तुम हमारी परछाई से भी दूर रहते हो इस डर से की कहीं हम गलती से भी छू न ले...
Read moreDetailsतुम कुछ भी कहो छेदी लाल, तुम्हारे क़िस्से में बहुत छेद है बाढ़ का पानी उतरा तो पता चला क्या...
Read moreDetailsकितना अच्छा होता मेरे लफ़्ज़ों में न कोई चाल होती न कारोबारी लफ्फ़ाज़ी न नफा़ नुक़सान का कोई शऊर कोई...
Read moreDetailsसहमत हो नहीं हो हां में हां मिलाओ माताओं को पूछो न पूछो बंदे मातरम् खूब बोलो भारत को मानो...
Read moreDetailsयह तो हर कोई जानता है कि मोदी जी शेर हैंं ऐसे-वैसे नहीं, बब्बर शेर हैं जिनका छप्पन इंच का...
Read moreDetailsइस घने अंधेरे में शब्दों की वे उंगलियां भी नहीं हैं जिनके सहारे हम पहुंचते थे तुम तक, चौक-चौराहों तक,...
Read moreDetailsतुम कैसे आदमी हो नुक़्स पर नुक़्स निकालते रहते हो कभी दाढ़ी में तिनका खोजते हो कभी टैग लगे लिबास...
Read moreDetails( एक ) हम बंजर कर देना चाहते हैं धरती को काट देना चाहते हैं सभी पेड़ सुखा देना चाहते...
Read moreDetailsतिरंगे में लिपटा अपराधी अपराधी ही होता है अपराधी का अपराध कम नहीं हो जाता अपराध धुल नहीं जाता समूह...
Read moreDetailsभेड़िये इस जंगल के हों या उस जंगल के भेड़िया बस भेड़िया होता है जंगल के बदलने से भेड़िये नहीं...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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