Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

हकीकतन सरदार पटेल तो गृहमंत्री बनने लायक भी नहीं थे

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 17, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

हकीकतन सरदार पटेल तो गृहमंत्री बनने लायक भी नहीं थे

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

संघी और भाजपाई सरदार पटेल के बड़े गुण गाते हैं और नेहरूजी को गरियाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि वास्तव में सरदार पटेल उतने समझदार थे ही नहीं जितना उन्हें दर्शाया जाता है, खासकर नेहरूजी के मुकाबले तो बिल्कुल नहीं. (फिर भी संघी-भाजपाई उन्हें प्रधानमंत्री बनने लायक मानते हैं जबकि हकीकतन तो वे गृहमंत्री बनने लायक भी नहीं थे. (उन्हें गृहमंत्री का पद भी गांधीजी के सामीप्य और नेहरूजी की मित्रता के कारण मिला था, उनकी अपनी योग्यता के आधार पर नहीं).

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

न जाने कितने ही सरदार पटेल के ऐसे निर्णय हैं जिन पर लम्बी बहस की जा सकती है, जैसे जूनागढ़ और हैदराबाद इत्यादि को भारत में मिलाने का, कश्मीर को छोड़ देने का और तो और राजस्थान के एक क्षेत्र को नाजायज तरीके से मुंबई को दे देने का भी. (आप सोच सकते हैं कहां बॉम्बे और कहां सिरोही, लेकिन फिर भी राजस्थान के निवासियों के जबरदस्त विरोध के बावजूद राजस्थान का एक प्रान्त पुनर्गठन अधिनियम के चलते राजस्थान के दिल माउंट आबू को निकालकर बॉम्बे को दे दिया.)

जी हां, आज़ादी के बाद जब रियासतों का विलयीकरण किया जा रहा था और छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर रेजीडेंसियां बनायी जा रही थी (ये सारा काम नेहरूजी की कृपा से सरदार पटेल को मिला, जिसे वे अपने सहयोगी वी. पी. मेनन की सहायता से अंजाम दे रहे थे. सो सारा राजपुताना रेसिडेंसियों का एक स्टेट राजस्थान बनाया गया लेकिन माउंट आबू जिसे राजस्थान का दिल कहा जाता है, माउंट आबू जो उस समय सिरोही रजवाड़े का हिस्सा था और राजस्थान जैसे सूखे मरुस्थलीय क्षेत्र में हरियाली युक्त खूबसूरत हिलस्टेशन और पर्यटन का केंद्र और देलवाड़ा समेत अनेकों प्रसिद्ध जैन मंदिरों की भरमार है, उसे राजस्थान से काटकर बॉम्बे को दे दिया था. (ज्ञात रहे अंग्रेजों के शासन में माउंटआबू गर्मियों के मौसम में राजपुताना रेसीडेंसी की राजधानी होता था) और उस समय गुजरात का कोई अस्तित्व तक नहीं था क्योंकि 80% गुजरात के इलाके बॉम्बे और 20% राजपुताना के अंडर में थे.

इसका एक मात्र कारण हिलस्टेशन होने से आय के स्रोत अच्छे थे. पटेल (चूंकि उस समय गुजरात तो था नहीं, इससे अपने आपको बम्बईया बाबू समझते थे और इसकी आमदनी अपने गृहराज्य बॉम्बे में शामिल करना चाहते थे. और इसी से राजस्थान की तमाम जनता और जनप्रतिनिधियों के कठोर विरोध के बावजूद अपनी मनमानी के चलते सरदार पटेल ने फरवरी 1948 में माउंट आबू के कारण पूरे सिरोही को राजस्थान से काटकर बॉम्बे में मिला दिया.

हालांकि समय राजस्थान के तमाम जनप्रतिनिधियों ने उस समय राजपुताना कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और राजस्थान के सबसे लोकप्रिय नेता गोकुल भाई भट्ट (गोकुल भाई भट्ट को राजस्थान में दूसरा गांधी या राजस्थान का गांधी माना जाता है और उनका जन्मस्थान भी सिरोही था) की अगुवानी में नेहरूजी से मिलकर उनके समक्ष भी अपनी बात रखी और जब नेहरूजी ने सरदार पटेल को इस बाबत निर्देश दिया तो सरदार पटेल ने नेहरूजी की बात को भी नजरअंदाज कर अपनी हठधर्मी पर अड़े रहे.

