'तुमने अभी उस आदमी से क्या कहा ?' 'मैंने उसे जल्दी करने को कहा.' 'तुम्हें उसे जल्दी करने को कहने...
Read moreDetailsचांद औंधे मुंह गिरा था नीले सागर में और चली गई थी मां उस पार चांद की पीठ पर एक...
Read moreDetailsकई दिनों से लगातार हो रही बारिश के कारण ये शहर अब अपने पिंजरे में दुबके हुए किसी जानवर सा...
Read moreDetailsमेरे अंगों की नीलामी अब मैं अपनी शरीर के अंगों को बेच रही हूं एक एक कर. मेरी पसलियां तीन...
Read moreDetailsघर-आंगन में आग लग रही सुलग रहे वन-उपवन, दर दीवारें चटख रही हैं जलते छप्पर-छाजन. तन जलता है, मन जलता...
Read moreDetails'लो मैं जीत गया...' सुदूर जंगल से लगा एक कस्बा एक खाली इमारत, चन्द कुर्सियां गहरी रात का पहर पांच...
Read moreDetailsअभिसारिका सोचो कि तुम सज धज कर मुझसे मेरे घर मिलने आई हो पहली बार और मैं तुम्हें वहां ब्रुकलिन...
Read moreDetailsकाट लो जुबां मेरी, मेरी कलम बोलेगी, काट दोगे हाथ मेरे, मेरी आंखें बोलेंगी, चढ़ा दो फांसी पर मुझे, मेरा...
Read moreDetailsओ गाजा के शरारती बच्चों तुम वही हो न जो मेरी खिड़की के नीचे शोरगुल से मेरी नाक में दम...
Read moreDetailsफिलिस्तीनी कविता : जंग के एक बरस बाद हम हाजिर हैं... (तस्वीर : cartoonmovement.com से) जंग के एक बरस बाद...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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