
कनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़
इस देश में लाश को खुद के खेत में गड़ने की हैसियत नहीं है. वर्ष 2025 की जनवरी में ही छत्तीसगढ़ के बस्तर के गांव छिंदावड़ा तहसील डबरा से पेचीदा, मर्मांतक और इंसानियत को तार तार कर देने वाला एक मामला सुप्रीम कोर्ट में भी जाकर औंधे मुंह गिर पड़ा. हमारे संविधान को भी अब न्यायपालिका से शत प्रतिशत उम्मीद नहीं होनी चाहिए.
सुभाष बघेल महरा दलित जाति में पैदा होकर ईसाई धर्म में चला गया था. 1986-1987 से उसने पास्टर या पादरी का भी काम किया. लंबी बीमारी से उसकी मृत्यु 7 जनवरी 2025 को हो गई. बेटे और परिवार ने अपने ही गांव छिंदावड़ा में ईसाई प्रथा के मुताबिक पिता का शव दफनाना चाहा लेकिन गांव के कई व्यक्तियों के उन्मादित विरोध के कारण दफनाना नहीं हो सका.
बेटे रमेश ने उसी दिन डबरा के थानेदार और टोकापाल के अनुविभागीय अधिकारी को लिखित शिकायत कर संरक्षण मांगा. मदद नहीं मिली. उसने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में तत्काल रिट याचिका दायर की कि अपने पिता को गांव में ही दफनाना चाहता है, वहीं उसके कुछ पूर्वजों को दफनाया भी जा चुका है.
छिंदावड़ा तथा अन्य निकट ग्राम पंचायतों ने लिखा कि उनके गांव में ईसाइयों को दफनाने के लिए कोई जगह पंचायत द्वारा पंचायत अधिनियम के तहत अधिसूचित नहीं की गई है. याचिकाकार ने कहा कि पंचायत द्वारा वर्षों से उसी जगह कब्रिस्तान का हिस्सा समझकर ईसाई शवों को दफनाने की मौखिक मंजूरी दी जाती रही है. उसने कई उदाहरण और फोटोग्राफ पेश किए.
राज्य ने कहा कि आसपास के चार गांवों छिंदावड़ा, मुंगा, तीरथगढ़ और दरभा को मिलाकर छिंदावड़ा से बीस पच्चीस किलोमीटर दूर ग्राम करकापार में ईसाइयों के लिए निर्धारित कब्रिस्तान में शव को दफनाया जा सकता है. दिमागपच्ची नहीं करते हाई कोर्ट ने बस इस जवाब से ही संतुष्ट होकर याचिका खारिज कर दी. कह दिया शव छिंदावड़ा में दफनाने की कोशिश की जाएगी तो जनता में असंतोष और लोक व्यवस्था के भड़कने की सम्भावना होगी. सुझाव दे दिया कि शव को ग्राम करकापाल में दफनाना बेहतर होगा.
सरकार की ओर से अतिरिक्त पुलिस सुपरिंटेंडेंट ने शपथ पत्र में बताया कि छिंदावड़ा की कुल आबादी 6450 है. उनमें 6000 आदिवासी तथा 450 महरा जाति के दलित हैं. उनमें 350 हिन्दू महरा दलित हैं. केवल 100 लोग महरा ईसाई हैं. रमेश बघेल के दादा लखेश्वर बघेल और अन्य रिश्तेदार शांति बघेल को वहीं शव दफनाने की इजाजत दी गई थी क्योंकि वे ईसाई नहीं हिन्दू थे.
हालांकि सरकार ने कोई सबूत नहीं दिया. कहा जन्म, मृत्यु, विवाह वगैरह कर्मकांडी परंपराओं से चलते हैं. जिसने भी ये परंपराएं छोड़ दीं, उन्हें इनसे वंचित होना पड़ेगा. इसलिए भी हिन्दू से ईसाई बने व्यक्ति के शव को वहीं दफनाने की इजाज़त नहीं मिल सकती. मृतक परिवार ने लाचार होकर शव को जगदलपुर के मेडिकल कॉलेज के सरकारी अस्पताल के शव गृह में भेज दिया.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस नागरत्ना ने लिखा छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 49 (12) के अनुसार शवों, पशु शवों, पशुओं और अन्य घृणोत्पादक पदार्थों के डिस्पोजल के लिए स्थानों का रेगुलेशन करना पंचायतों का कर्तव्य है. नियम 3 के मुताबिक किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के 24 घंटे के अंदर उसके शव को गाड़ने, जलाने या अन्यथा डिस्पोजल करने के लिए संबंधित व्यक्तियों और ग्राम पंचायतों को कार्यवाही करनी होगी.
