वसुधा, निक नेम से प्रकाशित इस कहानी की लेखिका का असली नाम विजयलक्ष्मी उर्फ भूमिका है. वे तेलंगाना आंदोलन के समय माओवादी आन्दोलन से जुड़ीं. यह दुखद इत्तेफाक है कि विजयलक्ष्मी उर्फ भूमिका 21 मई 2025 को सीपीआई माओवादी के महासचिव वासवराज के साथ एनकाउण्टर में ही खुद भी शहीद हो गयी. उसके बाद ही उनका असली नाम और उनकी फोटो दुनिया के सामने आई. अजीब संयोग है कि इस कहानी में उन्होंने एनकाउण्टर के स्थल का जा व्योरा दिया है, उनके एनकाउण्टर के बाद भी वैसा ही विवरण मीडिया में लोगों के सामने आया – सम्पादक

शाम के करीब सात बजे होंगे. मैं कंप्यूटर पर काम करने में व्यस्त थी.
‘हैलो ऑफिसर, आपका काम कैसा चल रहा है?’
यह सुनकर मैंने सिर उठाकर ऊपर देखा. वे कॉमरेड गंगाधर थे.
‘मुझे ‘ऑफिसर’ मत कहो कॉमरेड ! क्या मैं गुरिल्ला जैसी नहीं दिखती?’
मैंने मुंह घुमाते हुए कहा उन्होंने हंसते हुए सफाई दी-
‘मैंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि सेना में सभी वरिष्ठ अधिकारियों को केवल पिस्तौल मिलती है. वे एके या एसएलआर नहीं रखते.’
‘अच्छा ठीक है गंगाधर, पत्रिका का काम पूरा हो गया है. आप इसकी समीक्षा कब करेंगे? आप अपनी राय और सुझाव नहीं देंगे? पहले बताइये कि आपकी फाइनल परीक्षा कैसी रही? पास हो गये?’
गंगाधर ने रोक कर जवाब दिया- ‘रुको, कॉमरेड ! क्विज की तरह सवाल क्यों पूछ रही हो? मुझे जवाब देने दो! मैंने तैयारी कराने और पढ़ाने में बहुत मेहनत की है. मैं कैसे बता सकता हूं? क्या ये अच्छा नहीं होगा कि आप उन लोगों से इस बारे में पूछें, जो मेरी क्लास में शामिल थे?’
‘कॉमरेड्स, खाना तैयार है, आप अपनी चर्चा बाद में जारी रख सकते हैं, लेकिन अभी जाकर खाना खाएं,’ बुदरी ने आवाज लगाई.
मैंने एक प्लेट पकड़ी और रसोई की ओर भागी. उस समय वहां एक चर्चा चल रही थी. कुछ लोग कह रहे थे, ‘वे सितारे नहीं हैं, बल्कि टॉर्च की लाइट है,’ जबकि अन्य कुछ लोग जोर देकर कह रहे थे, ‘नहीं, वे पक्का सितारे ही हैं.’ मैं पांच दिनों से सोई नहीं थी, इसलिए अपनी धुंधलाई आंखों के साथ मैंने जल्दी से खाना खाया और रसोई से खिसक गई.
सब्जी लेने गए साथी रात के करीब नौ बजे वापस लौटे. तभी रामगुड़ख गांव के दो दादा भी आ पहुंचे.
‘एक आदमी दस्ते से मिलने आया था. वह गांव में है. क्या हम उसे यहां लेकर आ जाएं?’ दादा लोगों ने स्थानीय साथी से पूछा. स्थानीय साथियों ने यह बात वरिष्ठ नेता कामरेड समर दादा से बताया. यह संदेश वरिष्ठ नेता कामरेड रूपेश दादा तक भी पहुंचा. दोनों ने आगंतुक के बारे में सोचा. ‘वह तय जगह एपीटी पर जाने के बजाय यहां क्यों आया? और वह भी इस समय?’ दोनों ने आगंतुक के बारे में सोचा और रामगुड़ा दादा लोगों के पास संदेश भेजा-
‘उसे आज रात अपने पास रहने दो.’
हमेशा की तरह, रसोई का काम रात एक बजे शुरू हुआ. सुबह साढ़े चार बजे सभी साथियों ने उठकर अपने दांत साफ किए. मैं भी उठी, लेकिन वह अभी भी अपने रिचार्जेबल लैंप की रोशनी में लिख रहा था. सुबह के 5 बज रहे थे और साथी चाय पी रहे थे. मैं उठी, अपने दांत साफ किए, चाय पी और शौच के लिए तैयार हो गई. तभी, प्लाटून का साथी गश्त से लौटा और बोला-
‘स्थिति सामान्य लग रही है’ इसलिए मैं उस पहाड़ी की ओर चल पड़ी, जहां पिछली रात रोशनी देखी गई थी.
रास्ते में एक महिला साथी ने मुझे सलाह दी- ‘अकेले क्यों जा रही हो? किसी को साथ ले लो.’
मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई. जब मैं वापस लौटी, तो मैंने रोल-कॉल की सीटी सुनी. दो मिनट बाद गोली चलने की आवाज आई. मुझे लगा कि शायद मिसफायर हुआ होगा. इसके तुरंत बाद ऑटो-फायर की आवाज आई. यह मिसफायर नहीं था, बल्कि निश्चित रूप से पुलिस की गोली की आवाज थी. इससे पहले कि मैं किसी नतीजे पर पहुंच पाती, मैंने महसूस किया कि लोग भाग रहे हैं और मेरे पीछे पेड़ हिल रहे हैं. मैं भी तेजी से भागने लगी. दौड़ते हुए पहाड़ी से नीचे उतरना मेरे लिए आसान नहीं था. मैं दो-तीन बार लड़खड़ाई और गिरी, फिर उठी और भागती रही. ऐसा लगा, जैसे पुलिस मेरा पीछा कर रही है. मैं पहाड़ी से नीचे उतरी और एक पुल पर पहुंची. कैंप और आसपास के इलाकों में गोलियों की आवाज हवा में गूंज रही थी. यह सोचने का समय ही नहीं था, कि क्या करना है. पहले भी एक बार मैं गोलीबारी के दौरान अकेली रह गयी थी. मैंने ठान लिया कि इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए, किसी तरह मुझे अपने सेक्शन में वापस जाना है. पुल से कैंप की ओर जाने वाले रास्ते पर जैसे ही मैंने कुछ कदम आगे बढ़ाए, मैंने देखा कि पुलिस बल, गोलियां चलाते हुए नदी की ओर बढ़ रहे हैं. इसी बीच, कैंप से दस-पंद्रह मिलिशिया साथी दौड़ते हुए उस पुल की ओर आए, जहां मैं खड़ी थी. कैंप क्षेत्र के अंदर गोलियों की तड़तड़ाहट हो रही थी. यह स्पष्ट हो गया कि मैं कैंप में नहीं जा सकती थी.
