्यम वर्ग हिन्दू परिवार में पैदा, पली और बड़ी हुई हैं. वे परित्यक्त अकेली मां के द्वारा अपने मायके वालों के आश्रय पर पली बढ़ी हुई हैं, अतः दलित, वंचित, अल्पसंख्यक, कमज़ोर और हाशिये पर छूट गए लोगों के लिए न केवल दर्द रखती हैं बल्कि उनके हितों के लिए कार्य भी करती हैं. वे एक्टिविस्ट हैं. मनोविज्ञान की अच्छी छात्रा हैं और भविष्य में प्रॉब्लम चाइल्ड काउंसेलर के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहती हैं.

पिछले डेढ़ साल में दिल्ली रोहिणी/ मंगोलपुरी सिटी बस व चांदनी चौक बाजार की भीड़ में हम लोगों के चार या पांच फोन चुर चुके हैं. दो बार निशाना मैं बना. दोनों बार वे भी मेरे साथ थी. एक बार तो पूरा परिवार साथ था. हम अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर देख कर चांदनी चौक खाना खाने पहुंचे थे. एक बार रोहिणी वेस्ट मेट्रो के नीचे सिटी बस में मेरे और उनके बीच 17 से 20 साल के कुछ लड़कों ने आकर बैग से टेबलायड निकाल लिया और रेड लाइट पर कूद कर फरार हो गए.

दो बार वे अकेली थी, तब उनके साथ बस की भीड़ की आपा धापी में फोन गया. एक बार सम्पूर्ण पर्स, आईडी प्रुफ और एटीएम चले गए थे. एक बार घड़ी भी गयी लेकिन उन्होंने बस का गेट न खुलने दिया और ड्राइवर ने बस थाने पर लगा दी तो चोर ने घड़ी बस में ही फेंक दी.

ऐसे अनेक किस्सों में वह खुद अपराधी बालकों को पिटने से बचा अपना समय खराब कर दिल्ली पुलिस तक पहुंचा कर आई हैं. उनका काउंसेलर वाला मन उन्हें ऐसे सह्रदयता दिखाने पर मजबूर करता है.

अब कल फिर उनका फोन रोहिणी अवन्तिका के पास बस में ही निकला और कंडक्टर उन्हें बता कर चोर के पीछे उतार कर बस लेकर निकल गया. मज़े की बात ये है कि आज तक एक बार भी दिल्ली पुलिस किसी भी फोन या आर्टिकल को बरामद नहीं कर सकी.

अभी कल रात ही वे फोन पर मुझे बता रही थी कि अपने नंबर बन्द करवाकर नए सिम लेने के प्रोसेस में उन्हें शिकायत के दौरान टेलीकॉम कंपनी से बात करते में एक लंबी लाईन का सामना करना पड़ा. एयरटेल पर उनका वेटिंग नंबर 16 था और जियो पर 79 नंबर यानी इतने पीड़ित लोग आलरेडी उस क्षेत्र में लाइन में लगे थे. उनके एयरटेल कंप्लेन के OTP और मेसेज तो मेरे नंबर पर ही आ रहे थे.

आप अंदाजा लगाइये पूरे भारत में फोन चोरी का आलम क्या होगा फिर ? अधिकतर मामलों में नाबालिग लड़के चोरी और झपटमारी की घटना में शामिल थे. रिक्शा वालों तक के फोन चुराए गए थे. मोदी जी की भाषा मे कहूं तो फोन चुराने और झपटमारी का ये धंधा रोज़गार में गिना जाना चाहिए कि नहीं ? मुझे तो ये पकौड़ा ठेले से ज़्यादा फलता फूलता लग रहा है और सारे युवा 16 से 20 तक की उम्र वाले लड़के और कुछ लड़कियां भी.

इस सारी घटना और अपनी महिला मित्र की शिक्षा, पालन पोषण, कैरियर और दृष्टिकोण के साथ पृष्ठभूमि को बताने का मुख्य कारण था उनका वह वाक्य जो क़ीमती फोन चोरी, उनके बैंक अकाउंट एप्प की परेशानियों, उनके काम और कार्यालय के नुकसान के कारण हताशा में उन जैसी महिला के मुंह से गुस्से में निकला –  ‘ये कमीने, सब मंगोलपुरी वगैरह के कुंजड़े ही ऐसा करते हैं.’