बाद में पुरजोर विरोध के चलते जब ये कहा गया कि अगर ऐसा किया गया तो राजपुताना क्षेत्र भारत में अपना विलयीकरण खत्म कर देगा क्योंकि न सिर्फ सांस्कृतिक तौर पर बल्कि गर्मियों की राजधानी जैसी बहुत-सी बातें है जिस कारण सिरोही या माऊंट आबू पर अपना हक़ राजपुताना रेसीडेंसी नहीं छोड़ेगी.

तब लम्बे विरोध के बाद नंवबर 1948 में सरदार पटेल ने अपना तानाशाही फैसला सुनाया कि सिरोही न बॉम्बे में रहेगा और न ही राजपुताना में, इसे भारत सरकार अपने अधीन रखेगी और इसका सारा प्रबंधन भी केंद्र सरकार करेगी. लेकिन सर्वसम्मति से ये फैसला होने के बावजूद दो महीने से भी कम समय में (गांधीजी की मृत्यु पश्चात) सिरोही को फिर से बॉम्बे में मिला दिया गया. अपनी इस मनमर्जी वाली जीत की बाबत सरदार पटेल ने अपने विश्वस्त कल्याणजी मेहता को एक पत्र भी लिखा था कि – ‘संभालो अब फिर से आपका हुआ माउंट आबू…’

बाद में फिर से जब राजपुताना रेसीडेंसी के प्रतिनिधि नेहरू जी मिले और हस्तक्षेप कर उनका हक़ वापिस दिलाने को कहा तो नेहरूजी ने उन्हें आश्वासन दिया कि राजपुताना की जनता की भावनाओं का न सिर्फ ध्यान रखा जायेगा बल्कि हम उनकी इस भावना का आदर भी करते है. और इस तरह 26 जनवरी 1950 को नेहरूजी के निजी हस्तक्षेप के कारण सिरोही को वापिस राजपुताना में मिलाने के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये.

लेकिन यहां भी काइयां सरदार पटेल एक चाल खेल गये और सिरोही के दो हिस्से कर दिये. जिस हिस्से में गोकुलभाई भट्ट का गांव था वो राजपुताना को दे दिया और माउंट आबू और देलवाड़ा वाला हिस्सा बॉम्बे में ही मिला रहने दिया. विरोध चलता रहा और अपने हक़ को वापिस पाने की मांगें भी लगातार उठती रही. राजपुताना की देखा-देखी बाकी रियासतों ने भी भाषा और संस्कृति के आधार पर उनके राज्य बनाये जाने की आवाज़े बुलंद होने लगी और इसी दरम्यान सरदार पटेल की मृत्यु हो गयी.

बाद में नेहरूजी ने तमाम रियाया की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए दिसंबर 1953 में फजल अली की अध्यक्षता में ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ बनाया, जिसके दो अन्य मुख्य सदस्य थे एच. एन. कुंजरू और के. एम. पणीक्कर. आयोग ने देशभर में जाकर लोगों की मांगों को सुना और सितंबर 1955 में अपनी फायनल रिपोर्ट बनाकर पेश की.

उसी रिपोर्ट के आधार पर 1956 में ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ पास हुआ और इसी अधिनियम के आधार पर 1 नवंबर 1956 को देलवाड़ा समेत माउंट आबू और सिरोही के बाकी हिस्से को राजपुताना का अभिन्न अंग माना गया और पुनर्गठन में राजपुताना रेसीडेंसी का नाम राजस्थान राज्य माना गया.

स्वदेश/स्वक्षेत्र का क्या महत्व है, ये दूसरे लोग (जो आज अफगानिस्तान से भागकर आ रहे हैं) अब समझ रहे हैं लेकिन हम राजस्थानी इसे शुरू से समझते हैं. और इसी कारण आज़ादी के बाद भी अपने हक़ की सबसे पहली लड़ाई हम राजस्थानियों ने ही लड़ी. और इस लड़ाई को लड़ने का कारण मुहैया कराया सरदार पटेल की अयोग्यता ने.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

क्या आदिवासी हिन्दू हैं ?

Next Post

अतीत और धर्म के नाम पर पीठ थपथपाना बंद करो

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

अतीत और धर्म के नाम पर पीठ थपथपाना बंद करो

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

भारतीय अर्थव्यवस्था के बर्बादी का 8 साला जश्न

May 28, 2022

गोडसे ने गांधी जी को क्यों मारा ? सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सके ?

December 19, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.