मैं सिर्फ और सिर्फ गोलियों की बौछार सुन सकती थी. मैं मिलिशिया साथियों के साथ भागी. नदी किनारे मौजूद पुलिस बल ने अपनी गति बढ़ाते हुए हमें निशाना बनाया. वे गोलीबारी करते हुए आगे बढ़ते रहे. लेकिन, हमारे बीच बड़ी नहर होने के कारण वे हम तक नहीं पहुंच सके. हालांकि, इससे उन्हें अनगिनत गोलियां चलाने से नहीं रोका जा सका. मेरे आगे भाग रहे सभी मिलिशिया साथी निहत्थे थे और मेरे पास एक पिस्तौल थी. सांस लेने में तकलीफ से जूझते हुए मैंने सोचा कि गति धीमी होने के बाद में पिस्तौल लोड कर लूंगी. हम सभी रामगुड़ा गांव पहुंच गए. मैं तब तक पीछे रह गई थी. एक घर के सामने मैं यह सोचकर बैठ गई कि आगे बढ़ने से पहले मैं अपनी सांसें संभाल लूं. कोई भी मिलिशिया साथी दिखाई नहीं दे रहा था. सभी गांव वाले घबराए हुए थे, मैंने किसी भी कीमत पर गांव में न रुकने का फैसला किया और तुरंत उठ खड़ी हुई. लेकिन, मुझे पता नहीं था, कि कहां जाना है. सुरक्षित भागने के सभी रास्ते अब पुलिस के नियंत्रण में थे.
मैं जिस भी दिशा में जाती, नदी बीच में आ जाती, इसलिए मैं नदी की ओर भागी. दो युवा मिलिशिया सदस्य डोंगा (एक छोटी नाव, जो आमतौर पर गोल आकार की होती है, जिसका उपयोग नदियों में आने-जाने के लिए किया जाता है) शुरू कर रहे थे. मैं उनके पास गई और पूछा-
‘कॉमरेड्स, मुझे भी अपने साथ ले चल सकते हो?, ले चलोगे?’
लेकिन उन्होंने मना कर दिया. दूसरे किनारे पर पुलिस हमें देख रही थी और हम पर गोलियां चला रही थी. जब उन्होंने मुझे डोंगा में बिठाने से मना कर दिया, तो मैं वापस मुड़ गई. मुश्किल से पांच या छह कदम ही मैं चली थे कि नाव पर सवार दो कॉमरेड नजरों से ओझल हो गए. मैं अपना दुख रोक नहीं सकी… रोते हुए मैं भागी, मेरे दिमाग में उन दोनों के चेहरे घूम रहे थे, जिनसे मैंने अभी कुछ देर पहले ही बात की थी. कुछ दूर चलने के बाद मेरी मुलाकात उस आदमी से हुई, जो पिछली रात कॉमरेड समर दादा से मिलने आया था. मैं उसे जानती थी, क्योंकि वह दस्ते से मिलने पहले आ चुका था. उसने मुझसे पूछा- ‘अक्का आप ठींक हैं?’
‘हां, लेकिन इस समय तुम यहां कैसे?’ मैंने उससे पूछा. ‘मैं समर दादा से मिलने आया था, गांव में उनसे बात करते समय गोलीबारी शुरू हो गई, इसलिए दादा और दूसरे लोग वहां से चले गए.’
मुझसे बात करते समय वह अपने टैबलेट पर गोलीबारी का वीडियो बना रहा था.
‘गोलीबारी इतनी तेज है और आप इस समय वीडियो बना रहे हैं? अगर आप हमारे साथ रहेंगे, तो वे आपको जरूर मार देंगे, देर करना खतरनाक है, चलिये चलते हैं।’ मैंने उनसे आग्रह किया.
उसने कहा- ‘नहीं, अक्का! मैं नहीं आऊंगा. मैं आपके साथ नहीं चल सकता. आप भी अब कहां जाएंगी? आप भी गांव में ही रहिये.’
‘आपका दिमाग खराब हो गया है क्या? अपने पीछे देखिए- कितनी पुलिस है! वे पहले ही गांव में घुस चुके होंगे. जितनी जल्दी हम यहां से निकल चलें, उतना ही अच्छा है.. बहस मत करो, चलो अब चलते हैं.’ मैंने दृढ़ता से कहा.
‘मुझे डर लग रहा है, अक्का. मैं उनके पास जाकर आत्मसमर्पण कर दूंगा. मैं अपने हाथ ऊपर उठा रहा हूं. उन्हें पहले ही पता होगा कि मैं आपसे मिलने आया हूं.’ उसने कायरता दिखाते हुए हकलाते हुए कहा.
‘पार्टी के साथ इतने सालों के रिश्ते के बाद आपने क्या सीखा है? आप कैसे कह सकते हैं कि आप आत्मसमर्पण करेंगे? हमें ऐसे समय में अपनी जान देने के लिए तैयार रहना चाहिए… आप उस पार्टी को धोखा देने जा रहे हैं जिसने आप पर भरोसा किया? अगर आप आत्मसमर्पण करते हैं, तो वे आपसे उन नेताओं के बारे में पूछताछ करेंगे, जिन्हें आप जानते हैं और ये भी आप यहां क्यों आए थे. पार्टी को धोखा देने का मतलब है लोगों को धोखा देना… इस बारे में सोचो’.
मैंने कहा और निकल गयी.
एक छोटी पहाड़ी से मैं नीचे उतरी और नदी के करीब गई. मैंने अपनी पिस्तौल लोड की. नदी के पास कुछ झाड़ियों के बीच छिपकर मैंने देखा और वहीं दुबक गई. घुटनों के बल में लंबे समय तक नहीं बैठ सकती थी, इसलिए मैं खड़ी हो गई. कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था. दूसरे किनारे पर, मैंने ग्रामीणों को देखा, लेकिन मैं उन्हें कैसे बुलाती? अगर मैं जोर से पुकारती, तो दुश्मन सुन सकता था और आ सकता था, लेकिन अगर मैं नहीं पुकारती, तो यह मौका हाथ से निकल सकता था. तभी मैंने पहाड़ी पर पैरों की आवाज सुनी. मुझे लगा कि दुश्मन होगा, और मैं सतर्क होकर खड़ी हो गई कि अगर दुश्मन हुआ, तो मैं गोली चलाउंगी. तीन तरफ, मैं नदी से घिरी हुई थी, चौथी तरफ दुश्मन सेना. उस स्थिति से पीछे हटने का मतलब था, पानी में जाना. इसलिए मैंने दुश्मन के करीब आने पर गोली चलाने और मरने का संकल्प लिया. लेकिन पदचाप मेरी तरफ बढ़ती हुई सुनाई नहीं दी. मैंने राहत की सांस ली और नदी के पास पहुंच गई. मैंने दूसरी तरफ के ग्रामीणों को पुकारा. वे सब इधर-उधर देखने लगे, लेकिन कोई भी मदद के लिए नहीं आया. मैं आधे घंटे तक नदी के किनारे खड़ा रही. मुझे देखकर भी लोगों की ओर से कोई प्रतिक्रिया न मिलने से निराश होकर मैं किनारे पर टहलती रही. सुबह-सुबह पुलिस ने डोंगा पर गोली चलाई थी, शायद इसी वजह से वे डरे हुए थे.
