
तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने 13 दिसम्बर को विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया. इस प्रदर्शन में ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां आयोजित की गईं. इस रैली में हजारों की तादाद में लोगों ने शिरकत की और भारत में चल रहे माओवादी के न्यायपूर्ण आंदोलन के प्रति समर्थन जाहिर किया.
तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय वाणिज्य दूतावास भवन के सामने यह प्रदर्शन ‘पार्टिज़न’ और ‘अलिनतेरी’ सहित नौ वामपंथी और समाजवादी संगठनों के आह्वान पर आयोजित किया गया था, जिसमें अलिंतेरी, क्रांतिकारी आंदोलन, उत्पीड़ितों की समाजवादी पार्टी, कल्दिराक, कम्यून, संघर्ष संघ, पार्टिज़ान, समाजवादी सभाओं का संघ, समाजवादी संघर्ष पहल शामिल थे.
इस विरोध प्रदर्शन में ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ जैसे नारे के साथ साथ प्रदर्शनकारियों ने ‘आदिवासी लोग अकेले नहीं हैं’, ‘कैदियों को रिहा करो’, ‘कॉमरेड हिदमा अमर हैं’ और ‘क्रांतिकारी एकजुटता जिंदाबाद’ जैसे नारे भी लगाए.
विरोध प्रदर्शन में पढ़े गए बयान में कहा गया कि भारत का फासीवादी राज्य साम्राज्यवादी शक्तियों के हितों की रक्षा के लिए लोगों का नरसंहार कर रहा है. गाजा और सीरिया की तरह ही भारत में भी वही प्रवृत्ति जारी है.
18 नवंबर को भारत में माडवी हिडमा और उनके 11 साथियों की गिरफ्तारी और उसके बाद हुई हत्या का जिक्र करते हुए बयान में कहा गया कि ‘ऑपरेशन कागर’ नामक यह अभियान वास्तव में भारतीय राज्य की दमनकारी नीति का हिस्सा है. माडवी हिडमा और नक्सल आंदोलन के नेता बासवराज साम्राज्यवाद के खिलाफ न्यायपूर्ण संघर्ष के प्रतीक थे.
नक्सलवादियों द्वारा स्थापित क्रांतिकारी जन समिति (जनताना सरकार) ने गरीबों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पानी जैसी सुविधाएं प्रदान कीं लेकिन ‘ऑपरेशन कागर’ के दौरान इन सुविधाओं को नष्ट कर दिया गया. इस अभियान का उद्देश्य आदिवासियों की जमीनों, जंगलों और जल स्रोतों पर कब्जा करना था.
भारत सरकार अपने ‘भगवाकरण’ के नाम पर कश्मीर, नागालैंड और मणिपुर में आदिवासियों, दलितों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और आंदोलनों का दमन कर रही है. सरकार आलोचकों को चुप कराने के लिए यातना, गैर-न्यायिक हत्याओं और मनमानी गिरफ्तारियों का सहारा ले रही है.
बयान में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ संसाधन सौदे संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन हैं. हालांकि 2022-23 में राज्य का खनन राजस्व 153 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, फिर भी आदिवासी बहुल बस्तर के दंतेवाड़ा क्षेत्र में साक्षरता, स्वास्थ्य और मानव विकास सूचकांक सबसे कम हैं.
बयान में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार नक्सलियों के बारे में जानकारी देने या उन्हें मारने वाले आदिवासियों को ‘पुरस्कार’ देकर प्रोत्साहित कर रही है.
बस्तर पुलिस कार्रवाई एवं परिणाम रिपोर्ट 2024-2025 से भी पता चलता है कि 2024 में मुठभेड़ों की संख्या 68 से बढ़कर 121 हो गई, मृतकों की संख्या 20 से बढ़कर 217 हो गई. इनमें से अधिकांश शवों को सड़ा दिया गया या जला दिया गया. इन कार्रवाई का उद्देश्य यातना और हत्याओं के सबूतों को छिपाना और परिवारों को शव प्राप्त करने से रोकना है. माडवी हिडमा और उनकी पत्नी मदकम राजे के शवों का जल्दबाजी में अंतिम संस्कार इसका स्पष्ट प्रमाण है.
सितंबर 2025 तक मारे गए 550 से अधिक लोगों में से अधिकांश का नरसंहार बस्तर के खनिज-समृद्ध जंगलों में किया गया था, जहां गोंडी और मारिया जैसी आदिवासी जनजातियां रहती हैं.
