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भारत में किसान आन्दोलन और उसकी चुनौतियां

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 16, 2024
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भारत में किसान आन्दोलन और उसकी चुनौतियां
भारत में किसान आन्दोलन और उसकी चुनौतियां
अर्जुन प्रसाद सिंह, राजनैतिक अर्थशास्त्री

संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन या दिल्ली की सीमाओं पर चलाये गए महाधरना कार्यक्रम को राजनीतिक रूप से किस रूप में देखा जाये-इस बात पर देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी समूहों के बीच काफी गम्भीर बहस है. कुछ उसे सुधारवादी या अर्थवादी आन्दोलन मानते हैं, क्योंकि इसका लक्ष्य खेती-किसानी से जुड़े लोगों की आर्थिक हालतों में कुछ सुधार करना है. इस आन्दोलन का लक्ष्य किसानों की आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक हालतों में कोई बुनियादी परिवर्तन लाना नहीं है.

वे यह भी मानते हैं कि यह कोई क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन नहीं है जैसा कि तेलंगाना, तेभागा, नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम, मुशहरी एवं देवरा गोपीबल्लभपुर में 1960 के दशक में संगठित किया गया था, जिनमें मूलतः भूमिहीन एवं गरीब किसानों की भागीदारी हुई थी और जो जमीन, इज्जत एवं व्यवस्था परिवर्तन के मामलों से भी जुड़ा हुआ था. कुछ अन्य समूहों, जो इस आन्दोलन में शिरकत कर रहे हैं या इसके संचालन में अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं, का मानना है कि भले ही इसकी मांगें मुख्यतः आर्थिक हैं, लेकिन यह किसानों की मुक्ति का एक व्यापक आन्दोलन है.

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सच्चाई यह है कि संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे किसान आन्दोलन मुख्यतः मालिक किसानों (यानी जो जमीन के मालिक है) का आन्दोलन है, जिसकी मुख्य मांगे जमीन की मिल्कियत की रक्षा करना, स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश के मुताबिक किसानों की सभी फसलों का बढ़े हुए दर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाना और किसानों के सारे कर्जों को माफ कराना है. किसानों की मुक्ति के सवाल को संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल अधिकांश किसान संगठन ठीक से समझते भी नहीं हैं, तो वे इस सवाल को अपना लक्ष्य कैसे बना सकते !

जहां तक दिल्ली की सीमाओं पर करीब 13 माह तक चले लगातार महाधरनों के असर की बात है, विश्व व्यापार संगठन के दिशा निर्देश एवं स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आलोक में नरेन्द्र मोदी सरकार को अपने द्वारा लाये गए तीन किसान विरोधी कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा. यह देश के अन्नदाता किसानों की ऐतिहासिक जीत थी, जिसके लिए उन्हें अपने कुल 714 साथियों की शहादत देनी पड़ी और क्रूर राजकीय दमन का सामना करना पड़ा.

नरेन्द्र मोदी की केन्द्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों को किसानों के लिए हितकारी साबित करने के लिए करीब एक साल तक धुआंधार प्रचार चलाया और उसमें करोड़ों रूपये भी खर्च किये. इतना ही नहीं, मोदी सरकार द्वारा अपने समर्थक अम्बानी, अडाणी एवं रामदेव जैसे बड़े पूंजीपतियों से कृषि कानूनों के बनने के पहले ही कृषि उपजों के गोदामीकरण (भंडारण) के लिए आरबों रूपये खर्च करवा कर दर्जनों बड़े-बड़े आधुनिक साइलों भी बनवाये गये.

मोदी सरकार एवं इसके मंत्रियों समेत गोदी मीडिया द्वारा इस किसान आन्दोलन को तरह-तरह से बदनाम करने एवं किसानों की देशव्यापी एकता को तोड़ने के लिए काफी साजिशें रची गईं. इस आन्दोलन को देशद्रोही, खालिस्तानी, आतंकवादी एवं माओवादी जैसे उपनामों से नवाजा गया. इस तरह के मिथ्या आरोप लगाकर लोकप्रिय एवं व्यापक किसान आन्दोलन पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा क्रूर दमन भी चलाये गये. इन सबों के बावजूद किसानों का संगठन काफी दृढता एवं धैर्य के साथ लाखों किसानों, खेत मजदूरों एवं अन्य समर्थक समूहों का सहयोग लेकर 378 दिनों तक दिल्‍ली की सीमाओं पर डटे रहे और शांतिपूर्ण तरीके से लगातार अपना कार्यक्रम चलाते रहे.

