आज ही देख रहा था कि अभी भी इज़रायल में 93 फ़ीसदी यहूदी इस युद्ध के पक्ष में हैं. लाखों लोगों के मन में यह सवाल करोड़ों बार उठा होगा कि जो क़ौम ख़ुद दशकों तक सताई गई, वह इतनी कठोर और हिंसक कैसे हो गई ? जो-कुछ समझ में आया, मैं नीचे लिख रहा हूं.
इन सबके भीतर अपने होमलैंड को मज़बूत बनाने की ग्रंथि मौजूद है, जो 19वीं सदी के आख़िर में यूरोप में सताए जाने के समय पनपनी शुरू हुई थी. ज़ायोनिज़्म के राजनीतिक आंदोलन का उभार का केंद्रीय बिंदु ही यही था.
फिर अंग्रेज़ों की मदद से वे जेरूसलम और फ़िलिस्तीनी के इलाक़ों में बसे, तो उसके बाद दो चीज़ें हुईं. पहला, यहूदी-अरब टकराव की शुरुआत और जर्मनी में हॉलोकास्ट. इस होलोकास्ट ने यहूदियों के भीतर एक गहरा डर और अस्तित्व की चिंता पैदा कर दी.
1948 में इज़रायल बनते ही युद्ध और मार-काट का शुरू हुआ सिलसिला अब तक चल रहा है. इस तरह के लगातार युद्ध और असुरक्षा के माहौल ने इज़रायल को एक सुरक्षा-केंद्रित समाज बना दिया है. वहां के नेता बार-बार ‘दोबारा नहीं’ के नैरेटिव को हवा देते हैं.
जब कोई मुल्क सिक्योरिटी स्टेट बन जाता है, तो समाज का पूरा विमर्श ही इस पर टिक जाता है कि उसके अस्तित्व को ख़तरा है और उसे दुश्मनों से निपटना पड़ेगा, जैसे अपने यहां हो रहा है. ऐसे में समाज का सैन्यीकरण होता है, दुश्मन की छवि गढ़ी जाती है, डर और ध्रुवीकरण का माहौल गाढ़ा होता है.
साथ में आता है संकीर्ण राष्ट्रवाद. वहां की राजनीतिक धाराओं ने यहूदियों के भीतर यह धारणा मज़बूत कर दी है कि राज्य की पहचान यहूदी पहचान से जुड़ी होनी चाहिए. समाजशास्त्र में एक धारणा है एथनो-एक्सक्लूज़न की. यानी, अपनी पहचान के अलावा समाज में जो भी दूसरी अस्मिताएं हैं उनको मानने से इनकार कर देना.
इज़रायली-यहूदियों का बड़ा हिस्सा यही कर रहा है. वह अरब की ज़मीन हड़पकर वहां यहूदी वर्चस्व क़ायम रखते हुए अरबों को दोयम दर्जे के नागरिक की तरह ट्रीट करता है और उन्हें ख़त्म करने की कोशिश करता है.
इसके बावजूद, वहां का राजनीतिक तबक़ा समाज को यह डर दिखाता है कि अरबी मूल के लोग तुम्हें कमज़ोर कर सकते हैं. इसलिए, वह उन पर हमलावर बने रहो. यानी स्टेट आइडेंटिटी के साथ-साथ डेमोग्राफ़िक वर्चस्व और नस्लीय श्रेष्ठता का कॉकटेल इस क़ौम को लगातार पिलाया गया है.
जिस इलाक़े में इनकी शुरुआती बस्ती बनी, वह मिश्रित आबादी वाला इलाक़ा है. जेरूसलम पर यहूदियों के अलावा ईसाइयों और मुस्लिमों की भी दावेदारी है. तीनों के लिए यह पवित्र स्थल है. इस बैकग्राउंड में चीज़ों को समझने पर बेहतर पता चलेगा कि वहां धुर-दक्षिणपंथी नैरेटिव में जनता का बड़ा तबक़ा क्यों फंसा.
ऐसे नैरेटिव में एक्सक्लूसिव दावेदारी को हवा दी जाती है और सामंजस्य को ख़तरा बताकर पेश किया जाता है. जिस सुरक्षित होमलैंड की बात ऊपर कही गई है, वही वजह है कि आज भी दुनिया का कोई भी यहूदी इज़रायल पहुंच जाए, तो उसे तुरंत नागरिकता मिल जाती है. यही नहीं, वहां के ज़्यादातर यहूदी भी दोहरी-नागरिकता लिए हुए हैं. वह इसे ‘सेफ़ ऑप्शन’ के तौर पर देखते हैं.
वहां का मीडिया पूरी तरह सेना की यूनिट की तरह काम करता है. इज़रायलियों को ग़ज़ा या फ़िलिस्तीन के किसी भी इलाक़े की ख़बरें सेना से फ़िल्टर होकर मिलती हैं. उन्हें उनकी पीड़ा में अपनी जीत दिखाई देती है. अपना राज्य, अपनी ताक़त, अपना साम्राज्य.
पीड़ित पृष्ठभूमि की वजह से भय, राष्ट्रवाद, वर्चस्व और पिछले कई दशकों से सुपरपावर अमेरिका से मिली असीम और बेशर्त समर्थन ने इज़रायली-यहूदियों के मन में अजेय होने का भी भ्रम डाल दिया.
वह कठोर से हिंसक बनता चला गया और जिस जुल्म का वह ख़ुद सताया था, वह दूसरों पर ढाने लगा. वरना कोई सामान्य व्यक्ति यह सोच भी नहीं सकता कि तेल अवीव या हाइफ़ा शहरों में लोग अपने घर में छिपने के लिए बंकर ऐसे बनाते हैं, जैसे हम-आप बेडरूम या बाथरूम.
जब बम, मिसाइल से सुरक्षा को आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतार दिया जाता है, तो समाज की करुणा ख़त्म हो जाती है. वह बचेगा तो किससे ? ज़ाहिर है किसी दुश्मन से. तो दुश्मन को ख़त्म करना उसका टास्क बना दिया और वह ख़ून की हनक में डूब गया.
- दिलीप खान