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प्रोफेसर एसएआर गिलानी : बहुत जरूरी है कि उन्हें याद रखा जाए

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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प्रोफेसर एसएआर गिलानी : एक राजनीतिक बंदी की मौत

प्रोफेसर एसएआर गिलानी और कश्मीर में गिलानी की कब्र

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‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

आज से लगभग 11 साल पहले नवंबर 2008 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने आर्ट्स फैकल्टी के कमरा नंबर 22 में “सांप्रदायिकता, फासीवाद, लोकतांत्रिक शब्दाडंबर और यथार्थ” विषय पर सेमिनार आयोजित किया था. सेमिनार के मुख्य वक्ता थे विश्वविद्यालय में अरबी भाषा के कश्मीरी मुस्लिम प्रोफेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी.

गिलानी से बेहतर इस विषय पर बात रखने वाला देश में शायद ही कोई और था. 2002 में संसद में हुए हमले में उनकी कथित भूमिका को लेकर अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी. मीडिया ने ट्रायल चलाकर अदालत का फैसला आने से पहले ही गिलानी को आतंकवादी घोषित कर दिया था. लेकिन आगे के तीन सालों में दिल्ली उच्च अदालत और सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. उस सेमिनार में दमनकारी राज्य मशीनरी द्वारा उन पर लगाए आरोपों और सांप्रदायिकता पर गिलानी अपने विचार रखने वाले थे.

ऊंचे मंच पर रखी एक बड़ी मेज के पीछे गिलानी के साथ 21 साल के उमर खालिद बैठे थे. 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए विवाद के बाद खालिद पर भी देशद्रोह का आरोप लगा. इन दोनों के साथ मंच पर थे रामचंद्रन जो फिलहाल द ट्रिब्यून के संपादक हैं.

जैसे ही गिलानी मंच पर जा कर बैठे, एक विद्यार्थी उनके करीब आया और उनकी तरफ झुक गया. लग रहा था मानो वह गिलानी से कुछ कहना चाहता हो. वह छात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सदस्य था. गिलानी पर उसने दो बार थूका. गिलानी अचकचा गए और अपनी कुर्सी पर धंस-से गए.

इस कार्यक्रम को बिगाड़ने के लिए यह एक पूर्वनियोजित साजिश थी. फिर एबीवीपी के सदस्य चिल्ला-चिल्ला कर गिलानी और अन्य वक्ताओं को गालियां देने लगे. गिलानी ने बेखौफ रहकर अपनी बात कहनी शुरू की. एबीवीपी के सदस्य कमरे में तोड़फोड़ करने लगे और कुछ लोगों ने वक्ताओं के साथ मारपीट भी की. एबीवीपी की तत्कालीन अध्यक्षा नूपुर शर्मा, जिन्होंने बाद में हुए विधानसभा चुनाव में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ चुनाव लड़ा, आईं और घोषणा की कि गिलानी विश्वविद्यालय में अपनी बात नहीं रख सकते.

इस घटना का वीडियो मीडिया में पहुंच गया और टाइम्स नाउ चैनल के कार्यक्रम न्यूजआउर के एंकर अर्नब गोस्वामी ने गिलानी और नूपुर शर्मा को अपने शो में बुलाया. उस वक्त गोस्वामी आज की तरह हिंदू राष्ट्रवादी नहीं थे. 2014 में बीजेपी की जीत के बाद ही गोस्वामी हिंदू राष्ट्रवादी हुए.

गोस्वामी ने कहा, “आइए दिल्ली विश्वविद्यालय में घटी एक अश्लील हरकत की पिक्चर देखिए जिसमें एक छात्र ने एसएआर गिलानी पर दो बार थूका. पूरा देश इसे देखकर स्तब्ध है.”

गोस्वामी ने बार-बार कहा कि गिलानी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है और “विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र होने के नाते इस घटना ने उन्हें झकझोर और डरा दिया है. यह विरोध करने का कौन-सा तरीका है?” गोस्वामी ने नूपुर से कहा कि वह गिलानी से माफी मांगे.