करीब 550 किसान संगठनों के संयुक्त मंच ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ के आन्दोलन के दबाव में मोदी सरकार को 19 नवम्बर, 2021 को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी, हालांकि कृषि कानूनों को निरस्त करने का बिल संसद में 29 नवम्बर, 2024 क्रो पारित हुआ. वर्तमान किसान आन्दोलन की कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां रही हैं, जिन्हें बिन्दुवार इस प्रकार पेश किया जा सकता है –

  • पहली, यह देशव्यापी आन्दोलन है.
  • दूसरी, यह विश्व का सबसे बड़ा एवं लम्बी अवधि तक चलने वाला आन्दोलन है.
  • तीसरी, इस किसान आन्दोलन को व्यापक जन आन्दोलन में तब्दील किया गया, जिसमें शहरी-ग्रामीण मजदूरों, छात्रों-नौजवानों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों-कलाकारों, सरकारी कर्मचारियों के अलावा दलितों, आदिवासियों एवं अल्पसंख्यकों का समर्थन प्राप्त हुआ.
  • चौथी, इस आन्दोलन की गूंज विदेशों में भी सुनाई पड़ी और इसकी चर्चा यूके के हाउस ऑफ कामन्स और कनाडा, आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड के संसदों में भी की गई.
  • पांचवीं इस आन्दोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई और इसमें खेती-किसानों में महिलाओं की दावेदारी और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं एवं संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण तथा लैंगिक समानता के सवाल को जोरदार तरीके से उठाया गया.
  • छठी, इस आन्दोलन ने जातीय एवं धार्मिक सीमाओं को भी तोड़ा और लंगर में जाट-किसान एवं दलित और हिन्दू एवं मुस्लिम एक साथ धरनास्थलों पर खाना खाते दिखे.
  • सातवीं, इस आन्दोलन ने पूंजीवादी संसदीय प्रणाली को बेनकाब करते हुए 2024 के मानसून सत्र के समानान्तर 22 जुलाई से 9 अगस्त, 2024 तक दिल्ली के जंतर मंतर पर किसान संसद भी चलाने में सफलता प्राप्त की.

उपरलिखित उपलब्धियां काफी उत्साहजनक रहीं, लेकिन इस किसान आन्दोलन की कूछ गंभीर कमजोरियां भी थीं, जिन्हें समय रहते दुरुस्त करना जरूरी था. पहली कमजोरी यह रही कि इस किसान आन्दोलन में बगैर उचित समझदारी बनाये किसानों की मुक्ति दिलाने का आहवान किया गया और इसके लिए करीब डेढ़ दर्जन राज्यों में ‘किसान मुक्ति यात्रायें’ एवं जंतर मंतर (दिल्ली) पर ‘किसान मुक्ति संसद’ आयोजित किये गये. लेकिन इन आयोजनों में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) की ओर से स्पष्ट एवं तर्कसंगत राय नहीं व्यक्त की गई.

एसकेएम ने काफी स्पष्टता के साथ अपनी मूलतः 8 सूत्री आर्थिक मांगों को सरकार एवं आम जनता के सामने पेश किया. सरकार अगर उन मांगों को मान भी लेती, तो इससे न तो कृषि संकट दूर होगी और न ही किसानों की मुक्ति हो पायेगी. इस बात को वामपंथी एवं कम्युनिस्ट क्रांतिकारी धारा से जुड़े किसान संगठन एवं उसके नेतागण, जो एसकेएम को चलाने में अग्रणी भूमिका अदा कर रहे हैं, अच्छी तरह समझते हैं. लेकिन खेद है कि इसके बावजूद उन्होंने कृषि संकट की जड़, यानी पूंजीवादी विकास मॉडल और भारतीय कृषि के ऊपर विश्व व्यापार संगठन जैसी साम्राज्यवादी संस्थाओं की मजबूत पकड़ पर प्रहार करने की कोई योजना नहीं बनाई.

