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भारत सरकार बस्तर के बच्चों की हत्या और बलात्कार कर रहा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 10, 2025
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आज़ादी के अमृतकाल का जश्न मना रही भारत की मोदी सरकार छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी युवाओं का जहां नरसंहार कर रही वहीं आदिवासी युवतियों के साथ बलात्कार को अंजाम दे रही है और बच्चों को गोली मार रही है. हालत इतनी ख़राब है कि एक छह माह के बच्चे के हाथों की ऊंगलियों को इसलिए काट दिया ताकि वह बड़ा होकर बंदूक़ न चलाये. यही चीज़ आगे बढ़कर गर्भ में ही बच्चों को मारने की परंपरा यह ब्राह्मणवादी फासीवादी सत्ता करती है, जिसका एक विभत्स रुप गुजरात नरसंहार में समूची दुनिया ने देखा, जिसमें गर्भ चीरकर अजन्मे बच्चे को त्रिशूल में घोंपतर नाच रहा था.

बस्तर, छत्तीसगढ़ में मौजूद खनिज संपदा को लूटने और अडानी को देने के लिए ही मौत का नंगा नाच किया जा रहा है. अमित शाह बार बार छत्तीसगढ़ का दौरा कर रहा है. छत्तीसगढ़ के स्थानीय गुंडों, लंपटों यहां तक की माओवादी गुरिल्लों के कमजोर तत्वों को लाखों का प्रलोभन देकर सरकारी बलों का हिस्सा बनाया जा रहा है, और खनिज संपदा के लूट में बाधा बने माओवादी गुरिल्लों के साथ साथ स्थानीय लोगों का नरसंहार कर रहा है.

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वे लोग जो माओवादियों के ख़ात्मे के लिए नाच रहे हैं और माओवादियों पर हमला कर रहे हैं, इतिहास में ग़द्दार के तौर पर कलंकित किये जायेंगे. भारत का जनमानस राम की भी पूजा करता है, रावण का भी पूजा करता है, लेकिन ग़द्दार बिभीषण को घृणित दृष्टि से ही देखता है. ब्राह्मणवादी फ़ासिस्ट अमित  शाह के जिस लाखों रुपये के प्रलोभन पर अपने ही रक्षकों का नरसंहार कर रहे हैं, काम निकल जाने के बाद मक्खी की तरह निकाल फेंके जायेंगे.

बस्तर के संसाधनों की लूट जारी है, इन संसाधनों के लूट का विरोध करने वाले लोगों का बस्तर में नरसंहार जारी है. ख़ासकर छोटे छोटे बच्चों की हत्या कर रहा है. लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहा है. वेबसाइट ‘द पोलिस प्रोजेक्ट’ ने 13 मार्च 2025 को इस पर अंग्रेज़ी में एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है, जिसे श्रेया खेमानी ने लिखा है और हिन्दी अनुवाद ‘मनीष आज़ाद’ ने किया है, हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं- सम्पादक

भारत सरकार बस्तर के बच्चों की हत्या और बलात्कार कर रहा है
भारत सरकार बस्तर के बच्चों की हत्या और बलात्कार कर रहा है । (तस्वीर में बांयी ओरः शॉल ओढ़े हुए रमली, छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अस्पताल में अपने मां से लिपटी हुई. फोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए श्रेया खेमानी)

रमली 17 साल की है, लेकिन जब अस्पताल में वह अपनी मां के पीछे से निकल कर सामने आई तो वह महज 14 साल की लग रही थी. उसकी रीढ़ सीधी थी और उसकी दृढ़ और नर्म आंखे पैनी निगाहों से हमें देख रही थीं. एक शॉल में लिपटी हुई वह, बेहद खामोश थी और गहरी निगाहों से सब कुछ देख रही है. यदा-कदा वह मुस्कुरा देती थी. छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित, भैरमगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से मिले पर्चे पर बस इतना लिखा था कि कोई बाहरी वस्तु उसकी रीढ़ के पास धंस गई थी और बिना किसी व्याख्या के उसे दूसरे अस्पताल भेजने की संस्तुति की गई थी.

रमली के साथ उसके मातापिता राजे और विज्जा व साथ में पास के एक गांव की एक युवती रीना थी. वे भैरमगढ़ से दंतेवाड़ा, दंतेवाड़ा से जगदलपुर अस्पताल दर अस्पताल दौड़भाग करते रहे. किसी ने भी उन्हें यह नहीं बताया कि आखिर क्या गड़बड़ है. लेकिन सभी लोग हालत के चिंताजनक होने के प्रति उन्हें आगाह कर रहे थे. हर बार, अस्पतालों से उन्हें यही समान निर्देश मिलता था – ‘इन्हें बड़े अस्पताल में भेजा जाए.’

लगभग 5 दिन बाद जब उसे राज्य की राजधानी रायपुर के एक अस्पताल में लाया गया तब डॉक्टरों ने यह स्पष्ट किया कि रीढ़ के पास धंसी वह बाहरी वस्तु एक बुलेट थी. बाद में ऑपरेशन थिएटर के एक पर्चे से यह पता चला कि यह बुलेट 2.5 सेमी x 5 मिमी की थी. 12 दिसंबर को पुलिस ने रमली की पीठ में गोली मारी थी. गोली उसकी गर्दन के पिछले हिस्से से होकर निकली थी और जबड़े की हड्डी से कुछ मिलीमीटर दूर फंसी हुई थी.

‘पुलिस हमारी बच्ची को गोली कैसे मार सकती है ?’ रमली के मातापिता अविश्वास से पूछते हैं. 14 दिसम्बर, 24 को जब उन्होंने अपना घर छोड़ा था तो उन्हें नहीं पता था कि वे उसी दिन वापस नहीं लौट पायेंगे. वे इलाज और सर्जरी में लगने वाले लम्बे समय के लिए तैयार नहीं थे. वे पहनने के लिए कोई अतिरिक्त कपड़ा, सर्दियों के लिए गरम कपड़ा लेकर नहीं आये थे और न ही उनके पैरों में चप्पल थी. रायपुर अस्पताल ने जब यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटी की रीढ़ की हड्डी में फंसी चीज़ गोली है, तब तक तीन दिन बीत चुके थे और पिछले 24 घंटों से उनके मुंह में एक निवाला भी नहीं गया था.

अगले कुछ दिनों में, जब उसके तमाम परीक्षण कराये जा रहे थे और ऑपरेशन करने वाली टीम अपनी तैयारी कर रही थी तब रमली के मातापिता कुछ समय आईसीयू में अपनी बेटी के साथ रहते, और कुछ समय अस्पताल की छत पर बिताते थे. मरीजों के परिवारजनों ने अस्पताल की छत पर ही अपने रहने का अस्थाई प्रबंध कर लिया था. वहां वे सार्वजनिक शौचालय में नहाते और अपने कपड़े धुलते थे. और उसे सर्दियों की धूप में सुखाते थे. वे खाने और सोने के लिए कार्डबोर्ड के बक्सों के और चटाइयों के टुकड़े बिछाते थे और अपने प्रियजनों के स्वस्थ होने आशा और प्रार्थना करते थे. इस मौन इंतज़ार के दौरान ही विज्जा अचानक बताने लगते कि रमली को गोली कैसे मारी गई. उन्होंने हाथ से बन्दूक चलाने का इशारा करते हुए कहा- ‘उन्होंने हमारे बच्चों का पीछा किया और उन्हें गोली मार दी.’ आगे उन्होंने कहा – ‘हम कोसरा की खेती कर रहे थे. वे ऐसा कैसे कर सकते हैं ?’

