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पंजाब की समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर वर्तमान की काली छाया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 25, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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पंजाब की समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर वर्तमान की काली छाया

राम चन्द्र शुक्ल

पंजाब जैसी जिंदादिली भारत के और किसी हिस्से में नहीं मिलती. यहांं के लोग दिलेर होते हैं परंतु धर्म की जकड़बंदी यहांं देश के अन्य हिस्सों से ज्यादा है. यह जरूर है कि सिख धर्म उदार व सहिष्णुता से भरा है. दुनिया में यही संभवतः ऐसा धर्म है, जिसमें किसी किताब (गुरु ग्रन्थ साहिब) को गुरू का दर्जा प्राप्त है और उसकी पूजा होती है. गुरुद्वारों की भूमिका जनकल्याणकारी है. इस धर्म में छुआ-छूत व धार्मिक पाखंड ज्यादा नहीं है. गुरुद्वारों में होने वाले शबद कीर्तन ने संगीत-गायन तथा वादन की परंपरा को बचाए रखा है. बंगाल व महाराष्ट्र के बाद पंजाब ही ऐसा प्रदेश है, जो सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध है.

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यहांं बड़े-बड़े मठ आज भी है, जिनके कब्जे में काफी जादा मात्रा में जमीनें हैं. इन मठों में भ्रष्टाचार व अनाचार भी बहुत है, पर यह राज्य नशे के बढ़ते प्रचलन के कारण गर्त में मिल रहा है तथा इस राज्य के किसान बर्बादी की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश के साथ ही पंजाब में भी किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्या कर रहे हैं.

साहित्यिक रूप से आज भी यह भारत में सबसे ज्यादा समृद्ध राज्य है. पंजाब ने हिंदी को भी कई बड़े रचनाकार दिए हैं. मोहन राकेश व भीष्म साहनी हिंदी को पंजाब की ही देन हैं. इन दोनों रचनाकारों ने अपने लेखन से हिंदी को समृद्ध बनाया है. पंजाबी के कथाकारों में गुरदयाल सिंह, अमृता प्रीतम, कर्तार सिंह, दुग्गल राम, सरूप अणखी आदि का महत्वपूर्ण स्थान है.

राजेन्द्र सिंह बेदी को मात्र पंजाबी का लेखक नहीं माना जा सकता है. उर्दू में लिखने के वे जितने मकबूल हिंदुस्तान में रहे, उससे कहीं ज्यादा मकबूलियत उन्हें पाकिस्तान में भी मिली. राम लाल, कृश्न चंदर तथा राजेन्द्र सिंह बेदी की त्रयी उर्दू अफसानानिगार के रूप में भारत व पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मकबूल रही, इसलिए राजेन्द्र सिंह बेदी को मैं तीन भाषाओं के बीच पुल बनाने वाले के रूप में मानता हूंं. ये तीन जबानें हैं उर्दू, पंजाबी तथा हिंदी. उनके एक नावेल (उपन्यास) ‘एक चादर मैली सी’ पर हिंदी में एक बेहतरीन फिल्म का निर्माण किया गया है. यह उपन्यास मैंने पढ़ा है इसलिए यह बात निश्चित रूप से कह सकता हूंं कि जो प्रभाव मन पर यह उपन्यास पढ़ने पर पड़ता है वह फिल्म देखने पर नहीं.

इसके अलावा पंजाब की जो प्रतिभाएंं जेहन में अपना स्थान बनाने में कामयाब रहीं, उनमें बलराज साहनी बहु मुखी प्रतिभा के धनी थे. उनमें लेखक, अध्यापक, कलाकार तथा वक्ता का अद्भुत समन्वय था. यद्यपि वे हिंदी के लेखक बलराज साहनी के बड़े भाई थे, पर उनकी अपनी एक अलग पहचान थी. वे शांति निकेतन (पश्चिम बंगाल) में अध्यापक रहे. बीबीसी में उद्घोषक थे. वे एक बेहतरीन नाट्य निर्देशक व कलाकार थे, इसके साथ ही वे एक लाजवाब वक्ता थे.

जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में उनके द्वारा दिया गया लंबा भाषण सुना व पढ़ा है, वह उनकी जनपक्षधरता व चिंतनशीलता का कायल हुए बिना नहीं रह सकता. सबसे आखिर में उनका फिल्म अभिनेता वाला रूप जेहन में आता है.

‘दो बीघा जमीन’ में कलकत्ता में हाथ रिक्शा खींचने वाला,’काबुली वाला’ के पठान चरित्र द्वारा गाया गया वह गीत- ‘ऐ मेरे बिछड़े वतन, ऐ मेरे उजड़े चमन, तुझ पे दिल कुर्बान.’ फिल्म ‘सीमा’ का गीत ‘तू प्यार का सागर है, तेरी इक बूंद के प्यासे हम’ तथा फिल्म ‘वक्त’ में उनके द्वारा निभायी गयी बडे भाई की भूमिकाएं हिंदी फिल्म के इतिहास में अमर मानी जाएंगी.

