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Home कविताएं

जनकवि विनोद शंकर की चार कविताएं : राम की प्राण प्रतिष्ठा !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 26, 2024
in कविताएं
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1. हे राम

हे राम अब यहां क्या है तुम्हारा काम ?
अब किसका प्रतिशोध लेने आएं हो ?
अब किसका जमीन छीनने आएं हो ?
अब किसकी अग्निपरीक्षा लेनेवाले हो ?
अब किसे देश निकाला देने वाले हो ?

देखो अब तानाशाही नही चलेगी
तुम्हे भी अब सजा मिलेगी
तडका से लेकर शंबूक तक
सबने न्याय का दरवाजा खटखटाया है
बाली ने भी तुम्हे दंगल के लिए ललकारा है

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कौन है श्रेष्ठ ?

स्वप्न

अब ये वो अयोध्या नही है
जहां के तुम राजा थे
अब ये वो देश नही है
जहां तुमने चक्रवर्ती
सम्राट बनने के लिए
अश्वमेध यज्ञ किए थे

अब ये नया देश है
जिसकी नई सोच है
नये विचार है
जो किसी वशिष्ठ के
दिशा-निर्देश पर नही चलता है
नही यअ राजा का बेटा
सिर्फ़ राजा बनता है

देखो अब यअ संविधान हैं
लोकतंत्र है
जनता ही जनार्दन है
जिनसे अब ये देश चलता हैं

अगर तुम आओगे
तो निश्चित ही सजा पाओगे
और खुद को बचाने के लिए
जनता को ही आपस में लड़वाओगे
अपने नाम पर कत्लेआम करवाओगे

इसलिए तुम जहां से आए हो
वही चले जाओ
और बैकुण्ठ में आराम फारमाओ
इस देश को तुम्हारी कोई जरूरत नही हैं !

2. मेरे पुरखे

इतिहास के झरोखे से
झांकते हैं मेरे पुरखे
जो गए थे राम के साथ
रावण से लड़ने
जिनका पता रामायण
तो देता है
पर न जाने क्यूं उनका नाम छुपाता है ?

न ही तो वे बंदर भालू थोडे न थे
जिस रूप में दुनिया उन्हे जानती है
पर हम नही मानते है इसे

वे तो मेरे पुरखे थे
जो वीर थे
भोले-भाले थे
हमेशा किसी की मदद करने में
रहते थे आगे

आज वो मुझे बुलाते है
अपनी शौर्य गाथा सुनाते है
अपना इतिहास किसी अपने से लिखाना चाहते है

अब उन्हें किसी राम और बाल्मीकि पर भरोसा नही हैं
जो इंसान को भी जानवर बना देते है
अपनी जान पर खेल कर
मदद करने का पुरस्कार
इस तरह से देते हैं !

3. सच

कितना आसान है सच बोलना
अगर हम बोलना चाहे
सच बोलने के लिए मिलावट नही करना पड़ता है
और नही दिमाग लगाना पड़ता है
बस जैसा देखना है
वैसा ही बोल देना है

सच बोलना उतना ही आसान है
जितना आसान है रोटी खाना
जितना आसान है पानी पीना
जितना आसान है सांस लेना

सच बोलना हमारा प्राकृतिक गुण है
इसे किसी को सिखाना नही पड़ता
ये तो सबके स्वभाव में होता है

अगर हमारे अंदर लालच न हो
अगर हमारे अंदर किसी चीज का भय न हो
तो हम हमेशा सच ही बोलेंगे
और झूठ का साम्राज्य ढहा देंगे
जो खड़ा है हमारी कमजोरियों पर
जो खड़ा है हमारे शोषण पर

झूठ को जिन्दा रहने के लिए
रोज ही झूठ की जरूरत होती है
बिना इसके ये एक दिन में मर जाएगा
इसलिए वो चाहता है कि पूरा देश ही झूठ बोले
ताकी वो अजर-अमर रहे
अब हमे तय करना है कि
उसके लिए झूठ बोलना है
या अपने लिए सच !

4. हत्यारे

हत्यारो की पूजा करना
कोई नई बात नहीं है इनके लिए
ये तो सदियों से इनकी परंपरा रही है
सुबह से लेकर शाम तक
हत्यारो के पूजा में ही तो लगे रहते हैं ये

इनके सारे देवी-देवता हत्यारे ही तो है
हमारे सभ्यता और संस्कृति के
इन सब के हाथ रंगे हुए है
हमारे पूर्वजों के खून से

ये उसी हत्यारे राम के
मन्दिर का उद्घाटन कर रहे है न
जिसने दिन-दहाडे
शंबूक ऋषी का हत्या कर दिया था
ताकि ज्ञान पर ब्राह्मणवादियों का
एकाधिकार कायम रहे

ये उसी राम का प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं न
जिसने अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल में
फेंकवा दिया था मरने के लिए

ये राम मुझे भगवान तो दूर
कही से इंसान भी नहीं लगता है
जो प्रतीक है ब्राह्मणवाद है
जो प्रतीक है अन्याय का
जो प्रतीक है शोषण, जुल्म और अत्याचार का

जिसे दलितों, आदिवासियों
और महिलाओं को मिलकर
कब का मिट्टी में मिला देना चाहिए था

आज फिर उसी राम को
जिन्दा किया जा रहा है
उसके द्वारा शुरू किए गए काम को
जारी रखने के लिए
ताकी हत्यारे उस से प्रेरणा ले सके
जय श्री राम का नारा लगा कर
फिर किसी शूर्पणखा का नाक काट सके
फिर किसी बाली को जानवर समझ कर मार सके !

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