जब गिलानी की बोलने की बारी आई तो उन्होंने जैसे नूपुर को चिढ़ाते हुए याद दिलाया कि शर्मा खुद कानून की छात्रा हैं.

शर्मा ने आक्रमक अंदाज में कहा, “मैं आपसे कहना चाहती हूं कि पूरे देश को आप पर थूकना चाहिए, पूरे देश को आप पर थूकना चाहिए.”

शर्मा का ऐसा आत्मविश्वास कि जिस विश्वविद्यालय में वह पढ़ती हैं, उसके प्रोफेसर पर पूरे देश को थूकना चाहिए, एक ऐसे माहौल की गवाही है जो उस वक्त कायम था. 9/11 को अमेरिका में हुए हमले के बाद आतंकवाद के नाम पर इस्लाम विरोधी विचार दुनिया भर में फैल चुका था और इसने हिंदू राष्ट्रवादियों के शब्दकोश में जगह पा ली थी. बस आतंकी होने का आरोप काफी था कि लोगों को दानव की तरह दिखाया जा सके. अब मुसलमानों पर थूकना, उन्हें बिना सबूत गिरफ्तार कर लेना, उन्हें पीटना, यातना देना और यहां तक कि उन्हें गोली मार देना स्वीकार्य हो गया था. 2001 से लेकर अक्टूबर 2019 में हृदयघात से मृत्यु तक, गिलानी ने बिना एक भी आरोप साबित हुए ये अत्याचार झेले. आरोपों से बरी होने के बाद गिलानी मानव अधिकार कार्यकर्ता हो गए और राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए काम करने लगे.

गिलानी की रिहाई के लिए चलाए गए अभियान में शामिल रहीं लेखिका अरुंधति रॉय ने बताया, “मैं हमेशा उन्हें सबसे ज्यादा साहसी और ओजस्वी इंसान की तरह याद करती रहूंगी. वह हमेशा उन लोगों के लिए काम करते रहे जो उनके ही जैसे अनुभव से गुजर रहे थे.”

गिलानी भारत के ऐसे राजनीतिक कैदी थे जो भारतीय राज्य व्यवस्था की ज्यादतियों का जीता-जागता सबूत थे. उनकी जिंदगी की कहानी यह साबित करने के लिए काफी है कि आधुनिक राज्य सत्ता के पास इतनी ताकत है कि वह किसी आम इंसान को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरे की तरह पेश कर सकती है और गोदी मीडिया राज्य के इस कृत को स्वीकार्य बनाता है. साथ ही, यह भी कि कैसे कई बार अदालतें भी बड़ी नाइंसाफी कर बैठती हैं.

गिलानी का जन्म 1969 में हुआ था. वह कश्मीर के एक महत्वपूर्ण परिवार से आते थे. उनके पिता सैयद अब्दुल वली उल्लाह शाह गिलानी धर्म सुधारक थे, जिन्होंने कश्मीरी मुसलमानों में व्याप्त अंधविश्वास के खिलाफ काम किया. नूपुर शर्मा जैसे लोग चाहे जो भी समझें लेकिन गिलानी एक ऐसे माहौल में पले-बढ़े थे जो इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ था.

1980 और 1990 के दौर में गिलानी जवान हुए. यह वही दौर था जब कश्मीरी नौजवानों का भारतीय राज्य से मोहभंग होने लगा था और वे हथियार उठाने लगे थे. गिलानी की शादी जल्द हो गई लेकिन अपनी बीवी आरिफा को कश्मीर में छोड़कर वह लखनऊ और बाद में दिल्ली पढ़ाने आ गए. जब भी वह घर वापस आते तो काउंटर इनसरजेंशी के नाम पर जारी वहशियत की कहानियां सुनते जिसने शायद ही किसी कश्मीरी मुसलमान को बख्शा हो.

