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अमेरिकी साम्राज्यवाद को ललकारता उत्तर कोरिया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 13, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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प्रस्तुत आलेख भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी की त्रैमासिक मुखपत्र ‘प्रभात’ की अक्टूबर-दिसम्बर, 2017 में प्रकाशित हुई थी. उत्तर कोरिया के खिलाफ जिस प्रकार अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसका टट्टू बनने को उतारू मोदी सरकार और उसकी चाटूकार मीडिया दुष्प्रचार कर रही है, वैसे में भारत की जागरूक मेहनतकश जनता को उत्तर कोरिया के प्रति अपनी समझ विकसित करने में इस आलेख से मदद मिलेगी – सम्पादक
अमेरिकी साम्राज्यवाद को ललकारता उत्तर कोरिया
अमेरिकी साम्राज्यवाद को ललकारता उत्तर कोरिया

उत्तर कोरिया पर अमेरिकी हमले के बादल मंडरा रहे हैं. अमेरिकी अध्यक्ष डोनाल्ड टंªप ने उत्तर कोरिया पर सैनिक हमला करने की धमकी दी, तो उत्तर कोरिया ने पलटवार करते हुए कह दिया कि वह अमेरिकी सैनिक अड्डे-गुवाम द्वीप को उड़ा देगा. उत्तर कोरिया ने यह घोषणा की कि अमेरिका की किसी भी जगह पर हमला करने में वह सक्षम है. जबकि श्वेतभवन (व्हाईट हाउज) ने कहा कि उत्तर कोरिया विश्वसभ्यता और अंतर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए खतरा है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में 19 सितंबर को दिए अपने पहले भाषण में डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया को पूरी तरह तबाह करने की चेतावनी दी. इस अवसर पर उनके द्वारा उत्तर कोरिया के प्रति पहले की तुलना में बेहद कठोर शब्दों का प्रयोग किया गया. उत्तर कोरिया के अध्यक्ष किम जोंग उन का मखौल उड़ाते हुए उन्हें ‘राकेट मैन’ बताया गया.

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इसकी प्रतिक्रिया में किम जोंग उन ने कहा ’ट्रंप ने मेरा और मेरे देश का दुनिया के सामने अपमान किया और क्रूर युद्ध की घोषणा की. मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि अमेरिका में सर्वोच्च कमान का विशेष अधिकार संभाल रहे शख्स को यह बयान देने के लिए भारी कीमत चुकाना पडे़. इस पागल बुड्ढे को घुटने टेकने पर मजबूर करूंगा.’ ट्रंप की बातों का कड़ा जवाब उत्तर कोरिया के विदेशी मंत्री रियोंग हो ने भी संयुक्त राष्ट्र में दिया कि दुष्ट अध्यक्ष (ट्रंप) की बातों के बाद अमेरिका पर हमला अपरिहार्य हो गया.

इसकी प्रतिक्रिया में ट्रंप ने ट्वीट किया कि किम और रियोंग अब ज्यादा देर जीवित रहने वाले नहीं हैं. इस टिप्पणी के विरोध में उत्तर कोरिया के राजधानी प्यांगांग के किम इल संग स्क्वेयर में अमेरिका के खिलाफ 23 सितंबर को एक बड़ी रैली का आयोजन हुआ. खबरों के मुताबिक इस मौके पर कोरिया रेड गार्ड्स के कमांडिंग अधिकारी रे इल बे ने कहा, ‘दुनिया से अमेरिका और दुष्ट अध्यक्ष को हटाने के लिए उस देश से आखिरी जंग करने अच्छे मौके के लिए हम इंतजार कर रहे हैं. अगर किम आदेश देंगे, तो आक्रामणकारियों के खात्मे के लिए हम तैयार हैं’. उपरोक्त टिप्पणियों से यह साफ जाहिर होता है कि एक ओर अमेरिका उत्तर कोरिया पर आक्रमणकारी युद्ध के लिए उतावला है जबकि उत्तर कोरिया अपनी आत्मरक्षा की सारी तैयारियां कर रहा है.