तभी मैंने देखा कि दो आदमी डोंगा पर जा रहे हैं. मैं दौड़कर चिल्लाई, ‘दादा, मुझे भी साथ ले चलो.’
वे और तेजी से भागे. मैं निराश होकर रुक गई. जैसे ही वे नदी पार कर गए, एक और डोंगा मेरी ओर आया.
‘दीदी, जल्दी चढ़ो,’ दादा ने नाव मेरे सामने रोककर कहा
मैं तुरंत नाव में चढ़ गई. जैसे ही हम दूसरे किनारे पर पहुंचे, उन्होंने मुझे जल्दी से नीचे उतरने को कहा जैसे ही मैं नाव से उतरी, मेरी पिस्तौल गलती से चल गई.
‘ओह नहीं! मैंने कितनी बड़ी गलती कर दी’ मुझे बहुत पछतावा हुआ. अगर दुश्मन ने यह गोलीबारी सुनी, तो मैं और गांव वाले दोनों खतरे में पड़ जाएंगे.
‘अब क्या करूं?’ अभी मैं यह सोच ही रही थी कि स्थानीय लोगों ने जल्दी से मुझे सलाह दी-
‘दीदी, बेहतर होगा कि तुम यहां से निकल जाओ और कहीं और चली जाओ. अगर पुलिस ने गोली की आवाज सुनी, तो वे आ सकते हैं… तुम जितनी जल्दी यहां से निकल जाओ, उतना अच्छा है.’
उन्होंने मुझे दूसरे डोंगे में चढ़ने में मदद की. करीब दस मिनट बाद मैंने पीछे मुड़कर देखा. मेरे साथ मिलिशिया के तीन और साथी थे, जिनके बारे में मुझे लगा था कि वे पुलिस की गोलीबारी में मारे गए होंगे, उन्हें सुरक्षित देखकर मैं हैरान थी. मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे बच निकले. उन्होंने दुखी होकर जवाब दिया-
‘जैसे ही पुलिस ने डोंगा पर गोली चलाई, हम नदी में कूद गए, डोंगा को पकड़ लिया और तैरकर बाहर निकल आए. हम आपको अपने साथ नहीं ले गए, क्योंकि हमें लगा कि आप मुसीबत में पड़ सकती हैं दीदी.’
मुझे राहत मिली कि वे बच गए और जीवित थे.
जब तक मैं उस घर में पहुंची, जहां मैंने शरण ली थी, तकरीबन 10 बज चुके थे. पहुंचने पर घर की अक्का ने मुझे कुछ सादे कपड़े दिए, जबकि घर के दादा ने मेरे जूते और पिस्तौल ले लिए और उन्हें कहीं छिपा दिया. उन्होंने मुझे जो कपड़े दिए, उन्हें पकड़कर मैं वहीं खड़ी ही थी, कि दो गोलियों की आवाज सुनाई दी. वैसे ही खड़े-खड़े मैं सोच रही थी, कि किसे गोली लगी है. मैं साड़ी पहन ही नहीं सकी. अक्का ने मेरी हालत देखी और आकर साड़ी पहनने में मेरी मदद की. उन्होंने और परिवार के अन्य सदस्यों ने मेरे और मेरे साथ आए मिलिशिया साथियों के लिए खाना बनाया.
उसने मुझे संतूर साबुन की एक नई टिकिया देते हुए कहा- ‘जाओ नहा लो दीदी.’ मैं बेचैन थी, इसलिए मैं जाकर बरामदे में बैठ गई. परिवार के सदस्यों ने एक प्लेट में खाना परोसा और मुझसे खाने का अनुरोध किया. मुझे कोई भूख नहीं थी और मैं मुश्किल से निवाला निगल पा रही थी. मैं सिर्फ गोलीबारी के बारे में सोच रही थी. सोच रही थी कि दस्ते में सभी लोग कैसे होंगे, कौन घायल हुआ होगा और वे कितनी बुरी तरह घायल हो सकते हैं. इन सब के बारे में सोचने लगी, तो मेरे गालों से आंसू बहकर प्लेट में गिरने लगे. इस हालत में मुझे यह भी पता नहीं चला कि मिलिशिया के साथी कब खाना खाकर चले गए.
मैं उस खाने का क्या कर सकती थी? इन लोगों ने इस थाली के लिए कितना काम किया होगा? मुझे साथियों की वो सलाह याद आ गई, जो कैंप में खाना फेंकने वालों को दी जाती थी. लेकिन इस बार मैं खाना नहीं खा सकी, मैं घर के पीछे गई, खाना जमीन पर फेंका, थाली धोई और आंगन में नदी की ओर देखते हुए बैठ गई. साढ़े बारह बजे के करीब घर का मुखिया रेडियो पर खबर सुनकर आया. उसने मुझसे कहा-‘दीदी, खखबर में कहा गया है कि हमारे 21 लोग मारे गए हैं’ यह सुनते ही में टूट गई. पूरा परिवार और पड़ोसी आंगन में इकट्ठा हो गए और गोलीबारी पर शोक प्रकट करने लगे. कुछ ने कहा कि उन्होंने पहले कभी इतने लोगों को एक साथ मारे जाने के बारे में नहीं सुना था, दूसरों ने जोर देकर कहा कि सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर गोलीबारी की गई थी. कुछ युवा गुस्से में थे और अपने शहीद साथियों का बदला लेने की कसम खा रहे थे. दोपहर करीब एक बजे हेलीकॉप्टर की आवाज ने हम सभी को चौंका दिया.
‘दीदी, घर के अंदर चलो,’ उन्होंने चिंतित होकर मुझसे आग्रह किया. हेलिकॉप्टर नदी के किनारे उतरा, जहां सुबह गोलीबारी हुई थी.
तभी मुझे एहसास हुआ, कि मैं जहां थी, वहां से कैंप साफ दिखाई दे रहा था. एक और हेलीकॉप्टर हवा में मंडरा रहा था. मैं समझ गई कि वह गश्त कर रहा है. सिर्फ नदी ही हमें अलग कर रही थी. हेलीकॉप्टर ने लगभग पंद्रह मिनट में अपना काम पूरा किया और वापस आसमान में चढ़ गया. मैं वहीं बैठी, कैंप की दिशा में देखती रही और रोती रही. घर की महिला ने कहा-
‘दूसरे गांव से एक दादा आए हैं.’ में अपनी अचेत अवस्था से बाहर आई और उनसे बात की. उन्होंने बताया-
‘दीदी, हमारे कुछ साथी पास के गांव में हैं.’