1990 की शुरुआत में सुरक्षाबलों ने उनके भाई बिस्मिल्लाह को पकड़कर यातनाएं दीं. अपनी किताब फ्रेमिंग गिलानी, हैंगिंग अफजल में वकील नंदिता हक्सर बताती हैं कि “बिस्मिल्लाह को उल्टा लटकाकर पानी से भरी बाल्टी में डुबाया जाता. इसके बाद उन्हें पेट पर तब तक मारा जाता जब तक कि वह निगला हुआ पानी उगल नहीं देते. टॉर्चर के बाद उन्हें बर्फ पर फेंक दिया जाता था.’ बाद में बिस्मिल्लाह ने मैन्युफैक्चरिंग टेररिज्म : कश्मीर एनकाउंटर्स विथ द मीडिया एंड द लॉ किताब लिखी. अपने तीखे अनुभव के बावजूद दोनों भाई लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति वफादार बने रहे. हक्सर लिखती हैं, “दिल्ली में विद्यार्थी रहते हुए गिलानी अपने साथी विद्यार्थियों और शिक्षकों को घाटी के इतिहास और वर्तमान के बारे में शिक्षित करने का प्रयास करते रहते.” हक्सर को लगता है कि इस युवा कश्मीरी विद्यार्थी द्वारा राज्य के नेताओं को कश्मीर पर बोलने के लिए आमंत्रित करना गुप्तचर एजेंसियों की नजरों में आ गया होगा.

वक्त बीता और गिलानी साल 2000 में जाकिर हुसैन कॉलेज में लेक्चरर हो गए और मुखर्जी नगर में एक बरसाती किराए पर लेकर बीवी और तीन साल के बेटे आतिफ के साथ रहने लगे. उनकी सात साल की बेटी नुसरत कश्मीर में ही पढ़ रही थी.

13 दिसंबर, 2001 को पांच लोगों ने विस्फोटक से भरी गाड़ी भारतीय संसद में घुसा दी. पांचों मार दिए गए और अगले दो दिन में ही पुलिस ने दावा कर दिया कि उसने यह मामला सुलझा लिया है. पुलिस ने दावा किया कि इसमें गिलानी, मोहम्मद अफजल गुरु और उसका भाई शौकत हुसैन गुरु और शौकत की बीवी अफसान गुरु शामिल हैं. अफसान गुरु का नाम शादी से पहले नवजोत संधू था. पुलिस ने गिलानी को हमले का मास्टरमाइंड बताया.

गिलानी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. विशेष शाखा के लोग गिलानी को उल्टा लटका कर तलवों में लाठियों से पीटते और लगातार गालियां बकते रहते. इसके बाद उन्हें बर्फ की सिल्ली पर लिटा कर तब तक पीटा गया, जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गए. हाथ में हथकड़ी बांधकर उन्हें पुलिस स्टेशन के ठंडे फर्श पर फेंक दिया जाता और उनके पैरों को जंजीर से टेबल से बांध दिया जाता और उनके बच्चों को यह सब दिखाया जाता. पुलिसवाले धमकी देते कि अगर वह झूठा जुर्म कबूल नहीं करेंगे तो वे लोग उनकी बीवी के साथ बलात्कार करेंगे.

अरुंधति रॉय ने मुझे बताया कि अफजल और शौकत से उलट गिलानी ने जुर्म कबूल नहीं किया इसलिए वह एक असाधारण इंसान बन जाते हैं.

आतंकवादरोधी कानून के तहत छह महीनों के भीतर एक विशेष अदालत का गठन हुआ जिसके जज एसएन ढींगरा थे. उन्होंने चारों आरोपियों को दोषी करार दिया. गिलानी, अफजल और शौकत को राज्य के खिलाफ जंग और षड्यंत्र के आरोप में फांसी और अफसान को पांच साल की कैद सुनाई गई.

2001 में गिलानी की गिरफ्तारी के बाद भड़के दिल्ली विश्वविद्यालय के उनके साथियों और दोस्तों ने वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता नंदिता हक्सर को इस मामले में बचाव पक्ष का वकील बनाया. हक्सर की टीम ने इसके लिए व्यापक अभियान चलाया और गिलानी के बचाव के लिए 12 सदस्यीय कमेटी का गठन किया. उस कमेटी में रजनी कोठारी, सुरेंद्र मोहन, अरुंधति रॉय, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, फिल्म निर्माता संजय काक और संपादक प्रभाष जोशी जैसे लोग थे. इन लोगों ने गिलानी के खिलाफ सबूतों के अभाव की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया.

