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Home युद्ध विज्ञान

अक्टूबर (नवम्बर) क्रांति पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का दृष्टिकोण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 12, 2024
in युद्ध विज्ञान
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उथल-पुथल से भरी मानव इतिहास में रुसी अक्टूबर (नवम्बर) क्रांति अमिट स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली एक महान घटना है, जिसने मानव इतिहास में पहली बार मनुष्यों के द्वारा मनुष्यों के शोषण के चक्र को तोड़ दिया और सच्चे मनुष्यों के निर्माण की नींव डाली. यही कारण है कि दुनिया के तमाम मेहनतकश जनता इस दिन को याद करते हैं और अपने शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरणा लेते हैं. इसी के साथ ही इस महान व्यवस्था को जिस तरह साम्राज्यवादियों, संशोधनवादियों और गद्दारों ने मिलकर ध्वस्त कर दिया, उससे सबक सीखकर अपनी संघर्ष की धार को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
आज जब दुनिया के तमाम देशों से महान समाजवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया गया है, और एकबार फिर नये सिरे से समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने की जंग सारी दुनिया में मेहनतकश जनता जोर शोर से चला रही है, ऐसी ही कोशिश में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) भी भारत में ऐसी ही जंग चला रही है. यही कारण है कि भारत में एकमात्र यही पार्टी है, जो महान अक्टूबर क्रांति से प्रेरणा लेकर भारत में मुक्ति युद्ध का नेतृत्व कर रही है और अपने हजारों नेताओं, कार्यकर्ताओं की शहादत दे रही है.
महान अक्टूबर क्रांति पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) किस तरह अपना विश्लेषण किया है, इसे जानना जनमानस के लिए बेहद ही जरूरी है. इसी परिप्रेक्ष्य में हम यहां भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की सैद्धांतिक मुखपत्र पीपुल्स वार के हिन्दी संस्करण मुखपत्र ‘लाल पताका’ में नवम्बर 2017 के अंक में प्रकाशित इस सैद्धांतिक आलेख को प्रस्तुत कर रहे हैं – सम्पादक

‘महान रूसी समाजवादी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर रूसी क्रांति में निहित सारतत्वों की विश्वजनीन सच्चाई को सदा बुलंद रखें और अपने देश की विशिष्टता के अनुसार उसे व्यवहार में लागू करें.’

– केन्द्रीय कमेटी, भाकपा (माओवादी), 21 सितम्बर, 2017.

विदित है कि 1917 के 7 नवम्बर, महान रूसी क्रांति का विजय दिवस था. वह रूस तथा दुनिया के मजदूर-किसान व मेहनतकश अवाम के लिए एक ऐसे दिन के बतौर सामने आया जिस दिन वे वर्ग शोषण व वर्ग अत्याचार से मुक्ति मार्ग की ओर एक कदम अग्रगति के रूप में खुशियां मनाने के साथ-साथ शपथ भी लेते हैं. इसे और सुस्पष्ट कर कहने से रूसी क्रांति को वे पूंजीवाद के सीमाहीन शोषण व प्रचंड जुल्म से मुक्ति की ओर अग्रसर होने के रास्ते में एक मील का पत्थर जैसी विजय के रूप में देखते हैं. वाकई में जब से समाज में वर्गों का उदय हुआ और वर्ग संघर्ष की शुरुआत हुई, तब से दास समाज में दास-मालिकों के खिलाफ दास विद्रोह और सामंती समाज में भू-स्वामियों के खिलाफ बुर्जुआ क्रांति की बात जग जाहिर है. पर, दास विद्रोह हो या किसान विद्रोह या बुर्जुआ क्रांति- इन सब के जरिए सामाजिक व्यवस्थाओं में जरूर बदलाव आया, मगर शोषण व्यवस्था के एक तरीके के स्थान पर दूसरे तरीके की शोषण व्यवस्था आ बैठी. इनके रूपों में क्रांतिकारी बदलाव आने के बावजूद अंतर्वस्तु में वे सभी शोषणमूलक व्यवस्थाएं ही थी. लिहाजा कहा जा सकता है कि रूसी नवम्बर क्रांति ही दुनिया की सबसे पहली ऐसी क्रांति है, जिससे पुराने शोषक-शासक वर्गों का तख्ता उलट कर मजदूर वर्ग का तथा मजदूर-किसान-मेहनतकशों का राज स्थापित हुआ. अत: इसे मील का पत्थर अथवा प्रमाण-चिन्ह या प्रमाणांक (hall mark) या वर्ग संघर्ष के इतिहास में प्रचंड गुणात्मक विशिष्टताओं से परिपूर्ण एक विशेष घटना इत्यादि के रूप में वर्णन भी किया गया है. का. माओ ने कहा, ‘अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने न केवल रूस के इतिहास में, बल्कि विश्व के इतिहास में भी एक नए युग का सूत्रपात किया है’ (अंतरविरोधों के बारे में- का. माओ).

महान रूसी अक्टूबर क्रांति की 40वीं वर्षगांठ पर रूस में यू.एस.एस.आर. के सुप्रीम सोवियत (जिसमें सोवियत युनियन और तमाम राष्ट्रीयता के सोवियत शामिल थीं) के सामने का. माओ द्वारा दिए गए एक भाषण (नवम्बर-1957) में उन्होंने कहा, ‘जैसेकि
हमारे क्रांतिकारी शिक्षक का. लेनिन ने इस बात को दर्शाया है कि 40 वर्षों पहले सोवियत जनता द्वारा संचालित महान रूसी क्रांति विश्व इतिहास में एक नया युग की शुरूआत की है … इतिहास में अनेकों प्रकार के क्रांतियां देखी गयी. पर, अक्टूबर समाजवादी क्रांति के साथ तुलना करने लायक एक भी नहीं है. विगत हजारों वर्षो से समूचा विश्व के श्रमजीवी जनता और प्रगतिशील ताकतें एक ऐसा समाज की स्थापना की सपनें संजोये हुए थे जहां एक मानव द्वारा दूसरे मानव पर शोषण नहीं रहेगा. यह सपने का कार्यान्वयन तब-ही संभव हुआ जब दुनिया के एक चौथाई क्षेत्र में पहली बार अक्टूबर क्रांति सफल हुई.’

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‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ के जरिए ही सबसे पहले महान मार्क्स-एंगेल्स ने पूंजीवाद का ध्वस्त होने व समाजवाद की स्थापना होने की अनिवार्यता की बात कही

दुनिया के मजदूर-किसान-मेहनतकश जनता सहित आम जनता इस बात से अवगत हैं कि पूंजीवाद को ध्वस्त कर समाजवाद की स्थापना होना अनिवार्य है- का सिद्धांत महान मार्क्स ने ही सबसे पहले सामने लाया था. जैसाकि कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र में हम पाते हैं कि ‘कि बुर्जुआ वर्ग सर्वोपरि अपनी कब्र खोद देनेवालों को ही पैदा करता है. उनका पतन ओर सर्वहारा की विजय, दोनों समान रूप से अवश्यंभावी हैं.’ कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र हमें सिखाया है कि, ‘कम्युनिस्टों का तात्कालिक लक्ष्य वही है, जो अन्य सभी सर्वहारा पार्टियों का है, अर्थात सर्वहारा एक वर्ग के रूप में गठन, बुर्जुआ प्रभुत्व का तख्ता उलटना, सर्वहारा द्वारा राजनीतिक सत्ता का जीता जाना.’ (मार्क्स-एंगेल्स, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र)

यद्यपि मार्क्स-एंगेल्स ने दुनिया के सामने इस ऐतिहासिक सिद्धांत को लाया. पर, उस सिद्धांत को व्यवहार में कार्यान्वित कर पाने के लिए यानी बुर्जुआ प्रभुत्त का तख्ता उलटकर सर्वहारा द्वारा राजनीतिक सत्ता का जीता जाने के लिए 1917 तक इंतजार करना पड़ा. हालांकि, 1871 में पेरिस कम्युन के सर्वहारा वर्ग ने राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए पहली बार वीरतापूर्ण संघर्ष किया था. मगर, पूंजीपति वर्ग के सशस्त्र दमन के परिणामस्वरुप उसमें हार खानी पड़ी.

