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संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष ही है नवम्बर क्रांति का संदेश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 7, 2023
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बोल्शेविक क्रांति का समकालीन इतिहास में महत्व
बोल्शेविक क्रांति का समकालीन इतिहास में महत्व

रूस में 25 अक्टूबर 1917 को बोल्शेविक क्रांति हुई. इस अक्टूबर क्रांति के सौवें वर्षगांठ के अवसर पर समाजवाद की स्थापना के लक्ष्य से विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ध्वस्त करने की अक्टूबर क्रांति की स्फूर्ति को विश्व भर में मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी, सर्वहारा वर्ग और क्रांतिकारी जनता ऊंचा उठाते हुए मनाया जा रहा है. इस अवसर पर समाजवाद-साम्यवाद हासिल करने के लक्ष्य से मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन और माओ, पार्टी के नेता और कार्यकर्ता और क्रांतिकारी मजदूर व किसान जनता करोड़ों संख्या में अपनी जान न्योछावर किया. उन सभी अमर शहीदों को विनग्रतापूर्वक, सिर झुकाकर श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे. उनके अरमानों को पूरा करने के लिए आखिरी दम तक संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे.

इस अवसर पर आधुनिक संशोधनवादी (भाकपा, माकापा, भाकपा (मा-ले), अवसरवाद सुधारवादी, काउट्स्कीवादी, मेन्शेविक, ट्राट्स्कीवादी और प्रतिक्रियावादी बड़े पैमाने पर दुष्प्रचार कर रहे हैं. इन सभी के दुष्प्रचार को हराना आज बहुत ही जरूरत है. क्रांति एक लगातार और गंभीर संघर्ष है. इस संघर्ष के जरिए ही ‘मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद’ विकसित हुआ और भी विकसित होगा. ‘मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद’ द्वारा सूत्रित वैज्ञानिक मौलिक उसूल मानव समाज में हर एक नया बदलाव का मार्गदर्शन करते रहेंगे. मालेमा उसूल और ज्ञान को आधार बनाकर, नए सामाजिक प्रयोग जब का तब नए चीजों का ग्रहण करते हुए सैद्धांतिक ज्ञान को विकसित करते हुए समय-समय पर जरूरी नए चीजों को रेखांकित करना होगा. अगर पिछले सिद्धांतों व उसूलों का आधार नहीं तो नए प्रयोगों के लिए कोई बुनियादी नहीं बनता. अगर नए प्रयोग ही नहीं तो सिद्धांत की विकास नहीं होगी. इस तरह पेरिस कम्यून और रूस में अक्टूबर क्रांति, चीन में जनक्रांति, आदि कई क्रांतियां उभर कर आयी थी.

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कामरेड्स, लेनिन और स्तालिन अपनी रचनाओं में अक्टूबर क्रांति की महत्व के बारे में संक्षिप्त रूप से इस तरह बताया : रूस में सर्वहारा पार्टी ने कैसे अक्टूबर क्रांति की नेतृत्व प्रदान की ? वह सतही तौर पर मार्क्सवाद से सहमति जताना नहीं, बल्कि उसे वास्तविक रूप से अमल करने पर, व्यवहार से जोड़ने पर मुख्य प्राथमिकता दी. मार्क्सवाद को वास्तविक रूप से अमल करने के लिए रास्ते और पद्धतियां निर्धारण करने पर और परिस्थिति में बदलाव के साथ-साथ उन रास्तों और पद्धतियों को बदलने पर हनई रूप से वह अपनी ध्यान केन्द्रित किया. वह अपने निर्देशों और सूचनाओं ओर हिदायतों को ऐतिहासिक संदभों से या समानताओं से नहीं, बल्कि अपनी आसपास की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में अध्ययन करने द्वारा रेखांकित किया. अपने गतिविधियां उल्‍लेखनों और कहावतों से नहीं, बल्कि व्यवहार से हासिल अनुभव पर और हर कदम को व्यवहार से जांच-पड़ताल करने पर, अपने गलतियों से सीख लेने पर, नयी जीवन का निर्माण में दूसरों को शिक्षा देने पर निर्भर होकर संचालित करती थी. यही उनके गतिविधियों में कथनों व कार्यों में अंतर नहीं होने और मार्क्स की शिक्षाओं को पूरी तरह अपनी सजीव क्रांतिकारी शक्ति के रूप में सोखने की कारण रही थी. महान शिक्षक मार्क्स ने कहा, ‘मार्क्सवादी विश्व सारतत्व की विवरण देकर नहीं रुकते, वे और आगे बढ़कर उसे बदल देते हैं.’ उस पार्टी का नाम था बोल्शेविक पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टी और उस पार्टी का नेता थे लेनिन और स्तालिन.