विश्विद्यालय : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में आयोजित एजुकेशन ऑफ मल्टी क्लचरलिज्म पर आयोजित सेमिनार के मुख्य अतिथि वाईस चांसलर थे. वही वाले जिनका लड़कियों के होस्टल मुद्दे पर भयंकर लफड़ा हुआ था और रविश कुमार से नेशनल टीवी पर एक हास्यास्पद बहस हुई थी, जिन्हें इस मुद्दे पर अपने पद से हाथ धोना पड़ा था.

वाईस चांसलर साहब को शिक्षा संकाय कामच्छा में एक नव निर्मित द्वार का भी उद्घाटन करना था. उद्घाटन के उपरांत मुख्य अतिथि अन्य गणमान्य प्रोफेसर्स के साथ वापिस हाल की तरफ पैदल बढ़ने लगे. वाईस चांसलर ने गेट की उपयोगिता और निर्माण की तारीफ की तो एक सीनियर प्रोफेसर साहब बोले – जी हां सर ! अब कैंपस चोरी चमारी से सुरक्षित रहेगा.’

इस सेमिनार में ही मेरे पेपर प्रस्तुतिकरण पर भी हंगामा हुआ था और मुझे पेपर पूरा नहीं करने दिया गया था क्योंकि मैंने शिक्षा में बहुसंस्कृतिवाद पर हुए सेमिनार में उद्घाटन पर सरस्वती वंदना व वेद श्रुति पाठ को प्रश्नगत करते हुए बाइबिल, गुरवाणी, कुरान की आयतों के बारे में पूछ लिया था.

ये कैसा बहु शैक्षिक बहु संस्कृतिवाद पर चर्चा करने वाला सेमिनार है, जिसके एक भी सेशन में कोई दूसरी संस्कृति दृष्टिगोचर नहीं होती ? आदिवासी भी नहीं ? क्या हम यहां कोरी लफ्फाजी करने एकत्र हुए हैं ? मेरे इस प्रश्न पर पूरा सेशन ही भस्म हो गया था. खैर, अपने पेपर के एपिसोड पर मैंने और गेट पर सीनियर प्रोफेसर्स के ‘चोरी चमारी’ वाले वार्तालाप पर ज़हरीला तपन ने भी तब लिखे थे.

मुहल्ला : अभी छह महीने पहले जाड़ों की बात है. अपनी नौकरी के लिए उत्तर प्रदेश में जिस जगह कमरा लेकर रहता हूं, वहां सो रहा था. एकाएक चोर-चोर की आवाज़ सुनकर आंख खुल गयी. बालकनी से देखा तो मेरे रूम के नीचे की दुकान में कारों में एलपीजी गैस भरने का गोरखधंधा करने वाले गुप्ता जी और उनके भाई एक 16-17 साल के लड़के को जैकेट और मफलर से पकड़ घसीटते हुए लेकर आए.

दरअसल वे भोर सुबह सीतापुर किसी काम से जाने के लिए जैसे ही दरवाजा खोल बाहर आये तो उन्हें ये लौंडा गली में अवांछनीय घूमता हुआ मिला. इनके टोकने पर वह डर कर भाग खड़ा हुआ.

गुप्ता जी पहलवानी करते थे. दौड़ भाग में फिट थे सो थोड़ा दौड़-भाग और गिरने से चोटिल होने के बाद हाईवे तक दौड़ कर पकड़ लाये. गिरने से उन्हें चोट लग गयी थी और कपड़े भी फट कर गंदे हो गए थे सो उन्होंने उसके कई तगड़े-तगड़े हाथ जमा दिए थे और भागने का कारण पूछते हुए उसे तमाचों से पीट रहे थे.

मुहल्ला इकट्ठा हो गया और उसे चोर मान लिया गया. दुर्भाग्य से उसने अपना नाम सलमान बताया, बस फिर तो कई लोगों के हाथों दोहत्त्ता पीटा. पता पूछने पर ग्राम टांडा हेमपुर बताते ही उसकी जान पर बन आयी. उसका सर दीवार से पटका जाने लगा तो मुझे बीच में बोलना पड़ा – ‘मर जायेगा और केस आप लोगों पर लगेगा. अभी ये भागा था, तब आप भागेंगे.’