दरअसल मार्क्स-एंगेल्स के ऐतिहासिक सिद्धांत को व्यवहारिक तौर पर सर्वहारा सिद्धांत कहा जा सकता है. सर्वहारा क्रांति मानव इतिहास की सबसे महान क्रांति है और निजी मिल्कियत की जगह सार्वजनिक मिल्कियत की स्थापना करती है तथा तमाम शोषण के व्यवस्थाओं और तमाम शोषक वर्गों का उन्मूलन कर देती है. यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि ऐसी भूकम्पकारी क्रांति को गंभीर और भीषण वर्ग-संघर्षों से गुजरना पड़े तथा अनिवार्य रूप से एक ऐसा लम्बा और टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता तय करना पड़े जिसमें जगह-जगह असफलताओं का सामना करना पड़ता है.

का. लेनिन ने भी एक बार कहा था: ‘अगर हम इस मामले पर इसके सारतत्व की दृष्टि से विचार करें तो क्या इतिहास में कभी ऐसा भी हुआ है कि किसी नयी उत्पादन प्रणाली ने लम्बे समय तक एक के बाद एक असफलता का मुंह देखे बिना, गलतियां किये बिना और ठोकरें खाए बिना, फौरन अपनी जड़ें जमा ली हों ?’ (लेनिन- एक महान शुरुआत)

रूसी क्रांति का इतिहास भी टेढ़ा-मेढ़ा व उतार-चढ़ाव की तीन क्रांतियों के दौर से गुजरा

जाहिर है कि महान लेनिन व स्तालिन और उनकी प्रत्यक्ष देखरेख में संचालित सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) के नेतृत्व में 1917 के 7 नवम्बर (रूसी कैलेंडर के अनुसार अक्टूबर) की समाजवादी क्रांति सफल हुई. पर, एक ही चोट या कोशिश में यह समाजवादी क्रांति विजय हासिल नहीं कर सकी. बल्कि, तीन क्रांतियों से गुजरते हुए ही 1917 की समाजवादी क्रांति सफल हुई. ये तीन क्रांतियां थीं: 1905 की पूंजीवादी-जनवादी क्रांति, फरवरी 1917 की पूंजीवादी-जनवादी क्रांति और अक्टूबर (अभी नवम्बर) 1917 की समाजवादी क्रांति.

पर, पहली 1905 की रूसी क्रांति का अंत पराजय में हुआ. जिन कारणों से यह पराजय हुई उसे गहराई से समझना हमारे लिए बहुत जरूरी है. क्योंकि हम भी भारतीय क्रांति के मौजूदा दौर में उतार-चढ़ाव, पीछे हटना, धक्का खाना आदि का सामना कर रहे हैं. जो भी हो, पहली रूसी क्रांति की पराजय के मूल कारणों को रूसी बोल्शेविक पार्टी ने समीक्षा करते हुए जिन बातों को सामने लाया, संक्षेप में वे हैं –

  1. क्रांति में जारशाही के खिलाफ अभी मजदूरों और किसानों का पक्का सहयोग कायम नहीं हुआ था.
  2. किसानों का काफी बड़ा हिस्सा जारशाही का खात्मा करने के लिए मजदूरों से सहयोग करने में अनिच्छुक था. उसका असर फौज के व्यवहार पर भी पड़ा. फौज में ज्यादातर सिपाहियों की वर्दी पहने हुए किसानों के बेटे थे. जार की फौज के कई दस्तों में असंतोष और विद्रोह फूट पड़ा, लेकिन अधिकांश सैनिकों ने अभी भी मजदूरों की हड़तालें और विद्रोह दबाने में जार की मदद की.
  3. मजदूरों की कार्रवाई भी काफी सुगठित नहीं थी. क्रांतिकारी संघर्ष में वे 1906 में ज्यादा सक्रिय रूप से हिस्सा लेने लगे, लेकिन उस समय तक मजदूर वर्ग का हिरावल काफी कमजोर हो चुका था.
  4. मजदूर वर्ग क्रांति की पहली और प्रधान शक्ति था. लेकिन मजदूर वर्ग की पार्टी की कतारों में आवश्यक एकता और दृढ़ता का अभाव था. रूसी सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी (रू.सा.ज.म.पा.)- मजदूर वर्ग की पार्टी- दो दलों में बंटी हुई थी: बोल्शेविक और मेंशेविक. बोल्शेविक सुसंगत क्रांतिकारी लाइन में चलते थे. उन्होंने जारशाही का खात्मा करने के लिए मजदूरों का आह्वान किया था. मेंशेविकों ने अपनी समझौतापरस्त कार्यनीति से क्रांति में बाधा डाली, मजदूरों के बड़ी तादाद के मन में उलझन पैदा कर दी और मजदूर वर्ग में बाधा डाली. इसलिए, मजदूरों ने क्रांति में हमेशा एकजुट होकर काम नहीं किया. अभी खुद अपनी कतारों में एकता नहीं होने की वजह से, मजदूर वर्ग क्रांति का सच्चा नेता नहीं बन सका.
  5. निरंकुश जारशाही को 1905 की क्रांति का दमन करने में पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादियों से मदद मिली.
  6. सितम्बर 1905 में, जापान से शांति-संधि हो जाने पर जार को काफी मदद मिली. संधि होने से जार का पाया मजबूत हुआ.

अब दूसरी क्रांति पर नजर डाली जाएं: दूसरी क्रांति तो फरवरी 1917 में हुई, जिसके जरिए जारशाही का पतन हुआ तथा मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों का निर्माण हुआ और साथ ही साथ अस्थायी सरकार का निर्माण हुआ तथा दोहरी सत्ता अस्तित्व में आयी. इस तरह फरवरी की पूंजीवादी-जनवादी क्रांति की जीत हुई. रूसी कम्युनिस्ट पार्ट (बोल्शेविक) ने दिखाया है कि ‘क्रांति की जीत इसलिए हुई कि इसका हिरावल मजदूर वर्ग था. फौजी वर्दी पहने हुए और ‘शांति’, रोटी और आजादी मांगते हुए, लाखों किसानों के आंदोलन का मजदूर वर्ग ने नेतृत्व दिया. सर्वहारा वर्ग के दृढ़ नेतृत्व ने ही क्रांति की सफलता निश्चित कर दी !’

क्रांति के प्रारम्भिक दिनों में का. लेनिन ने लिखा था, ‘क्रांति मजदूरों ने की थी. मजदूरों ने वीरता दिखाई; उन्होंने अपना खून बहाया; अपने साथ मेहनतकश और गरीब जनता को बहा ले गये !’

पहली क्रांति ने, 1905 की क्रांति ने, दूसरी क्रांति, फरवरी 1917 की क्रांति की तुरंत कामयाबी के लिए रास्ता साफ कर दिया था.

का. लेनिन ने लिखा, ‘1905-1907 के तीन वर्षो में ही सोवियतें बन गयीं. विजयी क्रांति को मजदूर और फौजी प्रतिनिधियों की सोवियतों के समर्थन का आधार मिला. जिन मजदूरों और सैनिकों ने विद्रोह किया, उन्होंने मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतें बना ली. 1905 की क्रांति ने दिखला दिया कि सोवियतें सशस्त्र विद्रोह का साधन थीं, और साथ ही एक नयी क्रांतिकारी सत्ता का बीज थीं. आम मजदूर जनता के मन में सोवियतों की बात जीवित रहीं और जैसे ही जारशाही का तख्ता उलटा गया, वैसे ही उसे अमल में ले आयी. अंतर इतना था कि 1905 में सिर्फ मजदूर प्रतिनिधियों की सोवियतें बनी थीं, जबकि फरवरी 1917 में बोल्शेविकों की पहलकदमीं पर मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतें बनीं.’

मगर, सोवियत की कार्यकारिणी समिति के समाजवादी-क्रांतिकारी और मेंशेविक नेताओं ने सत्ता पूंजीवादियों को सौंप दी. फिर भी, जब मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों ने यह सब जाना, तो उसके बहुमत ने, बकायदा बोल्शेविकों के विरोध के बावजूद, समाजवादी-क्रांतिकारी और मेंशेविक नेताओं के काम को पास कर दिया.

इस तरह रूस में एक नयी राज्यसत्ता पैदा हुई जिसमें, लेनिन के शब्दों में, ‘पूंजीपतियों और पूंजीपति बन जाने वाले जमींदारों’ के प्रतिनिधि शामिल थे.