दिल्ली की सीमाओं पर चले महाधरने की पूरी अवधि के दौरान कभी भी भारत सरकार से यह मांग नहीं की कि वह विश्व व्यापार संगठन से बाहर आये, जबकि इस मांग पर करीब ढाई दशक पहले विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ बने ‘ज्वांडट एक्शन फोरम ऑफ इण्डियन पीपल’ (जाफीप) में शामिल देश के अधिकांश बडे किसान संगठनों के बीच सहमति बन गई थी. यह अच्छी बात थी कि इस किसान आन्दोलन में आडाणी-अम्बानी जैसे कुछ चुनिन्दा कारपोरेट घराने को प्रहार का निशाना बनाया गया, लेकिन जरूरत इस बात की थी कि कृषि संकट को दूर करने और ‘किसानों की मुक्ति’ के लिए देश की सम्पूर्ण पूंजीवादी सत्ता एवं व्यवस्था के साथ-साथ वित्तीय पूंजी के एकाधिकार को निशाना बनाया जाता.

दूसरी कमजोरी यह रही कि इस किसान आन्दोलन में खेत मजदूरों एवं बटाईदारों की मांगों और भूमि सुधार कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग को प्रमुखता से नहीं उठाया गया. इसके परिणामस्वरूप, ग्रामीण आबादी से इस आन्दोलन का जीवंत एवं मजबूत सबंध नहीं बन पाया और आन्दोलन उतनी व्यापकता ग्रहण नहीं कर पाया.

तीसरी कमजोरी यह थी कि एसकेएम ने राजनीतिक कार्यक्रमों के निर्धारण में सावधानी नहीं बरती. इस मोर्चे ने ‘पुलवामा दिवस’ मनाने का आहवान किया, जबकि इस घटना को खुद मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अंजाम दिया था. एसकेएम ने 26 जनवरी, 2021 को ट्रैक्टर मार्च के दौरान किसान संगठनों के झंडों से ज्यादा ट्रैक्टरों पर तिरंगा झंडा फहराने पर जोर दिया. फिर 9 अगस्त, 2021 को ‘भारत छोड़ो दिवस’ और 15 अगस्त, 2021 के ‘किसान-मजदूर आजादी दिवस’ मनाने के दौरान भी ऐसा ही देखा गया. इसके अलावा एसकेएम ने ‘संविधान बचाओ दिवस’ और ‘लोकतन्त्र बचाओ दिवस’ मनाने का आहवान किया, जबकि हमारे देश में भारतीय संविधान आधार पर ही एक बुर्जुआ लोकतंत्र का निर्माण हुआ है.

उपयुक्त राजनीतिक कमजोरियों के साथ-साथ एसकेएम की सांगठनिक कमजोरियों भी गंभीर हैं. पहले नेतृत्वकारी संगठनों के बीच पारदर्शिता एवं आपसी तालमेल का काफी अभाव है. इसकी वजह से एसकेएम के निर्णयों को पूरे देश में लागू करवाना मुश्किल होता रहा है. ऐसा उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड एवं अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में देखा गया. एसकेएम ने इन चुनावों में भाजपा हराओ का नारा दिया था, लेकिन कई राज्यों में इस नारे पर अमल नहीं किया गया.

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े किसान यूनियन के कुछ नेताओं ने तो भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार किया. पंजाब में तो एसकेएम के दो नेताओं-बलवीर सिंह राजेवाल एवं गुरनाम सिंह चढूनी के नेतृत्व में 22 किसान संगठनों ने ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ गठित कर एमएलए के कई उम्मीदवार भी खड़े किये. पंजाब एवं हरियाणा के कुछ अन्य किसान संगठनों ने पंजाब में चुनाव लड़ने के इस निर्णय का समर्थन भी किया.