अमेरिका द्वारा उत्तर कोरिया को धमकियां देना और इसके चलते कोरिया प्रायद्वीप में जंग का माहौल बनना कोई नयी बात नहीं है. हालांकि फिलहालं जुबानी जंग और तेज हो गयी है. सतही तौर पर देखने से हमें यह लगता है कि हाल ही में उत्तर कोरिया जो मिसाइल, बालिस्टिक मिसाइल और परमाणु परीक्षण कर रहा है वही इस तनावपूर्ण स्थिति की वजह है. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर अपनी पकड़ का इस्तेमाल करते हुए पूरी दुनिया में अमेरिका ऐसा माहौल निर्मित कर रहा है. यद्यपि यह सही है कि उत्तर कोरिया द्वारा इस वर्ष के 15 सितंबर तक पंद्रह मिसाइलों के परीक्षण किए गए हैं, जिनमें अल्प, मध्यम श्रेणी के अलावा बालिस्टिक मिसाइल भी शामिल हैं.

प्रसार माध्यमों के मुताबिक 29 अगस्त को उत्तर कोरिया ने जापान के ऊपर से प्रशांत महासागर में एक बालिस्टिक मिसाइल दागी. उत्तर कोरिया ने गर्व से घोषणा भी की कि उसने अत्यंत शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया. उतना ही नहीं उसका दावा है कि उसने उस बम को इतना छोटा बनाया कि उसे मिसाइल से जोड़ सकता है. यह माना जा रहा है कि वह उत्तर कोरिया का छठा परमाणु परीक्षण था. जबकि 2016 में ही उसने दो बार परमाणु परीक्षण किया.

इस पृष्ठभूमि में इन परीक्षणों को बहाना बनाकर उस देश पर पहले से जारी प्रतिबंध और बढ़ा दिए गए. ़संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अत्यंत कडे़ प्रतिबंध लागू करने वाले प्रस्ताव को 15 सदस्य देशांे ने सर्वसम्मति से अनुमोदन किया. इन प्रतिबंधों के मद्देनजर उत्तर कोरिया के तेल आयात और खादी वस्त्रों का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो जाएंगा. अमेरिका की दलील यह है कि चूंकि उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार के निर्माण और परीक्षण की क्षमता के लिए तेल ही जीवनधारा की भूमिका निभा रहा है, इसलिए अमेरिका ने पहले उत्तर कोरिया के तेल निर्यात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया.

हालांकि रूस और चीन जो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं, के हस्तक्षेप के फलस्वरूप प्रतिबंधों की तीव्रता कुछ हद तक कम हुई. इन प्रतिबंधों के चलते उत्तर कोरिया के तेल निर्यातों मंे 30 फीसदी की कटौती हुई. गैस, डीजिल, हेवी फ्यूयेल अॅइल के निर्यात में 55 फीसदी की कटौती होगी. उत्तर कोरिया ने इन पाबंदियों के प्रति न सिर्फ विरोध जताया बल्कि इन पाबंदियों का जवाब और एक बालिस्टिक मिसाइल परीक्षण से दिया. इन प्रतिबंधों के लगने के ठीक चार दिनों के बाद 15 सितंबर को जापान के ऊपर से प्रशांत महासागर में इस मिसाइल का प्रयोग किया. अपने आसमान में दो मिनट तक गुजरने वाली इस मिसाइल प्रयोग से जापान भयकंपित हो गया.

इतिहास को नजरअंदाज करके आंखों के सामने घटने वाली घटनाओं का ही आकलन करने से हमें एहसास हो सकता है कि उत्तर कोरिया की गतिविधियां छेड़खानीपूर्ण हैं. लेकिन उन ‘छेड़खानीपूर्ण गतिविधियों के पीछे अमेरिका साम्राज्यवाद के प्रति उत्तर कोरिया का अंतहीन क्रोध है. धिक्कार है. उस अमेरिकी साम्राज्यवाद से लोहा लेने की हिम्मत भी है जिसने कोरिया प्रायद्वीप को लंबे समय तक युद्ध में झोंका था और वहां के जनजीवन को तहस-नहस किया था.

अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच मौजूदा युद्ध के माहौल को समझने के लिए हमें पूर्वी एशिया महाद्वीप के इतिहास में झांकना होगा. कोरियाई प्रायद्वीप पर 1910 में जापान कब्जा जमाया. कोरियाई जनता ने इस कब्जे के खिलाफ न सिर्फ शांतिपूर्ण बल्कि सशस्त्र लड़ाई लड़ी थी.