उन्होंने यह नहीं बताया कि वे कौन लोग थे, लेकिन मैं उनसे जल्द से जल्द मिलने के लिए उत्सुक थी. ठीक तीन बजे समर दादा का एक पत्र आया. मैंने उसे पढ़ा. पत्र में लिखा था- ‘जिसने तुम्हें यह पत्र दिया उस साथी के साथ आ जाओ, मिलकर सारी बात करेंगे.’ पत्र की एक लाइन ने मुझे हिम्मत से भर दिया. मैं तुरंत उठी, उस परिवार को सलाम किया जिसने मुझे आश्रय दिया था और जाने के लिए तैयार हो गई. वे मुझे जाते हुए देखते रहे और कहते रहे- ‘सावधान रहना दीदी.’ लोगों की उदारता के लिए मेरा दिल कृतज्ञता से भर गया.
जब मैंने समर दादा को देखा, तो मुझे बहुत खुशी हुई, लगा जैसे मैं पूरी टुकड़ी से मिल रही हूं. उनके साथ गार्ड और स्थानीय साथी थे, जिनमें राजन्ना भी शामिल थे. समर दादा ने मुझसे पूछा, ‘तुम गोलीबारी से कैसे बच निकली?’ मैंने संक्षेप में अपनी वापसी और यात्रा के बारे में बताया.
शाम के करीब चार-पांच बजे दोनों हेलीकॉप्टर फिर आए, जैसे पहले आए थे. एक उतरा और दूसरा इलाके में गश्त करता हुआ, करीब पंद्रह मिनट बाद चला गया. इससे ऐसा लग रहा था कि फायरिंग स्क्वॉड को वापस भेजकर वे नया जत्था लेकर आए हैं. हम सब कुछ देर चुपचाप बैठे रहे. खबर से यह तो पक्का हो गया था, कि कैंप में मौजूद हम अस्सी से ज्यादा लोगों में से 21 लोग फायरिंग में शहीद हो गए हैं. लेकिन बाकी लोगों का क्या हुआ? समर दादा लोगों से उन सबके बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश करते रहे. इसी बीच भीषण फायरिंग से बचकर भागा एक साथी उस गांव में पहुंचा और उसने जो कुछ देखा, वो सबको बताया-
‘कैंप पर दूसरे राउंड की फायरिंग के दौरान जब हम एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर जा रहे थे, प्रसाद, मुन्ना, लता, ममता, टाटा, मधु, किरण, दया, ज्योति और रजिता सभी शहीद हो गए. बाकी लोगों का तो पता नहीं, लेकिन कुछ लोग घायल हो गए. रूपेश दादा के पैर में गोली लगी थी.’
रूपेश दादा के जिंदा होने की खबर से हमें थोड़ी राहत मिली. लेकिन दूसरों को खो देने की खबर ने हमें दुःख से भर दिया.
कामरेड ने आगे बताया- ‘दादा, घायलों को बहुत खून बह रहा है और वे बहुत तकलीफ में हैं.’
यह सुनकर समर दादा ने उनके स्थान का व्यौरा हासिल किया और उन्हें उस खतरनाक स्थान से हटाने का निर्णय लिया. उन्होंने सभी विकल्पों पर विचार किया और सावधानीपूर्वक योजना बनाकर वे उस जगह पर पहुंचे जहां घायल कामरेड रूपेश दादा और अन्य लोग मौजूद थे, तब तक रात के ग्यारह बज चुके थे. रूपेश दादा और पांच अन्य लोगों को वे वापस ले आए. रूपेश दादा को जीवित देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और मेरे दिल को हौसला मिला. मैं उनसे पूछना चाहती थी कि उन्होंने दुश्मन का मुकाबला कैसे किया, जबकि वे हमारे नुकसान और दुश्मन की घेराबंदी के बारे में चर्चा कर रहे थे. अपने विचारों को परे रखकर मैं दूसरों की तरह उन्हें सुनती रही. उनमें से हर एक को गोली लगी थी और उनके घावों से अभी भी खून बह रहा था. हालांकि उन्होंने अपने घावों पर कसकर रूमाल बांध रखा था, फिर भी खून बहना बंद नहीं हुआ था. राजन्ना ने स्थानीय लोगों के पास उपलब्ध दवाओं से सभी का इलाज करना शुरू कर दिया. जब उन्होंने मेरी मदद मांगी, तो मैं उनके पास गई. उनके जख्मों को देखकर मैं डर गई. पहली बार मैंने इस तरह के गंभीर घाव देखे थे. एक साथी की जांघ बुरी तरह से जख्मी थी, दूसरे के फेफड़ों के नीचे एक बड़ा छेद था, क्योंकि गोली उसकी पसलियों में घुस गई थी.
बाकी लोगों को घुटनों के ऊपर, जांघ के क्षेत्र में गोली लगी थी. रूपेश दादा के घुटने के नीचे एक गोली लगी थी. यह देखते हुए कि वे इतनी गंभीर जख्मों के बावजूद मौत को मात दे रहे थे, मैंने अपने डर पर काबू पाने का निश्चय किया. मैंने घावों का इलाज करने में राजन्ना की सहायता करनी शुरू कर दी. हम रात भर चलते रहे, भोर होते-होते एक अलग शिविर में पहुंच गए. यह सर्दी के मौसम की शुरुआत ही थी. बालीमेला नदी हमारे बगल में बह रही थी. हम लगभग तीस लोग थे. गोलीबारी के दौरान सब कुछ खो देने के बाद, हमारे पास जमीन पर बिछाने या ओढ़ने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. यहां की भयंकर सर्दी के बारे में जानने वाले लोगों ने हमें शॉल और कंबल दिए थे. लेकिन वे पतले और हल्के ठंड की चादरें यहां की ठण्ड का मुकाबला नहीं कर सकीं. हमने ठंडी और कठोर जमीन पर पत्ते बिछाए और उन पर लेट गए, खुद को शॉल में कसकर लपेट लिया. फिर भी कड़ाके की ठंड हमारी हड्डियों को कुतर रही थी, हम सभी के मन में रामगुडा के बारे में ही विचार थे और हर चेहरे पर दुख की लकीरें उभरी हुई थीं. गोलीबारी की भयावह तस्वीरें मेरे दिमाग में लगातार घूम रही थीं.