बस्तर में राज्य द्वारा मोर्टार से दागे गए गोलों का परिणाम बच्चों के लिए भयानक होता है. फ़ोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए जेनी इन्दवार.

माओवादी विद्रोह से लड़ने के नाम पर आज बस्तर दुनिया के सबसे ज्यादा सैन्यीकृत क्षेत्रों में से एक बन चुका है. 2019 से ही इस क्षेत्र में करीब 250 सुरक्षा कैम्प स्थापित हो चुके हैं. नागरिक समाज की एक रिपोर्ट बताती है कि अगस्त 2024 के बाद यहां 9 नागरिकों पर 1 सुरक्षाकर्मी तैनात है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अबूझमाड़ में (जिस जंगल में रमली का घर है) महज पिछले एक साल में अर्ध सैनिक बलों और राज्य के पुलिस बलों ने 8 सुरक्षा कैम्प स्थापित किये हैं तथा हाल के महीनों में कई अग्रिम चौकियां खोली हैं.

अब यह अच्छी तरह दर्ज हो चुका है कि बड़े पैमाने पर हो रहे इस सैन्यीकरण से स्थानीय निवासियों के मानव अधिकारों के लिए गंभीर खतरा बना रहता है. बस्तर के लोगों ने, समय-समय पर राज्य की ऐसी नीतियों की बुराइयों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है. उन पर थोपी गई लम्बी चौड़ी सड़कों और विकास के सैन्य-औद्योगिक मॉडल जैसी दूरी को नष्ट करने वाली प्रौद्योगिकी के माध्यम से किये जाने वाले आक्रामक विकास के विकल्प का प्रस्ताव दिया है.

पिछले वर्ष 11 और 12 दिसम्बर को, बस्तर की अबूझमाड़ की पहाड़ियों में नारायणपुर और बीजापुर जिले की सीमाओं पर ‘डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड फ़ोर्स’, ‘स्पेशल टास्क फ़ोर्स’ व ‘सीआरपीएफ़’ ने एक क्षेत्र प्रभुत्व अभ्यास (area domination exercise) चलाया था. अगम्य अबूझमाड़ जंगल एक समय माओवादियों का मजबूत गढ़ माना जाता था जो दक्षिण छत्तीसगढ़ में 4000 वर्ग किमी में फैला हुआ है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने जंगल में एक ‘मुठभेड़’ में 7 माओवादियों को मार डाला. हालांकि, गांव वालों का कहना है कि पुलिस ने उस वक्त गोलियां चलाई जब वे खेती कर रहे थे. पुलिस की इस फायरिंग में बच्चों समेत 6 निर्दोष ग्रामीण मारे गए थे और कई घायल हुए थे, जिसमें रमली और अन्य बच्चे भी शामिल थे.

30 दिसम्बर, 24 और 1 जनवरी, 25 के बीच 4 लोगों की तथ्यान्वेषी टीम के हिस्से के तौर पर मैंने नारायणपुर ज़िले में कुम्मम गांव और उससे घिरे जंगलों में भ्रमण किया. हमारी टीम घायलों, मारे गए लोगों के परिवारों और प्रत्यक्षदर्शियों से मिली. हमारी जांच में यह बात सामने आई कि गांव वालों को घेरा गया, उनका पीछा किया गया और यहां तक कि उनको निशाना बनाने की लिए ड्रोन का भी इस्तेमाल किया गया. तथा उन्हें नज़दीक से गोली मारी गई. घायल होने वाले लोगों में, 8-14 साल के बच्चे थे. मारे गए लोगों में, 3 कमोबेश नाबालिग थे और बाकी 20-22 साल के थे.

लगातार चल रही राज्य समर्थित प्रति-बग़ावत कार्यवाइयों ने बस्तर के जंगलों को युद्ध क्षेत्र में बदल डाला है. यहां आदिवासी बच्चे और ग्रामीण राज्य की क्रूर हिंसा का सामना कर रहे हैं. बस्तर के सैन्यीकरण के कारण नियमित “मुठभेड़” हो रही है, जिसमें बच्चों को गोली मारी जा रही है, नागरिकों की हत्या की जा रही है, और पूरे समुदाय को आतंकित किया जा रहा है. इस क्षेत्र के लोगों से न्याय दूर चला गया है क्योंकि न्यायेतर हत्याओं के मामलों में सरकार जवाबदेही को नज़रंदाज़ करती है. माओवादी उग्रवाद से लड़ने के नाम पर अनवरत जारी यह हिंसा बस्तर के नौजवानों से उनका बचपन और अक्सर उनका जीवन ही छीन लेती है.

बस्तर में बच्चों का शिकार

डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड फ़ोर्स के दो युवक रमली और उसके माता-पिता व रीना के साथ रायपुर आये. DRGF के एक कर्मी ने कहा- ‘सर ने मुझे केवल 1000 रुपये दिए और कहा कि मैं इतने में ही सभी को खाना खिलाऊं और ज़रूरत की सभी चीज़ें खरीद लूं. मैं क्या करूं ?’ पुलिसवाले अभी भी इस बात पर झगड़ रहे थे कि कौन सा विभाग दोष की ज़िम्मेदारी लेगा और बिल भरेगा.

उसकी उम्र 20-22 साल की थी. उसका साथी थोड़ा और छोटा था, और वह DRGF में केवल एक हफ्ते पहले शामिल हुआ था. यह उसकी पहला नियुक्त काम था. वे दोनों सहपाठी थे. DRGF में अन्य लोगों की तरह वे दोनों भी गोंड आदिवासी थे. जैसे कि रमली और उसके मातापिता थे. उनकी मातृभाषा एक थी लेकिन काम के दौरान वे अलग ज़बान में बोलते थे.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने रीना का फोन जब्त कर लिया. इससे उनकी असुरक्षा का पता चलता है. हर बार जब तथ्यान्वेषण टीम रमली और उनके परिवार के साथ अकेले में समय पाती तो DRGF कर्मी हमारी तरफ़ दौड़ कर आते ताकि हमारी बात चीत सुन सकें. उन्हें जो आदेश मिला था वह बहुत साफ़ था और उनका भय उनके चेहरे पर दिख रहा था. रमली के मातापिता और रीना ने बताया कि जब भी हम अस्पताल से जाते, तो पुलिस के ये लोग सवाल करते हुए और धमकी देते हुए उन्हें भाषण देने लगते – ‘तुमने एक्टिविस्टों को क्यों बुलाया ?, एक बार तुम गांव पहुंचो फिर मैं तुम्हें देख लूंगा.’