दूसरे विश्व युद्ध में जापान के हारने के बाद कोरिया के उत्तर प्रांत कामरेड स्तालिन के नेतृत्व वाली लाल सेना और दक्षिण प्रांत अमेरिकी सेना के काबू में गया. संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में 1948 में आयोजित चुनाव के बाद ये दोनों प्रांत दो अलग-अलग देशों के रूप में अस्तित्व में आए थे. उत्तर इलाका जो उत्तर कोरिया के नाम से लोकप्रिय हो गया, डेमोक्रैटिक पीपुल्स रिपब्लिक आफ कोरिया के रूप में गठित किया गया. जबकि दक्षिण इलाका जो दक्षिण कोरिया के नाम से लोकप्रिय है, रिपब्लिक आफ कोरिया के रूप में गठित किया गया.

उत्तर कोरिया में कोरियाई जनता के राष्ट्रीय नेता किम इल सुंग, जिन्होंने जापान के खिलाफ संचालित जनयुद्ध में प्रमुख भूमिका निभायी थी, के नेतृत्व और तत्कालीन समाजवादी रूस के मार्गदर्शन में समाजवादी सरकार का गठन हुआ. हालांकि उसके बाद दुनियाभर में साम्यवादी सरकारों के पतन की पृष्ठभूमि में उत्तर कोरिया नाम मात्र के कम्युनिस्ट देश के रूप में अस्तित्व में है. जब से देश का आविर्भाव हुआ तब से वहां किम का पारिवारिक शासन ही जारी है. किम इल सुंग के पोते ही हैं, वर्तमान में उत्तर कोरिया के अधिनेता किम जोंग उन. हालांकि उत्तर कोरिया में साम्यवादी शासन की विरासत जारी नहीं है लेकिन अमेरिका साम्राज्यवादी विरोधी विरासत तो मजबूती से बरकरार है.

यहीं पर दक्षिण कोरिया के बारे में थोड़ा जानना चाहिए. अमेरिका के प्रति उत्तर कोरिया के विरोध को समझना है, तो अमेरिका-दक्षिण कोरिया के संबंधों के बारे में समझना होगा. 1948 में आयोजित चुनाव के बाद दक्षिण कोरिया में सिंगमनरी नेतृत्व में अमेरिका की कठपुतली सरकार का गठन हुआ. एशिया में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की आक्रमणकारी योजनाओं को आगे बढ़ाने में सिंगमनरी ने विश्वसनीय सेवक की भूमिका निभायी. अकूत संसाधनों का भंडार उत्तर कोरिया को अपनी मुट्ठी में बांधे रखने के लिए अमेरिका दक्षिण कोरिया को एक औजार की तरह इस्तेमाल किया.

1950 में दक्षिण कोरिया ने उत्तर कोरिया के खिलाफ जंग छेड़ी थी. तीन वर्ष तक दोनों देशों के बीच भीषण युद्ध चलता रहा. कोरियाई जनता और चीनी वालंटियरों ने कंधे से कंधा मिलाकर अमेरिका की आक्रामणकारी सेना और उसकी विश्वसनीय सेवक सिंगमनरी की सेना को ठीक सबक सिखाया. हालांकि इस जंग में उत्तर और दक्षिण कोरिया की बुरी तरह तबाही हो गयी. उन दोनों देशों के अलावा अमेरिकी और चीनी सैनिक बड़े पैमाने पर मारे गए. अमेरिकी सेना के जनरल डग्लस मेकार्तर द्वारा अमेरिकी कांग्रेस में पढ़ी गई रिपोर्ट में लिखा गया, ‘पिछले एक वर्ष में ही 20 मिलियन आबादी वाले कोरिया को हमने ध्वस्त किया. इतने विनाश को मैं ने कभी नहीं देखा था.