उनके सुपुत्र परीक्षित साहनी ने भी हिंदी फिल्मों व धारावाहिकों में अपने अभिनय से एक अलग पहचान कायम की. कम ही लोगों को पता होगा कि हिंदी लेखक, अध्यापक व पत्रकार चंद्रगुप्त विद्यालंकार बलराज व भीष्म साहनी के बहनोई थे.

पंजाब के प्रसंग में भारत विभाजन की चर्चा न हो तो पंजाब से संबंधित कोई भी प्रसंग अधूरा ही माना जाएगा. भारत विभाजन का जैसा दंश पंजाब (दोनों तरफ के) ने झेला, वैसा दंश देश के किसी अन्य हिस्से ने नहीं.

1947 में 14 अगस्त को किया गया देश का बंटवारा पंजाब के लोगों के दिलों पर ऐसे घाव दे गया है जो आज तक रिस रहा है. पंजाब के उर्दू, पंजाबी व हिंदी कथाकारों ने भारत विभाजन पर एक से बढकर एक बेहतरीन रचनाओं का सृजन किया, पर इस विभाजन पर जैसा प्रहार मंटो ने किया वैसा किसी दूसरे अफसानानिगार ने नही किया. मंटो की कहानी ‘टोबाटेेक सिंह’ भारत के बंटवारे पर जैसा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है, वैसा हिंदी, उर्दू व पंजाबी की कोई दूसरी रचना नहीं.

यद्यपि भारत विभाजन पर भीष्म साहनी ने दो बेहतरीन कथा रचनाओं का सृजन किया. पहली है उनकी कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ तथा दूसरा है उनका उपन्यास ‘तमस’, जिस पर फिल्मकार गोविंद निहलानी ने एक बेहतरीन धारावाहिक फिल्म का निर्माण किया, जिसमें एक छोटी-सी भूमिका खुद भीष्म साहनी ने निभाई थी.

विभाजन के इस पूरे परिदृश्य को समझना है तो हिंदी के पाठकों को भीष्म साहनी की आत्मकथा ‘आज के अतीत’ जरूर पढ़ना चाहिए. इसके अतिरिक्त मोहन राकेश ने विभाजन का लोगों की मानसिकता पर क्या व कैसा प्रभाव पड़ा था, इसका बेहद सूक्ष्म अंकन अपनी कहानी ‘मलवे का मालिक’ में किया है. यद्यपि यशपाल का वृहद उपन्यास ‘झूठा सच’ तथा कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ भी भारत विभाजन पर आधारित रचनाएंं हैं, पर इनमें वह कलात्मकता व सृजनशीलता नहीं है जैसी कि ‘टोबा टेक सिंह’, ‘अमृतसर आ गया है’ तथा ‘मलवे के मालिक’ में.

कवियों व शायरों में मुख्य रूप से फैज अहमद फैज,हबीब जालिब, शिव कुमार बटालवी, साहिर लुधियानवी तथा अवतार सिंह ‘पाश’ का नाम लिया जा सकता है. गायकों में मुहम्मद रफी साहब, मुकेश तथा नूरजहांं की चर्चा के बिना पूरी दास्तान अधूरी रहेगी. नूरजहांं तो विभाजन के बाद पाकिस्तान में जाकर बस गयीं, पर वे अपनी गायकी से हिंदुस्तान व पाकिस्तान दोनों मुल्कों में बराबर से मकबूल रहीं तथा पाकिस्तानी शासकों से उनकी पटरी कभी नहीं बैठी.

पंजाब में भी वर्ग भेद तीखे व भयावह रूप में मौजूद है, इसकी झलक यहांं के साहित्य में मिलती है. गुर दयाल सिंह के लघु उपन्यास ‘मढी का दीवा’ में इस वर्ग भेद को तीखे रूप में देखा जा सकता है. पृथ्वी राज कपूर व उनके पूरे परिवार का हिंदी नाटकों व फिल्म कला के विकास में बहुत बड़ा योगदान है. इसके अतिरिक्त बलराज साहनी, सुनील दत्त, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना तथा ओम पुरी भी पंजाब की देन हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए बहुमूल्य योगदान दिया है.

जिस नस्ली नफ़रत को आधार बनाकर अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस पार्टी हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग के नेताओं की सहमति से भारत का विभाजन किया गया, वही नस्ली नफ़रत का हथकंडा देश पर शासन करने के लिए देश के वर्तमान दक्षिणपंथी शासक भी अपना रहे हैं, पिछले छः सालों से. उस पर सितम यह कि वे कोरोना के बहाने देश को फासिज़्म के गहरे गड्ढे की ओर ढकेल रहे हैं. देश के लोग जल्दी ही नही चेते/जागे तो देश फासीवादी शासन की गिरफ्त में आ सकता है.

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