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‘ऑपरेशन अनथिंकेबल’ : चर्चिल द्वितीय विश्वयुद्ध के ख़त्म होते होते सोवियत संघ पर हमला करना चाहता था ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 28, 2025
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पश्चिमी देश अपने गोपनीय दस्तावेज़ों को एक निश्चित अवधि के बाद सार्वजनिक कर देता है. अभी हाल ही में ऐसी ही एक दस्तावेज इंग्लैंड की ओर से सार्वजनिक हुआ है, जिसने दुनिया को झकझोर दिया है. यह दस्तावेज द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की है. यह दस्तावेज सोवियत संघ पर चर्चिल के उस मंसूबों को उजागर करता है, जिसे वह लागू करना चाहता था लेकिन महान स्टैलिन के ख़ौफ़ के कारण कभी लागू नहीं कर सका, यह था – ‘ऑपरेशन अनथिंकेबल’. इस दस्तावेज को देखकर मौजूदा रुस यूक्रेन युद्ध के बारे में अंदाज़ा लगाना आसान हो जाता है. साथ ही महान स्टालिन की दूरदर्शिता का भी पता चलता है प्रस्तुत आलेख ‘जिग्यासम’ चैनल पर प्रस्तुत तथ्यों का टेक्स्ट रूपांतरण है. – सम्पादक
‘ऑपरेशन अनथिंकेबल’ : चर्चिल द्वितीय विश्वयुद्ध के ख़त्म होते होते सोवियत संघ पर हमला करना चाहता था ?
‘ऑपरेशन अनथिंकेबल’ : चर्चिल द्वितीय विश्वयुद्ध के ख़त्म होते होते सोवियत संघ पर हमला करना चाहता था ?

अप्रैल 1945 में जर्मनी के अंदर एलाइड आर्मीज दोनों तरफ से अंदर आ रही थी. ईस्ट साइड से सोवियत रेड आर्मी और वेस्ट साइड से ब्रिटिश और अमेरिकन फोर्सेस तेजी से बर्लिन की तरफ बढ़ रही थी. इन तीनों साइड्स का मकसद एक था – जर्मनी को हराना. पर उस समय बहुत कम लोगों को ये बात पता थी कि जब ये तीनों साइड्स एक दूसरे की हेल्प कर रही थी, जर्मनी के अंदर घुस रही थी, उसी समय ब्रिटेन में एक प्लान बन रहा था. प्लान था – जर्मनी को हराने के तुरंत बाद अपने साथी सोवियत यूनियन पर हमला करने का.

कहानी शुरू होती है फरवरी 1945 से. यह वो टाइम था जब तीन मेजर एलाइड पावर्स के जो लीडर्स थे, वो आपस में एक सम्मेलन करने के लिए आए. इस सम्मेलन का नाम था याल्टा कॉन्फ्रेंस. इसमें सोवियत यूनियन को लीड कर रहे थे स्टालिन, ब्रिटेन को लीड कर रहे थे उनके प्राइम मिनिस्टर विसन चर्चिल और अमेरिका को लीड कर रहे थे उनके प्रेसिडेंट रूजवेल्ट. इस कॉन्फ्रेंस में कुछ बड़े बड़े डिसीजन लिए गए क्योंकि ये बात तय थी कि अब बस कुछ ही महीनों में जर्मनी हार जाएगी और यहां पे एलाइड साइड की विक्ट्री होगी. तो अब इस सम्मेलन में डिस्कशन करना था कि जर्मनी के हार के बाद यूरोप में क्या होगा.

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अमेरिकन प्रेसिडेंट रूजवेल्ट किसी भी तरीके से स्टालिन को नाराज नहीं करना चाहते थे. क्योंकि वे जानते थे कि जर्मनी को तो हरा दिया ऑलमोस्ट पर अभी जापान को नहीं हराया है और उनसे निपटने के लिए उनको सोवियत यूनियन की रेड आर्मी की जरूरत पड़ेगी. इसीलिए इस कॉन्फ्रेंस में आने से पहले रूजवेल्ट ये डिसाइड करके आए थे कि स्टालिन की मांगों को आसानी से से नजरअंदाज नहीं करेंगे. और स्टालिन की मांगे कुछ छोटी-मोटी नहीं थी.

