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बांग्लादेश से आदर्श संबंध : जब सरकार ही आदर्श बोल रही है तो हम आप क्या बोलेंगे ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 29, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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रविश कुमार

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुई हिंसा को आप केवल बांग्लादेश का मान कर नहीं देख सकते. एक ही हिस्से से निकले भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों मुल्कों में धार्मिक आधार पर नफ़रत चरम पर है। तीनों देशों में एक-दूसरे से सारी वाहियात चीज़ें सीखने वालों की कमी नहीं है.

दुर्गा पूजा पंडाल में क़ुरान रखने की घटना भारत के लिए अनजान नहीं है. आए दिन मंदिर और मस्जिद में मांस फेंक कर एक दूसरे को भड़काने की घटनाएं होती रहती हैं. बताने की ज़रूरत नहीं है इसलिए सांप्रदायिकता आज दुनिया की बड़ी राजनीतिक और धार्मिक समस्याओं में से एक है क्योंकि दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में है. अनंत कथाएं लेकर हर पक्ष हाज़िर है और एक दूसरे से आशंकित है.

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अगर आप बांग्लादेश में हो रही सांप्रदायिक हिंसा को, अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर होने वाले हमले को समझना चाहते हैं तो हिन्दू में छपे इस लेख को पढ़ सकते हैं. राउद्रो रहमान का यह लेख है। इसका सार यहां बता दे रहा हूं कि घटना के बाद क्या क्या हुआ. बाक़ी आप भी पूरा लेख पढ़ें –

  • दुर्गा पूजा पंडाल में क़ुरआन रखने के बाद हुई हिंसा की 70 से अधिक घटनाओं के संबंध में 400 से अधिक लोग गिरफ्तार किए गए हैं. बांग्लादेश के 22 ज़िलों में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं.
  • जहां से घटना शुरु हुई, उस पंडाल में क़ुरआन रखने की घटना में शामिल दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, इसके बाद भी हिंसा नहीं थमी. हिन्दुओं के मंदिरों पर हमले शुरु हो गए. दुकानों और घरों को भी निशाना बनाया गया. इतना होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक शब्द नहीं बोला. एक सप्ताह बाद सीसीटीवी फ़ुटेज की मदद से बांग्लादेश की पुलिस ने क़ुरआन रखने वाले इक़बाल हुसैन को गिरफ्तार कर लिया.
  • बांग्लादेश के गृहमंत्री का बयान है कि इक़बाल ने ऐसा किया है लेकिन उसे किसी ने उकसाया होगा. हम उसके बारे में भी पता लगाएंगे.
  • बांग्लादेश के हिन्दू, बौद्ध, क्रिश्चियन एक्य परिषद के महासचिव राणा दासगुप्ता ने कहा कि जब भी कोई गिरफ्तार होता है उसे मनचला या पागल बता दिया जाता है. यह पूर्व नियोजित साज़िश है. सरकार की जवाबदेही है कि पता लगाए किसने किया. हम यहां शांति और सद्भावना के माहौल में रहना चाहते हैं.
  • मानवाधिकार संस्थाओं ने भी बांग्लादेश की सरकार की आलोचना की है और कहा है कि ऐसी हिंसा पहली बार नहीं हुई है. सरकार ठीक से कदम उठाए. यही बात भारत के संदर्भ में मानवाधिकार संस्थाएं बोल दें तो प्रधानमंत्री मोदी तुरंत बयान देने आ जाएंगे कि भारत को बदनाम किया जा रहा है. हिन्दू की इस रिपोर्ट में है कि हिन्दुओं ने पूर्व की हिंसा में कोई कार्रवाई न होने की बात कही है. तब भी भारत कहता है कि बांग्लादेश उसका आदर्श पड़ोसी है.
  • बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि हिंसा में शामिल लोगों को सज़ा मिलेगी..हिंसा प्रभावित स्थलों पर सरकार के मंत्रियों ने दौरा किया है. मंत्रियों ने हिन्दू समुदाय को भरोसा दिलाया है कि उन्हें सुरक्षा मिलेगी और मुआवज़ा मिलेगा. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे नज़र रखें कि कोई सांप्रदायिक सद्भाव को नुक़सान न पहुंचाए. इस्लाम दूसरे धर्म की अवमानना की इजाज़त नहीं देता है.
  • प्रधानमंत्री हसीना ने यह भी कहा है कि बांग्लादेश के बड़े पड़ोसी को हालात के प्रति संवेदनशील होना चाहिए. भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक के साथ हो रही हिंसा की तरफ़ इशारा करते हुए शेख़ हसीना ने कहा कि उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए कि वहां कुछ न हो जिससे हमारे देश में हिन्दू समुदाय पर असर हो. इसके बाद भी भारत के विदेश सचिव ने कहा कि बांग्लादेश के साथ आदर्श संबंध हैं.
  • बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर हिंसा की इन घटनाओं पर अफ़सोस जताया है और कहा है कि पचास साल पहले जिन लोगों ने बांग्लादेश की आज़ादी का विरोध किया था वे लोग आज तक नफ़रत फैला रहे हैं. वे बांग्लादेश के सेकुलर, ग़ैर-कम्युनल और बहुलतावादी साख को ख़राब करना चाहते हैं.
  • क्या भारत का विदेश मंत्रालय त्रिपुरा और गुरुग्राम की घटना पर कुछ कहना चाहेगा ? कभी भारत का ऐसा किरदार हुआ करता था, आज इस तरह के बयान जारी कर बांग्लादेश भारत को शर्मिंदा कर रहा है.
  • विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि इस साल दुर्गा पूजा के मौक़े पर प्रधानमंत्री हसीना ने हिन्दू कल्याण ट्रस्ट को तीस लाख टाका दिया है.