DRGF छतीसगढ़ का एक विशेष पुलिस बल है जिसमें मुख्यतः निचली कतारों के भूतपूर्व नक्सली और कुख्यात राज्य समर्थित प्रति बग़ावत अभियान सलवा जुडूम में विस्थापित हुए ग्रामीण हैं. इस तथ्य के बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़-साफ़ कहा है कि प्रति-बग़ावत अभियानों में आदिवासी युवकों का इस्तेमाल असंवैधानिक है. लेकिन पिछले दो दशकों में बहुत से ऐसे विशिष्ट कार्यवाई बल गठित हुए हैं जिनमें या तो पूरी तौर से या अधिकांशत: आदिवासी युवक ही हैं. जैसे DRGF व बस्तरीया बटालियन. यह पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले का खुला उल्लंघन है.

इस फैसले में कहा गया है- ‘इनमें से अनेक आदिवासी युवा, उनके या उनके परिजनों और जिस समाज में वे रहते हैं, उसके अन्य लोगों के खिलाफ की गई हिंसा के कारण पहले से ही अमानवीकृत हो चुके हैं…उनके साथ ऐसी भावनाओं का इस्तेमाल करना और उन्हें प्रतिविद्रोह कार्यवाइयों में ढकेलना, जिसमें इन युवाओं की जान गंभीर खतरे में पड़ जाती है, यह एक स्वस्थ समाज बनाने के मानदंडो के खिलाफ है.’

कोर्ट ने अत्यंत कड़े शब्दों में आगे कहा – ‘कुछ गुमराह नीति निर्माताओं द्वारा माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में ऐसी अमानवीकृत संवेदनाओं के उपयोग को अवसर के रूप में करने की ज़ोरदार वकालत करना सबसे गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय होना चाहिए और सबसे गंभीर संवैधानिक निंदा का पात्र होना चाहिए.’

लेकिन बस्तर रेंज के भूतपूर्व आईजीपी एस.आर.पी. कल्लूरी जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सुप्रीम कोर्ट की इस भावना के खिलाफ गर्व से DRGF को इस रूप में व्याख्यायित करते हैं- ‘भूतपूर्व नक्सलियों की निचली कतारों के कैडर, पूर्व में माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले, सलवाजुडूम के दौरान बेदखल हुए ग्रामीण, जिन्हें प्यार से भूमिपुत्र कहा जाता है, इन सबमें विद्रोहियों से अपनी जमीन को पुनः प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा है.’

इसी तरह बस्तरिया बटालियन सीआरपीएफ़ के अधीन एक स्पेशल फ़ोर्स है जिसमें सभी आदिवासी हैं. इसमें भूतपूर्व माओवादियों को पुलिस मुखबिर के रूप में शामिल किया गया था. आदिवासियों की अपनी ज़मीन के बारे में उनकी भू-स्थानिक जानकारी व अनुभव का लाभ उठाने के लिए ऐसा किया गया था.

जिस दिन रमली की रायपुर में सर्जरी होनी थी उसके एक दिन पहले एक बच्चा दंतेवाड़ा ज़िला अस्पताल से भाग गया था. 13 साल के सितराम ने काफ़ी कुछ सह लिया था. उसका ईलाज हो चुका था और उसे छुट्टी मिल गई थी लेकिन फिर भी पुलिस उसे और एक दूसरे बच्चे सोनू ओयाम को अस्पताल में और लम्बे समय तक रखना चाहती थी. उन्हें दुबारा से भर्ती करने के लिए पुलिस ने डॉक्टरों से यह लिखवा लिया था कि इन बच्चों का मलेरिया का ईलाज चल रहा है.

देश में बस्तर उन इलाकों में से एक है, जहां वार्षिक तौर पर मलेरिया की सबसे ज़्यादा घटनाएं होती हैं. लेकिन सितराम वहां मलेरिया के ईलाज के लिए नहीं आया था. वह भी वहां गोली लगने के कारण आया था. पुलिस की एक गोली उसकी एक जांघ को चीरती हुई दूसरी जांघ से निकल गई थी. रमली की तरह ही उसे भी पुलिस ने उसी काम्बिंग ऑपरेशन में गोली मारी थी. उसने अस्पताल से इसलिए भागने की कोशिश की ताकि वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हो सके. उसके पिता मासे ओयाम को भी पुलिस ने उसी समय गोली मारी और उनकी मौत हो गई.

इण्डिया टुडे के एक लेख में इस कार्यवाई की तैयारी के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है, इस लेख में दंतेवाड़ा के DRGF कैम्प में चल रही ‘गहमागहमी’ का बहुत साफ़ तौर से वर्णन किया गया है. स्थानीय कमांडर ने टुकड़ी के लड़के और लड़कियों से कहा कि वे अग्रिम निर्देश के लिए तैयार हो जायें – यह एक ऐसा विवरण था जिससे पता चलता है कि प्रति विद्रोह (माओवादियों के विरूद्ध-सं.) की कार्यवाइयों में शामिल होने वाले लोगों की उम्र क्या थी.

रिपोर्ट के अनुसार सुदूर क्षेत्रों में फोन कॉल पर निगरानी रखने वाली एक एजेंसी को पता चला कि दक्षिण बस्तर में स्थित जंगल में एक पहाड़ी के ऊपर से एक फ़ोन कॉल हुआ है: ‘यह एक ऐसी जगह थी, जहां से आम नागरिक का फ़ोन करना मुश्किल था.’ यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी गई. इसके बाद ‘इस कॉल का विश्लेषण किया गया. इसे ज़मीनी ख़ुफ़िया सूचना के साथ और UAVs ( Unmanned Aerial Vehicles) से मिले चित्रों के साथ मिलाया गया और यह समझा गया कि इस क्षेत्र में कोई माओवादी कैम्प हो सकता है.’

कमांडर ने जब उस स्थान के बारे में बताया और कार्यवाई के दृष्टिकोण के बारे में बताया. तब उन्होंने अपने वाहनों को लोड किया और ऑपरेशन के लिए तैयार हो गए. रिपोर्ट बताती है कि ‘शिकार शुरू हो गया.’

एक नागरिक द्वारा एक फ़ोन करने से इस जगह को माओवादी कैम्प ‘समझ लिया गया’ और ‘शिकार शुरू हो गया.’ इसी शिकार के दौरान रमली को गोली लगी और सितराम के पिता मारे गए. इसे ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साईं ने एक बड़ी सफलता का नाम दिया. समाचार पत्रों ने लिखा सात सशस्त्र और वर्दीधारी माओवादी मारे गए. माओवादियों ने भी अपना बयान ज़ारी किया कि मरने वालों में 5 सामान्य नागरिक थे.

दूसरी तरफ़, पुलिस ने प्रेस रिलीज़ों में अपनी ही बात का खंडन कर दिया. 12 दिसम्बर को जारी प्रेस रिलीज़ में जंगल में मुठभेड़ की जगह कल्हाज़ा और दोंदरवेदा के बीच बताई गई. लेकिन बाद में 18 दिसम्बर की प्रेस रिलीज़ में बताया गया कि मुठभेड़ का स्थान रेकवाया, लेकावादा, कोंदाराकोती और बेहबेदा था. पहली प्रेस नोट में मुठभेड़ का समय सुबह 3 बजे बताया गया, जबकि दूसरी प्रेस रिलीज़ में यह समय सुबह 8 बजे का था.