निचली अदालत में हार जाने के बावजूद इस टीम ने अपने अभियान को मजबूत बनाया और शानदार कानूनी लड़ाई लड़ी. जब इस टीम ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की तो हक्सर और अन्य लोगों ने राम जेठमलानी को अपनी टीम में शामिल कर लिया जो कुछ वक्त पहले तक सत्तारूढ़ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कानून मंत्री थे. इस टीम ने भारत भर में हस्ताक्षर अभियान चलाया, पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया और जनसभाएं कीं. मुख्यधारा का मीडिया पुलिस के बयानों को दिखा रहा था लेकिन इस अभियान ने लोगों के सामने सच्चाई उजागर की. अभियान ने न केवल इस मामले के प्रति लोगों को जागरूक बनाया बल्कि आतंकवाद रोधी कानून के जरिए नागरिक स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों के प्रति भी लोगों को आगाह किया. यह कानून संसद में हुए हमले के तीन महीनों में बना था. गिलानी के लिए चलाया जा रहा अभियान पोटा कानून के खिलाफ जारी आंदोलनों का मंच बन गया.

जेठमलानी के नेतृत्व में लड़ी गई कानूनी लड़ाई को जन जागरूकता अभियान ने बल दिया और इसकी वजह से दिल्ली हाईकोर्ट ने गिलानी को मिली मौत की सजा खारिज कर दी और अफसान को भी सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. बहुत कम ही ऐसा होता है कि राज्य के खिलाफ जंग के आरोप में फांसी की सजा पाया शख्स बरी हो जाए.

हक्सर ने लिखा, “अपनी रिहाई के बाद गिलानी यह सुनकर हैरान रह गए कि जाकिर हुसैन कॉलेज के शिक्षक संघ और दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की तत्कालीन अध्यक्षा सास्वती मजुमदार ने उनका मुकदमा शुरू होने से पहले ही उन्हें कड़ी सजा देने की मांग की थी. इसने गिलानी को खास तौर से आहत किया क्योंकि उन्होंने खुद को लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं का हिस्सा माना था और दोनों शिक्षक निकायों के सदस्य रहे थे.”

गिलानी ने पोटा पर ध्यान खींचने के लिए मीडिया की चकाचौंध का इस्तेमाल किया. अपनी रिहाई के बाद आयोजित पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिलानी ने कहा कि लोकतंत्र में इस तरह के किसी भी कठोर कानून के लिए कोई जगह नहीं है. “क्या आप दो साल तक किसी निर्दोष के सिर पर मौत की सजा की तलवार लटकाए जाने को इंसाफ कहेंगे ?” उन्होंने पूछा. ‘द हिंदू’ ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, “उनकी रिहाई इस बात को केंद्र में ले आई कि पुलिस कितनी आसानी से पोटा का दुरुपयोग करने में सक्षम है.” तब तक कई दलित, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यकों के सदस्य और पर्यावरण और नागरिक-स्वतंत्रता कार्यकर्ता इस कानून का शिकार हो चुके थे. 2004 के चुनाव में पोटा को खत्म करना विपक्षी दलों के वादों में से एक था.

दिल्ली पुलिस ने संसद पर हुए हमले मामले में गिलानी और अफसान को उच्च न्यायालय द्वारा मिली रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए अपील की. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उनकी रिहाई को बरकरार रखा बल्कि शौकत की सजा को भी दस साल की जेल कर दिया. अफजल ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति था जिसे शुरुआत में मिली सजा को ऊपरी अदलतों ने बरकरार रखा बावजूद इस तथ्य के कि गिलानी के बरी होने से हमले के बारे में पुलिस की बनाई गई कहानी में काफी शक-सुबहा पैदा हो गए थे. हालांकि कईयों ने अफजल के खिलाफ सबूतों की भ्रामक प्रकृति की ओर इशारा किया था लेकिन अदालत ने उनकी सजा को सही ठहराया. इसे सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा शायद ही किसी और फैसले को इतनी बदनामी मिली होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “समाज का सामूहिक विवेक तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मौत की सजा दी जाएगी.” 2013 में अफजल को फांसी पर लटकाए जाने से कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए जहां आज भी ऐसे लोग हैं जो उन्हें निर्दोष शहीद के रूप में देखते हैं.

कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि हमारे पास अभी भी संसद के हमले में क्या हुआ और इसके पीछे कौन था, इसकी विश्वसनीय जानकारी नहीं है. जब मैंने रॉय से पूछा कि राज्य ने नए सिरे से जांच शुरू करने में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई, तो उन्होंने कहा, “एक तरफ यह असुविधाजनक सच्चाइयों को उजागर करती और इससे खून की प्यास बुझ गई. अफजल गुरु का भूत हमें परेशान करता रहेगा. ऐतिहासिक रूप से इस तरह के शासन ने इन रहस्यमय घटनाओं के साथ अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया है.”

बरी हो जाने से भी गिलानी की परेशानी खत्म नहीं हुईं. फरवरी, 2005 में नंदिता हक्सर के घर के बाहर एक अज्ञात बंदूकधारी ने उन्हें गोली मार दी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने कुछ गोलियां तो निकाल लीं लेकिन दो गोलियां उनकी रीढ़ में ही फंसी रहीं. उन्हें बाहर नहीं निकाला जा सका. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुरक्षा में हुई इस चूक पर रोष जाहिर किया और उन्हें सुरक्षा दिए जाने का आदेश दिया. सशस्त्र केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के दो लोग स्थायी रूप से उनकी सुरक्षा में लगाए गए जो दिन-रात उनके आसपास रहते थे.

“गिलानी को रिहा करो अभियान” ऐसे कई कार्यकर्ताओं को एक साथ ले आया जिन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की रक्षा का काम जारी रखा. जेल में बिताए अपने समय के दौरान, उन्हें कई ऐसे मुसलमान और आदिवासी भी मिले जिन्हें बहुत कम या बिना किसी सबूत के “माओवादी” या “आतंकवादी” बना दिया गया था. इस अनुभव ने राजनीतिक कैदियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को मजबूत किया. अपनी रिहाई के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं के साथ गिलानी ने “राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए समिति” के नाम से काम करना शुरू किया.

विख्यात मानवाधिकार वकील कामिनी जायसवाल ने मुझे बताया, “मैंने काफी संख्या में कश्मीरियों के केस लड़े हैं क्योंकि गिलानी उन्हें मेरे पास ले आते. उनका लाया आखिरी केस 1996 के जयपुर ब्लास्ट का था, जिसमें फिरोजाबाद के एक डॉक्टर को मौत की सजा दी गई थी.”

रॉय ने इस बारे में किए गए गिलानी के कामों की बहुत प्रशंसा की. उन्होंने कहा, “जेल से बाहर आने के बाद आदिवासियों के संघर्ष की तरह शेष भारत में लड़ी जा रही अन्य प्रकार की लड़ाइयों के बारे में उनकी समझदारी असाधारण रूप से बढ़ गई थी. अपने राजनीतिक व्यवहार के बारे में वह स्पष्टवादी थे और इस बारे में भी उन्होंने स्पष्टवादी होना तय कर लिया था कि वह कौन थे और राज्य के द्वारा अन्य जगहों पर भी लोगों को कुचला जा रहा है.”

गिलानी के साथ काम करने वाले दो प्रमुख कार्यकर्ता रोना विल्सन और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा थे. ये दोनों गिलानी को रिहा करने के अभियान का हिस्सा थे.

गिलानी के साथ मेरी पहली और एकमात्र मुलाकात आकस्मिक थी. 2014 में जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में साहित्य का छात्र था, तो साईबाबा को, जो मेरे प्रोफेसर थे, माओवादियों के साथ “लिंक” होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. पोलियो के कारण साईबाबा अपने जीवन के अधिकांश समय तक व्हीलचेयर पर रहे और नागपुर जेल में रहने की भीषण परिस्थितियों के कारण उन्हें मस्तिष्क, रीढ़ और किडनी में गंभीर समस्याएं पैदा हुईं. 2015 के उत्तरार्ध में, जबकि साईबाबा चिकित्सा आधार पर जमानत पर बाहर थे, मैंने उनसे दिल्ली के एक अस्पताल में मुलाकात की, जहां उनका इलाज चल रहा था. मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए उनके केस के बारे में लिखा था. जब मैं साईबाबा से बात कर रहा था, गिलानी अस्पताल के कमरे में चले आए. उनके साथ राइफल लिए दो गार्ड भी थे. गिलानी के सुरक्षा गार्ड और मैं दोनों प्रोफेसरों को बात करते हुए सुनते रहे.