नियम 5 के तहत ग्राम पंचायतों द्वारा सम्यक रूप से ग्राम में प्रशिक्षित, लिखित आदेश द्वारा अनुमोदित स्थान से भिन्न स्थान जो श्मशान घाट हो, या जो कब्रिस्तान हो, या सरकार द्वारा अवधारित हो, या शासकीय अभिलेखों में स्थान हो से भिन्न स्थान में शव को जलाकर, गाड़कर या उसे अन्यथा डिस्पोजल के लिए उपयोग में नहीं लाया जाएगा.
पिछले वर्षों में विवादित मृत्यु होने पर बार बार पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा है. सरकार ने कहा ईसाई मृतकों के शव को दफनाने के लिए कोई मौखिक अनुमति दी भी गई होगी, तो उससे इस मृतक के पक्ष में अधिकार पैदा नहीं होता.
बेटे रमेश बघेल ने छिंदावड़ा के पटवारी द्वारा बनाया नज़री नक्शा भी पेश किया, जिसमें ईसाई शवों को दफनाने की पुरानी घटनाएं दर्शाई गई हैं. याचिकाकार के वकील कॉलिन गोंजाल्वीज़ ने दो टूक कहा कि संविधान में है कि रमेश बघेल पिता का शव अपने ही खेत में दफना सकता है.
चतुर सुजान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संवैधानिक बहस से बचते केवल व्यावहारिक सुझाव दिया कि मृत्यु तिथि से 20 दिन हो चुके हैं इसलिए शव को करकापाल के शव गृह में ले जाकर दफनाने का आदेश दिया जाए. कमिश्नर ने 14 ईसाइयों के शपथ पत्र भी पेश किए गए जिनके रिश्तेदारों को भी उसी जगह दफनाया गया था. सरकार ने भी माना कि 20 ईसाई व्यक्तियों को उसी जगह दफनाने की मौखिक इजाज़त दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने पाया मामले को अनावश्यक रूप से भड़काया जा रहा है. ग्राम पंचायतों और अधिकारियों की हठधर्मी के कारण मामले को उलझाया गया. अधिसूचना प्रकाशित करने में चूक भी हुई है, खमियाजा दूसरा क्यों भुगते ? करकापाल गांव में ही ईसाईयों को दफनाने का कोई विश्वसनीय दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका. कोर्ट ने कहा हाई कोर्ट को देखना चाहिए था कि यदि रमेश बघेल द्वारा अपनी ही कृषि भूमि में पिता के शव को दफनाने की अनुमति मांगी गई तो उस पर विचार क्यों नहीं किया गया.
जस्टिस नागरत्ना ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के शपथ पत्र पर कड़ी टिप्पणी की कि यदि कोई परंपरा से अलग हो जाता है तो उसे शव को दफनाने का अधिकार नहीं मिलेगा. कहा इससे तो सीधे सीधे अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन हुआ है. उन्हें इस प्रकरण में संविधान के मकसद ‘धर्मनिरपेक्षता‘ और बंधुत्व (Fraternity) का भी अपमान हुआ लगता है. मृतक को सम्मानजनक ढंग से दफना दिया जाता, तो संवैधानिक मर्यादा में गरिमामय स्थिति हो सकती थी.
बेहतर होता सहयोगी जज सतीश चंद्र शर्मा फैसले को जस का तस कबूल कर लेते तो बतंगड़ नहीं बनता. अचरज है जस्टिस शर्मा जस्टिस नागरत्ना के समाधानकारक सुझाव से सहमत नहीं हो पाए. जस्टिस शर्मा ने भी माना कि किसी व्यक्ति को दफनाना मृतक व्यक्ति के भी मूल अधिकार में शामिल है लेकिन दावा नहीं किया जा सकता कि उसे दफनाने का स्थान चुनने की भी आज़ादी है. हर मृतक को भी मूल अधिकार अनुच्छेद 21 में हैं. अनुच्छेद 21 कहता है किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं.
एक हाइपोथीसिस जस्टिस शर्मा ने बना दी कि किसी भी व्यक्ति को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता, अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता, लोक व्यवस्था संबंधी प्रावधानों के तहत ही होगी. ग्रामीणों के उत्तेजक विरोध के या शांति भंग होने तथा हिंसक गतिविधियों के भी हो जाने की संभावना को जज ने लोक व्यवस्था का भंग होना समझा. शर्मा ने कहा कि मृतक और उसके परिवार को अबाधित अधिकार नहीं मिलता कि उसे कहां दफनाया जाए.