जब ग्रामीणों ने पत्रकारों और एक्टिविस्टों से संपर्क किया तब रमली, सोनू, जयराम और सितराम के घायल होने की खबर सामने आई और इस कथित ‘मुठभेड़’ के बारे में कुछ ज़ाहिर से सवाल पैदा होने लगे. पुलिस ने एक दूसरा बयान जारी किया. जब वे इस बात को साबित करने में नाकाम रहे कि इन बच्चों के शरीर में लगी गोली पुलिस की नहीं है तब वे यह आरोप लगाने लगे कि माओवादी इन बच्चों को ‘मानव ढाल’ के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे.

बस्तर रेंज के मौजूदा IGP सुन्दरराज पत्तिलिंगम ने इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक इन आरोपों से सम्बंधित द पोलिस प्रोजेक्ट द्वारा भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. हालांकि, जनवरी में IGP बस्तर ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया अखबार से कहा था कि ग्रामीणों पर गोली चलने और बच्चों को घायल करने के लिए सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ लगाये गए आरोप ‘झूठे और मनगढ़ंत’ हैं. उन्होंने बच्चों के मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किये जाने के दावे को भी दोहराया.

‘मुठभेड़’

रमली से मिलने के कई दिनों के बाद हमें यह पता चला कि दरअसल क्या हुआ था. एक स्वतन्त्र तथ्यान्वेषी टीम के हिस्से के रूप में हम एक दिन पूरा पैदल चल कर अबूझमाड़ के जंगलों में स्थित उसके 13 घरों वाले गांव कुम्मम तक पहुंचे थे. 11 दिसम्बर की सुबह, पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने कुम्मम पेंडा की पहाड़ियों पर चढ़ना शुरू कर दिया. (पेंडा – गोंडी में इस शब्दावली का प्रयोग उस स्थान के लिए किया जाता है जहां झूम खेती की जाती है)

हर वर्ष, कुछ महीनों के लिए अबूझमाड़ (माड़) जंगलों के ग्रामीण अपना सामान बांधकर आस पास की पहाड़ियों में उनके द्वारा साफ़ की गई ज़मीन पर कोसरा नामक मोटा अनाज, दाल, टमाटर और बड़े आकार वाले खीरे की खेती करते हैं. वे वहां पर कोसरा के कटने तक अस्थाई आश्रय व कैम्प बनाते हैं. इस सुन्दर लेकिन कठिन भूदृश्य में श्रम को नियोजित किया जाता है – यहां कौन क्या करेगा, इसका एक अनकहा नियम होता है.

अतः, 11 तारीख की सुबह सभी पुरुष और लड़के कोसरा इकट्ठा कर रहे थे और सभी औरतें और लड़कियां या तो उरद तोड़ रहीं थीं या श्रम के पुनुर्त्पादन के लिए खाना बनाना, साफ़-सफ़ाई और पानी भरने जैसा काम कर रही थीं. बच्चे खेल रहे थे. ठीक इसी समय, गोलियां चलने की आवाज़ हवा में तैर गई, और अबूझमाड़ की पहाड़ियों में गूंजने लगी.

ग्रामीणों का कहना था कि जब पुलिस कुम्मम पेंडा में घुसी और गोलियां चलने लगी तो एक गोली 8 साल के सोनू ओयाम के सिर को छीलते हुए चली गई. वह अपनी काम कर रही मां मासे के पास ही थोड़ी दूरी पर खेल रहा था. मासे अपने बच्चे की ओर दौड़ी, उसका घाव साफ़ किया और उसे कस कर चिपका पेज (बासी भात से बनने वाला एक पेय पदार्थ) पिलाया.

बाद में अपने बयान में उसने सोनू के बारे में कहा – ‘वह हमेशा से एक शांत बच्चा रहा है. वह अधिक नहीं बोलता. लेकिन वह बहादुर है, निडर है. लेकिन दूसरी तरफ अब मैं बहुत डरी हुई हूं. मैं डरती हूं कि पुलिस फिर से आएगी और वही करेगी जो उसने किया है. वे यहां इसके पहले कभी नहीं आये. वे हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं ? हम तो महज कोसरा की खेती कर रहे थे. कोसरा की फसल काटने वाले लोगों को अकारण ही वो लोग यहां आकर कैसे मार सकते हैं ?’

गांव वालों का कहना था कि जब वे खेती कर रहे थे, तो पुलिस ने उन पर गोलियां चलाई जिसमें नाबालिगों समेत 6 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या हुई. फ़ोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए जेनी इन्दवार

कुछ गोलियां चलने के बाद सभी बड़े बच्चे, युवक और युवतियां अपने को बचाने के लिए पहाड़ी पर जंगल की ओर भागे. गांव की बूढ़ी महिलाओं ने, जो उनकी माताएं और चाचियां थीं, बताया कि उन्होंने अपनी आंख से देखा कि पुलिस उन पर बन्दूक ताने उनका पीछा कर रही थी. तब महिलायें पुलिस के पीछे भागते हुए, उनसे हाथ जोड़ने लगीं कि वे गोली न चलायें.

हमने उनसे कहा – ‘वे हमारे बच्चे हैं, कृपया उन्हें गोली न मारें. लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं सुना. इसकी बजाय वे हमारी ओर मुड़े और बन्दूक तानते हुए हमें गोली मारने की धमकी देते हुए बोले कि अगर हमारे पीछे आओगे तो गोली मार देंगे.’ 16 साल की सोमारी की मां आइते ओयाम ने बताया – ‘वे अपने साथ कुत्ते भी लाये थे. क्या हम जानवर हैं. क्या वे कुत्तों से हमारे शिकार करते ?’

सोमारी उन 16 लोगों में से एक थी, जो जंगल में छिपने की जगह तलाशने के लिए काफ़ी दूर भाग गए थे. तभी भागते वक्त उनका सामना जंगली सुअरों के एक समूह से हुआ. जो इधर-उधर भागने लगे जिससे उनका भागना रुक गया. इसी समय, विपरीत दिशा से गोली चलने की आवाज़ आई और उन्हें अहसास हुआ कि पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया है. 18 साल के मनीष ओयाम ने कहा – ‘सुअरों ने हमारी जान बचा ली. यदि ये सुअर नहीं होते तो हम दौड़ते-दौड़ते सीधे उनकी गोलीबारी की ज़द में आ जाते और मारे जाते.’

वे 16 लोग जाड़े की सर्द रात में चीन घास (यह लम्बी घास इस क्षेत्र की एक समस्या भी है) के बीच छुपने के जगह पा गए. उनकी माताएं और चाचियां, जो पुलिस की बन्दूक के कारण वापस लौट गई थीं, ने बताया कि उन्होंने पूरी रात गोलियों की आवाज़ नहीं सुनी. हालांकि, अगली सुबह गोलियों की आवाज़ ने उनके कान फाड़ दिए. वे सबसे बुरे की आशंका करने लगे. जो 16 लोग छुपे थे उसमे से 10 बच गए और उन्होंने अपना अनुभव बयान किया. रमली उनमें से एक थी. 12 दिसम्बर की सुबह उनके सिर के ऊपर ड्रोन उड़ने लगा और शायद घास में छिपे डरे हुए निशस्त्र ग्रामीणों को चिन्हित भी कर लिया गया, और इसके बाद भी पुलिस ने उनपर गोलियां चला दी.