हालांकि इसके पहले मैं ने जितने खूनी बहावों और विनाश को देखा था, शायद ही अन्य जीवित व्यक्ति देखा हों, लेकिन कोरिया में जो विध्वंस हुआ है, वह मुझे बहुत ही विचलित कर दिया. आदमियांे, महिलाओं व बच्चों की लाशों के ढेरों को देख कर मैं ने उलटी की. हम ऐसे ही आगे बढ़ने से जन संहार और ज्यादा बढ़ेगा’. और एक अधिकारी कर्टिस लीमे ने लिखा था,‘उत्तर और दक्षिण कोरिया के सभी नगरों व शहरों को हमने आग के हवाले कर दिया. 10 लाख तक जनता को हमने मार दिया. उतनी ही तादाद में जनता को हमने गांवों से भगा दिया’. इससे हमें न सिर्फ युद्ध की तीव्रता को समझ सकते हैं बल्कि अमेरिका के प्रति कोरियाई जनता की नफरत के पीछे के कारण को भी समझ सकते हैं.

अमेरिका के प्रति सिंगमनरी की गुलामी का अंत इस युद्ध से नहीं हुआ. देश की सारी जनता की आकांक्षाओं के विपरीत 1953 में अमेरिका के साथ सैनिक समझौता करके दक्षिण कोरिया को अमेरिका के सैनिक अड्डे के रूप में तब्दील किया. हालांकि सिंगमनरी सरकार के खिलाफ दक्षिण कोरियाई जनता का संघर्ष लगातार जारी रहा. भीषण दमन का इस्तेमाल करके भी इन संघर्षों को रोकने में विफल सिंगमनरी ने 1960 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उसके बाद आयोजित चुनाव में जनता ने सिंगमनरी को हरा कर, पोसुन्युन को अध्यक्ष चुना. हालांकि इनके शासन को जल्द ही खतम किया गया.

1961 में पार्क चुंगही गुट ने सैनिक विद्रोह करके अधिकार को अपने हाथों में ले लिया. पार्क चुंगही का प्रतिक्रियावादी इतिहास रहा था. जापान साम्राज्यवादियों की सेना में वे सैनिक तानाशह थे. और कोरियाई राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के नेता किम इल सुंग और उनकी गुरिल्ला सेना के खिलाफ उन्होंने क्रूर लड़ाई लड़ी थी. इसलिए अधिकार में आने के बाद उन्होंने दक्षिण कोरिया को अमेरिकी और जापानी साम्राज्यवादियों के कठपुतली राज्य के रूप में ढाल दिया.

अमेरिका के तरफ से उन्होंने वियतनाम के ऊपर सेना भेजी थी. इनके बाद दक्षिण कोरिया में जितने ही शासक आए थे, वे सब इनके ही रास्ते पर चले थे. पार्क चुंगही की बेटी पार्कगियुन-हेय भी दक्षिण कोरिया की अध्यक्षा रह कर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हाल ही में पद छोड़ने मजबूर हो गईं. इस तरह दक्षिण कोरिया प्रारंभ से ही अमेरिका की गुलामी कर रहा है. हालांकि दक्षिण कोरिया की जनता तो अपने शासकों के खिलाफ लगातार संघर्ष करती आ रही है.

हालांकि साम्राज्यवादी हितों ने कोरिया प्रायद्वीप को दो टुकडे़ किए लेकिन कोरियाई जनता में तो फिर से एकजुट होने की मजबूत आकांक्षाएं जीवित हैं. उन आकांक्षाओं के विपरीत दोनों देशों के बीच में अगाध की सृष्टि करने वाले अमेरिका के प्रति कोरियाई जनता में व्याप्त नफरत जायज है.

हालांकि 1953 में उत्तर, दक्षिण कोरिया के दरमियान युद्ध रुक गया हो लेकिन युद्ध का खतरा उत्तर कोरिया का पीछा कर रहा है. उत्तर कोरिया में किम शासन को खतम करके अपने कठपुतली शासन को खड़ा करने के लिए अमेरिका लगातार कोशिश कर रहा है. दक्षिण कोरिया को अपना सैनिक अड्डा बनाने वाले अमेरिका ने वहां हजारों की संख्या में अपनी सेना को तैनात किया. जापान को भी उसने अपना सैनिक अड्डा बना दिया.

ऐसे में उत्तर कोरिया में असुरक्षा की भावना पैदा होना स्वाभाविक है. 1970 से दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर अमेरिका हर साल युद्ध अभ्यास कर रहा है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया के राजनयिक किम इन रेओंग ने कहा कि उत्तर कोरिया दुनिया का एकमात्र देश है, जिस पर 1970 से ही परमाणु हमले का खतरा मंडरा रहा है. इससे हम उत्तर कोरिया के डर को समझ सकते हैं.

