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Home कविताएं

पर्यावरण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 4, 2021
in कविताएं
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( एक )

हम बंजर
कर देना चाहते हैं धरती को
काट देना चाहते हैं सभी पेड़
सुखा देना चाहते है
तमाम बांवड़ियां
तपदील कर लेना चाहते हैं
पृथ्वी को रफ़्तार में
आसमान और जमीन पर बस
उड़ना चाहते हैं
कि पहुंच सके पहाड़ों में भी
वक्त से पहले
विडम्बना देखिये
फिर भी नहीं बढ़ पाता मनुष्य
मृत्य से आगे.

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स्वप्न

आज पर्यावरण दिवस भर
पृथ्वी को अनंत शुभकामनाएँ
कि वह बची रहे
मनुष्य जैसे
खूंखार जानवरों से.

( दो )

पुल पार करते हुए
एक नदी
अनायास छुप गई
मेरी जेब में
वह कर रही होगी
सुरक्षित महसूस अपने को
इस आततायी दुनिया से
पर उसे नहीं मालूम
आदमी और जेब का रिश्ता
आज कितना गहरा और
खतरनाक हो गया है

तमाम मजहब जातियां और रिश्ते
मिल जाएंगे उसकी जेब में
जिन्हें वह समय समय
करता रहता है इस्तेमाल
अपने पक्ष में

उसने कैद कर दिए हैं
जेबों में
जल जंगल और जमीन
यहां तक कि
पृथ्वी भी
अब वह तेजी से बढ़ने लगा है
चांद की ओर

आप कभी उसकी जेब
टटोल कर देखना
उसमें मिल जाएगी आपको
पृथ्वी, एक नदी और चांद
मुट्ठी भर तितलियां

यहां तक कि
उनके बीच ठूंस रखा होगा उसने
लोकतंत्र और देश का संविधान

जेबें सचमुच खतरनाक
हो गई हैं
दर्जी जो कभी
बड़े इत्मीनान से
सिला करता था उन्हें
आज खुद कैद पाता है
इन्हीं जेबों में

  • हरनोट

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