मनीष, सुदरी और सुनीला ने अपना कठिन अनुभव बयान किया. जब वे चुपचाप लम्बी घास के पीछे छिपे थे तो उन्होंने पुलिस को गोंडी में बात करते हुए सुना, ‘क्या हम उन्हें ज़िन्दा पकड़ें या फिर सीधे गोली मार दें.’ पुलिस उनसे कुछ ही मीटर दूर लम्बी घास के बीच खड़ी थी और घास की उस जगह को चारों और से घेरे हुए थे. तीनों ने जो बताया उससे यह प्रतीत होता है कि पुलिस ने रणनीतिक तौर पर घास के बीच खुलने वाली एक जगह के नज़दीक एक छोटा स्थान खुला छोड़ रखा था.

कुछ बातचीत के बाद उनमें से एक ने उत्तर दिया, ‘चलो अब उन्हें सीधे गोली मार दें.’ ठीक इसी समय, तकरीबन 19 साल का मोतू ओयाम उठा और उस छोटी खुली जगह से भागने लगा. एक सीटी बजी और फिर कुछ गोलियां चलीं. छुपे हुए लोग जब तक अपनी पलक झपकाते, मोतू मर चुका था. इसके बाद, 18 साल का नेवरू और सोमारी के अलावा सभी लोग भयभीत हो कर भागने लगे.

18 साल के मनीष ने बताया – ‘दौड़ते हुए मैंने ज़मीन पर ही छलांग लगाई जिससे गोली मुझे लगने की बजाय रमली को लग गई.’ एक अन्य नौजवान जयराम को दौड़ते हुए बाएं हाथ में गोली लगी. 15 से 19 साल के बीच के सुदरी, मुन्नी, और सुनील ने जयराम और रमली की मदद की. और उन्हें अपने साथ ले गए. धुंधलका होने तक वे इदवा गांव पहुंच गए थे, जो कुम्मम से लगभग 3 घंटे की पैदल की दूरी पर था.

सुदरी ने कहा – ‘हम सिर्फ़ यही सोच पा रहे थे कि कैसे इन दोनों को (जिन्हें गोली लगी थी) सुरक्षित पहुंचाया जाए.’ उसी शाम को मनीष, सांति, कमली, माते और तुलसी करीब चार घंटे की दूरी पर स्थित कुमनार गांव पहुंचे. उनमें से एक 18-20 साल की रामा ओयाम ग़ायब था. तब, उसे खोजने के लिए पुलिस ने कोई भी ड्रोन नहीं उड़ाया.

उस छिपने वाली जगह पर भय से जो दो लोग अभी भी छिपे हुए थे, उसमें नेवरू को शायद भागने के प्रयास में गोली लगी. गोली लगने के बाद वह शायद कुछ दूर तक खुद को घसीटता चला गया था, जहां उसका शव घटना के 6 दिन बाद 18 दिसम्बर को वहां पहुंचे ग्रामीणों और पत्रकारों को मिला. जहां तक सोमारी की बात है, नज़दीक ही भागकर छिपने में कामयाब होने वाले लोगों में से एक व्यक्ति ने, उसकी चीखें सुनी. उसने कहा – ‘वे आवाज़ ऐसी लग रही थी, मानो किसी पर हमला किया जा रहा हो.’ लेकिन उसने पुलिस के डर से आवाज़ को पहचानने से इनकार कर दिया.

बाद में सोमारी को गोली मार दी गई थी. कुछ दिनों बाद जब उसकी मां अईते ने अंततः उसके शव को देखा (जब उसे बॉडी बैग से निकाला गया और दफ़नाने की तैयारी की गई). तब उसे अहसास हुआ कि उसकी बेटी की चीख़ का क्या मतलब था. अईते ने बताया ‘उसके निजी अंग बुरी तरह ज़ख़्मी थे. ऐसा लगता था कि उसके साथ बलात्कार किया गया था.’ परिवार को अभी तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं दी गई है.

लगभग 23 साल के कोहला ओयाम घास में छिपने वालों में से एक थे. उनकी भी भागते समय गोली मार कर हत्या कर दी गई. वे तीन छोटे बच्चों के पिता थे. 11 तारीख को जब पुलिस ने पेंडा में प्रवेश किया तो उसकी पत्नी बुधरी पानी लाने बाहर गई थी और बच्चे उसकी ही देख रेख में थे. केवल 2 साल का राईनू कोहला की गोद में था, जब पुलिस की गोली से बचने के लिए वह भागे.

बुधरी को लगा कि आगे दौड़ने से पहले उसने बच्चे को कहीं सुरक्षित जगह छोड़ दिया था. लेकिन इस बारे में वह सुनिश्चित नहीं है. हो सकता है कि वह बच्चे को अपने साथ ही ले गया हो और राईनू छिपने वाले लोगों के साथ ही हो. वह निश्चित रूप से नहीं कह सकती क्योंकि कोहला की हत्या हो गई थी और बुधरी घटना के दो दिन बाद ही राईनू से मिल पाई.

पुलिस ने पता नहीं कहां से इस बच्चे को उठाया और उसे पैदल चल कर लेकवादा लेकर आये. वहां पर एक बूढ़े व्यक्ति मासा ओयाम के पास उसे छोड़ दिया. उन्हें नहीं पता था कि वह किसका बच्चा है. मासा ने बताया – ‘उन्होंने जल्दीबाजी में बच्चे को मुझे दिया और कहा कि इसे तुरंत इसकी मां के पास पहुंचा देना. मैंने विरोध करते हुए कहा कि मुझे इसकी मां के बारे में नहीं पता. न ही यह पता है कि यह बच्चा कहां का है. लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि जैसा कहा है, वही करो. यह कह कर वे चले गए.’

11 दिसम्बर, 24 की घटना के बाद ही नन्हें राईनू की तेज धड़कन और धड़कते सीने से पता चलता है कि वह डरा हुआ था. फोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए जेनी इन्दवार

हम कभी भी यह नहीं जान पाएंगे कि छोटे राईनू ने रात कहां बिताई थी, या वह किस यातना से गुजरा. गोली चलने वाली घटना के लगभग दो सप्ताह बाद 31 दिसम्बर को कुम्मम में जब हम उसे मिले तो उसकी तेज धड़कन और धड़कते सीने से पता चला कि वह डरा हुआ था. वह मां की गोद से उतरने को तैयार नहीं था. उसने एक हल्की से मुस्कान के साथ हमारी और देखा, मानो कह रहा हो कि मुझे पता है कि मैं घर में हूं, और अब मैं इसे दुबारा नहीं छोड़ना चाहता.