दरअसल मेरे विद्यालय से पहले ग्राम हेमपुर टांडा पड़ता है. मुख्यता कुछ सरदारों और अधिकांश ट्राइबल मुस्लिम बंजारों का गांव. वे बंजारे जिन्हें अपराधी जनजाति के अंतर्गत गिना जाता है, उनके कुछ बच्चे मेरे विद्यालय में भी आते हैं. आस-पास जब कोई भी घटना पुलिस से वर्कआउट नहीं होती तो इस गांव से लड़के और मर्द उठा लिए जाते हैं. कई बार तो निर्दोष भी बुक कर दिए जाते हैं. खैर मेरे बीच में आ जाने से लोग मेरी मास्टरी का ख्याल कर मान गए और पुलिस बुला ली गयी, जो उस लड़के को ले गयी. इस प्रकार उसकी जान बच गयी.

मेरा कमरा : कल रात लाइट न होने की वजह से मैं छत पर सो गया था. आज सुबह साढ़े तीन चार बजे मच्छरों से परेशान हो नीचे कमरे में आ गया. हवा आती रहे इसलिए दरवाजा और खिड़की भी खुली छोड़ दी थी. जहां मैं रहता हूं वहां बंदरों का बड़ा आतंक है, अतः चाहे कितनी गर्मी हो लोग दरवाजा बन्द ही रखते हैं. ये सोचते हुए कि बंदर आ गए तो मेरे कमरे की टेबल पर रखे आम के अलावा वो क्या नुकसान कर सकते हैं ?

मैंने ये सोच कर आंख बंद कर ली कि आधा घंटे में तो उठना ही है. एक छोटे से खटके की आवाज़ से मेरी आंख खुली और मैंने सोचा शायद बंदर है. बेड से मेरे उतरते ही मैं दरवाज़े की तरफ हो गया और खटका करने का दोषी मेरे एकदम उठ जाने से हतप्रभ हुआ. एक 16-17 साल का लड़का मेरा सेलफोन हाथ में पकड़े मेरी स्टडी टेबुल की तरफ कमरे में फंस गया. पास ही टेबल पर पर्स पड़ा था.

लड़के का कॉन्फिडेंस देखिये, फौरन बोला – अंकल मेरा ये नंबर मिला दीजिये. मैने पूछा क्या – ये पीसीओ है ? और तू कहां से आया ? बोला में तो टहल रहा हूं. डॉ. साहब का घर है. मैं तो अक्सर टहलता हूं. दरसल इस शहर में कई लोकल लोगों ने बड़े-बड़े ऐसे मकान बनाये हैं जिनमें दस पंद्रह ऐसे पोर्शन होते हैं जिसमें बाहर से नौकरी करने आये सिंगल या परिवार किराए पर रह सकें.

मेरे वाले मकान में ही पांच शिक्षक, दो बैंककर्मी सिंगल तथा तीन लेखपाल सपरिवार, दो प्राइवेट नौकरी वाले, एक सलमान का परिवार और एक एएनएम का परिवार रहते हैं. लाइट कटौती पर हम सब अक्सर रात भर छत पर बातें करते टहलते या ऊंघते समय काटते हैं. पहले तो मुझे लगा शायद इन्हीं किसी परिवार का कोई मेहमानी में आया लड़का होगा.

खैर, थोड़ी देर में स्पष्ट हुआ कि बगल वाले मास्टर जी बहुत सुबह ही ढाबे पर चाय पीने निकल गए और चैनल खुला छोड़ गए. अतः ये अंदर कुछ चोरी के इरादे से घुस आया था. मोबाइल ले चुका था और पर्स के लालच में हाथ कुछ चीज़ से टकरा गया, जिस पर मैं उठ बैठा. तब तक बिल्डिंग के लोग और फिर गली मोहल्ले के लोग भी ऊपर मेरे रूम तक आ गए.

सब उसे पुलिस को देने से पहले पीटना चाहते थे. वह कई लोगों के मोबाइल मार चुका था. अपने कमरे में मैंने ऐसा नहीं करने दिया. मेरे पांचों शिक्षक साथी भी पीटने के खिलाफ थे और मेरे साथ थे.