मैं पल भर की झपकी ले रही थी, तभी मुझे लगा कि कोई मुझे पुकार रहा है-
‘वसुधा, संतरी ड्यूटी.’ मैं चौंककर उठी, लेकिन आग के पास मौजूद साथियों के बीच बाबई (चाचा) को नहीं देखा. मैंने खुद को आश्वस्त किया, ‘बाबई अब तक सुरक्षित तरीके से पीछे हट गए होंगे.’ लेकिन मेरे भीतर अभी भी एक बेचैनी थी. मैं विश्वास करना चाहती थी, कि वह सुरक्षित रूप से पीछे हट गए हैं. मैंने कल्पना में उन्हें वह सब कुछ बताया, जो हुआ था, खासकर मेरे पीछे हटने के बारे में. काश मैं उन्हें अभी देख पाती, तो अपना सारा दर्द उड़ेल देती, आंसुओं को खुलकर बहने देती और अपने दिल पर रखे भारी बोझ को उतार देती. हालांकि बाबई को आंसू पसंद नहीं थे और रोने का नाम सुनते ही वे गुस्सा हो जाते थे, लेकिन मुझे लगा कि वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके सामने मैं खुले भाव से अपना दिल खोल सकती हूं. मेरे दिमाग में उनकी कई तरह की यादें आईं. उनके शब्द, ‘रोना कायरता है’ मेरे दिमाग में कौंध गया और मुझे और जोर से रोना आया.
मैंने ये सोचना जारी रखा कि उन्हें कुछ नहीं हुआ होगा और वे जल्द ही मुझसे मिलेंगे. कई तरह के ख्यालों ने मेरे दिमाग पर कब्जा कर लिया. कॉमरेड जगन, जो गोलीबारी के दौरान बाबई के साथ था, ने बताया कि उन्होंने बाबई को आवाज लगाई, ‘गंगाधर, चलो चलें.’
‘तुम जाओ, मेरे पैर में चोट लग गई है.. मैं थोड़ी देर में वहां पहुंच जाऊंगा,’ बाबई ने कहा था.
मैं उलझन में थी और समझ नहीं पा रही थी कि जगन ने सच कहा था या नहीं. अगर यह सच था, तो बाबई घायल तो होंगे, लेकिन जिंदा होंगे. मैं पूरे दिल से उम्मीद कर रही थी कि वे जिंदा होंगे.
‘ठंड नहीं लग रही क्या? आग के पास आओ,’ किसी ने आवाज दी, लेकिन मैं समझ नहीं पाई कि कौन है. मैं आग के पास चली गई. ठंड ने मेरे कानों को दर्द से सुन्न कर दिया था, लेकिन वह दर्द हमारी क्षति की पीड़ा के सामने कुछ भी नहीं लग रहा था.
सुबह होने वाली थी. हममें से कोई भी ठीक से सो नहीं पाया, लेकिन भोर हो चुकी थी. हमारे पास एक भी बर्तन और खाने की कोई चीज नहीं थी, इसलिए लोग हमारे लिए दो दिन का राशन, पकाने के बर्तन और खाना दे गए. मुख्यधारा के समाज में, जब किसी परिवार का सदस्य मुसीबत में होता है, तो उसके रिश्तेदार या सगे-संबंधी उसकी जरूरतों को पूरा करने और उसका साथ देने के लिए आगे आते हैं. हमारे पास इनमें से कुछ भी नहीं था, इसके बावजूद, हमें प्यार करने वाले लोग, जो हमारे वर्ग के थे, उन्होंने हमारे लिए सब कुछ व्यवस्थित कर दिया. अपने दुख को सहते हुए, सभी अपने कर्तव्यों के पालन में लग गये.
आठ बज रहे थे. पिछले दिन की तरह, हेलीकॉप्टर आसमान में उड़ रहे थे, पिछले दिन की गोलीबारी की दिशा में. उसके तुरंत बाद, गोलीबारी की आवाज गूंजी, जैसे किसी ने स्वचालित हथियार से गोली चलाई हो. कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या हुआ था और किसके साथ हुआ था. उस दिन की हाजिरी के दौरान, तीन डॉक्टरों की एक टीम की घोषणा की गई, उनमें से एक मैं थी. तुरंत मुझे लतक्का और टाटा की याद आ गई. जैसे ही वे किसी गांव में दाखिल होते, टाटा लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में पूछता, और आयुर्वेदिक इलाज करता. लतक्का महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में पूछती, उन्हें स्वास्थ्य से संबंधित स्वच्छता के बारे में सलाह देती, और एलोपैथिक दवाएं देती. उन दोनों ने अपनी चिकित्सा सेवाओं से लोगों की काफी सहायता की. सभी घायल साथियों के शरीर पर बहुत ज्यादा खून के धब्बे थे, इसलिए उन्होंने नहाया. राजन्ना के साथ, एक और साथी के साथ मैंने इलाज किया. जैसे ही सभी अपना काम पूरा करते, वे शहीदों को याद करते, शोक मनाते, और रोते. वे राज्य की क्रूरता और उसके अत्याचारों पर चर्चा करते हुए जोश से बोलते. अंधेरा छा गया. पिछले दिन की घटनाओं के बारे में सोचते हुए हममें से किसी ने भी ध्यान नहीं दिया कि क्या हो रहा है. उस रात फिर से गोलीबारी की आवाजें सुनाई दीं, लेकिन हमें यह समझ में नहीं आया कि कौन मारा गया है. 24 तारीख की रात की तुलना में यह रात दोगुनी उदासी के साथ गुजरी. हमें शहीदों की संख्या सिर्फ रेडियो और टीवी पर प्रसारित खबरों से ही पता चली.
पुलिस ने कैंप के आस-पास के इलाकों में हमारे लोगों को तलाश किया, जो मिल गया, उन्हें क्रूर यातनाएं दीं. यहां तक कि उन्होंने लाशों को क्षत-विक्षत भी कर दिया. हमें ये बातें टीवी और रेडियो प्रसारणों के जरिए पता चलीं. 26 तारीख को हमने समाचारों में सुना कि कॉमरेड गंगाधर मुठभेड़ में मारे गए हैं और उनका अंतिम संस्कार उसी शाम होगा. तब तक हमें उम्मीद थी कि वे पीछे हट गए होंगे और कहीं छिपे होंगे, लेकिन अब हमें एहसास हुआ कि बाबई शहीद हो गए हैं. तुरंत मुझे अपने पिता की याद आई. अपने प्यारे पिता को खोने के बाद मैंने उन्हें बाबई में देखा. क्रांतिकारी जीवन के बारे में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, जो मुझे पहले नहीं पता था. वे एक क्रांतिकारी गुरु थे, जिन्होंने मुझे गुरिल्ला जीवन और उसमें ढलने के तरीके के बारे में सिखाया. मुझे उम्मीद थी कि मैं उनसे इन सभी घटनाओं के बारे में बात करूंगी, लेकिन रेडियो समाचारों ने मुझे असहनीय दुख से भर दिया. मैं जानना चाहती थी कि बाहर के लोगों ने इस दुख को कैसे झेला होगा, उनकी जीवन साथी को इस खबर से कितना दर्द हुआ होगा. इस पितृसत्तात्मक समाज में जीवन की उम्मीद खो चुकी और मौत को ही अपना एकमात्र सहारा मानने वाली कई महिलाओं को गंगाधर ने जीवन का भरोसा दिलाया था. गंगाधर की शहादत उन सभी महिलाओं के लिए गहरा सदमा रही होगी, जो हिल गई थीं और हताश हो गई थीं. मेरा मन मुख्यधारा के समाज में रहने वाले सभी लोगों की ओर मुड़ गया.