ऑपरेशन अनथिंकेबल का दस्तावेज

इस वॉर में सबसे ज्यादा नुकसान सोवियत यूनियन का हुआ था. उन्होंने सबसे ज्यादा लोगों को भी गंवाया था. पिछले 30 सालों में जर्मनी ने दो बार सोवियत यूनियन को इवेट किया था. और वो आए थे पोलैंड के रास्ते से. इसीलिए पोलैंड के मुद्दे को लेकर स्टालिन बहुत स्ट्रिक्ट रवैया लेकर आए थे. उन्होंने ये डिक्लेयर कर दिया था कि 1939 में जो पोलैंड का हिस्सा उन्होंने सोवियत यूनियन के साथ मिलाया था, उसको वो वापस नहीं करेंगे.

स्टालिन इस बात को इंश्योर करना चाहते थे कि अब आने वाले सालों में कोई भी मेजर यूरोपियन पावर सोवियत यूनियन के अंदर पोलैंड के रास्ते से हमला ना करें. इसीलिए स्टालिन की मांग ये थी कि सोवियत यूनियन के बॉर्डर से लगने वाले जितने भी रीजंस थे – पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया, बल्गेरिया – इन सभी देशों की जो सरकार है, वो प्रो सोवियत होनी चाहिए. मतलब सोवियत यूनियन के सपोर्ट में होनी चाहिए. उनके साइड में होनी चाहिए.

अब जब ये कॉन्फ्रेंस हो रही थी, तब सोवियत रेड आर्मी ने पोलैंड के ऊपर ऑलमोस्ट अपना कब्जा कर लिया था और ये बात साफ थी कि जब सोवियत आर्मी का पूरा कब्जा पोलैंड के ऊपर हो जाएगा, तो वो अपनी ही मर्जी चलाएंगे यहां की गवर्नमेंट सेट करने के लिए. पर दूसरी तरफ स्टालिन ने वादा किया था इस कॉन्फ्रेंस में कि वे पोलैंड के अंदर फ्री इलेक्शंस कराएंगे. यानी जिन लोगों को यहां की जनता वोट करके चुन के लेकर आएगी, वही लोग पोलैंड की सरकार चलाएंगे.

अब ये बात सुनने से तो बहुत अच्छी लगती है कि स्टालिन कह रहे थे कि वहां पे फ्री इलेक्शंस कराएंगे और इस बात से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. पर इस बात से चर्चिल को आपत्ति थी. उनका यह मानना था कि स्टालिन जो कह रहे हैं कि फ्री इलेक्शंस कराएंगे, ये सिर्फ अपनी मांगे मनवाने के के लिए कह रहे हैं. और अगर हमने इनकी सारी मांगे मान ली तो वो वहां पे फ्री इलेक्शंस नहीं कराएंगे और पूरी तरह जो पोलैंड की सरकार है, वो सोवियत यूनियन के कंट्रोल में रहेगी. यह बात चर्चिल को मंजूर नहीं थी.

पर यहां पर ट्विस्ट यह था कि यह फैसला लेने का अधिकार चर्चिल के हाथ में नहीं था. इस वॉर में यूएस (अमेरिका) का बहुत बड़ा रोल रहा था. यूएस ने वॉर के शुरुआती सालों में ब्रिटेन और सोवियत यूनियन की काफी हेल्प की थी, उनको सप्लाईज भेजी थी. लेकिन 1941 में जब वो खुद वॉर में उतरे तब इन्होंने बहुत सारा एम्युनिशन, बहुत सारा मशीनरी, इक्विपमेंट, टैंक्स, ट्रक्स, जीप्स बहुत सारा सामान सोवियत यूनियन और ब्रिटेन को भेजा था.

चर्चिल की मर्जी नहीं थी कि स्टालिन की मांगें मानी जाए. पर क्योंकि रूजवेल्ट को सोवियत यूनियन की मदद चाहिए थी जापान के इनवेजन के लिए, इसीलिए पोलैंड के मसले पर जो स्टालिन की मांगें थी, उसको रूजवेल्ट ने स्वीकार कर लिया. और उसपर साइन हो गया, जितने भी फैसले इस याल्टा कॉन्फ्रेंस में हुए थे. जब वो पब्लिक के सामने आए तो शुरुआत में लोगों ने बहुत सपोर्ट किया.