लेकिन पूंजीवादी हुकूमत के साथ-साथ, एक दूसरी सत्ता मौजूद थी-मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियत. सोवियत में सैनिक प्रतिनिधि ज्यादातर किसान थे, जो युद्ध के लिए भर्ती किये गये थे. मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियत जारशाही के खिलाफ मजदूरों और किसानों के सहयोग की संस्था थी और इसके साथ ही उनकी सत्ता की संस्था थी, मजदूर वर्ग और किसानों के अधिनायकत्व की सत्ता थी.

इसका फल यह हुआ कि दो सत्ताएं, दो अधिनायकत्व विचित्र ढंग से आपस में गुंथ गये: पूंजीपतियों का अधिनायकत्व, जिसकी प्रतिनिधि अस्थायी सरकार थी और मजदूरों और किसानों का अधिनायकत्व, जिसकी प्रतिनिधि मजदूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियत थी.

इसका नतीजा निकला दोहरी-सत्ता.

अब, तीसरी क्रांति यानी रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति पर नजर डाली जाए. पहले यह हमें याद रखना चाहिए कि पहला विश्वयुद्ध 1914 से 1918 तक चला और रूसी समाजवादी क्रांति 1917 के अक्टूबर (अभी नवम्बर) में सफल हुई.

जिस प्रक्रिया के जरिए रूसी नवम्बर क्रांति सफल हुई उसके बारे में कहा जा सकता है कि1917 के 3 अप्रैल की रात को का. लेनिन ने एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने समाजवादी क्रांति की विजय के लिए लड़ने के लिए आम जनता का आह्वान किया. ‘समाजवादी क्रांति जिंदाबाद’- इन शब्दों के साथ का. लेनिन ने अपना यह भाषण खत्म किया. इसी समय का. लेनिन ने युद्ध और क्रांति के विषय पर बोल्शेविकों की एक मीटिंग में उन्होंने रिपोर्ट दी और उसके बाद मेंशेविकों और बोल्शेविकों की एक मिली-जुली मीटिंग में रिपोर्ट की सैद्धांतिक स्थापनाओं (थीसीस) को दोहराया. ये का. लेनिन की मशहूर अप्रैल थीसीस थी, जिससे पार्टी और सर्वहारा वर्ग को पूंजीवादी क्रांति से समाजवादी क्रांति की तरफ बढ़ने के लिए एक स्पष्ट क्रांतिकारी नीति मिली.

अक्टूबर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रांति इतनी तेजी से फैली कि का. लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता का ‘विजय’ यात्रा कहा.

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति की विजय हुईं.

रूस में समाजवादी क्रांति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे. नीचे संक्षेप में लिखे हुए मुख्य कारण ध्यान देने योग्य हैं:

  1. अक्टूबर क्रांति का दुश्मन अपेक्षाकृत ऐसा कमजोर, ऐसा असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसा अनुभवहीन था जैसे कि रूसी पूंजीपति. रूसी पूंजीपति आर्थिक रूप से कमजोर थे और हर तरह सरकारी ठेकों पर निर्भर थे. उनमें राजनीतिक आत्मनिर्भरता और पहलकदमीं इतनी नहीं थी कि परिस्थिति से निकलने का रास्ता ढूंढ सकें. मसलन, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गुटबंदी और राजनीतिक दगाबाजी में उन्हें फ्रांसीसी पूंजीपतियों का सा तजुर्बा नहीं था, और न ही अंग्रेज पूंजीपतियों की तरह उन्होंने विशद रूप से सोची हुई चतुर समझौता करने की शिक्षा पायी थी. फरवरी क्रांति ने जार का तख्ता उलट दिया था और सत्ता खुद पूंजीपतियों के हाथ में आ गयी थी लेकिन बुनियादी तौर से घृणित जार की नीति पर ही चलने के सिवा उन्हें और कोई चारा नहीं था. जार की तरह, उन्होंने ‘विजय तक युद्ध करने’ का समर्थन किया, हालांकि युद्ध चलाना देश की शक्ति से परे था और जनता तथा फौज दोनों युद्ध से बुरी तरह से चूर हो चुके थे. जार की तरह कुल मिलाकर वे भी बड़ी जागीरी जमीन बनाये रखने के पक्ष में थे, हालांकि जमीन की कमी और जमींदारों के जुए बोझ से किसान मर रहे थे. जहां तक उनकी मजदूर नीति का संबंध था, वे मजदूर वर्ग से नफरत करने में जार को भी कान काट चुके थे. उन्होंने कारखानेदार के जुये को बनाये रखने और मजबूत करने की कोशिश की, बल्कि उन्होंने बड़े पैमाने पर तालेबंदी करके उसे असहनीय बना दिया. कोई ताज्जुब नहीं कि जनता ने जार की नीति की और पूंजीपतियों की नीति में बुनियादी भेद नहीं देखा, और जो घृणा उसके दिल में जार के लिए थी, वहीं पूंजीपतियों की अस्थायी सरकार के लिए हो गयी. जब तक समाजवादी-क्रांति और मेंशेविक पार्टियों का थोड़ा-बहुत असर जनता पर था, तब तक पूंजीपति उन्हें पर्दे की तरह उसे इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता कायम रख सकते थे. लेकिन, जब मेंशेविकों और समाजवादी-क्रांतिकारियों ने जाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूंजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूंजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार नहीं रहा.
  2. अक्टूबर क्रांति का नेतृत्व रूस के मजदूर वर्ग जैसे क्रांतिकारी वर्ग ने किया. यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आंच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रांतियों से गुजर चुका था और तीसरी क्रांति के शुरू होने से पहले शांति, जमीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिए संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था. अगर क्रांति का नेता रूस के मजदूर वर्ग जैसा न होता, ऐसा नेता जिसने जनता का विश्वास पा लिया था, तो मजदूरों और किसानों की मैत्री न होती और इस तरह की मैत्री के बिना अक्टूबर क्रांति की विजय असम्भव होती.
  3. रूस के मजदूर वर्ग को क्रांति में गरीब किसानों जैसा सुदृढ़ साथी मिला, जो किसान जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था। सर्वहारा और गरीब किसानों की मैत्री दृढ़ हुई. मजदूर वर्ग और गरीब किसानों की इस मैत्री के कायम होने से, मध्यम किसानों की भूमिका स्पष्ट हो गयी. ये मध्यम किसान बहुत दिन तक ढुलमुल रहे थे और अक्टूबर विद्रोह के शुरू होने से पहले ही पूरी तरह क्रांति तरफ आये थे और उन्होंने गरीब किसानों से नाता जोड़ा था. कहना न होगा कि इस मैत्री के बिना अक्टूबर क्रांति विजय न होती.
  4. मजदूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षों में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था. बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सकी. शांति के लिए आम जनवादी आंदोलन, जागीरी जमीन छीनने के लिए किसानों का जनवादी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वाधीनता और राष्ट्रीय समानता के लिए उत्पीड्त राष्ट्रीयताओं का आंदोलन और पूंजीपतियों का तख्ता उलटने के लिए और सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करने के लिए सर्वहारा वर्ग का समाजवादी आंदोलन-इन सबको ऐसी ही पार्टी क्रांतिकारी धारा में मिला सकती थी. इसमें संदेह नहीं कि इन विभिन्‍न आन्दोलनों की धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रांतिकारी धारा में मिलने से रूस में पूंजीवाद की तकदीर का फैसला हो गया.
  5. अक्टूबर क्रांति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी जोरों पर था, जबकि प्रमुख पूंजीवादी राज्य दो विरोधी खेमें में बंटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फंसे रहने और एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे रहने से, वे ‘रूसी मामलों में’ मजबूती से दखल नहीं दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रांति का विरोध नहीं कर सकते थे. अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने सर्वहारा अधिनायकत्व कायम किया और विशाल देश की हुकूमत का काम मजदूर वर्ग को सौंप दिया. इस तरह से उसे शासक वर्ग बना दिया.

इस तरह अक्टूबर की समाजवादी क्रांति ने मनुष्य जाति के इतिहास में एक नया युग, सर्वहारा क्रांतियों का युग आरम्भ किया.

