डर डरकर जो लिखते हैं फटी फटी सी रहती है तिलकधारी जैसी चेता में रचना रचते हैं स्त्री दलित रचना...
Read moreDetailsयह हिम्मत के साथ, अपने लोगों के साथ खड़ा रहने का समय है साथी भूख के खिलाफ दमन के खिलाफ...
Read moreDetailsउसने अपने ... कई वायदे पूरे किये- तीन सत्तर ,.. लत्तर.. बहत्तर तीन तलाक या अखलाक.. और अब.. गांव गांव...
Read moreDetailsहम नहीं पहनतीं पैरों में पायल जिससे तुम्हें हो आभास हमारी मौज़ूदगी का और हमें हो एहसास अपने दायरे का...
Read moreDetailsये बादशा का हुक्म है तुम्हारी अर्थियां उठें मगर ये ध्यान में रहे कि मेरे लिये जो है सजी वो...
Read moreDetailsपलायन कभी सोचता हूं रूक कर इन घरों के बारे में कहां चले जाते हैं लोग ? इन घरों से...
Read moreDetailsबातों के गलियारों से निकल कर जब मैं पहुंचता हूं तुम्हारे अघोर वृष्टि वन में बने कुटिया तक अचानक बदल...
Read moreDetailsजब तुम्हारे भावों को शब्दों के चिमटे से पकड़ कर काग़ज़ पर परोसना पड़े समझ जाओ कि समंदर के तल...
Read moreDetailsकब सहिष्णु थे आप ? कौन से युग, किस सदी, किस कालखंड में, सहिष्णु थे आप ? देवासुर संग्राम के...
Read moreDetailsमोहन चंद एक क़मीज़ है जिसे रोज धोता है रोज सुखाता है रोज पहनता है सादा जीवन उच्च विचार का...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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