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Home कविताएं

कैसे हो मिर्ज़ा ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 11, 2024
in कविताएं
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पचहत्तर के बोयाम में
पांव घिसते हुए
जिस क्षरण से तुम वाक़िफ़ हो
सत्य की वह गंगा
अब किसी पांच सितारा होटल के नीचे बहते
गटर में समा गई है
इस शेरवानी और टोपी में
तुम एक चलन के बाहर का
सिक्का दिखते हो
क्या इतना भी नहीं मालूम तुम्हें

तुम्हारे दोस्त
अब हाईवे के समानांतर बने
परित्यक्त, जर्जर पुल बन गए हैं
अजीब बात है कि
नदी की वह धार
जो कभी बहती थी
उस पुल के नीचे से
अब सूख गई है
लोग बाग अब उस सूखी धार को
पैदल ही लांघ जाते हैं
उस समय लगता है जैसे कि
वे पुल को ढो रहे हैं माथे पर ।

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स्वप्न

कैसे हो मिर्ज़ा
और कहां है तुम्हारा दीवान
सुना है पिछले साल मेले में
सन्निपात का शिकार हो कर
जब तंबुओं पर टपक पड़ा था सूरज
जल गया था तुम्हारा दीवान
उस दिन तंबू को घेर कर खड़ी थी
बेतरा बांधे औरतें
नंग धडंग बच्चे
और ढेर सारे मर्द लंगोट में

मुझे याद है
तुम्हारा तंबू से बाहर आना
और ख़ाली हाथ तेज़ी से भागना
नदी की तरफ़
जहां तुम्हें तैरना पड़ा था
घुटने भर पानी में

चुंए का पानी
जब ज़ोर से थामकर चेहरा तुम्हारा
रगड़ रहा था रेत पर
कुछ गिद्ध भोज के इंतज़ार में थे
लेकिन, तुम बच निकले

आज तुम शरणार्थी हो
दियारा में बनी मेरी मड़ई में
सरकंडे की जालीदार छाँव में
दिन गुजरता है तुम्हारा
लू के हुलास का
गंडक में ख़ुदकुशी करने तक

चुनिंदा रातें
उछाल देती हैं
कुछ मटमैले सिक्के आसमान पर
नदी से चुनकर
फिर अपनी खुरदरी हथेलियों से
रगड़ रगड़ कर चमका देती हैं उन्हें
लेकिन, आख़िर तक नहीं मिलती
उन रातों को चांदी के कंगन

ऐसी उदासी के माहौल में
तुम्हारी फटी हुई टोपी की
लाल कलगी
बांग देता है
और फिर एक बार पूछता है
कैसे हो मिर्ज़ा ?

2

सुबह सुबह
कचरे के ढेर से
उस आदमी की एक टांग झांकी है
जैसे कि उसने
किसी पहाड़ की चोटी पर चढ़ कर
मारी हो गेंद को एक लात
और भारसाम्य खो कर
गिर गया हो खाई में

खाई में
कूड़े का ढेर है
और है सतत सड़न की प्रक्रिया

मैंने सोचा तो याद आया
उस टांग के उपर टंगे आदमी का चेहरा

दुनिया के सबसे बड़े आततायी लोगों की
प्रेम कहानियों की तरह
एक द्विअर्थी चेहरा

जानुस ?

नहीं नहीं
वह तो देवता होते हुए भी
मानुष था

क्लिओपाट्रा का पति ?

नहीं नहीं
वह तो श्रापित था

वह कोई चंगेज़
कोई तैमूर भी नहीं था

वह कोई
शोकाकुल अशोक भी नहीं था

लेकिन
इतना तो तय था कि
वह कोई बैल हांकने वाला किसान
या लोहा पीटने वाला लोहार भी नहीं था

वह इस शहर में नया नया था
और मेरे सिवा बहुत कम लोगों से
पहचान थी उसकी

इसलिए डरा हुआ था मैं
कहीं मुर्दा घर से मेरी बुलाहट न आ जाए
उसकी पहचान के लिए

अगर ऐसा हुआ तो
क्या कहूंगा मैं

क्या मैं कह सकूंगा इमानदारी से
कि ये आदमी
मरने के पहले
उतना भी ज़िंदा नहीं था
जितना आप सब समझ रहे हैं

