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खोरी जमालपुर की ग्राउण्ड रिपोर्ट : ‘जय श्री राम’ नारे के पीछे छुपे गुंडों, लुटेरों, शैतानों को नंगा करो !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 10, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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फ़रीदाबाद-गुड़गांव सीमा पर बसा, खोरी ज़मालापुर गांव, फ़रीदाबाद-सोहना हाई-वे से महज 100 मीटर दूर है, लेकिन कीकर के घने, हरे पेड़ों से इस क़दर ढका हुआ है कि सड़क से बिलकुल नज़र नहीं आता. ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, फ़रीदाबाद’ की 4 सदस्यीय टीम, जिसमें एक महिला साथी भी थी, मंगलवार, 4 जुलाई को दोपहर 1 बजे, खोरी जमालपुर में 30 जून को हुई भयानक गुंडई, लूट और समाज को मज़हब के नाम पर टुकड़े-टुकड़े करने की वारदात की असलियत जानने के लिए वहां गई.

रोड पर मौजूद ढाबे पर रुककर जैसे ही मोहम्मद ज़मात अली के घर का रास्ता पूछा, तुरंत वहां मौजूद लोग हरक़त में आ गए और हमारे पूछने का मक़सद समझ गए. एक बुजुर्ग रास्ता समझा ही रहे थे कि ज़ाहिद उठे और बोले, चलो मैं आपको उनके घर छोड़कर आऊंगा.
ज़मात अली, कई मायूस लोगों और सुबकती महिलाओं के बीच, गुम-सुम, अपने चेहरे को दोनों हथेलियों पर रखे, खाट पर बैठे थे. दुआ-सलाम के लिए जैसे ही मुंह ऊपर किया, तब समझ आया, उनकी आंखें बहुत देर से नम थी.

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दो-मिनट तक उन लोगों ने हमें परखा, हम कौन हैं, हमारे आने का मक़सद क्या है ? जैसे ही उन्हें समझ आया कि हम उनका दर्द बांटने आए हैं, 72 वर्षीय दुबले-पतले.ज़मात अली ने कौली भर ली और सुबकने लगे. ‘मेरी गायें ले गए, मेरा सब कुछ लुट गया, लेकिन उससे भी ज्यादा तक़लीफ़ इस बात की है कि जिन गायों को मैंने अपने बच्चों की तरह पाला, मुझ पर उन्हें काटने का इल्ज़ाम लगा’, उनका पहला वाक्य था.

कई दिनों से भावनाओं का बवंडर उनके कलेजे में घुमड़ रहा था. एक बार शुरू हुए तो ज़मात अली, हमारे सवालों का इंतज़ार किए बगैर, बोलते चले गए. ठेठ मेवाती भाषा में, गहरी सांसों के बीच, मुंह से जो भी निकल रहा था, सीधे उनके दिल की गहराई से आ रहा था. भावनाओं को नियंत्रित रखना, ख़ुद को रोने से रोकना बहुत मुश्किल हो रहा था. एक साथी इस प्रयास में विफ़ल रहे.

‘30 जून के दिन, मेरी छोटी बेटी की बारात आनी थी. एक दिन पहले शादी के लिए बल्लभगढ़ से ख़रीदा 1 लाख से भी ज्यादा का सामान घर में ऐसे ही रखा है. चलो अंदर, मैं तुम्हें दिखता हूं’, कहकर ज़मात अली फिर सुबकने लगे. ‘हमें क्या पता था, शैतानों की नज़र मेरे ढोरों पर है और उन्होंने हमारी दुनिया लूटने के लिए, वही दिन चुना है. वे मेरी, 55 गायों, 13 बछड़ों, 17 बकरियों और 4 गधों और उनके 2 बच्चों को, हमारी आंखों के सामने, कट्टे लहराते, लाठियां, तलवारें लहराते, मुसलमानों को गंदी-गंदी गालियां बक़ते, ये कट्टे तुम मुल्लों को काटने के लिए ही हैं, ज़मीन में जिंदा गाड़ देने की धमकियां देते, हांक कर ले गए.