अचरज है, छः हज़ार लोगों के गांव में इसके पहले 30, 35 पुलिस वाले पहुंचकर लोक व्यवस्था सम्हाल लेते थे. अब क्या अजूबा हो जाता ? लोक व्यवस्था की परिभाषा इतनी कामचलाऊ नहीं होती. जिस बस्तर में नक्सलियों के उन्मूलन के नाम पर हज़ारों लाखों पुलिसकर्मी मौजूद हैं, और कत्लेआम और हत्याएं सैकड़ों, हज़ारों में हो रही हैं, एक गांव के कुछ ग्रामीण संवैधानिक प्रावधानों का विरोध करें तो लोकव्यवस्था भंग होने का खतरा कैसे मान लिया जाए ?
दो जजों में मतभेद हो गया. जस्टिस शर्मा की असहमति ने एक समाधानकारक फैसले में उलझन पैदा कर दी. 7 जनवरी से मृत व्यक्ति के शव को कब्रिस्तान के चयन के लिए बीस दिनों तक अस्पताल/मेडिकल कॉलेज की निगरानी में पड़ा रहना पड़ा. मृतक के साथ हादसा होने से अपमान हुआ, अन्याय हुआ.
शायद जस्टिस नागरत्ना को मन मसोसकर साथी जज की बात मानने में उदार होकर अपने फैसले में व्यावहारिक दृष्टि अपनानी पड़ी. जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले के अंत में राष्ट्रपिता गांधी को भी याद किया कि हमारा जीवन तो क्षणिक है. सौ बरस भी जिएं तो अनंत काल में उसका क्या महत्व ! लेकिन यदि हम इंसानियत के समुद्र में डूब जाते हैं तो हम उसकी गरिमा के साथ जीते हैं.
एंबुलेंस और पुलिस की व्यवस्था करने की बात तो जले में नमक छिड़कने जैसी है. अनुच्छेद 14, 15, 25 तथा अनुच्छेद 21 में मनुष्य के अस्तित्व की गरिमा को ध्यान में रखते हुए जस्टिस नागरत्ना का फैसला लागू हो सकता था. हालांकि वह भी व्यवहारिक हल ही था. एक सम्भावित फैसला वर्गों, जातियों और संप्रदायों के बीच एकता और सहिष्णुता की समझ की भावना को कायम कर सकता था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नीयत और समझ नकारात्मक नहीं ही रही होगी.
आपको संविधान निर्माण की सुरंग में ले चलता हूं. इसका खुलासा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की बेंचों में भी नहीं हुआ और न वकीलों ने ही मुद्दा उजागर किया. संसद और विधानसभाओं द्वारा कानून बनाने का अधिकार संविधान की सातवीं अनुसूची में है. सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के क्रमांक 5 में राज्य सरकार पंचायतों का भी गठन कर सकती है, जो मौजूदा मामले के लिए 1993 में किया गया है.
29 नवंबर 1948 को संविधान सभा के सदस्य एस. नागप्पा ने साफ साफ पूछा था – मैं कहना चाहता हूं कि देश की अभागी संतानों के लिए क्या अलग अलग कब्रिस्तान या श्मशान बनेंगे या इस अनुच्छेद की भाषा में ये सभी बातें आ जाती हैं ? डॉ. अंबेडकर को जवाब देना मुश्किल था कि कैसे अलग अलग धर्मों की सदियों से चली आ रही अलग अलग व्यवस्थाओं को संविधान के एक अनुच्छेद में शामिल कर लिया जाए.
फिर अंबेडकर ने दो टूक कहा – मैं कहना चाहता हूं कि लोकसमागम या ‘पब्लिक रिसोर्ट‘ शब्द के तहत श्माशान और कब्रिस्तान भी शामिल होंगे, यदि राज्य किसी कब्रिस्तान या श्मशान का रखरखाव करता है तो प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह अपने शरीर को वहां दफनाए या दाहकर्म कराए. यह अंबेडकर का आश्वाासन देखने में सुप्रीम कोर्ट में चूक तो हो गई.
नागप्पा की आपत्ति के कारण ही संविधान के अनुच्छेद 15 को इस तरह पढ़ा जाता है कि राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा, जिनमें सार्वजनिक समागम के स्थानों का उपयोग शामिल है. उसे लेकर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अयोग्यता, दायित्व, निबंधन या शर्त के अधीन नहीं होगा.
छत्तीसगढ़ ने ऐसा अधिसूचित करने में साफ साफ लापरवाही की है. उसी पर जस्टिस नागरत्ना ने भी कड़ी टिप्पणी की है. यह बड़ी संवैधानिक चूक है. अनुभव सिन्हा की प्रसिद्ध फिल्म आर्टिकल 15 इसी तरह के विरोधों का स्पर्श करते हुए बनाई गई है.
Read Also –
[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

कनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़