मैं लाती हूंं गीता! तुम कुरान निकालो! दोनों को आग लगाकर जला लो! उसपर एक पतीला चावल का चढ़ा लो!...
Read moreDetailsपलामू की धरती पर पलामू की छाती को चीरती, रेल की ये पटरियां. आदिवासियों-मेहनतकशों की नसों को निचोड़ती, रेल की...
Read moreDetailsगुरिल्लों की रातें रात्रि का खाना खाकर, जब आप, बिछावन पर रजाई ओढ़े, सोने का प्रयत्न कर रहे होते हैं,...
Read moreDetailsयहां क्रांति की तैयारी चल रही है- कोनों में दुबक कर, वे जोर से गरजते हैं. नारे की गरजना से,...
Read moreDetailsअब वे झुंड में आयेंगे और एक एक कर सबको उठा ले जायेंगे गांव के बाहर तंबू गाड़ दिया है...
Read moreDetailsयह कैसा समय है भाई ? जब जानते हुए भी आप नहीं कह सकते चोर को चोर. और जो सच...
Read moreDetailsप्रो. (डॉ.) प्रमीला कोरोना तेरे नाम पर लोगों को मरते देखा. नदियां, हवा, शहर, आसमान, चांद-सितारे को स्वच्छ होते भी...
Read moreDetailsयुद्ध की बात करने से पहले परिंदों के पंख में पलते उजले-धुले, नीले आसमान को देखो ! देखो - पेड़ों...
Read moreDetailsमैं भी आत्महत्या करता लेकिन मैं पांचवीं माले पर नहीं जमीन पर हूं मैं फिलहाल जिस फूटपाथ पर रहता हूंं...
Read moreDetailsबहुत साल पहले की बात है, मथुरा वाले बाबा जय गुरुदेव, मेहंदी गंज बाजार में आए थे, और कहा था...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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