रूस में सर्वहारा पार्टी का गठन किन विशेष परिस्थितियों में हुआ ? वे ऐसी परिस्थितियां नहीं थी जो कि यूरोप (पश्चिमी) देशों में जब मजदूरों के पार्टी स्थापना हो रही थी. यूरोपीयन देशों में – फ्रांस और जर्मनी में – ट्रेड यूनियनों और पार्टियों को जब कानूनी दर्जा प्राप्त था, बुर्जआ वर्ग अधिकार को कब्जा करने के बाद वह सर्वहारा वर्ग से लोहा ले रही थी, तब मजदूरों की पार्टी का गठन हुआ. इसके विपरीत, जब रूस में क्रूर तानाशाही जारी थी, बुर्जुआ जनवादी क्रांति होने की आसार थी, तब सर्वहारा वर्ग की पार्टी का गठन हुआ. एक तरफ पार्टी की इकाइयां बुर्जुआ ‘कानूनी मार्क्सवदियों से’ कचाकच भरी हुई थी और वे बुर्जुआ क्रांति के लिए सर्वहारा वर्ग को बढ़ा रहे थे. दूसरी तरफ, स्वतःप्रवृर्ती क्रांतिकारी आंदोलन की वृद्धि होने के कारण, जब तानाशाह को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन को दक्षता से निर्देशित करने की एक दृढ़, मजबूत और उचित मात्रा में गुप्त संघर्षरत केन्द्रीय भाग (core) की जरूरत पड़ी थी, जारशाही सरकार के भाड़े की पुलिस ने उत्तम मजदूरों से आए हुए पार्टी कतारों का अपहरण कर रहा था.

इस तरह की परिस्थितियों में बोल्शेविकों कर्तव्य है सच्चे मार्क्सवादियों से झूठे मार्क्सवादियों को अलग करना, संघर्ष के व्यवहार से अच्छे और बुरे तत्वों को अलग करना, ठोस इलाकों में अनुभवी क्रांतिकारी कतारों को संगठित करना, उन्हें स्पष्ट कार्यक्रम और दृढ़ कार्यनीति बनाकर उपलब्ध कराना, अंत में इन कतारों को पेशेवर क्रांतिकारियों से युक्त, उचित रूप से गुप्तता का पालन करते हुए पुलिस बलों के हमलों से बचा पाने, उसी समय, उचित रूप से जनसमुदायों से संबंध रखकर, जरूरी समय पर उन्हें संघर्ष में नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम एक ही संघर्षरत संगठन में संगठित करना.

लेकिन मार्क्सवादी दृष्टिकोण से अलग रूख रखने वाले मेन्शेविकों ने समस्या को बहुत ही सरलता से निपट लिया. उनका कहना है, यूरोपीयन देशों में सर्वहारा वर्ग के अर्थिक परिस्थितियों को बेहतर करने के लिए संघर्ष करने के क्रम में जिस तरह नान-पार्टी ट्रेड यूनियनों से मजदूरों की पार्टी उभर कर आयी है, उसी तरह रूस में भी उभर कर आएगी, ‘पूंजीवादियों और सरकार के खिलाफ सिर्फ मजदूरों के आर्थिक संघर्ष’ ही पर्याप्त है, अखिल रूसी संघर्षरत संगठन का गठन करने की कोई जरूरत नहीं, समय पर अगर ट्रेड यूनियनें जागरूक नहीं होने पर नान-पार्टी लेबर कांग्रेस बुलाकर उसी को पार्टी के रूप में गठन कर सकते हैं. इस तरह की मार्क्सवाद विरोधी योजना पर अमल करने के लिए रूस की परिस्थितियों में भी कोई आधार नहीं था.

रूस के मजदूर वर्ग और बोल्शेविक पार्टी के लिए लेनिन की महान सेवा यही थी कि वे उस समय के मेन्शेविकों के सांगठनिक ‘योजना’ से उत्पन्न होने वाली खतरे को शुरूआत में ही भण्डाफोड़ कर लिया. सांगठनिक विषयों में मेन्शेविकों की ढीलापन पर उन्होंने तीव्र रूप से हमला शुरू किया. इस समस्या पर पार्टी में कार्यरत कार्यकर्ताओं की पूरी ध्यान केन्द्रित किया. पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ गयी. वह पार्टी के लिए एक जीवन-मरण समस्या थी.