उसके भाई-बहन बिमला और सुकला ने भी वह रात जंगल में अकेले बिताई थी. ‘अगर उन पर किसी भालू ने हमला कर दिया होता तो ?’ यह कहते हुए बुधरी की आंख कोमलता, भय और क्रोध से एक साथ भर गई. सुकला सिर्फ़ 3 साल का था. जब हमने बुधरी से बिमला की उम्र पूछी तो उसने कहा मुझे नहीं पता. हमने पूछा – ‘चार ?’ उसके बगल में बैठे एक व्यक्ति ने कहा – ‘नहीं यह चार साल नहीं हो सकती. वह बहुत कड़ी मेहनत करती है, इसलिए वह 5 या 6 साल की होगी.’

उसी कार्यवाई में पुलिस लेकवादा गांव के पेंडा में घुसी थी. यह गांव कुम्मम से पहाड़ियों के रास्ते 4 घंटे की दूरी पर है. उसी दिन सुबह मासा ओयाम नाम के व्यक्ति नदी में नहाने गए थे. और जैसे ही वह वहां पहुंचे, पुलिस ने उन्हें नज़दीक से गोली मार दी. तीन प्रत्यक्षदर्शी गांव लौटे और उन्होंने यह घटना उसकी पत्नी सुदनी को बताई. मासा सितराम के पिता थे. सितराम भी अपने पिता के जाने के थोड़ी ही देर बाद नदी पर पानी लाने के लिए पहुंचा था. वह लहूलुहान होकर लौटा. एक गोली उसके दोनों जांघों को चीरती हुई निकल गई थी.

बस्तर में चोरी होता बचपन

कुम्मम छोड़ने से तुरंत पहले हम पकली से मिले. वह नेवरू की छोटी बहन और गुडसा की लड़की थी. गुडसा ओयाम गांव का मुखिया या पटेल थे, उन्हें भी 11 दिसम्बर को उस वक्त गोली मार दी गई जब वह बचने के लिए भाग रहे थे. पकली गुस्से में थी. और वह तीखे शब्दों में बात कर रही थी और उसकी नज़र और अधिक तीखी थी.

उसने कहा – ‘मैं हॉस्टल से कुछ ही दिनों के लिए घर आई थी, क्योंकि मेरी तबियत ख़राब थी. अब मैं वापस स्कूल कभी नहीं जा सकती. पुलिस ने मेरे पिता और भाई को मार डाला. मेरे दूसरे भाई-बहन अभी बहुत छोटे हैं. अब कोई नहीं है जो कोसरा उगाने में मेरी मां की मदद कर पाए. इसलिए मुझे गांव लौटना होगा और अपने भाई बहनों को काम सिखाना होगा. मुझे इस सरकार पर बहुत क्रोध आ रहा है. मैं गुस्से में हूं क्योंकि स्कूल जाने का मेरा अवसर छीन लिया गया.’

अपने पिता और भाई की मौत के बाद पकली को बढ़ती हुई पारिवारिक जिम्मेदारियां उठानी हैं. अब वह स्कूल नहीं जा सकती. फोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए श्रेया खेमानी

कुम्मम और लेकवादा के आस-पास मीलों दूर तक कोई सरकारी स्कूल नहीं है. सबसे नज़दीक रेकवाया में भूमकाल छात्रावास है. पकली अपनी पिता की मौत तक वहीं पढ़ती थी. यहीं पर सितरम का भाई जामीन का दाखिला भी हुआ है. मई, 2024 में जब गर्मी की छुट्टियों में छात्रावास खाली था, CRPF के लोग वहां आये और उन्होंने वहां उत्पात मचाया.

उन्होंने स्कूल में मौजूद सारे हाजिरी रजिस्टर और कागज़ पत्तर जला दिए, और उसे माओवादी प्रशिक्षण केंद्र घोषित कर दिया. पहाड़ियों से उतरते वक्त हम वहां रुके. ख़ुद लगभग 20 – 21 साल के प्रदीप स्कूल के प्रधानाध्यापक थे. उन्होंने अपने अनुभव किये उस भय को हमसे साझा किया – ‘मैं बिलकुल बगल वाले गांव में रहता हूं. उन्होंने हमें हमारा घर ही नहीं छोड़ने दिया. उन्होंने कहा अगर हमने ऐसा किया तो वे गोली मार देंगे. मैं उन दस्तावेजों को नहीं बचा पाया.’

बाद में उसी साल, एक्टिविस्टों की मदद से स्कूल के शिक्षक और स्टाफ़ स्कूल को मान्यता दिलाने के लिए ज़िला कलेक्टर से मिले. उन्होंने कलेक्टर से पूछा – ‘अगर हर कोने पर प्राइवेट स्कूल खुल सकता है तो उस जगह पर जहां राज्य ने कभी भी स्कूल खोलने के बारे में नहीं सोचा, वहां 20 पंचायतों द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल को सरकारी मान्यता क्यों नहीं मिल सकती ?’

हाल ही में, प्रदीप को सूचित किया गया कि अंततः, स्कूल को DISE ( District Information System for Education) Code जारी किया गया है जिससे यह राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूल बन गया है. इस वक्त स्कूल में 115 विद्यार्थी और 4 शिक्षक हैं. यहां खेल उनकी रोज़ाना की गतिविधि का आवश्यक हिस्सा है और अधिकांश छात्रों ने, जिनसे हमने बात की, कहा कि उनका प्रिय विषय पर्यावरण है.

जब हम वहां से चलने लगे तो सितराम के भाई जामीन ने हमें बुलाया और कहा – ‘अगली बार जब आप आयें तो हमारे लिए कुछ हिंदी की कहानी की किताबें लायें. हमारे पास बहुत कम किताबें हैं. और हमें उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है.’ उसकी गंभीर मुस्कान उस दर्द को छुपा गई कि अभी कुछ रोज़ पहले ही उसने अपने पिता को खोया है. उसकी कमीज़ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. मैंने इसके पहले ऐसा कहीं नहीं देखा था. उसने अपनी कमीज़ में पेन रखने के लिए एक ख़ास जेब सिलाई थी. कोई भी शिक्षा के उसके अधिकार को छीन नहीं सकता.

जामीन ने अपनी कमीज़ में पेन रखने के लिए एक ख़ास जेब सिलवाई है. फोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए श्रेया खेमानी

जब हम वापस लौटते हुए पैदल चल कर इन्दरावती नदी के किनारे पहुंचे तो हमने देखा कि वहां स्थानीय नौजवान अपनी ज़मीन जन और जीविका को नष्ट होने से बचाने और हिंसा के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. उन्होंने हमें मोर्टार के कुछ टुकड़े दिखाए. यह राज्य की हवाई बमबारी की एक नयी रणनीति के परिणामस्वरूप था. 2022 में, छत्तीसगढ़ PUCL ने राज्य द्वारा RPG (Rocket Propelled Grenades) के इस्तेमाल के बारे में एक तथ्यान्वेषण किया था. और NHRC (National Human Rights Commission) को नागरिकों के ऊपर हवाई बमबारी के सन्दर्भ में एक शिकायत दर्ज की थी. लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्यवाई नहीं हुई.