रूसी क्रांति का ऐतिहासिक सबक

रूसी क्रांति का ऐतिहासिक सबकों के संबंध में दो/चार बातें इस प्रकार हैं:

  1. सर्वहारा क्रांति की विजय, सर्वहारा अधिनायकत्व सर्वहारा क्रांतिकारी पार्टी के बिना असम्भव है. सिर्फ नयी तरह की पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी (अभी मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी पार्टी), सामाजिक क्रांति की पार्टी, पूंजीपतियों के खिलाफ निर्णायक युद्ध के लिए सर्वहारा को तैयार कर सकने वाली और सर्वहारा क्रांति की विजय संगठित कर सकने वाली पार्टी ही ऐसी पार्टी हो सकती है;
  2. मजदूर वर्ग की पार्टी वर्ग नेता की अपनी भूमिका तब तक पूरी नहीं कर सकती, जब तक कि वह मजदूर आंदोलन के आगे बढ़े हुए सिद्धांत (अभी मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी सिद्धांत) में माहिर नहीं होती. मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत समाज के विकास का विज्ञान है, मजदूर-किसान व मेहनतकशों के आंदोलन का विज्ञान है। विज्ञान की हैसियत से, यह एक जगह रुकता नहीं बल्कि उसका निरंतर विकास होता है. मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत कठमुल्लापन नहीं है, बल्कि काम करने के लिए मार्ग-दर्शक है;
  3. पार्टी मजदूर वर्ग की हिरावल भूमिका पूरी नहीं कर सकती यदि सफलता से बदहवास होकर उसमें घमंड आ जाये, वह अपने काम में दोष न देखे, अपनी गलतियां मानने से और समय रहते खुलकर और ईमानदारी से उन्हें सुधारने से डरे. पार्टी अजेय होती है यदि वह आलोचना और आत्मालोचना से न डरे, यदि वह अपने काम में गलतियों से सबक लेकर कार्यकर्ताओं को सिखाये-पढ़ाये और यदि वह समय रहते अपनी गलतियों को सुधारना नहीं जानती, जब तक मजदूर वर्ग की पार्टी अपनी ही कतारों में उत्पन्न होने वाले अवसरवादियों के खिलाफ लगातार कड़ा संघर्ष नहीं करती, जब तक अपने ही भीतर पैदा होने वाले समर्पणवादियों का मुकाबला नहीं करती, तब तक वह अपनी कतारों में एकता और अनुशासन कायम नहीं रख सकती. हकीकत में बोल्शेविक पार्टी के आंतरिक जीवन के विकास का इतिहास पार्टी के भीतर अवसरवादी गुटों के खिलाफ अर्थवादियों, मेंशेविकों, त्रास्तकीवादियों , बुखारिनपंथियों के खिलाफ संघर्ष का इतिहास है.
  4. (अ) रूसी क्रांति के पहले कामरेड लेनिन के सामने बतौर एक नमूना पेरिस कम्युन 1871 का विद्रोह था जो शहरों पर कब्जा जमाकर ही शुरू हुआ था. उसी अनुभव से सबक लेकर कामरेड लेनिन ने रूसी क्रांति के मार्ग के रूप में बगावत का मार्ग अपनाया. (आ) अत: कहा जा सकता है कि रूसी क्रांति बगावत के जरिए सफल हुईं. जिसका अर्थ है पहले शन्नु का अड्डा स्थल शहर पर कब्जा जमाकर बाद में गांवों (देहातों) पर कब्जा जमाना.

पर, रूसी क्रांति के महान नेताओं, पहले का. लेनिन और बाद में का. स्तालिन की मृत्यु के बाद रूसी समाजवाद भी टिक नहीं सका. जो अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के लिए बहुत-ही दुःखद घटना है, कारण निम्न रूप है :

विदित है कि 21 जनवरी, 1924 में महान लेनिन की मृत्यु हुई. उनकी मृत्यु के बाद सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के अधीन रूस देश में समाजवाद की अग्रगति का जिम्मा का. स्तालिन के कंधे पर आ पड़ा, जो का. स्तालिन के कुशल नेतृत्व ने बखूबी निभाए. जबकि का. स्तालिन के सामने समाजवादी निर्माण-कार्य का कोई पूर्व अनुभव नहीं था. उन्होंने न केवल रूस में समाजवादी निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया, बल्कि साथ ही साथ विश्व सर्वहारा तथा कम्युनिस्ट आंदोलन में भी नेतृत्व दिया. का. स्तालिन के नेतृत्व में ही रूसी लाल सेना की अभूतपूर्व साहसिक जवाबी कार्यवाही के जरिए दूसरा विश्वयुद्ध के चरम फासीवादी ताकतों के सरगना हिटलर को बुरी तरह से परास्त किया गया और तमाम फासीवादी ताकतों का कमर तोड़ दिया गया. पर, पार्टी में छिपे हुए चरम संशोधनवादी व गद्दार ख़ुश्चेव गुट द्वारा 01 मार्च, 1953 को का. स्तालिन की मृत्यु के बाद पार्टी व सत्ता पर कब्जा जमा लिया गया और पहले पूंजीवाद की पुनर्स्थापना करके और बाद में रूसी समाजवाद को सामाजिक साम्राज्यवाद में बदल दिया गया. इस तरह से दुनिया के सर्वहारा वर्ग व उत्पीड़ित राष्ट्र व जनता के सामने एक नकारात्मक अनुभव रखा, जिससे महान माओ ने सबक लेकर चीन में समाजवाद को आगे बढ़ाया. रूसी समाजवादी निर्माण कार्य में जो भी भूल व त्रुटि हुई थी उनसे सीख लेकर और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति को जारी रखते हुए चीन में सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को और मजबूत बनाया तथा गद्दार संशोधनवादी व पूंजीवाद के राहगीरों को पार्टी से निकाल-बाहर कर दिया गया. पर, समाजवाद का गद्दार देंङ-गुट के नेतृत्व में 09 सितम्बर, 1976 में का. माओ की मृत्यु के बाद पार्टी व सत्ता पर कब्जा जमा लिया और चीन को पहले पूंजीवाद में और अभी साम्राज्यवाद में बदल दिया गया. इस तरह से दुनिया के सर्वहारा वर्ग व उत्पीडित जनता के सामने रूस के अधःपतन के बाद समाजवादी चीन का अध:पतन और एक नकारात्मक उदाहरण पेश आया. अब दुनिया के किसी भी देश में समाजवादी व्यवस्था का अस्तित्व नहीं है और इन दो नकारात्मक अनुभवों से सबक लेकर समाजवादी क्रांतियों को और आगे बढ़ाने व मजबूत बनाने का काम का जिम्मा सच्चे कम्युनिस्टों के कंधे पर आ पड़ा. इस महत्वपूर्ण काम को सही तौर पर निभाने के लिए दुनिया के कम्युनिस्टों को खुद को करना-ही होगा और इसलिए महान माओ द्वारा चीन में समाजवाद को मजबूत बनाते हुए जो भी नीतियों को सूत्रबद्ध किया गया, उसे गहराई से अध्ययन करना पड़ेगा ओर क्रियान्वयन करना होगा. समाजवाद की जीत की दिशा भी स्पष्ट तौर पर आगे बढ़ाने के लिए सारे कुछ को तैयार करना होगा.

रूसी समाजवादी क्रांति का विश्वजनीन तात्पर्य को आत्मसात करें !