मैंने अपने बेटों को डांटकर घर में बंद कर दिया और दरवाज़े पर खड़ा अपनी दुनिया लुटते देखता रहा. गायें भी मुझे देखती रहीं, जैसे कुछ कहना चाह रही हों !! उसके बाद क्या बारात आनी थी और शादी का क्या उत्सव होना था. हम अपनी बच्ची को उसकी ससुराल छोड़ आए. सारा सामान ऐसे ही पड़ा है. मेरी बच्ची तो अपनी शादी के दिन को याद कर हर साल रोएगी.’

मेरे पेट में तो बस एक बात की हौल हो रही थी, कहीं ऐसा ना हो जाए कि मेरा कोई बेटा या भतीज़ा अपने गुस्से पर काबू ना रख पाए, कहीं मुंह ना खोल दे. बहुत बुरा वक़्त है ये, हमारी ज़मात के लिए. हर रोज़ हो रही वारदातों से अंदर दहशत होती है, कैसे ये लोग हमारे बच्चों को जिंदा जला देते हैं. मेरे बच्चों को ऐसा कुछ हो गया तो कैसे जिऊंगा, मुझे ये खौफ खाए जा रहा था. जब मेरी गायें दूर निकल गईं, तो दर्द के साथ राहत भी महसूस हुई, ‘मेरे बच्चे तो बच गए’.

वे लोग, मुसलमानों के 5 गांवों से बिलकुल इसी तरह हथियार लहराते हुए, बेहद भड़काऊ गालियां देते हुए और ‘जय श्री राम’ के नारे लगते हुए निकले. हर गांव में बिलकुल वही हुआ जो मैंने किया था. कहीं भी, किसी भी युवक ने अपना मुंह नहीं खोला. ज़िल्लत और गुस्से का ज़हर हम इसी तरह पीते गए.

डकैती के इस भयानक जघन्य अपराध की एफआईआर, थाना धौज़, ज़िला फ़रीदाबाद में साज़िद खान द्वारा दर्ज़ कराई जा चुकी है. एफआईआर क्र. 0189 दिनांक 03.07.2023 (शाम 08.30) की कॉपी हमारे पास है. भारतीय दंड संहिता की संगीन धाराओं 148, 149, 295-ए, 506 एवं 25 में नामदर्ज़ आरोपी हैं; बिट्टू बजरंगी, गोपाल, पंकज जैन, अनूप, मोनू, सतेन्द्र, मोती खटाना व 50-60 अन्य. बिट्टू बजरंगी इस गिरोह का सरगना है.

यह वही बिट्टू बजरंगी है, जिसके विरुद्ध, नीलम-बाटा रोड पर स्थित मज़ार पर हनुमान चालीसा का पाठ रखने के प्रपंच द्वारा फ़रीदाबाद को हिन्दू-मुस्लिम दंगों की आग में झोंकने का मुक़दमा, ‘सामाजिक न्याय एवं अधिकार मंच’ के चेयरमैन साथी दीनदयाल जी ने दर्ज कराया था, जिसमें वह ज़मानत पर है. लोगों को अमन-चैन से ना रहने देने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के इरादे से, मुस्लिम समाज के विरुद हिंसा भड़काने की, ना जाने कितनी पुलिस शिकायतें, उसके ख़िलाफ़ दर्ज़ हैं.

‘क़ानून अपना काम करेगा’, बिट्टू बजरंगी जैसे दंगाईयों, उन्मादियों को तैयार करने, पालने-पोसने वाले, जाने कितने ठग टाइप नेता, यह प्रवचन ज़रूर देते हैं. अगर यह बात सच होती, तो बिट्टू बजरंगी अपना पूरा जीवन जेल में काटता. इस क्रूर जुमले का, असलियत में आज ये मतलब है कि ‘कानून हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता !!’

मुस्लिम समाज में फैली दहशत की तीव्रता का ये आलम है कि 3 जुलाई को एफआईआर दर्ज होने के बाद भी, 4 तारीख को जब ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ की टीम ने, वस्तु-स्थिति जानने के लिए उस गांव का दौरा किया, और जिससे पूरा पीड़ित बहुत खुश हुआ था, कौली भरकर रोए कि हम उनका दुःख बांटने पहुंचे हैं, लेकिन फिर भी बयान कैमरे पर देने से मना कर दिया था.