हिन्दू अख़बार में छपी इस लंबी रिपोर्ट से कुछ बिन्दुओं का हमने हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि जिन्हें अंग्रेज़ी से दिक़्क़त है वे इसे समझ सकें, बाक़ी लोगों से निवेदन है कि पूरे लेख को पढ़ें. काफ़ी लंबा है लेकिन बांग्लादेश के समाज की विभाजन रेखाओं को पहचानने में मदद मिलती है. बाक़ी जिसे आईटी सेल और गोदी मीडिया के बहकावे में रहना है वो तब भी रहेगा. आप कुछ भी लिख दें या बोल दें, उसे बांग्लादेश के हिन्दुओं से कोई मतलब नहीं है. उसके लिए यह मुद्दा केवल खुराक है जिसके नाम पर वह यहां के मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलाता है, वर्ना ऐसे लोग रवीश कुमार से नहीं नरेंद्र मोदी से पूछ रहे होते कि आपने क्या किया ?

मुसलमानों से नफ़रत करना इस देश के एक बड़े तबके का मुख्य राजनीतिक काम बन चुका है. यह तबका हर दिन
अलग-अलग जगहों से और अलग-अलग प्रकार के मुद्दों को ले आता है जिसे आगे कर नफ़रत की अपनी सोच को सही साबित करता है. ख़ुद सौ मुद्दों पर चुप रहने वाला दूसरों से हिसाब मांगेगा क्योंकि इसे पता है कि यही वो मुद्दा है जिससे हर नाकामी पर पर्दा डाला जा सकता है.

बात अब नाकामी की भी नहीं रही. जनता के एक बड़े वर्ग को हमेशा के लिए इस सांचे में ढाल दिया गया है जहां मुसलमान हमेशा दूसरा है. उसे किसी सफ़ाई से मतलब नहीं है, निंदा से मतलब नहीं है, वह हर निंदा के बाद इस तरह के बहाने ले आता है और चुप्पी का कारण पूछता है. अगर वह अपने ही बोलने की बेवक़ूफ़ियों को समझ लेता तो दूसरों की चुप्पी से परेशान नहीं होता.

इस ‘दूसरावाद’ से नुक़सान मुसलमानों को तो हुआ ही है, हिन्दुओं को भी हुआ है. ‘दूसरावाद’ के इस ज़हर से उनके बच्चों को दंगाई बनाया जा रहा है. विष बनकर कोई अमृत नहीं पा सकता. सात सालों में नफ़रत की इस राजनीति का अंजाम आपने देख लिया. क्रिकेटर शमी के साथ जो हुआ वो त्रिपुरा से लेकर गुरुग्राम में हज़ारों से हो रहा है. फ़र्क़ है कि शमी के साथ सचिन तेंदुलकर हैं लेकिन तेंदुलकर उस सहवाग के ख़िलाफ़ नहीं हैं जिसने पटाखों के बहाने दूसरावाद को हवा दी. महताब आलम का लेख इस दूसरावाद के ज़िम्मेदार लोगों को पहचान रहा है.