एसकेएम के 7 कोऑर्लिनेटरों ने एक बयान जारी कर कहा कि ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ से उनका कोई रिश्ता नहीं है और जो संगठन पंजाब में चुनाव लड़ रहे हैं, वो संयुक्त किसान मोर्चा के हिस्सा नहीं रह गये हैं. एसकेएम के उस बयान पर कई किसान संगठनों ने एतराज जाहिर किया और कहा कि ‘चुनाव लड़ने वाले किसान संगठनों को मोर्चा से हटाने का कोई सामूहिक निर्णय नहीं लिया गया है. चुनाव लड़ना या नहीं लड़ना किसी संगठन की स्वतंत्र नीति होती है और एसकेएम को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए’.

हालांकि, चुनाव में भाग होने वाले संगठनों को 4 माह के लिए एसकेएम से बाहर कर दिया गया. 2023 की एसकेएम की एक बैठक में दिशा निर्देश बनाकर इस विवाद को हल किया गया. इस निर्देशिका के 9 वें बिन्दु में यह कहा गया कि ‘जो किसान नेता किसी भी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ता है वह एसकेएम की राष्ट्रीय बैठक या किसी कमिटी में नहीं रहेगा. उसके संगठन को उसकी जगह मोर्चा में किसी और प्रतिनिधि को नामित करना होगा.’

एसकेएम के नेतृत्वकारी संगठनों और खासकर वामपंथी धारा से जुड़े नेताओं के बीच आपसी तालमेल के अभाव के चलते एक तो कई राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश एवं बिहार) में एसकेएम के दो या तीन केन्द्र बन गये हैं और दूसरे इन राज्यों में केन्द्रीय आह्वान के समर्थन में कुछ सांकेतिक कार्यक्रम ही सम्पन्न किये जा रहे हैं. इसके अलावा कुछ राज्यों में कुछ कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा से जुड़े किसान संगठन एवं उसके नेतागण आपस में प्रतियोगिता करने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने में भी मशगूल दिखाई पड़ रहे हैं. वे एसकेएम के बैनर को प्राथमिकता देने की बजाय अपने-अपने किसान संगठन के बैनर को चमकाने में लगे रहे. खासकर, ऐसा राज्यों में आयोजित किये गए तीन दिवसीन महापड़ाव के दौरान और उत्तर प्रदेश एवं झारखंड में आयोजित विभिन्‍न कार्यक्रमों में देखा गया.

उपर्युक्त राजनैतिक एवं सांगठनिक कमियों को दुरूस्त करना जरूरी था लेकिन एसकेएम का नेतृत्व अभी तक इसमें सफल नहीं हो पाया है. नतीजतन, कई राज्यों में एसकेएम के बिखराव को नहीं रोका जा सका और देश के विभिन्‍न भागों में चल रहे कई किसान आन्दोलनों को एसकेएम के अनुशासनिक दायरे में नहीं लाया जा सका.

एसकेएम के बीच एक बड़ा बिखराव तब हुआ, जब इसके दो नेता शिवकुमार शर्मा काकाजी और जगजीत सिंह डल्लेवाल के नेतृत्व में संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनैतिक) उभर कर सामने आया. इस
एसकेएम ने सरवन सिंह पंधेर एवं सवर्णजीत सिंह के नेतृत्व में चल रहे किसान मजदूर मोर्चा एवं कुछ अन्य किसान संगठनों को लेकर 13 फरवरी, 2024 को मुख्यतः पंजाब के हजारों किसानों को लेकर दिल्ली की ओर मार्च कर दिया.

हरियाणा सरकार ने उन्हें शंभू एवं खनौरी बॉर्डर पर बड़ी संख्या में पुलिस बलों को लगाकर क्रूरतापूर्वक रोक दिया. बार्डर के पास की सड़कों पर लोहे के कील लगाये गए और कंटीले तारों एवं सीमेंट की पक्की वैरिकेडिंग की गई. कुछ स्थानों पर सड़कों पर बड़े-बड़े गढ़के भी खोदे गए. किसानों पर नजर रखने के लिए ड्रोन के भी इस्तेमाल किये गये. लेकिन उतने के बावजूद किसान पीछे नहीं हटे और काफी संख्या में शंभु एवं खनौरी बॉडर पर धरने पर बैठ गये.

