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फ्रेडरिक एंगेल्स (1858) : भारत में विद्रोह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 28, 2024
in युद्ध विज्ञान
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फ्रेडरिक एंगेल्स (1858) : भारत में विद्रोह

गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है. सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था. उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है. और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं. इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान. मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था. यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा. देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला. इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है. अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें. लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता है. इन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं. इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं. न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है. शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है. इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है. ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए. इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा. अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है, वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे.

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अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं. बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है. अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है. जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है. उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गया जैसी कि आशंका है तो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा. लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं. इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है.

पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं. ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा था. इंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए, जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए. उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी. लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है. ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं. वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे. लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े. रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया. इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है. नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं. इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है. अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है. स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है. सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है. यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता.

ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है. एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है. लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए.

इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं. कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है. इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम हो गई. पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है. फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती. रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा.

लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है, जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है. डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है. इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते. संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो. लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते. कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है. ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं. वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं ! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं. यदि सचमुच उनके अंदर बगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा. भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं. ब्रिटिश ‘राज’ को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है. तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए ? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें, जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके. लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी, जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं.

लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है. वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है. लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है. देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है. इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है. यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता. बात इतनी ही नहीं है. दोनों महान एशियाई ताकतें इंगलैंड और रूस इस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं, जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है. वह बिंदु पीकिंग है. वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी, जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा. इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी.

[ 1 अक्टूबर, 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ. ]

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