बम के गोलों के इन टुकड़ों का बच्चों पर बेहद घातक परिणाम होता है. नजदीक के गांव बोदगा के निवासी क्रमशः 9 और 12 साल के लक्ष्मण और बोती ओयाम, 12 मई 2024 को तेंदू पत्ता डीलर के साथ काम करने के दौरान, पत्तों के बण्डल को सुखाने में उसकी मदद करते हुए, बम के कुछ टुकड़ों के संपर्क में आ गए. प्रोपेलर का अंतिम हिस्सा ज़मीन के ऊपर दिख रहा था. जबकि, विस्फ़ोटक सामग्री से भरी उभरी हुई बल्बनुमा चीज़ ज़मीन के नीचे धंसी हुई थी. जिज्ञासावश बच्चे लकड़ी और पत्थर से इस अजीब से खजाने को खोदने लगे. इनमें से एक में अभी भी विस्फोट नहीं हुआ था. इसमें विस्फ़ोट हो गया और दोनों मारे गए.

यह घटना उसके कुछ ही दिनों बाद घटी थी जब पत्रकार विकास तिवारी ने इस क्षेत्र से एक लाइव वीडियो जारी करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यहां अभी भी बिना विस्फ़ोट वाले बम या उसके टुकड़े गांव के आसपास फैले हुए हैं. और उन्होंने अधिकारियों से गुहार लगाई थी कि वे इस बात पर ध्यान दें और इसे साफ़ करें. इसके बावजूद पुलिस और प्रशासन ने कुछ भी नहीं किया.

हवाई बमबारी के अवैध इस्तेमाल से उठे गंभीर सवालों के अलावा यहां वहां फैले बम और बमों के अवशेष के सवाल को ध्यान में लाये जाने के बावजूद राज्य अपनी इस अकर्मण्यता को कैसे व्याख्यायित करेगा ? दो बच्चे अब मर चुके हैं. इस घटना पर परदा डालने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘नक्सल पीड़ित’ योजना (माओवादी हिंसा के शिकार लोगों को क्षतिपूर्ति देने की योजना) के अंतर्गत परिवारों को कुछ क्षतिपूर्ति दे दी. लक्षमण और बोती की मौत के लिए अभी तक राज्य ने ज़िम्मेदारी नहीं ली है. इनमें से एक स्कूल का प्रधानाध्यापक होना चाहता था तो दूसरी एक नर्स होना चाहती थी.

हालांकि, बोती और लक्ष्मण अकेले नहीं हैं. उनकी नन्हीं कब्रें, बस्तर के जंगलों में दूसरी कब्रों से घिरी हुई हैं. 2024 में, बहुत से बच्चे नक्सल विरोधी कार्यवाई की आड़ में पुलिस हिंसा का शिकार हुए हैं. 2024 के पहले ही दिन 1 जनवरी को बीजापुर के मुत्वेंदी में छः महीने के मांगली को उसकी माँ की गोद में ही गोली मार दी गई. मासे सोदी उस वक्त अपने गांव में एक पेड़ को कटने से बचाने का प्रयास कर रही थी, जब पुलिस की एक गोली उसकी बांह को चीरती हुई बच्ची को लगी.

2024 में, बस्तर में अब तक सबसे ज्यादा ‘मुठभेड़’ में हुई मौतें, सबसे ज्यादा ‘समर्पण’ और सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां दर्ज की गई हैं – 1000 लोग गिरफ्तार हुए, 837 ने समर्पण किया और 287 लोग मारे गए (जबकि 2023 में 20 लोग मारे गए थे). इन संख्याओं को सफलता के रूप में पेश करते हुए संघीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलियों को छत्तीसगढ़ से ख़त्म कर दिया जायेगा. यह उनके द्वारा चुनी गई एक महत्वपूर्ण तिथि है.

कुम्मम के ग्रामीणों ने मुझे बताया कि जब उन्हें पहली बार यह सूचना मिली कि 7 शवों को पहाड़ियों से नीचे लाया गया है तो पल्ली के गांव वालों ने कथित तौर पर DRGF, STF और CRPF बलों को ख़ुशी से लाश के चारों और नाचते देखा. प्रत्येक शव के ऊपर उनके मूल्य की एक पर्ची लगी थी. 31 मार्च, 26 तक आवंटित ईनाम की राशि को बांट दिया जायेगा और उनके बहीखाता को बंद कर दिया जायेगा. वह बहीखाता मांगली, सोमारी, बोती और लक्षमण जैसे बच्चों की हत्या से निकले खून में रंगा है.

ऐसा लगता है कि बस्तर में बच्चों के जीवन का अब कोई मूल्य नहीं है. जैसे ही हम नेवरू की कब्र के क़रीब पहुंचने वाले थे, हम एक घर के बगल से गुजरे, जहां से हमने एक शोकाकुल सिसकियां सुनी. एक महिला रो रही थी. उसी दिन उसका नवजात बच्चा शायद किसी ऐसी बीमारी से चल बसा था जिसका सामान्य तौर से इलाज किया जा सकता था. जैसे डायरिया या मलेरिया. नेवरू को कुछ ही दिन पहले दफ़नाया गया था और उसकी कब्र दूसरी कब्रों से अलग दिख रही थी. क्योंकि वह अभी भी पत्थरों की बजाय लकड़ियों और पत्तियों से ढकी थी. नज़दीक ही एक आदमी और दो लड़के एक गड्ढा खोद रहे थे. अगले ही क्षण हमें समझ आ गया कि वे उसी नवजात की कब्र तैयार कर रहे थे.

इस देश में जहां मनुष्य की हैसियत जाति व्यवस्था के जरिये उसके जन्म से निर्धारित होती है. ऐसे में यह हिंसा एक ख़ास तरह का रूप रंग लेकर सामने आती है. बस्तर में अपनी ज़मीन और समुदाय को बचाने की इच्छा और अपने अधिकारों को मांगने के कारण लोगों का अपराधीकरण कर दिया गया है. उनके बच्चों को मार दिया जाता है. कभी खेती करने या खेलने के दौरान बन्दूक की नोक पर उनका पीछा करते हुए, कभी तेंदू पत्तों को सुखाने के दौरान बिना विस्फोट वाले मोर्टार शेल के विस्फ़ोट के जरिये उड़ा दिए जाते हैं या कभी पुलिस की अंधाधुंध फायरिंग के कारण कोई गोली मां के हाथ को चीरते हुए उनकी छाती में धंस जाती है. कभी-कभी वे सिर्फ़ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उनकी पहुंच में कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. लगभग हमेशा ही वे इसलिए मरते हैं क्योंकि वे ‘कमतर’ लोगों के बच्चे हैं.

bullet । 12 दिसम्बर, 2024 को पुलिस ने रमली की पीठ में गोली मारी. फोटो : द पोलिस प्रोजेक्ट के लिए श्रेया खेमानी

भारत में लम्बे समय से बच्चों का अपराधीकरण होता रहा है और वे मारे जाते रहे हैं. कभी इस कारण से कि उनके मातापिता के पास ज़रूरी दस्तावेज नहीं होते, कभी दूसरी जाति के व्यक्ति के साथ प्यार करने के कारण और कभी अपने लिंग के कारण उन्हें जन्म के पहले ही मार दिया जाता है.