इस परिप्रेक्ष्य में उत्तर कोरिया के सामने दो ही रास्ते हैं. आत्मसमर्पण या प्रतिरोध. उत्तर कोरिया यह नहीं चहता है कि अपनी सुरक्षा एवं संप्रभुता को अमेरिका की कृपा पर छोड़ दें. उसने समझ लिया कि प्रतिरोध में ही आत्मरक्षा है. अमेरिका के आधिपत्य को धिक्कारने के लिए अपनी हथियार संपदा को बढ़ाने का निर्णय उसने लिया. इसी क्रम में उसने परमाणु कार्यक्रम की ओर अपना कदम बढ़ाया.

हालांकि शुरुआत में ही उस कार्यक्रम को रोकने के लिए अग्र राज्यों ने कोशिशें की. साम्राज्यवादी देशों के पास इतने बड़े पैमाने पर परमाणु हथियार हैं कि वे इस सारे भूमंडल को हजारों बार राख कर सकते हैं. सिर्फ अमेरिका के पास ही दस हजार से जादा परमाणु हथियार हैं. उसके टट्टू देशों को भी वह परमाणु हथियारों की आपूर्ति करता है. इज्राइल के पास दो हजार परमाणु हथियार हैं.

अमेरिका,रूस, चीन एवं कई यूरोपीय देशों ने अभी तक करीब दो हजार बार परमाणु परीक्षण किए. परमाणु बम से लगभग हजार गुना अधिक ताकतवर हाइड्रोजन बम भी अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैंड एवं फ्रांस के पास हैं. मगर ये देश अन्य पिछडे़ देशों को परमाणु मुक्त बनाए रखने के लिए सख्त कोशिश कर रहे हैं. अमेरिका ने परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाते हुए इरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश की. दुनिया भर के विरोध को दरकिनार करके जैविक, रासायनिक हथियार होने के झूठे आरोप लगाते हुए इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ कर बड़े पैमाने पर नरसंहार व विध्वंस को अंजाम दिया. इराक के तत्कालीन अध्यक्ष सद्धाम हुस्सैन को फांसी पर लटका दिया. रासायनिक हथियारों का प्रयोग करने का आरोप लगाते हुए सिरिया पर हमला किया. ज्ञात हो कि 1998 में जब हमारा देश परमाणु परीक्षण किया, अमेरिका ने कई प्रतिबंध लगाए. 2006 में भारत-अमेरिका के बीच में हुए परमाणु समझौते में भारत के परमाणु कार्यक्रम को आईएईए (इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी) के पर्यवेक्षण में लाने की शर्त रखी गयी है.

चूंकि आईएईए के ऊपर अमेरिका का दबदबा चल रहा है, इसलिए नतीजा यह निकला कि भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका की प्रभुता को स्वीकार किया. इसी प्रकार उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए शीर्ष देश कई तरह की कोशिशें कर रहे हैं. चीन, रूस, अमेरिका आदि छह देशों के विचार-विमर्श के चलते 2005 में उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने की घोषणा की. नान-प्रोलिफरेशन ट्रीटी-एनपीटी पर उसने हस्ताक्षर भी किया. परमाणु कार्यक्रम को रोकने के बावजूद आतंकवादी देशों की फेहरिस्त से उत्तर कोरिया को नहीं हटाया गया. समझौते की अन्य शर्तें भी इन देशों द्वारा लागू नहीं की गईं. इससे 2008 दिसंबर में उत्तर कोरिया ने यह घोषणा की कि छह देशों की बातचीत विफल हुई. उसके बाद उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर शुरू किया.

साम्राज्यवादी देश खासकर अमेरिका द्वारा कई पाबंदियां लागू करने के बावजूद वह अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है. 2011 में किम जोंग उन के सत्तारूढ़ होने के बाद इस कार्यक्रम पर और जोर दिया गया. परमाणु हथियार संपत्ति में अमेरिका से बराबरी करने की अपनी चाहत को कई बार उत्तर कोरिया ने सार्वजनिक रूप से इजहार किया.