इससे अब अमेरिकन जनता और वहां के लीडर्स को लग रहा था कि हमने इतने अच्छे से नेगोशिएट किया सोवियत यूनियन के साथ और हमारे जो अच्छे रिलेशन बन गए हैं, यह वॉर के बाद भी वैसे ही रहेंगे. पर इस कॉन्फ्रेंस के दो महीने के बाद अमेरिकन प्रेसिडेंट रूजवेल्ट की अचानक मौत हो गई. ध्यान रखिए कि रूजवेल्ट वॉर शुरू होने से पहले से यूएस के प्रेसिडेंट थे. उन्होंने इस वॉर में यूएस को लीड किया था और पूरे वॉर के दौरान जितने भी नेगोशिएशंस हैं, जितनी भी डीलिंग्स हैं बाकी कंट्रीज के साथ, उनको लीड किया था. रूजवेल्ट का अमेरिकन फॉरेन पॉलिसी पे एक बहुत बड़ा इंपैक्ट था.

जब उनका (रुजवेल्ट का) देहांत हुआ तो उनके बाद एक नए प्रेसिडेंट बने, इनका नाम था – हैरी ट्रूमैन. अप्रैल 12 को रूजवेल्ट का निधन हुआ था और अप्रैल के अंत तक आते-आते हैरी ट्रूमैन की एडमिनिस्ट्रेशन और सोवियत यूनियन के बीच में झगड़े होने लगे. ट्रूमैन को ईस्टर्न यूरोप में सोवियत यूनियन का इन्फ्लुएंस अच्छा नहीं लग रहा था और यूनाइटेड नेशंस को लेकर भी इन लोगों के बीच में कुछ डिसएग्रीमेंट्स थे. ये चीजें अब सीरियस हो रही थी, पर अब क्योंकि याल्टा एग्रीमेंट साइन हो चुका था और यह बात लगने लगा था कि सोवियत यूनियन का अब ईस्टर्न यूरोप पर पूरा दबदबा हो जाएगा.

इसके अगले ही महीने यानी मई 1945 को ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर विंस्टन चर्चिल ने अपने मिलिट्री प्लानर से कहा कि एक प्लान बनाओ. यह प्लान ऐसा होना चाहिए कि हम सोवियत यूनियन का ईस्टर्न यूरोप पर इन्फ्लुएंस रोक सकें. चर्चिल को स्टालिन की इस बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं था कि वे पोलैंड में फ्री इलेक्शंस कराएंगे. और इसी वजह से चर्चिल चाहते थे कि मिलिट्री एक्शन करके हमको सोवियत यूनियन को यहां से बाहर निकालना चाहिए।

इस जल्दबाजी का कारण यह था कि अभी ब्रिटिश और यूएस फोर्सेस फुली मोबिलाइज थी. और यहां पर बात आती है मोबिलाइजेशन की, देखिए जब भी आप अपने देश के अंदर एक बड़ा मिलिट्री ऑपरेशन प्लान करते हो तो इसमें आपको जरूरत होती है अपने देश की आर्म फोर्सेस को मोबिलाइज करने की. यानी आपके पूरे देश के अंदर जहां-जहां पर भी फौजी हैं, उनमें से कुछ फौजियों में से कुछ बटालियंस को इकट्ठा करके उस जगह पर पहुंचाना, जहां पर मिलिट्री एक्शन स्टार्ट होने वाला है.

जब आप इतनी भारी मात्रा में इतने सारे फौजियों को एक जगह से दूसरी जगह मोबिलाइज कराते हो, उसके लिए आपको चाहिए होता है अच्छा ट्रांसपोर्टेशन, जिसके लिए आपको चाहिए अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर. यानी अच्छे रोड्स और एक पावरफुल नेवी ताकि बहुत सारे फौजियों को आप जहाजों में बैठा कर एक जगह से दूसरी जगह लेकर जा सको.