इस तरह की परिस्थितियों में पार्टी शक्तियों को इकट्ठा करने की केन्द्र के रूप में अखिल रूसी स्तर पर एक राजनीतिक पत्रिका निकालना, विभिन्‍न इलाकों में पार्टी के दृढ़ कतारों को पार्टी के नियमित ईकाइयों के रूप में संगठित करना, समाचार अखबार के मध्यम से इन कतारों को एक ही संगठन के रूप में संगठित करना, यानी उन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमाओं में, स्पष्ट कार्यक्रम, दृढ़ कार्यनीति और एक ही लक्ष्य के साथ अखिल रूसी संघर्षरत पार्टी के अंदर शामिल करना – यह थी लेनिन के अपने प्रमुख ग्रंथों – ‘क्या करना है’, ‘एक कदम आगे और दो कदम पीछे’ – द्वारा विकसित की गयी योजना. इस योजना की विशेषता यही थी कि यह पूरी तरह रूसी वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप होना. व्यवहार में निमग्न बेहतरीन कार्यकर्ताओं की सांगठनिक अनुभव को लेकर दक्षता से उस योजना में साधारीकरण किया गया था. इस योजना के लिए जारी संघर्ष में बहुसंख्यक रूसी कार्यकर्ताओं ने लेनिन का अनुसरण किया. किसी दरार को मौका नहीं देते हुए एकजुटता दर्शाया. इस योजना की सफलता आपस में सहयोगिता से, फौलादी बने, विश्व में असमान कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के लिए नींव रखी.

बोल्शेविक पार्टी खुद उसकी अंदर से गैरसर्वहारा और अवसरवादी शक्तियों को निकाल नहीं देते, तो वह आंतरिक कमजोरियों से और निराशा से उबर नहीं पाते. अपनी स्फूर्ति और शक्ति को फिर से हासिल नहीं कर पाते. बोल्शेविक पार्टी की इतिहास ने साबित कर दिखाया कि है शासन काल में सर्वहारा वर्ग की पार्टी अपनी अंदर और सर्वहारा के अंदर अवसरवादी, क्रांति विरोधी और पार्टी विरोधी शक्तियों के खिलाफ जिस हद तक लड़ पाती है, उस हद तक वह बढ़कर मजबूत हो सकती है. लेनिन पार्टी विरोधी और क्रांति विरोधी शक्तियों के खिलाफ समझौता-विहीन संघर्षरत रास्ते में पार्टी का संचालित करना हजार बार सही है. उस तरह की सांगठनिक दिशा के जरिए ही बोल्शेविक पार्टी ने आंतरिक एकता और चकित कर देने वाली सम्बद्धता हासिल कर पायी थी. केरेन्स्की के शासन काल में उभरने वाली जुलाई संकट से आसानी से उबर पायी थी. अक्टूबर बगावत में मुख्य शक्ति के रूप में खड़ी हो पायी थी. किसी हिचकिचाहट से ब्रेस्ट-लिटोवस्क संधी काल के संकट से उबर पायी थी. एनटेंटे पर जीत हासिल कर पायी थी. अंत में किसी भी समय पर अपनी कतारों को पुनरगठित कर पाने की असमान लचीलता हासिल कर पायी थी. बोल्शेविक पार्टी चाहे किसी भी बड़े कर्तव्य हासिल करने के लिए हो, किसी गड़बड़ से दूर रहते हुए अपने सैकड़ों हजार सदस्यों को केन्द्रीकृत कर पायी थी.

बोल्शेविक पार्टी के अपनी प्रयास में, अपनी कार्यक्रम (रणनीति) में और कार्यनीति में राजनीतिक सारतत्व अगर रूसी वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होते तो, उसकी नारे मजदूर-किसान जनसमुदायों को अगर जागरूक नहीं किए तो और क्रांतिकारी आंदोलन को अगर आगे नहीं बढ़ा पाए तो, वह तेजी से वृद्धि होकर मजबूत नहीं हो पाती थी. अभी इस पहलू के बारे में देखेंगे.