परमाणु हथियार न सिर्फ मानव जाति बल्कि जीव  जगत के अस्तित्व के लिए भी खतरा है. दूसरे विश्वयुद्ध के समय हिरोशिमा और नागासाकी के ऊपर अमेरिका द्वारा गिराए गए परमाणु बमों द्वारा कितना भयानक विनाश पैदा हुआ था, इससे दुनिया वाकिफ है. लगभग दो लाख लोगों ने इन हमलों में जानें गवाईं. उन हमलों द्वारा उत्पन्न दुष्प्रभाव अभी भी वहां के लोगों का पीछा कर रहा है.

परमाणु हथियार के प्रयोग या परीक्षण में सैकड़ों मील दूर तक जलवायु बुरी तरह प्रभावित होता है. पूरा वातावरण परमाणु प्रदूषणयुक्त हो जाता है. नतीजतन बड़े पैमाने पर जानी नुक्सान होता है. जो मरने से बचते हैं वे कैंसर आदि जानलेवा बीमारियों का शिकार होते हैं. सिर्फ परमाणु हथियार ही नहीं बल्कि अन्य सभी हथियार वर्गीय लूट को जारी रखने वाले औजार हैं. धरती पर जब तक लूट जारी रहेगी तब तक न सिर्फ लूट करने बल्कि लूट का प्रतिरोध करने हथियारों की आवश्यकता होती है. परिणामक्रम में मानव जाति लूट के साथ-साथ हथियारों का उन्मूलन भी जरूर कर लेती है.

दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियारों का मालिक अमेरिका ही है. उतना ही नहीं अभी तक परमाणु हथियारों का इस्तेमाल (हिरोशिमा और नागासाकी पर) करने वाला एकमात्र देश भी अमेरिका ही है. अमेरिका अपने सामने न झुकने वाले देशों के खिलाफ झूठा, विषैला, मनगढ़ंत प्रचार करता है, उन पर आक्रमण करता है, उन पर युद्ध छेड़ता है, उन देशों में सैनिक विद्रोह करवाता है, उन देशों के शासकों की हत्याएं करता है, करवाता है, वहां सरकार विरोधी आंदोलनों यहां तक कि सशस्त्र आंदोलनों को भी हवा देता है, आतंकी हमलें करवाता है, आतंकी संगठनों को खड़ा करता है, वहां अपनी कठपुतली सरकारों का निर्माण करता है, उन देशों के संसाधनों को हड़पता है, उस लूट के खिलाफ जारी जन आंदोलनों को आतंकवाद करार देकर आतंकवादविरोधी मुहिम के नाम पर उन्हें कुचलता है, दुनिया में शांति व जनवाद कायम करने के नाम पर वह कहीं भी और कभी भी आतंक मचाता है. इस तरह वह दरअसल दुनिया की शांति के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है. ऐसे इतिहास वाले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एशिया दौरे के समय उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को विश्वसभ्यता और अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए खतरा बताया.

संयुक्त राष्ट्र की महासभा में ट्रंप ने कहा कि अब समय आ गया है कि उत्तर कोरिया को यह एहसास हो कि निरस्त्रीकरण ही एकमात्र स्वीकार्य भविष्य है. साम्राज्यवादी देश खासकर अमेरिका ढेरों परमाणु हथियार अपने पास रख कर, उन हथियारों के बल बूते दुनिया को अपनी मुट्ठी में बांधने की कोशिश करते हुए निरस्त्रीकरण के बारे में अन्यों को ’हितोपदेश’ कर रहा है.

परमाणु हथियारों के प्रति उत्तर कोरिया का रवैया क्या है ? संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण कमेटी के सामने उत्तर कोरिया के राजनयिक किम इन रेओंग द्वारा कही गई बातों से हम इसे समझ सकते हैं. रेओंग ने कहा कि उत्तर कोरिया को अपनी सुरक्षा के अधिकार के तहत परमाणु हथियार रखने का हक है. साथ ही उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों का विनाश और विश्व को पूरी तरह से परमाणुमुक्त करने के प्रयासों का समर्थन करता है.

