
माओवाद की नई कमान में एक ऐतिहासिक चेहरा थिप्परी तिरुपति एक ऐतिहासिक परिघटना है. भारतीय वामपंथी आंदोलन के सबसे क्रांतिकारी संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) (सीपीआई (माओवादी))के महासचिव थिप्पिरि तिरुपति, जिन्हें देवजी (Devji) के नाम से जाना जाता है, न केवल एक सैन्य रणनीतिकार हैं, बल्कि माओवादी आंदोलन में जातिगत न्याय की एक प्रतीकात्मक छवि भी हैं.
2025 में नंबाला केशव राव (उर्फ बासवराज) की मौत के बाद सितंबर में महासचिव पद पर नियुक्ति के साथ वे संगठन के तीसरे तेलुगु नेता बने. दलित (मादीगा जाति) समुदाय से आने वाले तिरुपति की यह नियुक्ति माओवादियों के लिए ‘ऐतिहासिक बदलाव’ मानी जा रही है, जो लंबे समय से ऊपरी जातियों (खासकर ब्राह्मणों) के वर्चस्व का शिकार रहा है.
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की मोस्ट वांटेड लिस्ट में उनका नाम शामिल है, और उन पर 1 करोड़ रुपये का इनाम है. वे दंडकारण्य के जंगलों में छिपे हुए हैं, जहां वे गोरिल्ला युद्ध की रणनीति तैयार करते हैं. इस लेख में उनकी जीवनी, संघर्ष और वर्तमान भूमिका पर संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत करता हूं.
प्रारंभिक जीवन : दलित पृष्ठभूमि से जागृति की शुरुआत
थिप्पिरि तिरुपति का जन्म लगभग 1963-65 के आसपास तेलंगाना के जगतियाल जिले (तत्कालीन करीमनगर जिला) के कोरुटला टाउन के अंबेडकर नगर में हुआ. उनके पिता का नाम वेंकट नरसैया था, और वे मादीगा जाति के दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं—एक ऐसा समुदाय जो सदियों से सामाजिक और आर्थिक शोषण का शिकार रहा है. तिरुपति का बचपन गरीबी और जातिगत भेदभाव की छाया में बीता, जो बाद में उनकी क्रांतिकारी चेतना का आधार बना.
कॉलेज के दिनों में वे हैदराबाद के ओस्मानिया विश्वविद्यालय से जुड़े, जहां 1975 में रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन (आरएसयू) का गठन हुआ. आरएसयू, जो दक्षिणपंथी गुटों द्वारा छात्र नेता की हत्या के विरोध में बनी, माओवादी आंदोलन का प्रमुख भर्ती केंद्र बनी. तिरुपति ने यहां से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, जहां वे छात्र आंदोलनों, भूमि अधिकार और जातिगत न्याय के मुद्दों पर सक्रिय हुए. आरएसयू पर 1992 में प्रतिबंध लगा, लेकिन इसने माओवादी संगठनों को सैकड़ों कैडर दिए. तिरुपति की दलित पृष्ठभूमि ने उन्हें आरएसयू में विशेष स्थान दिया, जहां वे आदिवासी और दलित छात्रों को संगठित करने में माहिर साबित हुए.
माओवाद में प्रवेश : नक्सलबाड़ी की लपटों से दंडकारण्य तक
1985 में थिप्पिरि तिरुपति ने सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वॉर (पीडब्ल्यूजी) में औपचारिक रूप से प्रवेश किया, जो बाद में 2004 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के साथ मिलकर सीपीआई (माओवादी) बना. नक्सलबाड़ी आंदोलन (1967) और तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष (1946-51) की विरासत से प्रेरित होकर वे भूमिगत जीवन में उतर गए. दंडकारण्य—छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा के जंगलों का यह क्षेत्र—उनकी कर्मभूमि बना, जहां वे आदिवासी विद्रोह को संगठित करने लगे.
तिरुपति की विशेषज्ञता गोरिल्ला युद्ध में थी. 2000 में उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) का निर्माण किया, जो माओवादियों का सशस्त्र विंग है. पिछले चार दशकों में वे दक्षिण बस्तर क्षेत्र में सक्रिय रहे, जहां उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण और हमलों की रणनीति तैयार की. उनकी उपनामों की लिस्ट—संजीव, चेतन, रामेश, सुदर्शन, देवन्ना—उनकी भूमिगत गतिविधियों का प्रमाण है.
प्रमुख भूमिकाएं और गतिविधियां : सैन्य रणनीतिकार की विरासत
थिप्पिरि तिरुपति को माओवादी संगठन में सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का प्रमुख माना जाता है, जो पिछले दो दशकों से सैन्य विंग का नेतृत्व कर रहे हैं. वे सेंट्रल कमेटी और पोलिटब्यूरो के तीन बचे सदस्यों में से एक हैं. मिलिशिया इंचार्ज के रूप में वे दंडकारण्य के सेंट्रल रीजनल ब्यूरो (सीआरबी) को सैन्य मार्गदर्शन देते हैं. उनकी प्रमुख गतिविधियों में कई बड़े हमले शामिल हैं –
- 2007 बीजापुर हमला: छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में पुलिस बेस कैंप पर माओवादी हमला, जिसमें 55 सुरक्षाकर्मी मारे गए. तिरुपति ने इसकी रणनीति तैयार की.