साईबाबा के स्वास्थ्य और उनके मामले के बारे में एक गंभीर चर्चा के बाद उनकी बातचीत ने कुख्यात अंडा सेल के अनुभव की ओर रुख किया. अंडा सेल नागपुर जेल में कैदियों को अलग-थलग रखने वाला ब्लॉक है. दोनों ने जिन यातनाओं से वे गुजरे थे उसे लेकर एक-दूसरे का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. साईबाबा ने बताया कि क्योंकि उनकी सेल में कोई खिड़की नहीं थीं और वहां हमेशा अंधेरा रहता था इसलिए यह बताना भी असंभव था कि समय क्या हुआ होगा.

साईबाबा ने कहा, “जब मुझे खाना दिया जाता तो मैं उससे समझने की कोशिश करता कि क्या समय हुआ है.”

“कम से कम आपको खाना तो मिलता था,” गिलानी ने अपनी जेल को याद करते हुए जवाब दिया. उन्हें उच्च जोखिम वाली तिहाड़ सेल में रखा गया था और वहां भी कोई खिड़की नहीं थीं. उन्होंने मुझे नंगा रखा और मुझे कई दिनों तक खाना नहीं दिया. लेकिन मैंने भी समय का ध्यान रखा. जब गार्डों की बदली होती तो उन्हें अपनी मैगजीन खाली करनी पड़ती. मैगजीन की टिक टॉक मेरी घड़ी थी.” (साईबाबा को 2017 में एक सेशन कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और तब से वे जेल में हैं. उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सरकार से उनकी रिहाई का निवेदन किया है. लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.)

साईबाबा की गिरफ्तारी और दोषी ठहराए जाने के बाद से, राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लड़ने वालों पर कड़ा हमला हुआ है. रोना विल्सन और सुरेंद्र गडलिंग, जो दोनों साईबाबा की रिहाई के अभियान का हिस्सा थे, को पिछले साल भीमा कोरेगांव में हिंसा के बाद संदिग्ध आरोपों में गिरफ्तार किया गया था. पिछले साल जिन अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है, उनमें शोमा सेन, महेश राउत, सुधीर धवले, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, वर्नोन गोंसाल्विस, वरवरा राव और गौतम नवलखा शामिल हैं. हाल ही में हनी बाबू के घर पर छापा पड़ा था जो दिखाता है कि बुरा वक्त अभी बीता नहीं है. हनी बाबू ने मुझे डीयू में पढ़ाया था और सीआरपीपी के मीडिया सचिव थे. सीआरपीपी के अध्यक्ष गिलानी की मौत के साथ जमीनी स्तर की मानवाधिकार रक्षा के कामों में एक तरह का खालीपन पैदा हो गया है.

“हर कोई जेल में है,” रॉय ने मुझे बताया. “आप अचानक चारों ओर देखते हैं और खाली कुर्सियां पाते हैं.”

9 फरवरी, 2016 को अफजल गुरु की फांसी की तीसरी वर्षगांठ पर गिलानी ने गुरु की हत्या के विरोध में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया. गिलानी हमेशा अपने इस विश्वास पर कायम और मुखर रहे कि गुरु निर्दोष थे. कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए गिलानी पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और एक महीना जेल में बिताना पड़ा.

उसी दिन नए-नए हिंदू राष्ट्रवादी बने, अर्नब गोस्वामी ने गिलानी की गिरफ्तारी को जायज ठहराते हुए द न्यूजआउर में एक घंटे का प्रोग्राम चलाया.

