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Home कविताएं

डर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 29, 2022
in कविताएं
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वह
पोस्टर से डरता है
कार्टून से डरता है
धरना प्रदर्शन से डरता है

डर का हौवा कुछ इस क़दर है
कि ऊंची ऊंची बाड़ें खड़ा करता है
खंदक खुदवाता है
ट्रैक्टर ट्राली न चले
सड़कों पर कीलें ठुकवाता है
बिना बहस, बिना तर्क कानून बनाता है
बने क़ानूनों को अपने
अपने हित एवं हितैषी हितार्थ
बदल लेता है
कोई मौका
चरित्र हनन का
नहीं छोड़ता है
हर घटित अप्रिय घटना से
अपने उस डर से जोड़ता है

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आलम यह है
वह
कविता, कहानी से डरता है
स्कूल से
स्कूल के सिलैबस से डरता है
इतिहास उसका
उसके अतीत का पीछा नहीं छोड़ता
वह ऐसे इतिहास से डरता है
घटित घटनाओं के सच से कांपता है
लेकिन तब भी झूठा बताता है
शोध नहीं फ़ोटोशॉप करता है
बातें पलटता है, बातें बदलता है
अपने ही कहे से यू टर्न ले लेता है

रोज ब रोज इतिहास बदलने की बात करता है
हिस्ट्री उस के लिए हिस्ट्री नहीं
हैरिश पोट्टर की तिलस्मी स्टोरी है
इतिहास का हर पन्ना उसके लिए
कम्युनिस्ट इतिहासकारों की साजिश है
इतिहासकार उसके लिए उसके मन मुताबिक़
पत्र का पत्रवाहक हरकारा है
और इस इतिहास के समांतर
एक दूसरा इतिहास रचा चाहता है

समाजवाद लोहिया का हो
या मार्क्स का, उसके लिए एक प्रमादी प्रलाप है
गांधी उसके लिए रामनामी चादर है
मस्खरी शामियाना है
जिसे जहां चाहे गाड़ लेता है
सुरक्षा के सख्त पहरे में भी बेचारे को
पल पल कत्ल का डर सताता है
लगातार सोचता रहता है
हो न हो कहीं न कहीं
उसे मारने की साजिश रची जा रही है

प्रोफ़ेसर वक़ील पत्रकार
कलाकार बुद्धिजीवी चित्रकार….
सब उसे उस साजिश के हिस्सेदार लगते हैं
उसे किसान किसान नहीं
मजदूर मजदूर नहीं
छात्र छात्र नहीं लगते
सब के सब असामाजिक तत्वों द्वारा
बहकाये नक़ली लोग लगते हैं

अपने किराये के ढिंढोरचियों से रात दिन
खूब ढोल पिटवाता है
हर मंच से युवाओं की
युवा ताकतों की, बडी बडी बातें तो करता है
और मंच से उतरते ही उसे हर युवा चेहरा
मवाली लगने लगता है
बेरोज़गारों पर लाठियां चलवा देता है
झूठे मुक़दमे दर्ज करता है

उसे यहूदियों से डर लगता था
इसे मुसलमान, नसरानियों से डर लगता है
वह हिब्रू से डरता था
इसे उर्दू से
उर्दूवाले नामों से डर लगता है
जब भी जागता है
नाम मिटाने, नाम बदलने की बात करता है

ईडी के छापे को सर्वे बताता है
तोता बनाये सीबीआई को आज़ाद कहता है
पक्षपाती अदालत को निष्पक्ष लिखता है
तमाम प्रायोजि तंत्र उसका डर छुपाता है

लेकिन डर तो डर है
डर कभी न कभी, कहीं न कहीं से उभर ही आता है
और कपूर की तरह हवा में चारों तरफ फैल जाता है

  • राम प्रसाद यादव

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