- 2010 दंतेवाड़ा एम्बुश: अप्रैल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में आईईडी हमला, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान मारे गए. पुलिस तिरुपति को इसका मास्टरमाइंड मानती है, जो आंध्र प्रदेश के माओवादियों को शामिल करने का परिणाम था.
- अन्य योगदान: उन्होंने आदिवासी समुदायों में भर्ती बढ़ाई, विस्थापन विरोधी अभियान चलाए, और संगठन की सैन्य संरचना को मजबूत किया. 2009 से माओवादियों को प्रतिबंधित संगठन घोषित करने के बाद भी वे सक्रिय रहे.
तिरुपति की दलित पृष्ठभूमि ने उन्हें आदिवासी और दलित कैडरों के बीच लोकप्रिय बनाया, जो माओवादियों का मुख्य आधार हैं.
हालिया घटनाएं : 2025 का संकट और नई जिम्मेदारी
2025 माओवादियों के लिए संकटपूर्ण वर्ष रहा. मई 2025 में छत्तीसगढ़ के अबुझमाढ़ में बासवराजू की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद सेंट्रल कमेटी ने सितंबर में तिरुपति को महासचिव नियुक्त किया. यह नियुक्ति मुप्पाला लक्ष्मण राव (गणपति) के बाद जगतियाल जिले का दूसरे महासचिव हैं. तिरुपति ने मल्लोजुला वेणुगोपाल राव (भूपति) को पछाड़ा, जो वैचारिक प्रमुख थे.
थिप्परी तिरुपति के महासचिव पद पर नियुक्ति के बाद आंतरिक तनाव उभरा. सितंबर 2025 में भूपति ने एक 22-पेज पत्र जारी कर हथियार डालने की अपील की, जिसे पार्टी ने अस्वीकार किया. सोशल मीडिया पर चर्चा हुई कि तिरुपति की दलित नियुक्ति ने ‘ब्राह्मण कोटरी’ (ऊपरी जाति नेताओं) में असंतोष पैदा किया. 15 अक्टूबर को भूपति ने 61 साथियों सहित आत्मसमर्पण ने संगठन को झकझोर दिया. तिरुपति ने दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (डीएसजेडसी) की कमान संभाली, जबकि मदवी हिड़मा को बस्तर का प्रमुख बनाया गया.
तिरुपति की पोती ने मई 2025 में एक वीडियो जारी कर उनसे आत्मसमर्पण की अपील की, जिसमें कहा गया कि वे समतामूलक समाज के लिए समर्पित हैं लेकिन हालिया घटनाएं दुखद हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2026 तक नक्सलवाद उन्मूलन के वादे के बीच तिरुपति का नेतृत्व संगठन को पुनर्गठित करने की कोशिश है. X पर हालिया पोस्ट्स में उनकी नियुक्ति को ‘सोशल जस्टिस ऑप्टिक्स’ कहा गया, जो भर्ती बढ़ाने का प्रयास है.
चुनौतियां और भविष्य : संकट में माओवाद का नया चेहरा
थिप्पिरि तिरुपति का नेतृत्व माओवादियों के लिए दोहरी चुनौती है. एक ओर, सरकारी अभियान (ऑपरेशन प्रहार) और पुनर्वास नीतियां (20 लाख रुपये प्रति कैडर) से कैडर भाग रहे हैं—2025 में 312 माओवादी मारे गए, 100+ आत्मसमर्पण. दूसरी ओर, आंतरिक फूट और जातिगत तनाव संगठन को कमजोर कर रहे हैं. तिरुपति की दलित छवि आदिवासी-दलित भर्ती को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन पोलिट ब्यूरो दस्तावेजों में ‘अनुकूल परिस्थितियों की कमी’ स्वीकार की गई है.
भविष्य में तिरुपति दंडकारण्य को मजबूत करने पर फोकस करेंगे, लेकिन राज्य की घेराबंदी से हमलों में कमी आ रही है. उनकी नियुक्ति माओवाद को ‘समावेशी’ बनाने का प्रयास है.
क्रांति की लपटों में एक अनसुलझा सवाल
थिप्पिरि तिरुपति माओवादी आंदोलन के एक ऐसे चेहरे हैं, जो शोषित वर्गों की आकांक्षा को प्रतिबिंबित करते हैं. उनकी यात्रा—दलित छात्र से सैन्य प्रमुख तक—माओवाद की जटिलताओं को उजागर करती है: जातिगत न्याय का वादा बनाम आंतरिक वर्चस्व. 2025 के संकट में वे संगठन को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्या वे नक्सलबाड़ी की चिंगारी को फिर जला पाएंगे ? समय ही बताएगा. तिरुपति का जीवन साबित करता है कि क्रांति व्यक्तियों से बड़ी होती है, लेकिन नेतृत्व की भूमिका निर्णायक होती है.
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