भारत के विदेश सचिव ने कहा है कि बांग्लादेश से आर्दश संबंध है. उन्होंने ये बात बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के पंडाल पर हुए हमलों के बाद कही है. बांग्लादेश की सरकार ने हिंसा में शामिल कई लोगों को गिरफ्तार भी किया है लेकिन भारत में ऐसी राजनीति और भाषा बोलने वालों को माला पहनाया जा रहा है. ऐसे में जनता उचित ही प्रधानमंत्री मोदी की जगह रवीश कुमार से जवाब मांग रही है क्योंकि उसे पता है जवाब देने में सक्षम कौन है.

उम्मीद है आप धर्म की असुरक्षा की राजनीति को समझेंगे, नहीं समझेंगे तो भी कोई बात नहीं. हम मान लेंगे कि उन्होंने आपको दंगाई बनाने में अच्छी मेहनत की है. आपको डॉक्टर बनाने की हमारी मेहनत में कुछ कमी रही होगी. याद रखिएगा सांप्रदायिकता इंसान को मानव बम में बदल देती है.

त्रिपुरा की घटना हो या गुरुग्राम की, आप किसी को किसी से अलग नहीं कर सकते. न आर्यन ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद कही गई बातों को क्रिकेटर शमी को कही गई बातों से अलग कर सकते हैं. ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए हर तरफ़ संगठित भीड़ खड़ी कर दी गई है. इनमें से एक में भी बीजेपी का नाम सुनाई नहीं देगा लेकिन बीजेपी की जीत के लिए काम करने वाले संगठनों के नाम सुनाएंगे.

इस तरह से हिंसा का यह काम ऐसे संगठनों और जनता के बीच बनी स्वतःसंगठित भीड़ के हवाले छोड़ दिया गया है. ऐसी घटनाओं का स्केल और रेंज इतना बड़ा हो चुका है कि आप लाख कोशिश कर लें कुछ न कुछ छूटता है. छूटेगा. दिल्ली में ही हो रही इस तरह की घटनाएं पकड़ में नहीं आती. दिल्ली दंगों को लेकर जिस तरह की जांच हुई है वह भी छूटता ही जा रहा है. कितनी चीज़ों पर कहां कहां कोई समेटे ?

मुख्यधारा की मीडिया के पास अब न रिपोर्टर है और न रिपोर्टिंग का बजट. जो बोल रहा है उसी पर बोलते रहने का भार लादा जा रहा है. त्रिपुरा की घटना को नज़रअंदाज़ भी किया गया है लेकिन इसके कई कारणों में एक कारण यह भी है. अब सारा सवाल कवरेज़ होने या न होने, पोस्ट लिखने या न लिखने पर आकर टिक गया है.

इस पूरी बहस में वह व्यवस्था ग़ायब है जिसकी ज़िम्मेदारी है नागरिकों के हक़ों की रक्षा करना. कितना आसान हो गया है कि किसी मस्जिद पर हमला कर दीजिए और कह दीजिए कि पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया जा रहा था. पाकिस्तान ज़िंदाबाद बोला जा रहा था. यह अजीब दौर नहीं है, इस दौर के लिए जो तैयारी की गई है उसका अंजाम है.

रोज़ ही यहां लिखता हूं. रोज़ ही आप पढ़ते हैं लेकिन हिंसा की मशाल लिए यह राजनीति रुकने का नाम नहीं ले रही है. ऐसा लगता है कि इसका एक ही मक़सद है सांप्रदायिकता का विस्तार. इतना व्यापार कर दिया जाए कि केवल बोलने और न बोलने वाला अपराधी कहे जाने लगें, जो अपराध कर रहे हैं वो किसी की साइड खड़े होकर देवता बन जाएं.

मैं बांग्लादेश पर न लिखूं या त्रिपुरा पर न लिखूं, जो लिख रहा हूं, बोल रहा हूं, उसमें हमेशा ही ऐसी घटनाओं को लेकर चिन्ताएं शामिल रही हैं. वो काफ़ी नहीं है तो कुछ भी काफ़ी नहीं है और हिंसा का यह दौर अनंत असीमित होता जा रहा है.

त्रिपुरा पर ख़ुद भी पढ़ने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ीं. थोड़ा बहुत द वायर हिन्दी में ही एक दो लेख मिले. स्क्रोल में भी रुददेब शाहिद ने लिखा है. हर जगह की रिपोर्टिंग में पूरी बात नहीं है. वायर में एक्सप्रेस को कोट किया गया है. यह एक नया चलन है. इसी तरह संसाधनों की कमी पूरी हो रही है. मैं लिखूंगा तो एक्सप्रेस से लेकर वायर और स्क्रोल को कोट करूंगा.

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