पिछले वर्ष 22 दिसंबर को एक शिक्षाविद ने दंतेवाड़ा से ज़िला CWC (Child Welfare Committee) को फोन किया. और इस बात पर चिंता ज़ाहिर कि सितराम और सोनू को पुलिस ने अस्पताल में रोक कर रखा है और उनसे पूछताछ की जा रही है. नाम न जाहिर करते हुए उस शिक्षाविद ने मुझे बताया कि उन्होंने CWC से अनुरोध किया कि वे बच्चों की बेहतरी सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करें. CWC ने उत्तर देते हुए कहा कि वे इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कर सकते क्योंकि ये बच्चे ‘देखभाल और सुरक्षा की ज़रूरत की श्रेणी में आने वाले बच्चों में नहीं आते.’

इस उत्तर की क्रूरता इसकी मूर्खता से मेल खाती है. किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल व सुरक्षा ) अधिनियम CWC को यह अधिकार देता है कि दूसरी चीज़ों के अलावा ‘जिन बच्चों को देखभाल और सुरक्षा की ज़रूरत है उन्हें देखभाल, सुरक्षा, उचित पुनर्वास या पुनर्स्थापना’ सुनिश्चित करे. हालांकि, इस श्रेणी की व्यापक परिभाषा है. इसके अंतर्गत जिन बच्चों को पुलिस द्वारा अनौपचारिक रूप से हिरासत में लिया गया, उनसे पूछताछ की गई और उन्हें उनके परिवारों के पास जाने से रोका गया, ऐसे बच्चों को देखभाल और सुरक्षा की ज़रूरत वाले बच्चों में नहीं शुमार किया गया. बस्तर में सुरक्षा बल इन्हीं अस्पष्टताओं में फलते-फूलते हैं.

बढ़ते हुए आक्रामक जातीय और सांस्कृतिक, धार्मिक राष्ट्रवाद के युग में पूरी दुनिया में ही बच्चे आज पहले से कहीं ज्यादा हिंसा के निशाने पर हैं. पिछले वर्ष यूनिसेफ़ ने दर्ज किया कि पूरी दुनिया में चल रहे सशस्त्र संघर्षों का बच्चों पर प्रभाव ‘विनाशकारी स्तर पर पहुंच गया है और संभवतः 2024 में यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया होगा.’

आगे यह रिपोर्ट कहती है कि पहले से कहीं ज्यादा बच्चे इस समय सक्रिय संघर्ष क्षेत्रों में रह रहे हैं – 473 मिलियन से ज़्यादा. यानि, वैश्विक स्तर पर हर 6 में से 1. इसके परिणामस्वरूप, बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हो जा रहे हैं. उन्हें मारा जा रहा है, घायल किया जा रहा है, उन्हें स्कूल से बेदखल किया जा रहा है या वे बुरी तरह कुपोषण का शिकार हैं. व्यापक तस्वीर और भी ज़्यादा चिंताजनक है. 2023 तक उपलब्ध आकड़े के अनुसार विश्व के दो तिहाई बच्चे संघर्षों से ग्रस्त देशों में रह रहे हैं. यह आकड़ा अब और भी भयानक हो गया है. क्योंकि इजराइल फ़िलिस्तीन में जनसंहार कर रहा है, जहां बच्चों को सक्रिय तरीके से निशाना बनाया जा रहा है और उनका कत्ले आम किया जा रहा है. यह ऐसा जनसंहार है जिसे दुनिया अपने फ़ोन और टेलीविज़न लाइव घटित होते देख रही है.

अक्टूबर 2023 से, वेस्टबैंक में औसतन एक फ़िलीस्तीनी बच्चा हर दूसरे दिन मारा जा रहा है. इसी समय, वर्तमान भारत सरकार द्वारा इजराइल की अत्यधिक तारीफ़ और उसकी सैन्य रणनीतियों का अनुकरण करने की उसकी इच्छा अब कोई गुप्त बात नहीं रह गई है. निगरानी के नए उपकरण और रक्षा तकनीक के परीक्षण और उनके विकास की दौड़ में इजराइल अग्रिम पंक्ति में है. वह इस धरती पर अत्यधिक क्रूर संघर्षों को ईंधन उपलब्ध कराने के लिए अपनी इस तकनीक को निर्यात कर रहा है. भारत इस वक्त इजराइल की रक्षा सामग्री का सबसे बड़ा खरीददार है.

सवाल यह उठता है कि राज्य बच्चों की हत्या रोकने के लिए कुछ कर क्यों नहीं रहा है ? यह रेखांकित करना होगा कि उन्हें वास्तव में देखभाल और सुरक्षा की ज़रूरत है. कानूनी श्रेणियां बनाकर राज्य यह कहना चाहता है कि कुछ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है. इसके परिणामस्वरूप बच्चों के ख़िलाफ़ राज्य की हिंसा को बढ़ावा मिलता है, जैसा कि आज बस्तर में देखा जा रहा है. लेकिन, निर्विवाद के रूप में यह सुनिश्चित करना राज्य और समाज की ज़िम्मेदारी है कि प्रत्येक बच्चे को देखभाल और सुरक्षा की गारंटी दी जाए.

बस्तर जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों में बच्चों की दुर्दशा एक शोचनीय विषय होता है. जिस पर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है. जैसे-जैसे बस्तर में नक्सल समूहों के खिलाफ़ राज्य की कार्यवाई सघन होती जा रही है (2024 में गिरफ्तारियां, समर्पण और मौतों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है), बच्चे सभी पीड़ितों में सबसे ज़्यादा निशाने पर हैं. इस क्षेत्र में, व्यवस्थागत चुनौतियों के बीच बच्चे जिस तरह से परिस्थितियों से जूझ रहे हैं, उसने सुरक्षा नीतियों के बारे में और इस क्षेत्र में चल रहे प्रति विद्रोह अभियानों की असली कीमत के बारे में ज़रूरी सवाल उठाये हैं. यहां सबसे कमज़ोर समुदाय लगातार सबसे अधिक बोझ उठा रहा है.

इस दुनिया में लगातार चलने वाली हिंसा के बावजूद उम्मीद मेरे साथ एक जिद्दी पीड़ा के रूप में हमेशा साथ रहती है. शायद इसका कारण यह है कि मैं बच्चों के साथ काम करती हूं. प्रत्येक दिन वे मुझे उम्मीद का कोई कारण देते हैं और मुझे याद दिलाते हैं कि बेहतर दुनिया संभव है. एक ऐसी दुनिया जिसकी धड़कन वे मानो अपनी मुस्कानों, आहों और स्वप्नों में साथ रखते हैं. यहां तक कि अपने गुस्से और निराशाओं में भी. और निश्चित रूप से पेन के लिए बनी उन जेबों में जिसे उन्होंने अपनी कमीजों में सिल रखा है.

मैं इस लेख को अपने दिमाग में नक्श दो तस्वीरों के साथ समाप्त करती हूं – पकली का वह गुस्सा कि अब वह स्कूल नहीं जा पायेगी और जामीन की पेन रखने के लिए सिली गई जेब. भले ही देश उन्हें लगातार निराश कर रहा हो, लेकिन इन बच्चों की दृढ़ता, सौम्यता और साहस शायद हमारी एकमात्र उम्मीद है.

  • सोनी सोरी से मिली जानकारी के साथ

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