यहां से उन्हें हटाने के लिएं पुलिस और अर्द्ध सैनिक जवानों ने गोलियां चलाईं. इस क्रम में हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा में घुसकर एक किसान शुभ करण सिंह की गोली मारकर हत्या भी कर दी और कई किसानों को घायल भी किया. 400 से ज्यादा ट्रैक्टरों एवं ट्रालियों को नुकसान भी पहुंचाया गया.

शुभ करण सिंह की शहादत को लेकर गांवों में कलश यात्रा आयोजित की गई और 31 मार्च, 2024 को अम्बाला के शाहपुर मोड़ अनाज मंडी में श्रद्धाजंली सभा रखी गई. मंडी में इस श्रद्धांजली सभा को बाधित करने के लिए 50 किसान नेताओं के घरों पर पुलिस छापेमारियां की गई और कुछ को मोहाली एयरपोर्ट के पास से गिरफ्तार भी किया गया.

इस राजकीय दमन से किसान घबराये नहीं, बल्कि गिरफ्तार साथियों की रिहाई एवं शहीद साथी के परिवार को मुआवजा देने की मांग को लेकर वे हजारों की संख्या में 17 अप्रैल से पटियाला जिला की रेल पटरियों पर बैठ गये. अम्बाला डिवीजन के कामर्सियल मैनेजर के अनुसार किसानों के इस रेल रोको संघर्ष के चलते 10 मई, 2024 तक 3,877 ट्रेने प्रभावित हुईं और 1,550 ट्रेनों को रद्द करना पड़ा.

इस कार्यक्रम की सफलता ने रेल की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया. 22 मई, 2024 को इस आन्दोलन के 100 दिन पूरे होने वाले हैं, जिसे मनाने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनैतिक) ने जीटी रोड एवं शंभू रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर चल रहे धरना में भाग लेने के लिए भारी तादाद में किसानों को आमंत्रित किया है.

ज्ञात हो कि एसकेएम (अराजनैतिक) ने अपने नेतृत्व में संचालित आन्दोलन में उन्हीं सारी मांगों को उठाया है, जिन्हें संयुक्त किसान मोर्चा लम्बे समय से उठाता रहा है लेकिन एसकेएम (अराजनैतिक) ने एक खास मांग को उठाया है- ‘भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन से बाहर आये.’ इसका असर यह पड़ा है कि संयुक्त किसान मोर्चा को भी इनकी सभी मांगों का समर्थन करना पड़ा है.

आन्दोलन के दौरान सरकार की ओर से किसान नेताओं से कई बार वार्तायें भी की गईं, लेकिन सरकारी प्रतिनिधियों ने उनकी प्रमुख मागों को मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद आन्दोलनकारियों ने हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज एवं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा विश्व व्यापार संगठन के पुतलों का दहन भी किया. शुरू में एसकेएम (अराजनैतिक) में केवल 5-6 किसान संगठनों की भागीदारी थी, जो अब करीब दो दर्जन किसान संगठनों की हो गई है. आन्दोलन अभी जारी हैं, कुछ और संगठनों के इस आन्दोलन से जुड़ने की संभावना है.

संयुक्त किसान मोर्चा में एक दूसरा बिखराव तब हुआ जब भारतीय किसान यूनियन, हरियाणा के नेता गुरनाम सिंह चढूनी तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति में शामिल हो गये. चन्द्रशेखर राव ने उन्हें पार्टी की किसान शाखा ‘भारत राष्ट्र किसान समिति’ का अध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया. इसके पहले भी उन्होंने ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ के गठन में एक मुख्य भूमिका अदा की थी, जिसके चलते उन्हें एसकेएम से बाहर कर दिया गया था. एसकेएम के कुछ नेताओं के प्रयास से बाद में ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ में शामिल अधिकांश किसान संगठनों को एसकेएम में वापस लाने में सफलता प्राप्त की गईं.