हमने उससे पूछताछ की तो पता चला कि पिता हत्या का पुराना आरोपी था, जो अब ट्रक चलाता है और अधिकांशतः बाहर रहता है. मां मर चुकी थी. सौतेली मां अपनी बेटी को तो भारतीय कॉलेज में पढ़ा रही थी और उपेक्षा व अकेलेपन के कारण ऐसे बच्चे जो बन सकते हैं, वह ये बन चुका था. उसकी कहानी सुन हमने उसे पुलिस में देना भी स्थगित कर दिया. डांट डपट कर, ऊंच नीच और जान के खतरे समझा कर सुरक्षित जाने दिया.

अब मेरी बिल्डिंग की समस्त औरतें मुझसे खफा हैं. सर आप बहुत सीधे हैं ! आपने जाने दिया ये फिर आकर चोरी करेगा और हमारा नुकसान करेगा.

विद्यालय से लौटते वक्त अपनी स्कूटी की कुछ समस्या मिस्त्री को दिखाते सुबह की घटना का ज़िक्र चला. मेंरी बात सुनते ही वहां बैठे सब स्थानीय लोगों ने बताया मास्टर जी वह लौंडा बहुत हरामी है. हालांकि उसकी कहानी सही है लेकिन शातिर मोबाइल चोर है. 500 चुरा चुका होगा. उसका बफा भाई दिल्ली में यही धंधा करता है. अभी तीन चार महीने पहले मेरी दुकान से एक कस्टमर के दो मोबाइल मार दिए थे. मैंने जाकर उसे उठा लिया. हंटर से तीन घंटे बांध कर यहीं बाजार में पीटा था. सारे दुकानदारों ने पीटा था. मोबाइल बरामद हो गए थे. पुलिस को भी दे दिया था. वे भी एक दो दिन सुताई कर छोड़ देते हैं. नाबालिग़ है, जेल भेज नहीं सकते.

अब मैं सोच रहा हूं कि क्या आज हम उसे इस मिस्त्री से ज़्यादा पीट सकते थे ? क्योंकि इतनी पिटाई से तो वह सुधरा नहीं ! पुलिस से भी कंट्रोल न हुआ. और एक बात जो अंत में बतानी थी.

सुबह मैंने उससे बाप का फोन नंबर मांगा था. वो उस पर नहीं था. मां का भी नहीं था. उसने बताया कि वे सब बहुत मारेंगे. मेरे ये पूछने पर कि घर कोई तो होगा तो उसने अपने बाबा (दादा) का नम्बर दिया था, जिस पर बात करने पर उधर से उपेक्षा से कहा गया ‘मेरा कोई नहीं है’ और काट दिया.

साथी प्रधानाध्यापक ने जब छोटू चोर से उसका असली नाम पूछा तो उसने बताया सोनू सिंह. प्रधान अध्यापक परिहार जी का अगला सवाल था – क्या ठाकुर हो ? तो उसका जवाब था – जी हां सर ! आपके स्कूल में ही नाम लिखा है लेकिन मैं जाता नहीं हूं.

अब बताइये मैं कैसे झारखंड के लोगों की तरह, अपनी महिला मित्र की तरह, बनारस के सीनियर प्रोफेसर्स की तरह, अपने मुहल्ले के गुप्ता जी की तरह जो खुद चोरी की गैस का व्यवसाय करते हैं, मलेच्छ, कुंजड़े, बंजारे, चोरी चमारी जैसा उद्बोधन अपनी जिव्हा पर लाऊं ?

डार्लिंग मेरे कमरे में आज पकड़ाया गया छोट्टू चोर तो सोनू सिंह निकला. ठाकुर निकला ! क्षत्रिय निकला ! प्रदेश के मुख्यमंत्री की उच्चवर्णीय जाति का निकला. जातियां चोर नहीं बनाती, परिस्थितियां चोर बनाती हैं. ( छोटटू की तस्वीर भी भरे मन से मोबाइल से डिलीट कर अपना आज का अनुभव लिपिबद्ध कर ले रहा हूं ताकि दस्तावेज के रूप में सुरक्षित भी रहे.)

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