खूब संक्षेप में कहने से महान रूसी समाजवादी क्रांति का तात्पर्य निम्नरूप है –

(अ) विदित है कि वर्ग समाज उद्भव के बाद समूची दुनिया के सामाजिक विकास का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है. इस इतिहास के अंदर महान रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति एक युगांतकारी घटना है ! क्‍यों यह युगांतकारी घटना है ? क्‍योंकि रूसी समाजवादी क्रांति के जरिए पूर्व में हुए तमाम विद्रोह व क्रांति के साथ एक सुस्पष्ट विभाजन रेखा भी खींची गयी. जैसे: रूसी क्रांति के पहले मानव समाज में जितने भी विद्रोह या क्रांतियां हुई, महान माओ के अनुसार, वे सब पुरानी बुर्जुआ जनवादी क्रांति का हिस्सा थी जिसका मूल मकसद था बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में बुर्जुआ समाज या पूंजीवादी समाज की स्थापना करना; और बुर्जुआ वर्ग मजदूर-किसान को लामबंद कर सशस्त्र उपायों में बुर्जुआ क्रांति के जरिए खुद के वर्ग स्वार्थ में ही सामंती समाज को चकनाचूर करते हुए बुर्जुआ या पूंजीवादी समाज की स्थापना करना. पर, उसने देख लिया कि पूंजीवादी समाज स्थापित होने के बाद मजदूर-किसान चुपचाप नहीं बैठे रहे. बल्कि, आगे आकर 1917 में रूसी समाजवादी क्रांति के जरिए बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग को ही उखाड़ फेंका और मजदूर राज की स्थापना कर लिया. इससे आतंकित होकर बुर्जुआ वर्ग 1917 के बाद से और कहीं भी बुर्जुआ क्रांति का झण्डा नहीं लहराये. यानी बुर्जुआ वर्ग बुर्जुआ क्रांति का जिम्मा और नहीं निभाया. अब यानी 1917 के बाद से बुर्जुआ क्रांति के जरिए सामंतवाद को कब्र में डालने का जिम्मा मजदूर वर्ग के कंधे पर-ही आ पड़ा, जिसे राष्ट्रीय व जनवादी क्रांति यानी नई जनवादी क्रांति के रूप में कामरेड माओ ने परिभाषित किया; और महान रूसी क्रांति के बाद जितनी भी क्रांतियां हुई तथा हो रही हैं, वे सब के सब सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में विश्व सर्वहारा क्रांति का हिस्सा बन गया है. और विश्व सर्वहारा क्रांति की दो धाराएं हैं, पहला समाजवादी क्रांति और दूसरा है नई जनवादी क्रांति. समाजवादी क्रांति का मूल मकसद है मजदूर वर्ग के अधिनायकत्व के अधीन समाजवादी समाज और नई जनवादी क्रांति का मूल मकसद है मजदूर वर्ग के नेतृत्व में 90 प्रतिशत जनता का जनवादी अधिनायकत्व के अधीन नई जनवादी समाज की स्थापना करना; और बाद में नई जनवादी समाज को आगे बढ़ाते हुए सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के अधीन समाजवादी समाज की स्थापना करना;

(आ) क्रांति की मूल बात है राजसत्ता पर कब्जा जमाना जो बहुत ही तात्पर्यपूर्ण है, जिसे हमें हरगिज नहीं भूलना चाहिए.

रूसी क्रांति की धारावाहिकता के अभिन्‍न अंश के रूप में ही हुई. चीनी क्रांति और रूसी व चीनी क्रांति की धारावाहिकता के अभिन्‍न अंश के रूप में ही जारी भारतीय क्रांति

हमें मालूम है कि साम्राज्यवाद के युग में सर्वहारा क्रांतियों के अनुभवों का निचोड़ निकालते हुए चीन की विशेषताएं और क्रांतिकारी युद्ध के बारे में माओ ने कहा, ‘सशस्त्र बल द्वारा राजसत्ता छीनना, युद्ध द्वारा मसले को सुलझाना, क्रांति का केन्द्रीय कार्य और सर्वोच्च रूप है. क्रांति का यह मार्क्सवादी-लेनिनवादी उसूल सर्वत्र लागू होता है, चीन पर और अन्य सभी देशों पर लागू होता है.

लेकिन उसूल एक ही होने पर भी जब सर्वहारा वर्ग की पार्टी उसे अमल में लाती है तो वह अलग-अलग परिस्थितियों के अनुरूप उसकी अभिव्यक्ति के अलग-अलग तरीके अपनाती है. पूंजीवादी देश, जब वे फासिस्टवादी नहीं होते अथवा युद्ध में उलझे नहीं होते तो वे अपने देश के भीतर बुर्जुआई-लोकशाही पर अमल करते हैं; अपने वैदेशिक संबंधों में वे दूसरे राष्ट्रों के उत्पीड़न का शिकार नहीं होते बल्कि खुद दूसरे राष्ट्रों का उत्पीड़न करते हैं. उनकी इन विशेषताओं के कारण, पूंजीवादी देशों के सर्वहारा वर्ग कौ पार्टी का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह दीर्घकालीन कानूनी संघर्ष के जरिए मजदूरों को शिक्षित करे तथा अपनी शक्ति का संचय करे और पूंजीवाद का तख्ता अंतिम रूप से उखाड़ फेंकने के लिए तैयारी करे. उक्त देशों में मसला यह है कि दीर्घकाल तक कानूनी संघर्ष चलाया जाय, पार्लियामेंट को एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाय, आर्थिक व राजनीतिक हड़तालें की जाएं, ट्रेड यूनियनों को संगठित किया जाए और मजदूरों को शिक्षित किया जाए. उन देशों में संगठन का रूप कानूनी होता है और संघर्ष का रूप रक्तपातहीन (गैर-फौजी). युद्ध के मसले के बारे में, पूंजीवादी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियां अपने खुद के मुल्कों द्वारा छेड़े गए साम्राज्यवादी युद्धों का विरोध करती हैं; अगर इस प्रकार के युद्ध हो तो इन कम्युनिस्ट पार्टियों की नीति ऐसी होती है जो अपने देश की प्रतिक्रियावादी सरकारों को पराजित करने में सहायक हो. जो युद्ध वे करना चाहती हैं, वह गृहयुद्ध होता है जिसकी वे तैयारी कर रही है. लेकिन यह बगावत और युद्ध तबतक नहीं छेड़ना चाहिए जब तक पूंजीपति वर्ग वास्तव में असहाय नहीं हो जाता, जब तक सर्वहारा वर्ग का बहुसंख्यक जन-समुदाय सशस्त्र विद्रोह करने और युद्ध चलाने के लिए संकल्पबद्ध नहीं हो जाता, तथा जब तक किसान जन-समुदाय स्वेच्छा से सर्वहारा वर्ग को मदद नहीं देता. और जब इस प्रकार की बगावत और युद्ध का समय आ जाएगा, तो पहला कदम यह होगा कि शहरों पर कब्जा कर लिया जाए और फिर देहातों की तरफ बढ़ा जाए, न कि इसके विपरीत कदम उठाया जाए. पूंजीवादी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने ऐसा ही किया है, तथा रूस की अक्टूबर क्रांति ने इस बात को सही साबित कर दिया.

‘लेकिन चीन एक भिन्न प्रकार का देश है. चीन की विशेषता यह है कि वह एक स्वाधीन जनवादी देश नहीं है, बल्कि अर्द्ध-औपनिवेशिक और अर्द्ध-सामंती देश है; अंदरूनी तौर पर चीन में लोकशाही का अभाव है और वह सामंती उत्पीड़न का शिकार है, तथा उसके वैदेशिक सम्बंधों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अभाव है और वह साम्राज्यवादी उत्पीड़न का शिकार है. इस प्रकार यहां न तो इस्तेमाल करने के लिए कोई पार्लियामेंट है, और न मजदूरों को हड़ताल के लिए संगठित करने के लिए कोई कानूनी अधिकार ही. बुनियादी तौर पर, यहां कम्युनिस्ट पार्टी के सामने न तो यह कार्य है कि वह बगावत अथवा युद्ध शुरू करने से पहले एक लम्बे अरसे तक कानूनी संघर्षों के दौर से गुजरे, और न यह कि पहले शहरों पर कब्जा कर लिया जाए और फिर देहातों पर अधिकार किया जाए. उसके सामने जो कार्य है वह इसके एकदम उल्टा है.’ (उद्धरण- माओ के ‘युद्ध और रणनीति की समस्याएं’ नामक लेख से). इस रूप से दीर्घकालीन लोकयुद्ध के जरिए ही 1949 में महान माओ के नेतृत्व में चीनी क्रांति सफल हुई.

अनुभव हमें सिखाया है कि महान रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग और जनता के क्रांतिकारी संघर्षो की अनिवार्य परिणति थी तथा महान चीनी क्रांति उसी प्रक्रिया की धारावाहिकता थी. अब हमारी भारतीय क्रांति भी अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग और जनता के क्रांतिकारी संघर्षों का अभिन्‍न अंग है. अतः भारतीय क्रांति का भी केन्द्रीय कार्य सशस्त्र बल द्वारा राजनीतिक सत्ता पर कब्जा जमाना है. भारत में भी सर्वहारा वर्ग की पार्टी यानी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए विश्व समाजवादी क्रांति के अनुभवों का, खासकर रूस और चीन की दो महान क्रांतियों के अनुभवों का अध्ययन करना नितांत अनिवार्य है.