पूरी दुनिया ने देखा है कि भारत सरकार ने कश्मीर में मुख्यधारा और स्थानीय दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया और फिर कश्मीर की स्वायत्तता को रद्द कर दिया. पिछले नौ वर्षों में, मोदी ने बढ़ते फासीवाद और आपातकाल को लागू किया है. हजारों मुसलमानों और दलितों को जेल में डाल दिया गया है.
फिर भी, उन्हें राजनीतिक कैदी का दर्जा नहीं दिया जा रहा है, और उत्पीड़न के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष को राजनीतिक संघर्ष के बजाय एक आम अपराध के रूप में चित्रित किया जा रहा है. वर्षों की जांच के बाद, अदालतों को कई लोगों को रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि कोई ‘सबूत’ उपलब्ध नहीं है.
राजनीतिक कैदियों पर भी उतना ही अत्याचार होता है; लोगों को झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया जाता है, और जेलों में बुनियादी मानवीय सुविधाएं भी सुनिश्चित नहीं की जातीं. बीमार और बुजुर्ग कैदी सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. जेलों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है. इसके परिणामस्वरूप कुछ लोगों की मृत्यु हो चुकी है.
हाल ही में, साई बाबा और तोता सेथारामैया जमानत पर रिहा होने के कुछ ही समय बाद चल बसे. परिवारों को ऐसी घटनाओं की जानकारी नहीं दी जाती. लंबे समय से जेल में बंद कैदियों के परिवारों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है. टेलीविजन चैनलों ने दिखाया है कि अधिकांश परिवार बेहद गरीबी में जीवन यापन करते हैं.
आज भारतीय राज्य ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ और ‘पुनर्मिलन’ के नाम पर लोगों के बीच विभाजन पैदा करने और उन नीतियों को वैधता प्रदान करने की कोशिश कर रहा है, जो साम्राज्यवादी कंपनियों के लिए भूमि, वन और जल के द्वार खोलती हैं.
हम एक बार फिर यह घोषणा करते हैं कि हम न्याय, स्वतंत्रता और समानता के लिए संघर्ष कर रही भारतीय जनता के साथ खड़े हैं. हम विश्व के सभी लोगों से आह्वान करते हैं कि वे भारत में हो रहे नरसंहार के विरुद्ध भारतीय क्रांतिकारियों का समर्थन करें और साम्राज्यवादी लूट और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करें.
प्रदर्शनकारियों ने भारत सरकार से भी अपील करते हुए कहा कि वे जनता के खिलाफ सभी अपराध तुरंत बंद करें. गैर-न्यायिक हत्याओं, यातना, मनमानी हिरासत और राज्य हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करें, उन परियोजनाओं को रद्द करें जो आदिवासी लोगों और अन्य आदिवासी समुदायों के रहने की जगहों को लूटपाट के लिए खोलती हैं.
ऑपरेशन कागर को बंद करो. ऑपरेशन कागर के तहत हुए सभी नरसंहारों, जिनमें मडवी हिडमा और मदकम राजे शामिल हैं, की स्वतंत्र जांच के लिए एक आयोग गठित करो और दोषियों को न्याय के कटघरे में लाओ की मांग किये और इसके साथ ही आदिवासी लोगों के भूमि, वन और जल पर सामूहिक अधिकारों को मान्यता दें; प्राकृतिक संसाधनों का एकाधिकार को हस्तांतरण रोकने की मांग की.
जनता के हितों की रक्षा करने और प्रकृति के विनाश के खिलाफ लड़ने वालों को ‘राजनीतिक कैदी’ का दर्जा प्रदान करें; जेलों में रहने की स्थितियों में सुधार करें, बीमार कैदियों के चिकित्सा उपचार में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करें और बिना चिकित्सा उपचार के लंबे समय तक जेल में बंद रहे लोगों को बिना शर्त रिहा करें.
प्रदर्शन में हजारों लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने भारत समेत दुनिया भर के लोगों को झकझोर दिया है. भारत की हिन्दुत्ववादी फासीवादी मोदी सत्ता के नृशंसता को दुनिया के सामने उजागर कर दिया वहीं इस प्रदर्शन ने भारत समेत दुनिया भर के क्रांतिकारी जमातों में जोश भरने का काम किया है.
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