और आपको सिर्फ फौजियों को एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुंचाना, आपको वहां पहुंचाने हैं सप्लाईज. आपको उनको आर्म्स एंड एम्युनिशन देना है, इक्विपमेंट देना है, मशीनरी देना है, मेडिकल सप्लाईज, राशन ऑयल. ये सारी चीजें आपको पहुंचानी होती हैं. और ये सारा जो प्रोसेस है, ये बहुत टाइम कंजूमिंग होता है और बहुत महंगा होता है. इसीलिए बार-बार आपके लिए करना आसान नहीं होता. अब क्योंकि अप्रैल 1945 में ऑल ऑलरेडी अमेरिकन, ब्रिटिश, फ्रेंच फोर्सेस मोबिलाइज थी इसीलिए चर्चिल चाहते थे कि हम जल्दी से जल्दी यहां मिलिट्री एक्शन करें. क्योंकि एक बार जब यहां से अमेरिकन फोर्सेस स्पेसिफिक चली गई फिर ब्रिटिश फोर्सेस अकेले कुछ नहीं कर पाएंगी.

तो चर्चिल के कहने पर ब्रिटिश जॉइंट प्लानिंग स्टाफ ने 22 मई 1945 को एक पूरा प्लान बनाया. इस प्लान का नाम था – ऑपरेशन अनथिंकेबल. इसका मेन ऑब्जेक्टिव था – ‘टू इंपोज अपॉन रशिया द विल ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स एंड ब्रिटिश अंपायर.’ यानी सोवियत यूनियन को यूएस और ब्रिटेन के कंबाइंड फैसले को मानने के लिए मजबूर करना. इस मिलिट्री एक्शन को करने के लिए ब्रिटेन ने कुछ धारणाएं बनाए थे.

उनका पहला धारणा यह था कि इस अटैक को करने के लिए उनको ब्रिटिश और अमेरिका की जनता का फुल सपोर्ट मिलेगा क्योंकि ऑलरेडी वो लोग इस वॉर में जीत रहे थे तो मोराल ऑलरेडी हाई था. तो उस एरिया में प्रॉब्लम नहीं थी. दूसरा धारणा था कि यूएस और ब्रिटेन की फोर्सेस को पोलैंड की आर्मी का फुल सपोर्ट मिलेगा. पर उन्होंने ये अनुमान कैसे किया ?

पोलैंड पर उस समय तो सोवित यूनियन का कब्जा था. तो पोलैंड की आर्मी सोवियत यूनियन के प्रति वफादार होगी ना ! कैसे वो ब्रिटिश और अमेरिकंस का साथ देंगे ? इसका रीजन यह था कि 1939 में जब हिटलर ने पोलैंड पर अटैक किया था, उसके लगभग 17 दिन के बाद सोवियत यूनियन ने भी ईस्ट से हमला किया था और पोलैंड के कुछ हिस्से को अपने साथ मिला लिया था. जब ये हुआ था तो जो पोलैंड की सरकार है, वहां के जो इंपॉर्टेंट लोग हैं, वो लोग यहां से भाग के लंदन चले गए थे और लंदन में जाकर उन्होंने पोलैंड की एक एजाइल गवर्नमेंट बनाई थी. और पीछे जो पोलैंड की आर्मी बच बची थी, वो आर्मी अभी एजाइल गवर्नमेंट के ऑर्डर्स को फॉलो कर रही थी.

स्टालिन इस पोलिश एजाइल गवर्नमेंट को सपोर्ट नहीं करते थे. उनकी बात नहीं मानते थे क्योंकि उनको लगता था कि यह जो गवर्नमेंट है, यह प्रो ब्रिटिश और अमेरिकन है. उनकी सोच सही थी. पोलैंड की एजाइल गवर्नमेंट एक्चुअली प्रो अमेरिकन और ब्रिटिश थी. और इसी वजह से जो ब्रिटेन में ऑपरेशन ‘अनथिंकेबल’ प्लान हो रहा था, उसके प्लानर्स ने ये एज्यूम किया था कि जब हम ये अटैक करेंगे तो पोलिश आर्मी जो है, जो एजाइल गवर्नमेंट के प्रति वफादार है, वो हमको सपोर्ट करेगी.

उनकी तीसरा धारणा यह था कि जर्मनी की जितनी टेरिटरीज हमने कैप्चर की है यानी ब्रिटिश और अमेरिकन फोर्सेस ने, वहां पे जितने भी पीओडब्लू हमारे पास हैं यानी प्रिजनर्स ऑफ वॉर, उनको भी हम इस वॉर में यूज कर सकते हैं. और यहां की जितनी भी इंडस्ट्रीज हैं जर्मनी की, जो हमने कैप्चर
की हैं, उनको भी हम यूज करेंगे.