चूंकि, भारत एक अर्द्ध-औपनिवेशिक व अर्द्ध-सामंती देश है, इसलिए यहां की क्रांति के लिए जो तरीका अपनाना होगा, वह है, ‘यदि कोई देश किसी साम्राज्यवादी शक्ति या शक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासित हो और एक ऐसा अर्द्ध-सामंती देश हो जहां कि जनता को कोई आजादी या जनवादी अधिकार नहीं हो, वहां सर्वहारा वर्ग की पार्टी बिल्कुल शुरू से ही जनता को सशस्त्र संघर्ष के लिए जागृत और गोलबंद करती है. क्रांति की प्रधान शक्ति के रूप में किसान वर्ग रहती है, क्रांति, पिछड़े हुए क्षेत्रों को अपने कामकाज का मुख्य केन्द्र बनाती है, जनसेना और जनमिलिशिया का निर्माण करती है, विस्तीर्ण देहाती क्षेत्रों में निर्भर-योग्य, मजबूत और आत्मनिर्भर आधार क्षेत्रों या मुक्त इलाकों की स्थापना करती है, दीर्घकालीन लोकयुद्ध के दौर से उनका निरंतर विस्तार करती है और प्रतिक्रियावादियों की राजसत्ता पर निर्णायक व विध्वंसक प्रहार करने के जरिए शहरों को घेरकर उन पर अंतिम रूप से कब्जा जमा लेती है तथा देश में जनता की राजनीतिक सत्ता व राज्य-व्यवस्था की स्थापना करती है.’

भारत में लम्बे समय से चली आ रही विभिन्‍न रूपों की संशोधनवादी लाइन व कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में संसदीय चुनाव पर हमारा एक सही दृष्टिकोण व उस अनुसार कार्यक्रम होना बहुत जरूरी है. इस पर हमारा रणनीति-कार्यनीति दस्तावेज में लिखित अंश के अंतर्वस्तु को गहराई से आत्मसात करना चाहिए और उस अनुसार स्लोगन व कार्यक्रमों को भी तैयार करना चाहिए. हमें याद रखना है कि चुनाव में भाग लेना या बहिष्कार करने का सवाल अवश्य-ही कार्यनीति से संबंध रखता है. लेकिन ख़ुश्चेव संशोधनवाद के उद्भव के बाद, जब संसदीय रास्ता और चुनाव में भागीदारी आधुनिक संशोधनवाद की रणनीति बन गई है, तब इस पहलू के मद्देनजर हम इस सवाल को महज कार्यनीतिक मामला कहकर नजरअंदाज नहीं कर सकते. साथ ही ‘अभी पार्टी पहाड़-जंगल इलाके की थोड़ी-सी जगह के अंदर सिमट कर रह गयी है’, ‘बहुत सारी जगहों या प्रांतों में पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था हावी हो गयी है”, ‘संसदीय व्यवस्था या चुनाव पर जनता में मोह है”- इत्यादि तर्कों तथा दलीलें बेबुनियाद हैं और भारत की ठोस जमीनी वास्तविकताओं से इनका कोई लेना-देना नहीं है.

हमारे देश में ‘अब तक के ऐतिहासिक अनुभव ने सिर्फ यही साबित किया है कि जिन्होंने चुनाव में भाग लिया उनमें से अधिकांश या तो संशोधनवादी हो गये हैं या उन्होंने क्रांतिकारी सशस्त्र संघर्ष को कानूनी और शांतिपूर्ण मार्गों पर भटका दिया. अतः निष्कर्ष के बतौर हम यह कह सकते हैं कि चुनावों का बहिष्कार हालांकि कार्यनीति का सवाल है, पर भारतवर्ष की ठोस परिस्थितियों में यह रणनीति का महत्व प्राप्त कर लेता है क्योंकि चुनावों में भागीदारी दीर्घकालीन लोकयुद्ध की रणनीति से बिल्कुल ही मेल नहीं खाती.

अतः खूब संक्षेप में कहने से हमें अवश्य-ही भारत की नई जनवादी क्रांति को सफल बनाने के लिए सशस्त्र कृषि-क्रांति तथा दीर्घकालीन लोकयुद्ध के रास्ते पर अडिग रहना होगा.

रूसी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ पर शपथ लें

भारतीय नई जनवादी क्रांति को सफल करें, अपना फौरी, प्रधान व केन्द्रीय कर्तव्य पर अडिग रहें

रूसी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ मनाने के दो तरीके होते हैं- एक पेटी-बुर्जुआ संशोधनवादी तरीका और दूसरा क्रांतिकारी तरीका. संशोधनवादी तरीका का मतलब केवल दिखावे के रूप में रूसी क्रांति का और का. लेनिन-स्तालिन का जयगान करना, कुछ लम्बा-चौड़ा भाषण देना, पर व्यवहार में उसे कतई लागू नहीं करना. और क्रांतिकारी तरीका का मतलब है केवल दिखावे के रूप में नहीं, बल्कि रूसी क्रांति के तात्पर्य को यानी क्रांति के जरिए सत्ता पर काबिज होने का कर्तव्य को अपना-अपना देश की विशेषता के अनुसार आगे बढ़ाने की शपथ लेना. इसलिए हमें अवश्य-ही संशोधनवादी तौर-तरीके का कड़ा विरोध करना होगा और क्रांतिकारी तौर-तरीके के अनुसार रूसी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ मनाना होगा.

रूसी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर हमें भी यही शपथ लेनी चाहिए ताकि भारतीय क्रांति की मौजूदा चुनौतियों का तथा मोदी सरकार की हर फासीवादी नीति व कार्यवाहियों का साहस के साथ मुकाबला कर एक नया जनवादी भारत का निर्माण करना और समाजवाद-साम्यवाद की स्थापना के लिए पूरजोर कोशिश करना होगा.

जाहिर है कि भारत में केन्द्रीय सत्ता में आसीन ब्राह्मणीय हिन्दुत्ववादी फासीवादी आरएसएस-बीजेपी के नरेन्द्र मोदी का शासनकाल का तीन वर्ष पार हो गया. सरकारी व कॉरपोरेट नियंत्रित प्रचार यंत्र रेडियो, टीवी, पत्र-पत्रिका इत्यादि सारे कुछ के जरिए एक के बाद एक मोदी सरकार द्वारा जिन्हें उपलब्धियों के रूप में गिनाया जा रहा है, उनका व्यापक प्रचार किया जा रहा है. यह कहते नहीं थक रहे हैं कि अब भारत में गरीबी नहीं है, नौकरी का अभाव नहीं है, तमाम अभाव-अनटन खत्म होकर सभी प्रकार की समानता आ गयी है. आंकड़ों की हेराफेरी के जरिए सकल घरेलु उत्पाद में भारी वृद्धि दिखा रहे हैं, विश्व में सबसे तेज गति से विकास करनेवाली अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के उभरने की बात कह रहे हैं. यह कह रहे हैं कि अब भ्रष्टाचार नहीं है, नोटबंदी के जरिए कालेधन पर अंकुश लगाया गया है, सब का विकास होकर अच्छे दिन भी आ गये हैं. नारियों के साथ छेड़खानी, बलात्कार, यौन उत्पीड़न इत्यादि नारी यातनाएं बहुत कम होने का ढोंग कर रहे हैं. जातिवाद, भेद-भाव के कम होने व धर्मीय अल्पसंख्यकों को हर अधिकार दिये जाने की सफेद झूठ बोल रहे हैं. ‘मेक इन इंडिया’, ‘मैनुफैक्चरिंग हब’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ इत्यादि स्‍लोगन देकर भारत के विकास होने, डिजिटल इंडिया, नगद रहित अर्थव्यवस्था का कार्यक्रम में बहुत तेजी आने के झूठे दावे कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का शान बढ़ा है, अमेरिका के साथ हर मामले मे घनिष्टता व सहयोग बढ़ा है, भारत भी किसी से कम नहीं की गलत समझ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. अब केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरा बने माओवाद या माओवादी ही बचे हैं.