उनका कहना था कि आज ही डीएसपी सोहना ने उन्हें अपने दफ़्तर बुलाया है. कहीं हमारे बयान का बहाना बनाकर हमारे ख़िलाफ़ ही मुक़दमा ना दर्ज हो जाए !! हमारे समाज के ख़िलाफ़ आजकल कुछ भी हो सकता है. पुलिस तफ्तीश का ये हाल है कि अभी तक (5 जुलाई) रात तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है. गिरोह सरगना, बिट्टू बजरंगी, अपने चेलों-चमचों के साथ एसीपी, एनआईटी, फ़रीदाबाद कार्यालय के सामने हुड़दंग कर चुका है, ‘उसे ज़ेहादियों से ख़तरा है इसलिए ज़ेड सुरक्षा मुहैया कराई जाए !!’

गायों के मालिक, ज़मात अली का गांव, खोरी ज़मालपुर, फ़रीदाबाद जिले में आता है, लेकिन गायें जिस जगह से लूटी गई हैं, वह जगह गांव बाईखेड़ा, जिला गुडगांव में पड़ता है. यही वज़ह है कि इस मामले की शुरुआती तफ्तीश गुडगांव पुलिस ने की थी. पुलिस, अपनी जांच की अपडेट नहीं दे रही.

लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की साहसी पत्रकार ऐश्वर्य राज़ की शानदार रिपोर्ट, 4 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस में छपी, और उसी से समूचे देश को ये भयानक डकैती की वारदात मालूम पड़ी, लिखती हैं कि जब ज़मात अली का परिवार, अन्य 4 लोगों के साथ, गुड़गांव की पुलिस कमिश्नर कला रामचंद्रन से मिला तो उनका कहना था कि मामले को एसीपी सोहना देख रहे हैं, लेकिन ‘ज़मात अली, गायों के मालिक होने का कोई दस्तावेज़ नहीं दे पाए’.

इस आख़री अर्द्ध-वाक्य से ये अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं कि इस मुक़दमे का अंजाम क्या होगा ? ‘पीड़ित को ही क़सूरवार बनाओ’, हिन्दू फ़ासिस्टों द्वारा किए जा रहे जघन्य अपराधों में, पुलिस इस मक़सद से काम करती है.

इन पुलिस कमिश्नरों ने गांव सिर्फ़ फिल्मों में ही देखे हैं. इन्हें यह भी मालूम नहीं कि गांव वास्तव में होते कैसे हैं ? पीढ़ी दर पीढ़ी गांव में रह रहे लोगों के पास, अपने घरों के मालिकाने के भी कोई दस्तावेज़ नहीं होते. गायों के बछड़े-बछियां बड़े होते रहते हैं, आगे, ब्याह कर बछड़े-बछियां बढ़ाते जाते हैं. इनके मालिकाने के क्या और कौन से दस्तावेज़ तैयार होंगे ?

जिस व्यक्ति का सब-कुछ लुट चुका हो, जीवन भर की मेहनत किसी ने छीन ली हो, लुटेरे उनकी आंखों के सामने कट्टे लहराकर, ‘मुल्लो, ये तुम्हारे लिए ही हैं’ धमकाते हुए, ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए, उनकी रोज़ी-रोटी 40 लाख रुपये से भी ज्यादा का उनका पशु-धन लूटकर, उन्हीं को ‘गौ माता के हत्यारे’ ठहराते हुए, दिन-दहाड़े ले गए हों, उसे ये बोलना कि गायों के मालिकाने के कागज़ दिखाओ, उनके ताज़े, गहरे ज़ख्मों पर नमक-मिर्च रगड़ना तो है ही, इसका ये भी मतलब है कि ‘दफ़ा हो जाओ’.