रूसी बुर्जुआ जनवादी क्रांति (1905) ऐसी परिस्थितियों में हुई जो कि यूरोप के देशों में – उदाहरण के लिए फ्रांस और जर्मनी में – क्रांतिकारी उभारों की काल के परिस्थितियों से विपरीत थी. यूरोप देशों में क्रांतियां उस समय हुई, जब वहां पूंजीवाद के माल उत्पादन की दशा थी, वर्ग संघर्ष की विकास नहीं हुई थी, सर्वहारा वर्ग कमजोर थी, वह राशी में कम, अपने लिए अपनी पार्टी नहीं होने, अपने मांगों को तय करने में अक्षम थी, बुर्जुआ वर्ग में उचित क्रांतिकारी रूझान मौजूद थी, उनके द्वारा मजदूर-किसान जनसमुदायों के विश्वास में लेने और उन्हें राजशाही के खिलाफ संघर्ष में नेतृत्व प्रदान कर पाने की परिस्थितियां थी. इसके विपरीत रूस में क्रांति (1905) पूंजीवाद की यात्रीकारण (machine industries) की काल में, वर्ग संघर्ष की विकसित काल में, रूस के सर्वहारा वर्ग सापेक्षिक तौर पर राशी में वृद्धि होने, पूंजीवाद के जरिए संगठित होने की काल में, पहले से बुर्जआ वर्ग के साथ उनके द्वारा कई लड़ाइयां किए जाने की स्थिति में, वह अपने लिए एक पार्टी होने की काल में, बुर्जुआ पार्टी से और एकता हासिल कर पाने की काल में, अपने वर्ग के लिए अपने मांग होने, उसी समय, रूसी बुर्जुआ वर्ग ज्यादातर सरकार के ठेकों पर निर्भर रहने की काल में, सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी जोश को देखकर आतंकित होकर मजदूर-किसानों के खिलाफ सरकार और जमींदारों के साथ बुर्जुआ वर्ग एकताबद्ध हो जाने की स्थिति में हुई थी.

इस तरह की परिस्थितियों में बोल्शेविक पार्टी ने निर्णय लिया था कि सर्वहारा वर्ग को रूसी क्रांति का नेतृत्व प्रदान करना होगा, किसानों को अपने इर्दगिर्द गोलबंद करना होगा, देश में संपूर्ण जनवाद की स्थापना के लक्ष्य से, अपने वर्ग हितों का भरोसा देते हुए, जारशाही और बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ एक ही समय में निर्णयात्मक संघर्ष संचालित करना होगा.

इसके विपरीत मार्क्सवाद की तिलांजलि देकर बुर्जुआ वर्ग की पिछलग्गू बनने वाले मेन्शेविकों ने समस्या को अपने हिसाब से निपट लिया : चूंकि रूसी क्रांति एक बुर्जुआ क्रांति था, इसका नेतृत्व बुर्जुआ को ही करना होगा (फ्रांस और जर्मनी के क्रांतियों की ‘इतिहास” देखें), इस क्रांति पर मजदूर वर्ग अपनी प्रभुत्व कायम नहीं रख सकती. वह समझना होगा कि (क्रांति का) नेतृत्व रूसी बुर्जुआ वर्ग (जो क्रांति की गद्दारी करने वाले बुर्जुआ वर्ग को) छोड़ देना होगा. किसान जनता को भी बुर्जुआ वर्ग के देखरेख में छोड़ना होगा. सर्वहारा वर्ग सिर्फ एक अतिवामदल-विपक्षी दल के रूप में रहना होगा.

रूसी क्रांति के लिए लेनिन द्वारा की गयी महान सेवा यह थी कि उन्होंने मेन्शेविकों द्वारा उल्लेखित ऐतिहासिक संदर्भों की निरर्थकता, बुर्जुआ दया-कटाक्षों पर मजदूरों को छोड़ने वाली उनकी (मेन्शेविकों की) ‘क्रांतिकारी योजना’ से बैठे हुए खतरे को भण्डाफोड्‌ किया. बुर्जुआ तानाशाह नहीं बल्कि मजदूर-किसानों के क्रांतिकारी जनवादी अधिनायकत्व; बुलिगिन ड्युमा में भाग लेना नहीं बल्कि ड्युमा का बहिष्कार करना, सशस्त्र बगावत; इस ढांचे में सांगठनिक प्रयास जारी रखना; ड्युमा शुरू होने के बाद ‘वामपंथी गठजोड़’ की भावना; केडेटों की मंत्री पद स्वीकार करना या प्रतिक्रियावादी ड्युमा को ‘आसमान’ में उठाना नहीं बल्कि ड्युमा से बाहर संघर्ष के लिए ड्युमा मंच को इस्तेमाल करना; केडेट पार्टी के साथ ‘गठजोड़’ बनाना नहीं बल्कि प्रतिक्रांतिकारी शक्ति के रूप में रही उस पार्टी के खिलाफ संघर्ष करना – इस तरह की कार्यनीतिक योजना को लेनिन अपने प्रमुख पर्चे – जनवादी क्रांति में सामाजिक जनवाद के दो कार्यनीति, केडेटों की विजय और मजदूरों की पार्टी के कर्तव्य – में विकसित किया.