फिर तो ये सवाल भी उठेगा कि
कितनी मरी हुई है ये लाश

सच कहूं तो
मेरे पास दोनों प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है

दरअसल किसी के पास नहीं है

कौन कौन ज़िंदा दिखते हुए
कितना मरा हुआ है
और कौन कौन मरा हुआ दिखते हुए
कितना और कहां कहां ज़िंदा है
किसी को नहीं मालूम

मैंने भी मृत रति की आराधना से
यौवन प्राप्ति के लिए
खजुराहो की शरण ली है

आप लोगों में से कईयों ने
देह के अमरत्व की तलाश में
ममी के उबटनों को बाज़ार में ढूंढा होगा

मैं भी
अपनी छाया को अनंत लंबाई
देने की कोशिश में
करोड़ों शब्दों और विंबों की रोशनी में नहाता
रहा हूं

उपसंहार में
हम सभी को
उस पुरानी गेंद को
किक मारते हुए
लुढ़क जाना है
अपनी अपनी चोटियों के पीछे बने
कूड़े दान में

आप ही बताएं
लाश देख कर
कैसे दावे से कोई कह सकता है कि
ये किस ज़िंदा आदमी की है

अगर ये लाश किसी
अधमरे आदमी नुमा किसी प्राणी की हो तो
कितना सच होगा आपका कहा हुआ

इसलिए मैंने फ़ैसला किया है कि
अब से किसी भी लाश को पहचानने के लिए
उस बर्फीले, सर्द कमरे में
नहीं जाऊंगा मैं

3

पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर
बदरंग दीवार की एक खुरचन
तुम्हारी बिंदिया समेटे
आईने की कतरन
बर्फ़ की लड़ियों का पिघलते हुए
टप टप कर छज्जे के नीचे
पानी के कटोरे में गिरने की आवाज़
गर्म कड़ाही में फोड़न की छौंक से
उठता धुंआ
और कलाई पर उभरे
तुम्हारी उंगलियों के निशान

सबकुछ समेट कर कंगाल मन
जब निकलता है कोई यात्रा पर
कहीं लौटने के लिए
पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर

जो ईंटें बच गई
दीवारें, छत बनाते हुए
उनके तिर्जक में क़ैद आग में
सिंकती रोटियाँ
और जीभ निकाल कर
हाँफता हुआ कुत्ता
ठंढे राख पर निढाल जिस्म
स्वर्ग के द्वार तक जो सहयात्री था
उसकी मलिन कुंठा का उद्गार
कृष्ण की बांसुरी सा बुलाता है

पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर
साथ रह जाती हैं शहर की रोशनियां
और गलियों के अंधेरे
सस्ते चाय खाने की मेज़ पर उभरे
पसीने की छाप
हमारी उंगलियों के निशान
सवारियों के दरवाज़े के हैंडल पर

वे जब चाहेंगे ढूंढ लेंगे हमें
गीले फ़र्श पर उभरे
हमारे पैरों के निशान से
बुझे हुए अलाव पता देते हैं
बंजारों की टोली का

और मेरे उतरन
जो बिखरे पड़े हैं यहां वहां
कुछ शब्दों के ढेर पर
इन रेतीले ढूहों पर
कभी गाता था कोई मलंग
रात के सन्नाटे में
ढूंढ लेंगे वे

आवर्जना के स्रोत में
निष्प्रभ बहते हुए
पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर
जितना कुछ समेट लेते हो तुम
कहीं उससे ज़्यादा छोड़ जाते हो पीछे
अकिंचन समुद्र
लौटता है बच्चे को उसकी गेंद
थोड़ा नमक के साथ

हम सब अधूरे लौटते हैं घर
और, अचानक डूबने से पहले
उंकड़ु बैठ जाते हैं कुछ पल
वो दूर पहाड़ी की चोटी पर

पूरी तरह से कोई नहीं लौटता घर

  • सुब्रतो चटर्जी

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