तथापि भारत का सही चित्र ठीक इसके विपरीत है. जैसे- गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर बनते जा रहा है तथा गरीब व अमीरों के बीच की खाई बहुत अधिक हो गयी है. खासकर, 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही एक प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति 49 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 58.4 प्रतिशत हो गयी. 2016 में देश के सबसे धनी 10 प्रतिशत अमीरों के पास देश के कुल सम्पत्ति में हिस्सा 80.7 प्रतिशत था. यानी बाकी 90 प्रतिशत आबादी के पास केवल 9.3 प्रतिशत सम्पत्ति ही है (स्रोत:- क्रेडिट सुईस ग्लोबल वेल्थ डेटा बेस). विदेशों में जमा काले धनों को 100 दिनों के अंदर लाने की मोदी की घोषणा अब 1050 दिन पार हो जाने के बाद भी उस ओर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है यानी उसकी घोषणा टांय-टांय फिस्स हो गयी.

देश में नौकरी मिलने के अवसर पूरी तरह समाप्त हो रहे हैं. मुद्रास्फीति की दर में भी वृद्धि हुई है और महंगाई रोज दिन बढ़ती ही जा रही है. फिर, मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ व ‘मैनुफैक्चरिंग हब’ का नारा असल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देना और ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा भी असल में पूरे प्रशासन तंत्र को डिजिटलाइज्ड करना है, ताकि पूरे प्रशासन तंत्र पर उनका नियंत्रण बरकरार व मजबूत हो सके. मोदी सरकार कई मजदूर विरोधी व किसान विरोधी कानून लायी है, जिससे लाखों मजदूर नौकरीहीन हालत में आ गये हैं और किसान आत्महत्याएं और बढ़ें हैं.

साम्राज्यवादी और दलाल नौकरशाही पूंजीपतियों के हितों के लिए पूरे देश को एक ही एकीकृत बाजार के रूप में ढालने के लिए परोक्ष कर नीति को सुधार कर वस्तु सेवा कर (जी.एस.टी.) को सामने लायी गयी है. भ्रष्टाचार को उन्मूलन करने की धोखेबाजी प्रचार के साथ बड़े नोटों को रद्द कर लोगों के पास मौजूद पूरे पैसे को बैंकों में जमा कराया गया. इससे किसानों, छोटे व्यापारियों और छोटे पूंजीपतियों को झटका लगा. इससे कृषि, औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को धक्का लगा. लोगों को अपने शेष व बचत पैसों को स्वतंत्र रूप से विनिमय करने की मौका न देकर उनके सभी पैसे बैंकों में जमा कराकर, इसके जरिए साम्राज्यवाद और दलाल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाते हुए डिजिटलीकरण, नगदरहित अर्थ व्यवस्था (cashless economy) स्थापित करने के लिए की जाने वाली कोशिशें आगामी दिनों में देश के मध्यम वर्ग सहित सभी तबकों पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और दलाल नौकरशाही पूंजी के हमले और बढ़ने का आसार हैं.

देश के आर्थिक तौर पर विकसित होने की लफ्फाजी मोदी सरकार करने के बावजूद देश में औद्योगिक क्षेत्र और उत्पादन क्षेत्र (manufacturing) में मंदी की स्थिति पैदा होने के कारण बेरोजगारी, दैनिक जरूरत के चीजों की महंगाई और कृषि संकट बढ़कर इस ‘विकास’ के खोखलापन का भण्डाफोड़्‌ कर रहा है.

देश में दिन ब दिन तेज होने वाले अंतरविरोधों के कारण उभरती सामाजिक आन्दोलनों को कुचलने के लिए मोदी सरकार जितने भी फासीवादी कानूनें सामने ला सकती है. इसी तरह विभिन्‍न नाम देकर हिन्दू फासीवादी गिरोहों को भी गठित करने और जनता पर गैरकानूनी एवं फासीवादी हमले तेज करने के आसार हैं.

देश के अंदर कश्मीर की जनता को सभी अधिकारों से वंचित कर एक बंदी शिविर का जीवन गुजर-बसर करने के लिए तथा बंदूक के साये में जीवन बिताने के लिए मजबूर किया गया है. ऐसे अत्याचार का स्वरूप इतने भयंकर है कि सेना द्वारा जीप गाड़ी में कश्मीरी युवक को बांधकर घुमाये जाने की चरम कुकीर्ति चलाया जा रहा है. पूर्वोत्तर भारत के समूचे राष्ट्रीयता की जनता के आत्म-निर्णय का अधिकार प्राप्त करने के लिए जारी आंदोलनों पर निर्मम दमनात्मक अभियान चलाया जा रहा है तथा उक्त आंदोलन को लौह बूटों तले रौंदा जा रहा है. ऐसाकि विरोध करने वाले मीडिया के लोगों को भी बख्शा नहीं जा रहा है. उनके द्वारा उठाया जा रहा प्रतिवाद या प्रतिरोधी आवाज को दबाने खातिर विभिन्‍न तरीके की धमकी व मुकदमा लाद दिया जा रहा है.

फिर, गोरक्षा के बहाने गोमांस रखने व खाने के आरोप लगाकर मुस्लिमों की पीट-पीटकर हत्या करने, उन्हें घायल करने की घटनाएं तो बे-रोक टोक जारी हैं और उत्तर-प्रदेश में कट्टर मुस्लिम विरोधी योगी आदित्यनाथ की सरकार के आगमन के बाद धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिम जनता पर हर तरह का जुल्म-अत्याचार, दबाव, धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन पर विभिन्‍न प्रकार के पाबंदी लगा दिया गया है तथा गोमांस सहित सभी प्रकार के मांस बिक्री पर प्रतिबंध और तमाम बुचड्खाने बंद कर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया, ऐसाकि पशु खरीद-बिक्री को नियंत्रित करते हुए क्रूर कानून बनाए जा रहे हैं. लोगों के खान-पान व पहनावे-ओढ़ावे पर पाबंदियां लगा रहे हैं. अन्यान्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भी विभिन्‍न प्रकार का दबाव व पाबंदी लगायी जा रही है, जिससे गरीब तबके के एक हिस्सा का रोजगार बंद हो गया है. दलितों पर अत्याचारों में कई गुना इजाफा हुआ है. सहारनपुर के दलितों पर अत्याचार इसकी ताजा मिसाल है.

मोदी सरकार के आने के बाद भारत की विस्तारवादी भूमिका को और व्यापक रूप से बढ़ा दिया गया है. पड़ोसी देशों के साथ पारस्परिक संबंध में और ज्यादा खटास आयी है. अमरीकी साम्राज्यवादी महाशक्ति द्वारा चीन को घेरने की नीति को आगे बढ़ाने के स्वार्थ में ही मोदी सरकार द्वारा विभिन्‍न प्रकार की योजना व कार्यक्रम अपनाया गया है. फिलहाल, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा असम के ब्रहमपुत्र नदी पर 9 किलोमीटर सेतु का उद्घाटन दरअसल अरुणाचल के साथ द्रुत कॉन्टैक्ट स्थापित करना है ताकि अमेरिका की ‘चीन को घेरो’ की योजना को आगे बढ़ाया जा सके. दरअसल भारत के राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-सामरिक-विदेश नीति-शासन प्रणाली सभी क्षेत्रों में फासीवादी नीति व तौर-तरीके अपनाया जा रहा है. सच कहा जाये तो पूरे भारत में पुलिस व बंदूक का राज चल रहा है.