अपनी सैनिक प्रभुता के सामने उत्तर कोरिया का दब कर न रहना अमेरिका को नहीं पच रहा है. भारत जैसे बड़़े देश ने अपने संप्रभुता और आत्मसम्मान को अमेरिका के चरणों पर रख दिया. ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर, सिर्फ ढाई करोड़ आबादी वाला और अमेरिका की तुलना में दो फीसदी से कम क्षेत्रफल वाले उत्तर कोरिया द्वारा अपने आत्मसम्मान को प्रदर्शित करना अमेरिका के लिए असहनीय विषय बन गया है. असल में उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए ? सिर्फ और सिर्फ परमाणु कार्यक्रम से परहेज करने वाले देशों और उत्तर कोरिया की जनता की जनता के पास. न तो अमेरिका और ना ही किसी अन्य साम्राज्यवादी देश को इसकी नैतिक योग्यता है, अधिकार तो बिलकुल ही नहीं.

उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण के प्रति अमेरिका की प्रतिक्रिया बहुत ही आक्रामक है. उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बहाने दक्षिण कोरिया की मिसाइल प्रणाली को विकसित करने के लिए अमेरिका ने सैकड़ों करोड़ डॉलरों के समझौते कर लिए. उत्तर कोरिया की सीमा पर उसने टेर्मिनल हाय आल्टिट्यूड एरिया डिफेन्स (थाड) मिसाइलों को तैनात किया. ये दुश्मन के मिसाइलों को आकाश में ही रोक कर विस्फोट कर सकते हैं. पहले से वहां काम कर रही दो थाड मिसाइलों के अलावा इनकी तैनाती हुई. संयुक्त सैन्य अभ्यासों पर और जोर दिया गया.

बालिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण भी किया गया. 18 सितंबर को जापान के नजदीक के उत्तर कोरिया के गगनतल में अमेरिका ने आधुनिक व शक्तिशाली फाइटर जेट व बांबरों के साथ अभ्यास करके अपनी ताकत का प्रदर्शन किया. दक्षिण कोरिया व जापान की फौजी जहाजों के साथ उसने कवायद की.

24 सितंबर को अमेरिका के गुवाम द्वीप से निकलने वाले बी-1 बी लान्सर बांबर उत्तर कोरिया के पूर्वी तट की ओर कूच किए. जापान के ओकिनोवा से एफ-15 युद्ध जहाजों ने उनके साथ सफर किया. उत्तर कोरिया के तट पर अमेरिका ने अपनी सैनिक संपत्ति को बढ़ा दिया. दुनिया के सबसे खतरनाक परमाणु बम ‘बी 61-12‘ का परीक्षण अमेरिका ने किया.

अमेरिका की उपरोक्त गतिविधियों द्वारा हम समझ सकते हैं कि उत्तर कोरिया के ऊपर अपने प्रभुत्व को कायम करने के लिए वह अनगिनत कोशिशें कर रहा है. अमेरिका के इस कथन कि ‘अपने आपको बचाने के लिए या हमारे मित्र देशों को बचाने के लिए उत्तर कोरिया को पूरी तरह तबाह करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा है’, से अमेरिका के सूपर पुलिस का रवैया हमें समझ में आता है. पूरी दुनिया को बचाने की जिम्मेदारी उसके ही कंधों पर रखा गया है, अमेरिका ऐसी बात कर रहा है. ट्रंप की इस धमकी की प्रतिक्रिया में किम ने कहा ‘ट्रंप की टिप्पणी ने मुझे डराने या रोकने के बजाय इस बात के लिए संतुष्ट किया कि जो रास्ता मैंने चुना है, वही सही है और इस पर मुझे अंत तक चलना है.’

दरअसल अमेरिका 2008 से जिस आर्थिक संकट से जूझ रहा है, उससे उबरा नहीं. वह दुनया का संकट बन गया है. दुनिया पर अमेरिकी प्रभुता कमजोर हो रही है. चीन और रूस के नेतृत्व वाली ब्रिक्स और शांघाई सहयोग संगठन, एशिया-यूरोप महाद्वीपांे को मिलाते हुए चीन द्वारा निर्माणाधीन ‘वन बेल्ट-वन रोड’… इत्यादि अमेरिका के आधिपत्य को चुनौती दे रहे हैं. संकट के चलते अमेरिका में भी कई संघर्ष सामने आ रहे हैं. ट्रंप के नेतृत्व वाली फासीवादी ताकतें अपने देश में तानाशाही अमल करके और अन्य देशों में युद्ध छेड़ कर इस हालत से बाहर आने की कोशिश कर रही हैं. इस परिप्रेक्ष्य में सत्ता में आते ही टंªप ने उत्तर कोरिया के प्रति ’फायर एंड फ्यूरी’ (सर्वनाश) की नीति का ऐलान किया था.

