अब बंद भी करो, बजाना झुनझुना, अपने वादों, अपनी बातों का, कब तक समझाऊं मन को, कबतक बहलाऊं दिल को,...
Read moreDetailsवे डरते हैं, किस चीज़ से डरते हैं वे, तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं, कि...
Read moreDetailsकहते हैं वे विपत्ति की तरह आए कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले वे व्याधि थे ब्राह्मण कहते थे...
Read moreDetailsभागे भूत मिटै सब पीरा आप बीमार हैं कोई बात नहीं अप्रैल से देशहित में दवाइयां अब बढ़े दामों पर...
Read moreDetailsभगवान के नाम पर मन्दिरों-मस्जिदों मजारों, पीरों, कब्रों नदियों, कुओं और तालाबों को खोदा जा रहा है पाताल तक अगली...
Read moreDetailsयह किताबों को कंठस्थ करने का समय है क्योंकि किताबों को जलाने का आदेश कभी भी आ सकता है. तानाशाह...
Read moreDetailsवे पांच थे निर्वासन में थे लेकिन पांडव नहीं थे उनकी हार भी चौसर के खेल में हुई थी...
Read moreDetailsअतीत को न्याय दिलाने वाले इस 'राष्ट्रीय खुदाई अभियान' में अन्ततः मैं भी शामिल हो गया ! फावड़ा लेकर मैं...
Read moreDetailsहम नहीं चाहते थे मरना डंगर/बाड़ों में तूड़ी के ढेरों में ट्यूबवेल के कोठों में होटलों में /ढाबों में तहखानों...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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