***
बाद में हम अन्य लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. कैंप के रास्ते के दाहिनी ओर हमें एक लाश की गंध आ रही थी. हालांकि, हम कुछ देख नहीं पाए. कैंप में दाखिल होते ही हमने देखा कि खाना बनाने के हमारे बर्तन वहां पड़े थे. जब हम उनके पास से गुजरे तो देखा, कि हमारा सारा सामान एक जगह पर जमा कर आग लगा दी गई थी. उन्होंने सब कुछ इतनी बुरी तरह जला दिया था, कि एक भी सामान इस्तेमाल करने की हालत में नहीं था. हम उस दिशा में गए, जिधर से दुश्मन सबसे पहले कैंप में दाखिल हुए थे. यह पुराना रास्ता था, कैंप की ओर जाने वाला सीधा रास्ता. अगर कोई तारकोल वाली सड़क से करीब सौ मीटर अंदर आता, तो हमारे कैंप तक पहुंच जाता. यह साफ था, कि दुश्मन ने पास के हिस्सों की आड़ लेकर हमला किया होगा, जहां उस समय हाजिरी लग रही थी. फिर हम रसोई के पास नहर के बगल से रास्ता लेकर उस पहाड़ी पर चढ़े, जहां रोशनी दिखाई दी थी. ठीक उसी जगह जहां रोशनी दिखाई दी थी, वहां एक हैंडबैग और ग्लूकोज के दो पैकेट रखे थे. इस पहाड़ी को पार करते हुए कई साथी शहीद हो गए थे. जो साथी पूरी गोलीबारी के गवाह थे और बचकर भाग निकले थे, उन्होंने बताया कि जब कामरेड प्रसाद नीचे उतर रहे थे, तो विपरीत दिशा से एक पहाड़ी से गोलियां आ रही थीं, जिसमें वे शहीद हो गए.
उन्होंने हमें यह भी बताया कि कामरेड दया, किरण और बिरसू नीचे उतरते समय पहाड़ी के बाईं ओर चले गए थे, इसलिए हम उसी ओर चले गए. जिस जगह कामरेड बिरसू शहीद हुए, वहां हमें गोलियों के कई खोखे मिले और जिस जगह दया शहीद हुए, वहां हमें गोलियों के खोखे और चश्मे का टूटा हुआ फ्रेम मिला. हमें बताया गया कि किरण दया से थोड़ी दूरी पर शहीद हुए थे, लेकिन हमें उनका कोई निशान नहीं मिला. पूरी पहाड़ी से नीचे उतरने के बाद गांजे (मारिजुआना) का एक खेत था. अधिकांश कामरेड्स ने उस खाली खेत में अपनी जान गंवाई. कामरेड मुन्ना, जिन्होंने गांजा के खेत में छुपकर गोली चलाई, नेतृत्व की रक्षा करते हुए शहीद हो गए. कामरेड एरल, जो अपनी एके 47 के साथ पीछे हट रहे थे, मुन्ना से लगभग दो फीट की दूरी पर मारे गए. पीछे हटने के दौरान पहाड़ी पर चढ़ते समय कई कामरेडों ने अपनी जान गंवाई, क्योंकि आसपास की पहाड़ियों पर गोलीबारी की स्थिति में तैनात दुश्मन सेना ने अपने स्वचालित हथियारों से बिना रुके गोलीबारी की. इसके कारण कामरेड ममता, लता और टाटा शहीद हो गए. कामरेड मधु, राजेश, बुदरी, मंजुला, राजिता, ज्योति, कमला और कुछ मिलिशिया साथी, जो एक शहीद की सेल्फ लोडिंग राइफल (एसएलआर) लेकर पीछे हट रहे थे, दुश्मन की गोलियों का सामना करते हुए, उस जगह पर अपना कीमती खून बहाया. कामरेड मधु की एसएलआर एक अन्य साथी ने ले ली, जो पीछे हट गई, और कामरेड ज्योति की 303 राइफल भी एक अन्य साथी ने उठा ली. घटनास्थल पर जाने से एक दिन पहले भारी बारिश के बावजूद, जिस जगह पर हमारे ज्यादातर साथियों ने अपनी जान दी थी, वहां की मिट्टी पर अभी भी उनके खून के लाल निशान थे. ऐसा लग रहा था मानो मिट्टी के लाल रंग के ढेले हमें उनके आदर्शों की याद दिला रहे हों और राज्य के साथ हमारी लड़ाई में हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिखा रहे हों. घायल साथियों में से एक ने हमें बताया कि पांच या छह अन्य लोग जो घायल होकर पीछे हटे थे, उन्हें भी वहां गोली लगी थी. नेतृत्व के रक्षक कॉमरेड गंगल, जो संतरी की ड्यूटी पर थे, शिविर की ओर आ रहे होंगे. उनके बैग की हालत और सूख चुकी खून से लथपथ जमीन को देखते हुए, यह जाहिर हो रहा था कि उन्होंने उन्हें वहां यातनाएं देकर मारा था. वापसी के रास्ते पर, हम एक पुल पर पहुंचे, और पास में हमें कॉमरेड गंगाधर की टोपी मिली. उनकी टोपी पर लाल तारे के बीच में छेद, जो उनके माथे के बीच में रहा होगा, यह बताता है कि यह एक गोली का छेद था. उन्हें देखने वाले साथियों ने कहा कि उन्हें शुरू में पैर में चोट लगी थी. बाद में उसे पकड़ लिया गया होगा, प्रताड़ित किया गया होगा और मार दिया गया होगा. मैंने खुद भी दो-तीन बार वह टोपी सिली थी.
जब मैंने उनसे कहा, ‘बाबई, आप एक नई टोपी ले लीजिये’ तो उन्होंने जवाब दिया- ‘कम्युनिस्टों से उम्मीद की जाती है कि वे हर चीज का इस्तेमाल तब तक करें, जब तक वह पूरी तरह से खराब न हो जाए, जहां तक हो सके, हमें इस सिद्धांत का पालन करना चाहिए.’