“यह आदमी एसएआर गिलानी खतरनाक है,” गोस्वामी गला फाड़-फाड़ कर चीख रहे थे. “अगर अब आपने एसएआर गिलानी को ढील दी, एसएआर गिलानी को इस देश में छुट्टा छोड़ दिया तो यह असम में अलगाववाद की वकालत करने वालों को खुली छूट देने के समान होगा यानी उल्फा की कार्रवाइयों को नैतिक रूप से सही ठहराना होगा. अगर एसएआर गिलानी को इस देश में छुट्टा छोड़ा जाता है तो यह खालिस्तानी अलगाववादियों को हरी झंडी दिखाना होगा यानी बब्बर खालसा के कामों को सही ठहराना होगा. इसलिए मेरा मानना है कि एसएआर गिलानी को अब लंबे समय तक सलाखों के पीछे होना चाहिए … यह गिलानी ही था जिसने एक आतंकवादी को शहीद कहा था. यह गिलानी ही था जो भारत विरोधी, देश विरोधी भावनाओं को भड़का रहा था.” 2008 में गिलानी का बचाव करने वाले इस सेलिब्रिटी एंकर ने एक सौ अस्सी डिग्री का मोड़ ले लिया था.

जैसे कई पत्रकारों ने शुरुआती दौर में किया, गोस्वामी भी शासन द्वारा निर्मित भाषा और शब्दावली का उपयोग कर रहे थे. 2014 के बाद से, हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभुत्व ने यह निर्धारित करने के लिए एक व्यापक मानदंड प्रस्तुत किया है कि किसे मानवता से वंचित किया जा सकता है. एक बार “आतंकवादी” का ठप्पा लगने की जरूरत है और मानवता का दायरा सिमट जाएगा और अब तो “राष्ट्र-विरोधी” होने का हल्का सा ठप्पा भी इसके लिए काफी है. राष्ट्रगान बजाए जाने के दौरान खड़े होने से इनकार करना तक झगड़े की वाजिब वजह हो सकती है और घर में मांस होना भले ही वह गाय का हो या न हो लेकिन वह दलितों या मुसलमानों के लिए घातक साबित हो सकता है. मुख्यधारा का मीडिया, जो पहले आतंकवादियों के खिलाफ था, अब राष्ट्र—विरोधियों के खिलाफ हो गया.

मानवाधिकारों का उल्लंघन अब केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सुरक्षा बलों का विशेषाधिकार नहीं है. जब मैंने कामिनी जायसवाल से हिरासत में टॉर्चर और मौत के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था, “अब सड़कों पर लिंचिंग होती हैं. आप कल्पना कर सकते हैं कि जेलों के अंदर क्या होता होगा. ”

आज भारत सरकार मानवाधिकार के विचार के खिलाफ युद्ध लड़ती हुई सी दिख रही है. मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफ्तारियों को गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है जिसमें वह मानवाधिकार की निंदा एक पश्चिमी अवधारणा के रूप में करते हैं. इससे पता चलता है कि यह हिंदू-राष्ट्रवादी सरकार अधिकारों के संदर्भ में कई कट्टरपंथी इस्लामी राष्ट्रों के ही समान है.

निरंकुशता, अत्याचार और लगभग मारे जाने के बावजूद, अमानवीयता के इस युग में गिलानी ने अपनी इंसानियत को बचाए रखा. उन्होंने भारतीय राज्य या उन्हें दुश्मन के रूप में देखने वालों के लिए अपने दिल में नफरत पैदा नहीं की. तो भी एक ऐसे शख्स के रूप में जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, वह राज्य और मीडिया में उसके प्यादों के निशाने पर ताउम्र रहे. जब आतंकवादी का ठप्पा नहीं लगाया जा सका तो उन्हें राष्ट्रविरोधी करार दिया गया. बहुत जरूरी है कि गिलानी को याद रखा जाए : उन पर लगाए गए आरोपों और उछाले गए कीचड़ के लिए नहीं बल्कि इंसाफ और मानवाधिकारों के लिए उनकी निडर प्रतिबद्धता के लिए.

  • मार्तण्ड कौशिक (कारवां के सीनियर सहायक संपादक हैं), साभार

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