चौथी धारणा यह थी कि जैसे ही हम सोवियत यूनियन की फोर्सेस पे अटैक करेंगे, तुरंत सोवियत यूनियन और जापान एक मिलिट्री अलायंस बना लेंगे और इससे पहले कि जापान भी इस कॉन्फ्लेट में इवॉल्व हो जाए इसीलिए हमको जल्दी से जल्दी इस अटैक को शुरू करना होगा. और इसीलिए उन्होंने यह जो सोवियत यूनियन पे अटैक करने वाले थे, इसकी डेट तय की थी 1 जुलाई 1945. यानी अगर दूसरे शब्दों में कहे तो वर्ल्ड वॉर टू खत्म होने के तुरंत बाद यूरोप में वर्ल्ड वॉर 3 होने का प्लान बन रहा था.

जॉइंट प्लानिंग स्टाफ ने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा था कि अगर सोवियत यूनियन के साथ हम एक टोटल वॉर में उलझे तो उनको हराना बहुत मुश्किल होगा. पर दो बातें हैं जिनसे सोवियत यूनियन को हराया जा सकता है. अगर ये दो बातें हम कर सके तो.

उनका पहला पॉइंट यह था कि अगर हम सोवियत यूनियन पर आक्रमण कर दें और वहां जाकर उनकी जितनी भी ऐसी फैक्ट्रीज हैं, ऐसी इंडस्ट्रीज हैं जो उनके वॉर एफर्ट को सपोर्ट करती हैं, उनको अगर हम डिसेबल कर दें या अपने कब्जे में ले लें तो हम सोवियत यूनियन की वॉर प्रोडक्शन की कैपेसिटी को कम कर सकते हैं और इससे हम सोवियत यूनियन को शायद हरा सकते हैं.

पर यह करना इतना आसान नहीं था. इनफैक्ट बहुत मुश्किल था. क्योंकि यही चीज करने की कोशिश जर्मनी ने भी की थी, जब उन्होंने सोवियत यूनियन पर आक्रमण किया था. वो भी कोशिश कर रहे थे कि जितनी भी इनकी वॉर मेकिंग फैक्ट्रीज हैं, जो भी ऐसी इंडस्ट्रीज हैं जो वॉर एफर्ट को सपोर्ट कर रही हैं, उनको हम कैप्चर कर लें. पर सोवियत जब देख रहे थे कि जर्मन इसको कैप्चर करने वाले हैं तो उन सारी फैक्ट्रीज को उठाकर वो लोग पीछे हटते रहते थे. और इसी वजह से जर्मन के हाथ में फैक्ट्रीज आ तो रही थी, पर वो फैक्ट्रीज डिसेबल्ड थी. यूज नहीं हो रही थी. और जितने भी वर्कर्स हैं, जितना भी इक्विपमेंट है वो लोग पीछे लेकर भाग रहे थे.

सोवियत यूनियन का हमेशा फायदा ये रहा है कि वो बहुत बड़ी टेरिटरी उनके पास है. और एक फैक्ट्री से लेकर दूसरी फैक्ट्री तक जाने का डिस्टेंस बहुत ज्यादा लंबा है. इसी वजह से जो हमारा पहला पॉइंट है कि हम उनकी वॉर मेकिंग इंडस्ट्रीज को डिसेबल कर दें, उस पॉइंट को अचीव करना बहुत ही मुश्किल होगा.

दूसरा पॉइंट उनका ये था कि अगर हमको सोवियत यूनियन को हराना है तो हमको सोवियत रेड आर्मी को यूरोप के अंदर ही एक बड़ी डिसाइसिव हार देनी होगी. यानी हम सोवियत यूनियन के अंदर नहीं घुसे. जो इनकी आर्मी अभी यूरोप के अंदर है, उसको हम पूरी तरह से घेर के अगर कैप्चर कर लें और एक बड़ी डिसाइसिव विक्ट्री हासिल कर लें तो शायद से हम सोवियत यूनियन को सरेंडर करने या फिर आर्मिस की बात पर लाने के लिए मजबूर कर सकते हैं.