उनके शब्द मेरे दिमाग में गूंजने लगे. उनके संकल्प की याद को समेटे हुए, मैंने अपना दुख निगल लिया और अपने दिल में असहनीय बोझ लिए हुए पुल पार कर गई. लगभग दस कदम आगे बढ़ने पर, मौत की बदबू ने हमें फिर से घेर लिया. यह वही जगह थी, जहां से हमने प्रवेश करते ही गंध का पता लगाया था. हमने इसका स्रोत जानने के लिए आसपास खोजबीन की, और हमें मिलिशिया कॉमरेड लोयकल का मृत शरीर मिला! शरीर इतनी सड़ चुका था कि उसकी पहचान नहीं हो पा रही थी, उसका एक पैर और एक हाथ गायब था. लगभग बीस मीटर दूर, हमें ‘फ्लेमिंगो’ कंपनी के ग्रेनेड और ‘इन-सोल’ वाले जूते मिले, ग्रामीणों ने हमें बताया कि गांव की दिशा में उसी पहाड़ी पर कामरेड चिलका को, जो चोटों के कारण चलने-फिरने में असमर्थ थे, टार्चर किया गया और उनका सिर काट दिया गया था, ताकि उनका शरीर पहचान में न आए.
दो साल पहले, केंद्रीय समिति ने ‘बोल्शेविकीकरण अभियान’ शुरू किया था, जिसमें कामरेडों को अपनी गैर-सर्वहारा प्रवृत्तियों को सुधारने और सर्वहारा अनुशासन (जैसे तंबाकू छोड़ना, राजनीतिक अध्ययन में सुधार करना और सामूहिक कार्यों को प्राथमिकता देना) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था. ये कामरेड उस अभियान में विकसित हो रहे थे. उनकी शहादत ने पार्टी और जनता की अपूरणीय क्षति की है. ये वे कामरेड थे, जिन्होंने निचले स्तर के कामरेडों को सलाह दी और अपनी रणनीतियों के साथ पार्टी को आगे बढ़ाया, जो सैन्य, चिकित्सा, कृषि और तकनीकी क्षेत्रों में उत्कृष्ट थे, जो अपने कई नए कौशल के साथ नेतृत्वकारी भूमिका में आ रहे थे, जो नए होने के बावजूद पार्टी अनुशासन सीख रहे थे. विविध कौशल वाले इन सभी कामरेड्स ने हमें संघर्ष करने के कई सबक सिखाए.
जिस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर उतरा था, वह नदी के किनारे का स्थान- फलों, छाछ, पानी, चावल, शराब की बोतलों और मांसाहारी करी के पैकेटों से अटा पड़ा था- आधे खाए हुए और चारों ओर फेंके गए सामान की बदबू फैली हुई थी.
***
शिविर से लौटने के कुछ दिन बाद, मुठभेड़ से बचे हुए हम सभी लोग एक साथ मिले. दिन बीतते गए. कुछ ने दुखद घटना में अपने रक्त संबंधियों को खो दिया था, कुछ ने जीवनसाथी खो दिया था. कुछ लोग विभिन्न मुठभेड़ों से सुरक्षित रूप से पीछे हटने में कामयाब रहे थे, जबकि अन्य अनुभवी साथियों ने उन नए गुरिल्लाओं को संघर्ष का पाठ पढ़ाया, जिन्हें आंदोलन के बारे में बहुत कम जानकारी थी. कुछ साथियों ने भावनात्मक रूप से संघर्ष कर रहे लोगों को सहारा दिया और उन्हें पार्टी में मजबूती से खड़ा होने में मदद की. अन्य ने अपने क्रांतिकारी गीतों से कई दिलों पर अमिट छाप छोड़ी. अपने दुख को दबाते हुए, भारी मन से, सभी अपने-अपने काम में डूबे हुए आगे बढ़ रहे थे. जब मैंने उन महिलाओं को देखा, जिन्होंने अपने साथी खो दिए थे, वास्तव में मैं आश्चर्यचकित थी. गुरिल्ला जीवन के बाहर, मैंने महिलाओं को निराशा में डूबते देखा था, उन्हें लगता था कि उनके पति के गुजर जाने के बाद जीवन खत्म हो गया, उनमें से कई अपने बचे हुए साल अपने पति की यादों में बिताती थीं, समय के साथ उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता था. इन महिला गुरिल्लाओं के बारे में क्या है, वे अपने काम में डूबी हुई थीं. क्या वे अपने मारे गये साथियों से प्यार नहीं करती थीं? क्या उनमें दुख की भावनाएं नहीं थीं, जो उन्हें पीड़ा देती थीं? उनका काम उन लोगों के लिए उत्तर है जिनके मन में ऐसे सवाल हैं. ये कोई साधारण महिलाएं नहीं थीं- ये मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की विचारधारा से बंधी जनता की गुरिल्ला थीं. वे युद्ध के मैदान में रहती थीं. वे स्पष्ट रूप से समझती थीं, कि युद्ध, अपने मूल में, मृत्यु के विरुद्ध एक अथक संघर्ष है.
बहुत पहले, वे शोषितों की मुक्ति और समाज के परिवर्तन के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए अपने माता-पिता, भाई-बहनों और दोस्तों को पीछे छोड़ आई थीं. उन्होंने ताकतवर हथियारबंद दुश्मन को उखाड़ फेंकने के लिए हथियार उठाए थे. शोषितों द्वारा शासन स्थापित करने के लिए इस जनयुद्ध के लिए उन्होंने अपने अस्तित्व के मूल में वर्ग चेतना को आत्मसात किया था. इसीलिए अपने शहीद साथियों के आदर्शों से प्रेरित होकर, वे शोषितों द्वारा सत्ता पर कब्जा करने के लिए दुश्मन ताकतों के खिलाफ दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थीं. इन महिला गुरिल्लाओं को देखकर मुझे गर्व हुआ. वास्तव में, जनयुद्ध कितना महान है! मैंने कॉमरेड रीता से बात की, जिन्होंने अपना साथी खो दिया था. ‘गोलीबारी के बीच, जब मैं पीछे हट रही थी, तो घायल और हिलने-डुलने में असमर्थ हो चुके रमना ने मुझे पुकारा, ‘रीता, मुझे अपने साथ ले चलो.’ मैं तुरंत उसके पास भागी. उसके हाथ और पैर में गोली लगी थी, और बहुत खून बह रहा था. मैं उसे पूरी तरह से उठा नहीं सकती थी. इसलिए मैंने उसका हाथ थामा और उसे थोड़ी दूर तक चलने में मदद की.
हमारे सामने की पहाड़ी से भारी गोलीबारी हो रही थी, यह देख उसने दृढ़ता से कहा- ‘रीता, मैं आगे नहीं जा सकता. मैं तुम्हारी मदद से भी नहीं चल पाऊंगा. तुम आगे बढ़ो, अगर तुमने देर की, तो हम दोनों मर जाएंगे. मैं नहीं चाहता कि तुम मेरी वजह से मरो. एक भी सेकंड बर्बाद मत करो.. जल्दी जाओ.’