इस बीच एसकेएम ने अपने समर्थन के विस्तार और अपनी लंबित मांगों को पूरा करवाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने के लिए देश के केन्द्रीय मजदूर संगठनों / महासंघों से तालमेल बढ़ाया और 24 अगस्त, 2023 को दिल्‍ली के तालकटोरा स्टेडियम में अखिल भारतीय मजदूर-किसान संयुक्त सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन ने पूरे देश के सभी राज्यों की राजधानियों में 26-27-28 नवम्बर, 2023 को तीन दिवसीय किसान मजदूर महापड़ाव आयोजित करने का आहवान किया, जो उत्तर भारत के सभी राज्यों एवं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में काफी सफल रहा.

16 जनवरी, 2024 को जलंधर में एसकेएम का राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ, जिसमें 16 फरवरी को देशव्यापी ग्रामीण भारत बंद एवं औद्योगिक हड़ताल को सफल बनाने का आहवान किया गया. इसके बाद एसकेएम की ओर से 14 मार्च, 2024 को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक महापंचायत आयोजित करने का फैसला लिया गया. इन सभी कार्यक्रमों में एसकेएम से अलग काम कर रहे किसान संगठनों एवं गुरनाम सिंह चढूनी को शामिल करने की कोशिश की गई.

इस महापंचायत को विफल करने के लिए हरियाणा सरकार ने कई बाधायें उत्पन कीं. पंजाब के हजारों किसानों से भरी सैकड़ों बसों को दिल्‍ली की सीमाओं पर रोक दिया गया. पुलिसकर्मियों ने रेल के डिब्बों में सफर कर रहे किसानों को दिल्ली के बाहर के स्टेशनों पर उतार दिया. यहां तक कि रामलीला मैदान के अच्छे खासे हिस्से में नाले का पानी छोड दिया और मैदान के अंदर खाने-पीने की व्यवस्था भी बनाने नहीं दी गई. इन सबों का नतीजा यह हुआ कि संयुक्त किसान मोर्चा इस महापंचायत में जुटने वाले लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाया. एक अच्छी बात यह हुई कि गुरनाम सिंह चढूनी काफी समय बाद एसकेएम के कार्यक्रम में शामिल होने में सफल हुए और उन्होंने रामलीला मैदान में उपस्थित करीब 5,000 किसानों को सम्बोधित भी किया.

देश के कुछ राज्यों में काफी लम्बे अरसे से अलग-अलग मुद्दों पर किसान आन्दोलन चल रहे हैं, लेकिन वे संयुक्त किसान मोर्चा के अनुशासनिक दायरे से बाहर हैं. इस संदर्भ में दो आन्दोलनों का जिक्र करना उचित होगा. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के पास खिरियाबाग में मंदुरी हवाई अड्डा के विस्तारीकरण के खिलाफ पिछले 600 से अधिक दिनों से सामूहिक धरना चल रहा है. इस विस्तारीकरण परियोजना के तहत 9 गांवों की 670 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की जानी है, जिसमें करीब 10,000 लोग विस्थापित होंगे.

इस आन्दोलन को भी तोड़ने के लिए कई प्रकार के राजकीय दमन किये गए, मंच एवं माईक सेट को भी तोड़ा गया और कई कार्यकर्त्ताओं को मुकदमों में भी फंसाया गया. लेकिन इसके वाबजूद आन्दोलन आज भी जारी है. प्रशासनिक पदाधिकारियों के साथ कई बार आन्दोलनकारियों की बातें हुई, लेकिन अबतक कोई समझौता नहीं हुआ है.

दूसरा किसान आन्दोलन चौसा बाजार के पास बक्सर ताप विद्युत परियोजना के लिए अधिग्रहीत भूमि का सही मुआवजा दिलाने के लिए 17 अक्तूबर, 2022 से मुरा बाबा में सामूहिक धरना के रूप में चल रहा है. इस आन्दोलन पर भी क्रूर पुलिस दमन किया गया है. इस परियोजना के लिए कूल 4,283 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई है. इस जबरिया भूमि अधिग्रहण एवं उचित मुआवजा नहीं देने के खिलाफ प्रभावित गांवों के किसान इतने लम्बे अरसे से आन्दोलनरत हैं.