उसी दिन, 30 जून का, ‘फ़रीदाबाद न्यूज़ टुडे’ का एक विडियो वायरल है, जिसे सभी पुलिस अधिकारियों, गृह मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट को देखना चाहिए. धौज़ थाने में, बजरंग दल के गुंडे पीड़ित मुस्लिम परिवार पर टूट पड़ रहे हैं, गालियां देते हुए, शिकायतकर्ताओं को ही बाहर खदेड़ रहे हैं और पुलिस वाले आराम से देख रहे हैं, तमाशबीन बने हुए हैं. कुटिल मुस्कान के साथ, बीच-बीच में बोल देते हैं, ‘ऐसा ना करो भई’!!

पुलिस स्टेशन का ये हाल है तो ये गुंडा-वाहिनी बाहर क्या हाल करेगी ? क्या ये सामान्य घटनाएं हैं ? क्या ऐसे मंज़र चुपचाप खड़े होकर देखना अपराध नहीं है ? जर्मनी में नाज़ियों के ऐसे ज़ुल्मों को, जर्मनी के लोग नज़रंदाज़ ना करते तो जर्मनी क्यों तबाह होता ? वहां गारत हुए करोड़ों लोगों में सब यहूदी नहीं थे.

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति पर अकेले ड्रेसडेन शहर पर इंग्लॅण्ड ने इतनी बमबारी की थी की एक ही रात में हिटलर की तथाकथित श्रेष्ठ आर्य नस्ल के 25,000 लोग मारे गए थे. पूरा जर्मनी खंडहर में तब्दील हो गया था. जर्मनी में आज भी, हिटलर, नाज़ी का नाम लेना या उसका स्वस्तिक का वह घृणित निशान बनाना क़ानूनी रूप से प्रतिबंधित है. क्या जर्मनी के लोगों को तब, और हमें अब, जर्मन पादरी मार्टिन निमोलर की, इस कविता से सीख नहीं लेनी चाहिए ?

पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था.

फिर वे ट्रेड यूनियन वालों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था.

फिर वे यहूदियों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था.

फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता.

‘गौ रक्षा’ के नाम पर, इस मुल्क ने पिछले 9 सालों में ऐसे ज़ुल्म देखे हैं, जिन्हें इतिहास, नाज़ियों के ज़ुल्मों की श्रेणी में ही नमूद करेगा. सभी शातिर अपराधी समझ गए हैं कि ‘जय श्री राम’ के जयकारे और भगवा गमछे के पीछे आसानी से छुपा जा सकता है. देश का भाई-चारा इन लंपट शैतानों ने अगवा कर लिया है.

ऐसा नहीं है कि ये उन्मादी, शातिर ज़मात समाज में बहुसंख्यक हैं, लेकिन वे जानते हैं कि समाज के अधिकतर ‘सुशिक्षित और सचेत’ लोग वे हैं, जो अख़बार में ऐसी दुर्दांत वारदातें पढ़कर, उसे मोड़ कर यथा-स्थान रखकर ‘अपने काम’ में लग जाते हैं. लक्कड़ के ठूंट की तरह संवेदनहीन, ‘सामान्य’ बने रहते हैं. मोटी चमड़ी वाली, ये स्वार्थी और कायर ‘तटस्थ’ ज़मात कितनी बड़ी अपराधी है, यह भी एक दिन निश्चित तय होना है.

फ़रीदाबाद ज़िले के एक गांव में, एक ग़रीब मासूम परिवार पर ढाया गया ये ज़ुल्म, यूं तो सारे देश के अमन पसंद लोगों को ही एक चुनौती है, लेकिन फ़रीदाबाद के लोगों की ज़िम्मेदारी सबसे ज्यादा है. यह उनकी हिम्मत और हौसले की परीक्षा है. अगर ये दुर्दांत अपराधी, क़ानून की गिरफ़्त से निकलने में क़ामयाब हो गए, अगर ये जेल में नहीं गए, और ज़मात अली को उनका सारे का सारा पशुधन वापस नहीं हुआ, तो ये अकेले ज़मात अली की नहीं, हम सब की हार होगी.

  • फरीदाबाद से सत्यवीर सिंह की रिपोर्ट

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