हमारे कर्तव्य

कामरेडों, हमें यह समझ लेना होगा कि मोदी सरकार द्वारा माओवादी पार्टी व माओवादी आंदोलन को पूरी तरह कुचल डालने की योजना, निश्चित रूप से मोदी सरकार का एक प्रमुख काम के बतौर उजागर हुआ है. लेकिन, यह केवल भारत की किसी एक पार्टी की सरकार का अपना मनमौजी निर्णय नहीं है और ऐसा हो भी नहीं सकता है. क्योंकि भारत के शासक पार्टियां सामंतवाद व साम्राज्यवाद के दलाल हैं. इसलिए चाहे कोई भी पार्टी हो या किसी भी रंग की सरकार क्‍यों न हो, साम्राज्यवाद खासकर अमरीकी साम्राज्यवाद का निर्देशन-अनुसार एलआईसी पॉलिसी (या कम तीक्रता वाला युद्ध) के विभिन्‍न पहलुओं को पूरी तरह लागू कर रहे हैं. यूपीए जमाने की तुलना में अभी एनडीए जमाने में भी इन नीतियों पर और आक्रामक ढंग से अमल हो रहा है. इसलिए यह केवल मोदी सरकार के गद्दी पर बैठने के बाद ही सरकार का प्रमुख काम बन गया- ऐसा नहीं है. अगर हमलोग यूपीए-1 व यूपीए-2 सरकार के जमाने पर एक बार नजर दौड़ाते हैं तो हम देख पाते हैं कि यूपीए-1 और यूपीए-2 दोनों ने ही माओवादी पार्टी व माओवादी आंदोलन को ही ‘देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताकर हमारी पार्टी व आंदोलन को खत्म करने के काम को सबसे प्रमुख काम के बतौर चलाया था. ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के पहले व दूसरे चरण उन्हीं सरकारों के जमाने के थे. मगर परिणाम क्या निकाला ? इतिहास गवाह देता है कि वे उसके द्वारा निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने में काफी हद तक विफल रही. उल्टे, माओवादी पार्टी व आंदोलन की जड़ जनता के अंदर तक चली गयी है और हजारों कामरेडों की शहादतों के कारण हुआ भारी नुकसान झेलने के बावजूद पार्टी अनेकों अनुभव व सबक लेकर मजबूत हुई है.

अब ब्राह्ममणीय हिन्दुत्ववादी-फासीवादी मोदी सरकार द्वारा अमरीकी साम्राज्यवाद सहित अन्य तमाम साम्राज्यवादियों व प्रतिक्रियावादियों से हर प्रकार की मदद लेकर ही क्रांतिकारी आंदोलन को पूरी तरह रौंद डालने के लिए ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के तीसरे चरण की योजना को लागू किया जा रहा है. ‘घेरा डालो-विनाश करो’ अभियान हो या किसी भी प्रकार के दमनात्मक अभियान, सरेंडर पॉलिसी हो या मनोवैज्ञानिक लड़ाई के बतौर दुष्प्रचार चलाने की पॉलिसी, चाहे विभिन्‍न प्रकार के तथाकथित सुधार कार्यक्रम हो या तथाकथित विकास का ढोल पीटने का कार्यक्रम- सभी में मोदी सरकार द्वारा आमूल-चूल बदलाव लाया गया है. मोदी सरकार गद्दी पर बैठते न बैठते ही माओवादियों को उखाड़ फेंकने की घोषणा की. और ज्यादा संख्या में अर्द्ध सैनिक बलों के बटालियनों को माओवादी इलाके में तैनाती की जा रही है. फिर ‘अपनी ही उंगलियों से अपनी आंखें फोड़वाने’ की चरम प्रतिक्रियावादी नीति के तहत कहीं ‘बस्तारिया बटालियन’ तो कहीं ‘पहाड़ी बटालियन’ या ‘स्थानीय आदिवासी बटालियन’ का गठन कर ‘आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ लड़वाने’ जैसी प्रतिक्रियावादी एलआईसी पॉलिसी को बहुत वफादारी के साथ लागू किया जा रहा है.

दूसरा घृणित तरीके के बतौर यूपीए सरकार द्वारा अपनायी गयी सरेण्डर या आत्मसमर्पण पॉलिसी को उसके कथनानुसार ‘और लुभावना’ बनाने के लिए पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा रूपए मिलने का लोभ-लालच दिया जा रहा है. कामरेड व कार्यकर्ताओं के घर-परिवार के लोगों पर आत्मसमर्पण करवाने का दबाव दिया जा रहा है और न करने पर जुल्म सहना होगा व जेलखाना में सड़ना होगा की धमकी भी दी जा रही है, बुरी तरह से कुर्की-जब्ती की कार्रवाई चलाई जा रही है.

उपरोक्त तमाम क्रांति-विरोधी पॉलिसियों का मुकाबला करने के लिए हमारा पहला व प्रधान काम है, सीसी से एसी व जन संगठनों के नेतृत्व तक रक्षा करना, पार्टी को और बोल्शेवीकरण करना तथा दुश्मन के चौतरफा हमले का मुकाबला चौमुखी जवाबी हमला के जरिए करने के लिए पूरी पार्टी कतार व लड़ाकू जनता को हर प्रकार से शिक्षित-दीक्षित करना व और बेहतर प्रतिरोधी कार्रवाई चला सके, इसलिए सैनिक प्रशिक्षण बढ़ाएं ताकि जवाबी हमले को सही मायने में जनयुद्ध के रूप में बदल दिया जा सके. हमें अवश्य-ही राजनीतिक-सांगठनिक व सैनिक तैयारियों के काम को एक अभियान के बतौर आगे बढ़ाना होगा, सैनिक हमले का जवाबी प्रतिरोधी लड़ाई, दुष्प्रचार का जवाबी प्रचार अभियान व ज्वलंत जन-समस्याओं को लेकर जन-आंदोलन का निर्माण आदि के लिए हमें जी-तोड़ प्रयास चलाना होगा. साथ ही साथ तमाम प्रगतिशील-जनवादी शक्तियों सहित ब्राह्मणीय हिन्दुत्व फासीवादी शक्तियों के खिलाफ तमाम मित्र शक्तियों से मिलकर आंदोलन के निर्माण के लिए प्रयास करते रहना होगा. अखिल भारतीय स्तर पर यथासंभव शीघ्र एक संयुक्त मोर्चा या विशाल मंच का गठन कर देश की जनता के सामने रखने की जरूरत हे.

कामरेडों, भारतीय क्रांति की अग्रगति के अगले दौर को भारी चुनौतीभरी परिस्थिति का सफलतापूर्वक मुकाबला करके ही हम आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए हमें हर प्रकार की चुनोती का मुकाबला करने हेतु सभी प्रकार की तैयारियों को पूरी करनी होगी. इसका मतलब है, उल्लिखित जितने किस्म की कर्तव्यों की बातों का जिक्र किया गया है तथा उसे पूरी तरह से कार्यान्वित करना हमारा फौरी व अहम्‌ कर्तव्य है.

ऐसा करके ही हम क्रांति के तीन जादुई हथियार यानी पार्टी, जनसेना व संयुक्त मोर्चा के निर्माणों को सुदृढ़ व लगातार मजबूती प्रदान कर सकते हैं. हमें याद रखना है कि पार्टी को सही अर्थ में बोल्शेवीकरण किये बिना एक कदम.भी हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं. आवें, हर प्रकार की कमी-कमजोरी को केवल कथनी में ही नहीं, करनी में दूर हटाने के लिए संकल्पबद्ध हो जाएं और पार्टी की अन्दरूनी एकता को आंख की पुतली जैसी रक्षा करते हुए उसे और मजबूत बनाएं तथा हर प्रकार के संशोधनवाद, चाहे ‘वाम’ संशोधनवाद हो या दक्षिण, उसे परास्त करते हुए पार्टी की सही लाइन, नीति व कार्यशैली का दृढ़तापूर्वक अनुसरण करें.

निस्संदेह, रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा, कठिन व जटिल है, पर मालेमा (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) व पार्टी लाइन पर अडिग रहने से हम सारी बाधाओं को लांघते हुए भारत की नई जनवादी क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए आधार इलाकों के निर्माण के लिए ‘गुरिल्ला युद्ध को चलायमान युद्ध’ में बदल डालो, ‘पीएलजीए को पीएलए’ में बदल डालो’ जैसे अहम्‌ व फौरी कर्तव्य को तेज गति से आगे बढ़ा सकते हैं.

आवें, महान शहीदों के अधूरे कायों व सपनों को पूरा करने हेतु साहस के साथ वर्गयुद्ध के मैदान में कूद पड़ें.

इतिहास गवाह है कि अन्तिम जीत जनता की ही होगी. रात के अंधेरे के बाद भोर का उजाला होगा ही. भारतीय क्रांति सफल होगी ही यानी पहले नव जनवादी क्रांति और इसके तुरन्त बाद समाजवादी क्रांति भी सफल होगी ही.

रूसी क्रांति की सौवीं वर्षगांठ के तात्पर्य को सही मायने में केवल भारत की नई जनवादी क्रांति में तेजी लाकर व उसे सफल बनाकर ही तथा क्रांति का अगला कदम समाजवादी समाज की स्थापना की ओर आगे बढ़ाकर ही सही रूप से मनाया जा सकता है. यही पार्टी का आहवान है.

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