बिहार की नीतीश सरकार आन्दोलनकारियों की मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है और उनपर पुलिस दमन भी करवा रही है. 20 मार्च, 2024 को बिहार पुलिस के जवानों ने आन्दोलनकारी किसानों के गांवों में बच्चों, महिलाओं एवं बुजुर्गों पर भयंकर जुल्म ढाया और 30 से अधिक गरीब किसानों को में ले. इस क्रूर दमन के बाद बिहार में कार्यरत संयुक्त किसान मोर्चा एवं एसकेएम के केन्द्रीय नेताओं को बीच चौसा किसान आन्दोलन की गूंज पहुंची. इसके बाद 10 अप्रैल, 2024 को चौसा में एक महापंचायत आयोजित किया गया.

आगे 24 मई, 2024 को बक्सर रेलवे स्टेशन से वीर कुंवर सिंह चौक तक मौन जुलूस निकालने की तैयारी चल रही है. उक्त दोनों किसान आन्दोलन काफी महत्वपूर्ण हैं और काफी लम्बे समय से चल रहे हैं. अच्छी बात है कि संयुक्त किसान मोर्चा इन आन्दोलनों से जुड़ने और अपने दायरे में समेटने की कोशिश कर रही है.

ध्यान देने की बात है कि एसकेएम 2021 को दिल्ली की सीमाओं पर स्थित राजमार्गों एवं अन्य स्थानों पर चल रहे विभिन्‍न मो्चों को हटाने की औपचारिक घोषणा करते वक्‍त कहा था- वर्तमान आन्दोलन को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है, लड़ाई जीत ली गई है और किसानों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष जारी रहेगा. तबसे लेकर अभी तक लंबित मांगों को पूरा करवाने के लिए एसकेएम के नेतृत्व में लगातार संघर्ष चलाया जा रहा है. ये लंबित मांगें वही हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने अपने औपचारिक पत्र में एसकेएम के नेताओं को सौंपा था. इस पत्र में निम्नलिखित आश्वासन दिए गये थे –

  1. सरकार एमएसपी गारंटी कानून बनाने के लिए किसान प्रतिनिधियों को लेकर एक कमिटी का निर्माण करेगी,
  2. सरकार किसान आन्दोलन के दौरान दर्ज सभी मुकदमों को वापस करेगी,
  3. किसान आन्दोलन के दौरान शहीद हुए 700 से अधिक किसान परिवारों को उचित मुआवजा दी जायेगी,
  4. बिजली (संशोधन) बिल को सभी स्टेक होल्डर्स//संयुक्त किसान मोर्चा से चर्चा करने के बाद ही संसद में पेश किया जायेगा,
  5. पराली जलाने सम्बंधी कानून की उन धाराओं को निरस्त किया जायेगा, जिनमें किसानों को दंडित करने का प्रावधान है, और
  6. लखीमपुर-खीरी हत्याकांड के दोषी मंत्री पर कार्रवाई की जायेगी और इस कांड में गिरफ्तार किसानों को रिहा किया जायेगा.

किसान प्रतिनिधियों में राजनीतिक बन्दियों को रिहा करने और 26 जनवरी, 2021 के ट्रैक्टर मार्च के दौरान क्षत्तिग्रस्त हुए करीब 100 ट्रैक्टरों एवं अन्य गाड़ियों के एवज में मुआवजा देने की मांगे भी उठाई थीं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई आश्वासन नहीं दिया गया.

इसके अलावा एसकेएम ने अपनी मांगों के साथ किसानों-मजदूरों के सभी कर्जों को माफ करने, विश्व व्यापार संगठन से वापस आने, सभी मुक्त व्यापार समझौतों को रद्‌द करने, किसानों-मजदूरों के लिए पेंशन की व्यवस्था करने, कम्पनियों द्वारा किसानों की जमीन पर कब्जा रोकने एवं भूमि अधिग्रहण कानून-2013 को सख्ती से लागू करने जैसी मांगों को जोड़ दिया. इन मांगों को पूंजीवादी एवं दमनकारी मोदी सरकार से मनवाना काफी कठिन है. इसलिए आन्दोलन को व्यापक बनाने हेतु तमाम राजनीतिक एवं सांगठनिक कमजोरियों को दूर करना जरूरी है.

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