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Home कविताएं

बेचारों का हिंदू राष्ट्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 14, 2022
in कविताएं
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उन्होंने मारे
और-और मारे
और, और, और मारे लोग
उन्होंने मारने में 50 से भी ज्यादा साल लगा दिए
फिर भी बना नहीं, हां जी बन ही नहीं सका
बेचारों का हिंदू राष्ट्र

उन्होंने रथ चलाए और घर जलाए
उन्होंने मस्जिदें गिराईं और मंदिर बनाए
उन्होंने त्रिशूल उठाए और सरकारें गिराई
उन्होंने साधु का वेश धरा
उन्होंने राष्ट्रवाद के प्रदर्शन में बिना डोपिंग के
रजत और स्वर्ण पदक जीत लिए
उन्होंने नैतिकता के शंख फूंक कर
लोगों के कान फोड़ डाले
उन्होंने मंदिरों में महाआरतियां कीं
उन्होंने हत्याकांड को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया
उन्होंने झूठ के एक से एक
शानदार महल खड़े किए
उन्होंने भावनाओं की गंगा-यमुना और
यहां तक कि सरस्वतियां तक बहाकर दिखा दीं
उन्होंने धोखे की
समस्त विश्व सौंदर्य प्रतियोगिताएं जीत लीं
मगर बना नहीं, हां बन ही नहीं सका
बेचारों का हिंदू राष्ट्र

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स्वप्न

उन्होंने भगत सिंह की बगल में
हेडगेवार को बैठाया
उन्होंने महात्मा गांधी के पास
गोलवलकर के लिए स्थान बनाया
उन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर के पास
गाव- तकिया लगाकर
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए जगह बनाई

उन्होंने विवेकानंद को झपटा
सुभाष चंद्र बोस को लपका
उन्होंने कबीर को पटका
नेहरू को दिया करारा झटका
मगर बना ही नहीं, हां हां बिल्कुल भी नहीं
हाय-हाय बन ही नहीं सका
हो-हो, क्या करें ये गरीब
कोई तो मदद करो इनकी

हा-हा, ये क्या हुआ रे इनके साथ
हो हो, हाय-हाय
हाय-हाय, हो-हो
आह-आह, अरे वाह
बन ही नहीं सका
बेचारों का
गरीबों का
मुसीबत के मारों का
काली टोपी, केसरिया पटकेवालों का हिंदू राष्ट्र

बताते हैं कि अब वे ग्लोबल टेंडर निकालेंगे
अटल बिहारी वाजपेयी उनसे सहमत हैं कि
यह हुई न कोई बात
ठीक इसी तरह बनेगा हमारा हिंदू राष्ट्र.
करो, करो और करो, करते चले जाओ
ध्वज प्रणाम.

  • विष्णु नागर

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