ऐसे में तनाव की वर्तमान परिस्थितियों का जिम्मेदार अमेरिका ही है, इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए. इसलिए दुनिया के हर देश को अमेरिका के युद्धोन्माद की निंदा करनी चाहिए. इधर एक महत्वपूर्ण विषय जो युद्ध और तनावपूर्ण माहौल के दरमियान आशावह भविता का आश्वासन दे रहा है, का उल्लेख करना आवश्यक है. एक ओर अमेरिकी शासक युद्धोन्माद के साथ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर इसके खिलाफ अमेरिकी जनता सहित दुनिया भर की उत्पीड़ित जनता आवाज उठा रही है.

चीन और रूस उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण की निंदा कर रहे हैं, इसके साथ ही अमेरिका के रवैये का भी विरोध कर रहे हैं. संयम बनाए रखने की विज्ञप्ति कर रहे हैं. उत्तर कोरिया के ऊपर अमेरिका द्वारा प्रस्तावित कठोर पाबंदियों को उन्होंने अपने वीटो अधिकार के साथ कुछ हद तक रोक दिया. उत्तर कोरिया के व्यापार में चीन का 90 फीसदी हिस्सा है. इसलिए ट्रंप का कहना है कि चीन को उत्तर कोरिया पर दबाव डालना चाहिए. लेकिन टंªप की इस बात को चीन गलत ठहराता है. चीन ने कह दिया कि चूंकि प्रशांत महासागर में अमेरिका के युद्ध जहाज सैन्य अभ्यास कर रहे हैं, इसी वजह से उत्तर कोरिया ने बालिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया. रूस भी पाबंदियों के पक्ष में नहीं बल्कि कूटनीतिक हल की आवश्वकता की वकालत कर रहा है. जाहिर है कि रूस-चीन और अमेरिका के बीच में जो अंतरविरोध हैं, उनकी वजह से ही रूस और चीन उत्तर कोरिया के प्रति कुछ हद तक अनुकूल रवैया अपना रहे हैं.

खासकर एशिया में अमेरिका के दबदबे को रोकने के लिए चीन को उत्तर कोरिया जैसे देश की जरूरत है. उत्तर कोरिया में अकूत संसाधनों का भंडार है. उसके समुंदर के किनारे 12 अरब बैरलों के पेट्रोल का पता चल गया है. इसलिए उत्तर कोरिया पर आधिपत्य चलाने के लिए न सिर्फ अमेरिका बल्कि चीन व रूस की कोशिशें जारी हैं. इस परिप्रेक्ष्य में ही उत्तर कोरिया के प्रति ये तीनों देशों के रवैया को समझना होगा. वर्तमान में मध्य प्राच्य और कोरियाई प्रायद्वीप इन तीनों देशों के अंतर विरोधों का केंद्र बना हुआ है.

साम्राज्यवाद का मतलब ही युद्ध है. हर साम्राज्यवादी देश पिछड़े हुए देशों के संसाधनों और मार्केट पर कब्जा करने के लिए कोशिश करता है. अगर कोई देश इसका विरोध करे, तो उस पर कई प्रकार का दबाव डाला जाता है. दुनिया के संसाधनों व बाजारों पर कब्जा जमाने के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच में जो प्रतिस्पर्धा चल रही है, वह दुनिया की शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं. यह जगजाहिर है कि विगत के दोनों विश्व युद्ध इन्हीं के लिए हुए हैं.

इसलिए अगर युद्धों को खतम करना है, सभी देशों के दरमियान सही मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना है, अंतर्राष्ट्रीयता को बनाए रखना है, तो इस धरातल से साम्राज्यवाद का नामोनिशान मिटा देना होगा. इसके लिए दुनिया भर के सभी देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में नव जनवादी या समाजवादी क्रांतियों को सफल करना होगा. उस लक्ष से दुनिया भर के मजदूरों, किसानों के अलावा तमाम क्रांतिकारी व उत्पीड़ित वर्गों की जनता और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं को एकजुट होकर अपने-अपने देशों में जनांदोलनों व सशस्त्र संघर्षाें को सही तालमेल के साथ आगे ले जाना होगा.

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