पर इस पॉइंट में आपत्ति ये थी कि सोवियत यूनियन इतने आसानी से डिसाइसिव विक्ट्री सामने वाली साइड को नहीं देते थे. ऐसा पॉसिबल है कि अगर सोवियत आर्मी को लगता कि वह पूरी तरह गिर चुके हैं या फिर हारने वाले हैं तो हो सकता है कि वह पीछे हट जाते. और यह चीज उन्होंने सेकंड वर्ल्ड वॉर में जर्मनी के साथ की थी. और 1812 में नेपोलियन के साथ भी की थी, जब नेपोलियन ने 1812 में अपनी ग्रैंड आर्मी को लेकर रशिया को इवेट किया था. तब रशियन आर्मी लगातार पीछे हट रही थी.

तो अगर देखा जाए टेक्निकली नेपोलियन के पास टेरिटरी तो आ रही थी रशिया की, पर वो रशियन आर्मी को डिसाइसिवली हरा नहीं पा रहे थे. और यही चीज ब्रिटिश मिलिट्री प्लानर्स ने इस रिपोर्ट में भी कहा कि हम जो सोच रहे हैं कि एक डिसाइसिव जीत हासिल कर पाएं सोवियत आर्मी के ऊपर, वो बहुत मुश्किल साबित हो सकता है क्योंकि वो लोग पीछे हटते जाएंगे और इसीलिए ब्रिटिश प्लानर्स ने ये रिकमेंड किया कि हमको बहुत बड़ा अटैक माउंट करना होगा यूरोप के अंदर सोवियत फोर्सेस को घेरने के लिए और उनको हराने के लिए. और इसके लिए ब्रिटिश लोगों को चाहिए था बहुत सारे फौजी, बहुत सारा इक्विपमेंट.

चलिए अब नंबर्स की बात करते हैं. 1 जुलाई 1945 को जब ये अटैक लॉन्च होने का प्लान था, उस समय यूरोप के अंदर एलाइड साइड के पास 80 इन्फेंट्री डिविजंस थे और सोवियत यूनियन के पास थे 228 इन्फेंट्री डिवीजन. तो आप सोचिए लगभग एक एलाइड सोल्जर के अगेंस्ट इनके पास तीन रेड आर्मी के सोल्जर थे. आर्मर्ड डिविजंस एलाइड साइड के पास थे 23 और सोवियत के पास थे 36. टैक्टिकल एयरक्राफ्ट एलाइड साइड के पास थे 6000 और सोवियत यूनियन के पास थे 11800. इसी वजह से यूरोप के अंदर भी सोवियत आर्मी के ऊपर एक डिसाइसिव विक्ट्री हासिल करने के चांसेस बहुत ही कम थे.

इन सारी बातों को मद्देनजर रखते हुए इस ब्रिटिश प्लानिंग स्टाफ ने निष्कर्ष निकाला कि अगर हमको सोवियत यूनियन को हराना है तो उनको एक टोटल वॉर में हराना होगा. और यह वॉर जल्दी नहीं जीता जाएगा. इसमें बहुत साल लगेंगे. यह एक बहुत अच्छी बात है क्योंकि जब भी पहले वॉर्स हुए थे, फर्स्ट वल्ड वार हुआ था, जब जर्मनी ने इनवेड किया था सोवियत यूनियन को तो सब लोग ये कहते थे कि इनको हम जल्दी हरा देंगे. कुछ महीनों की बात है. पर ब्रिटिश प्लानिंग स्टाफ ने इस बात को माना कि हमको सोवियत यूनियन को हराने के लिए बहुत साल लग जाएंगे. और इस एफर्ट के लिए क्या हम सरकार, क्या हमारी जनता तैयार होगी ?

ऐसा होने के चांसेस बहुत कम थे और इसीलिए ब्रिटिश प्लानिंग स्टाफ ने यह एडवाइज किया कि हमको ऑपरेशन अनथिंकेबल को लॉन्च नहीं करना चाहिए. ऑपरेशन अनथिंकेबल मई 1945 में लिखा गया था. और अब ब्रिटिश सरकार ने ये सारे जितने इसके डिटेल्स थे उनको पब्लिक डोमेन में डाल दिया है.