मैंने उसे उसी हालत में पीछे छोड़ दिया और गोलीबारी करते हुए पीछे हट गई. मरते हुए रमना को न बचा पाना एक असहनीय दर्द है, जो आज भी मुझे सताता है. लेकिन मैं जानती हूं कि रमना ने आदिवासी लोगों के लिए बंदूक उठाई और सर्वहारा राज्य के लिए अपनी जान दे दी. जब तक मैं जिंदा हूं, मैं उसके सपनों को साकार करने के लिए लड़ती रहूंगी. मैं उनके सपनों को पूरा करने वाले रास्ते पर अपने काम को तेज करूंगी.’
भले ही वह आंसुओं के साथ बोल रही थी, लेकिन उसके अंतिम शब्द, ‘मैं उनके सपनों को पूरा करूंगी,’ ने मुझे बहुत प्रेरित किया. अपने काम में सभी साथियों की विनम्रता, साथी खोने वाले साथियों की दृढ़ता, पार्टी के कार्यकर्ताओं में दुश्मन के प्रति गुस्सा- इन सब बातों ने तीस साथियों की शहादत के बाद मेरे दुखी दिल को तसल्ली दी. इससे पार्टी में मेरी आस्था और गहरी हो गई.
***
पुलिस, जो दमनकारी शासक वर्ग के पालतू कुत्ते हैं, ने झूठा प्रचार किया. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने AOB (आंध्र ओडिशा सीमा) क्षेत्र को माओवादी-मुक्त क्षेत्र बना दिया है, कि वहा६ एक भी माओवादी नहीं बचा है, और उन्होंने माओवादी पार्टी को आखिरकार खत्म कर दिया है. इस बीच, उन्होंने गांव के युवाओं को जबरन उठा लिया, उन्हें मार डाला, दावा किया कि वे मिलिशिया का हिस्सा थे और मिलिशिया की मौतों का दोष माओवादियों पर मढ़ दिया. इसके अलावा, उन्होंने दावा किया, कि यह बात उन्हें मिलिशिया सदस्यों के परिवारों ने खुद बताई थी. उन्होंने मीडिया में ये झूठ फैलाया. जब वे यह प्रचार कर रहे थे, हम उन इलाकों में मौजूद थे. मैं अक्सर सोचती थी, कि मुठभेड़ के बाद लोग और जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खो दिया है, वे पार्टी के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देंगे. लेकिन जल्द ही मुझे पता चला कि वे असाधारण लोग थे. जब हम इतने सारे साथियों के खोने का शोक मना रहे थे, तब उनमें से कईयों ने हमारा बहुत ख़्याल रखा. जैसे ही हम उनके गांवों में पहुंचे, उन्होंने पहरेदारी की और गश्त करते हुए भोजन इकट्ठा किया और हमें खिलाया. उन्होंने हमें नुकसान के बारे में सांत्वना दी और हमें हिम्मत दी. जब हमारे साथियों ने लोगों से पूछा, ‘दादा, क्या रामगुडा की घटना के बाद आप डरे हुए थे?’, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘नहीं, दादा. हमने सिर्फ आप सभी के बारे में सोचा. हम पार्टी के सदस्यों के बारे में चिंतित थे- वे कैसे और कहां हैं, और कितने लोग मारे गए हैं. डरो मत दादा. हम यहां आपके लिए हैं,’ उन्होंने हमें पूरे विश्वास के साथ आश्वासन दिया. मुझे लगा कि उनका गर्मजोशी से स्वागत आंदोलन के लिए बहुत सकारात्मक बात थी.
रोल कॉल की सीटी बज गई. हम सब चुपचाप पंक्तियों में खड़े हो गए. ‘अब हम शहीद मिलिशिया साथियों के परिवारों से जाकर बात करेंगे. वे अपने बच्चों को खोने का शोक मना रहे हैं. इसलिए, भले ही वे हमें डांटें या मारें, हमें जल्दबाजी में प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए. हमें पूरी संवेदनशीलता के साथ बात करनी चाहिए.’ इन शब्दों के साथ कमांडर ने रोल कॉल समाप्त की.
फिर भी, मैं बहुत घबराई हुई थी. लोगों से गर्मजोशी से भरे स्वागत को देखने के बाद भी, मैं इस बात को लेकर असहज थी, कि वे अपने बच्चों को खोने के दुःख में कैसे प्रतिक्रिया देंगे. मुझे अखबारों में प्रकाशित पुलिस प्रचार याद आया, जिसमें दावा किया गया था, कि मिलिशिया साथियों के माता-पिता ने कथित तौर पर कहा था कि ‘माओवादी हमारे बच्चों को ले गए और उन्हें मार डाला.’ मैं चलते समय इन सभी चीजों के बारे में सोचती रही और जल्द ही हम उस गांव में पहुंच गए जहां हमें पहुंचना था.
हमारे आने का आभास होते ही कुत्ते भौंकने लगे. हमारी उपस्थिति को देखते ही संगम के सदस्य और शहीद मिलिशिया साथियों के माता-पिता सहित लोग एकत्र हो गए. एक स्थानीय साथी ने हमें ‘लाल सलाम’ कहकर अभिवादन किया और हम सबने हाथ मिलाया. एरिया कमांडर ने बोलना शुरू किया और मुठभेड़ की घटनाओं के बारे में बताते हुए भावुक लोगों ने जोश से जवाब दिया, ‘दादा, हम सिर्फ अपने बच्चों के लिए शोक नहीं मना रहे हैं. आपकी पार्टी के कितने लोग शहीद हुए हैं! वे ऐसी जगहों से आए हैं, जिन्हें हम जानते तक नहीं- इस राज्य से नहीं, इस जिले से नहीं, लेकिन उन्होंने हमारे लिए अपनी जान दे दी. हम अपनी पार्टी से क्यों नाराज होंगे, दादा? हमारे बच्चे सिर्फ आपके लिए नहीं मरे, वे हम जैसे कई लोगों के लिए, सभी गरीब लोगों के लिए, हमारी जिंदगी बदलने के लिए मरे. हम आपको समझते हैं, दादा !’
वे स्पष्टता से बोल रहे थे, आंसू बहा रहे थे और अपनी राजनीति के बारे में भावुक होकर बोल रहे थे. यह सच था, या सपना? मैंने खुद से सवाल किया. उनकी प्रतिक्रिया मेरी उम्मीद से अलग थी. इस दृश्य को सामने देखकर, मुझे ऐसे साफ दिल वाले लोगों के बीच होने पर गर्व महसूस हुआ. धरती के उन दुखी लोगों के प्रति मेरा प्रेम और भी गहरा हो गया, जो इतिहास बना रहे हैं. सचमुच, लोगों की चेतना उच्चतर और महान स्तर पर है!
- लेखनकाल दिसंबर 2016, प्रकाशित- अरुणतारा, दिसंबर 2023
[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]