तो अब यह तय हो गया था कि ब्रिटिश और अमेरिकन फोर्सेस सोवियत यूनियन के ऊपर कोई ऑफेंसिव एक्शन नहीं लेने वाले थे. पर फिर जून 1945 में फिर चर्चिल जी जागे और उन्होंने कहा कि अब ऑपरेशन अनथिंकेबल का एक फॉलो अप रिपोर्ट बनाओ. पहली रिपोर्ट में तुमने कहा कि हम एक ऑफेंसिव एक्शन नहीं ले सकते. अब तुम यह रिपोर्ट बनाओ कि अगर यहां से अमेरिकन फोर्सेस निकल गई, वो पैसिफिक की तरफ चले गए या फिर अमेरिका वापस चले गए तो यूरोप के अंदर जो हमारी एलाइड फोर्सेस बचें हैं (ज्यादातर ब्रिटिश और कुछ फ्रेंच) अगर इनके ऊपर सोवियत ने हमला किया किया तो हम अपने होम आइलैंड्स को यानी ब्रिटिश आइल्स को कैसे डिफेंड कर सकते हैं ?

तो पहली रिपोर्ट में वो ऑफेंस की बात कर रहे थे और दूसरी रिपोर्ट में डिफेंड करने की. चर्चिल यह कह रहे थे कि अमेरिकंस के जाने के बाद हमको अपनी सारी ब्रिटिश फोर्सेस को यूरोप से नहीं निकालना चाहिए. कुछ फोर्सेस को हमको कुछ इंपॉर्टेंट स्ट्रेटेजिक जगह पर रखना चाहिए. इस बात को ब्रिटिश प्लानिंग स्टाफ ने नकार दिया, यह कह कर कि सोवियत यूनियन के पास इतनी बड़ी आर्मी है यूरोप में और अगर उन्होंने फैसला कर ही लिया है हमला करने का तो हमने अगर कुछ फौजी छोड़ भी दिए यूरोप के अंदर तो वो कुछ काम नहीं आएंगे. और हमको उनको अल्टीमेटली वहां से इवेक्युएट ही करना पड़ेगा. जैसा उन्होंने 1940 में किया था ऑपरेशन डंकन के समय. लगभग ढाई लाख फौजी यहां फ्रांस में थे और फंसे हुए थे और उनको जर्मन कैप्चर से बचाने के लिए ब्रिटिश लोगों ने इन ढाई लाख फौजियों को इवेक्युएट किया था.

तो अगर हमको वही करना है तो हम क्यों यहां पर अपने फौजियों को छोड़ें. हमारे लिए बेहतर ऑप्शन यह है कि हम अपनी फोर्सेस को ब्रिटेन के अंदर ही रखें और हम अपने आप को डिफेंड करेंगे अपनी नेवी और अपने एयरफोर्स को यूज करके.

अगर ऑपरेशन अनथिंकेबल का पहला वर्जन लागू हो जाता तो जर्मनी के हराने के कुछ समय के बाद यानी जुलाई 1945 में यूरोप में एक और महायुद्ध शुरू हो जाता. और फिर ज्यादा चांसेस हैं कि सोवियत यूनियन और जापान भी एक साथ हो जाते और फिर 1945 में शायद जापान सरेंडर भी नहीं करता. क्योंकि जापान ने सरेंडर सिर्फ एटॉमिक बॉम की वजह से नहीं किया. उन्हें इसलिए भी सरेंडर करना पड़ा क्योंकि सोवियत यूनियन ने नॉर्थ से आक्रमण कर दिया था.

इसीलिए बहुत लोग ऐसा मानते हैं कि ऑपरेशन अनथिंकेबल वर्ल्ड वॉर 3 का पैगाम लेकर आया था. पर थैंकफूली वो इंप्लीमेंट नहीं हुआ. पर अनफॉर्चूनेटली सिर्फ ऑपरेशन अनथिंकेबल एक ऐसा मोमेंट नहीं था जब वर्ल्ड वॉर 3 होने वाला था, उसके बाद 1962 में एक बार रियल पॉसिबिलिटी हो गई थी कि सोवियत यूनियन और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच में एक न्यूक्लियर वॉर छिड़ जाएगा और पूरी दुनिया में तबाही हो जाएगी. ये पूरी ह्यूमन हिस्ट्री का, मिलिट्री हिस्ट्री का कोल्ड वॉर का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट इवेंट था.

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