इस योजना विशेषता यह था कि वह रूस में बुर्जुआ जनवादी क्रांति में मजदूरों के वर्ग मांगों को धारदार बनाकर मजबूत किया. समाजवादी क्रांति की मार्ग को सुगम बनाया. उसमें अंकुरित होने वाली सर्वहारा के अधिनायकत्व की भावना निहित थी. बहुसंख्यक रूसी मजदूरों ने दृढ़, स्थिर और किसी बदलाव किए बिना इस कार्यनीतिक योजना को अमल करने की संघर्ष में लेनिन का अनुसरण किया. बोल्शेविक पार्टी उस क्रांतिकारी कार्यनीति की नींव रखने के कारण ही इस योजना सफल होकर वर्तमान वह विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आधार शिलाओं को हिला रही है.

उसके बाद हुई बदलावों; चार वर्ष के साम्राज्यवाद युद्ध, पूरे देश (रूस) की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाना; फरवरी क्रांति, द्वंद्वाधिकार उभर कर सामने आना; अस्थायी सरकार बुर्जुआ प्रतिक्रांतिकारी गतिविधियों के केन्द्र के रूप में तब्दील हो जाना; सर्वहारा अधिनायकत्व के शुरूआत के रूप में पेत्रोग्राद के सोवियत प्रतिनिधि उभर कर आना; अक्टूबर क्रांति, संविधान सभा तितर-बितर हो जाना; बुर्जुआ संसदवाद की खत्मा; सोवियत संघ की घोषणा; साम्राज्यवाद युद्ध गृहयुद्ध में परिवर्तित हो जाना; सर्वहारा क्रांति के खिलाफ विश्व साम्राज्यवाद मार्क्सवादी गद्दारों से मिलकर हमला करना; संविधान सभा से चिपक जाने वाले मेन्शेविकों की दयनीय स्थिति – ये सब इसे साबित कर दिखाया कि लेनिन अपनी ‘दो कार्यनीति’ में बनायी गई क्रांतिकारी उसूल सही थी. उस तरह की विरासत को ऊंचा उठाने वाली बोल्शेविक पार्टी ने पानी में डुबे हुए बड़े-बड़े पत्थरों से डरे बिना, उससे बचते हुए हिम्मत के साथ तैरते हुए आगे बढ़ी. अक्टूबर क्रांति ने सर्वहारा क्रांति की जीत के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य (एक कार्यक्रम) और दृढ़तापूर्ण कार्यदिशा (कार्यनीति) के साथ सही नेतृत्वकारी भूमिका को विकसित किया. उसी तरह बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवाद की पक्ष का समर्थन करने वाली दूसरी इंटरनेशनल और मेन्शेविक की संशोधनवादी नेतृत्वकारी भूमिका को हरा कर उसे नकार दिया. सर्वहारा क्रांति में और सर्वहारा की पार्टी में नेतृत्वकारी भूमिका को कायम करने के लिए सैद्धांतिक पकड़ होने के साथ-साथ उसे सर्वहारा के संगठन के व्यवहार से मिलने वाली अनुभव से जरूर जोड़ देना चाहिए. ऐसा करने के साथ-साथ व्यवहार में सर्वहारा वर्ग के गुण – जैसे ‘फौलादी बनाना, बगावतों के अवसर पर दृढतापूर्वक आत्मबलिदान देना और धैर्य – को परीक्षण में लगाया गये थे.

‘इसलिए सभी क्रांतियों की कीर्तिमान है 1917 में रूसी हुई अक्टूबर क्रांति. उससे पहले इतिहास में हुई सभी क्रांति से राशी में और गुण में गुणात्मक रूप से वह उच्च स्तर के क्रांति के रूप में खड़ी है. बोल्शेबीवाद न सिर्फ रूसी क्रांति की, बल्कि विश्व के सभी क्रांतियों का ठोस और सही मार्गदर्शन किया. इसलिए लेनिन ने कहा –

‘बोल्शेवीवाद न सिर्फ विश्व बोल्शेवीवाद के रूप में उभर कर आयी, बल्कि वह एक विचार, एक सिद्धांत, एक कार्यक्रम और कार्यनीति को – सामाजिक अंधराष्ट्रवाद और सामाजिक शांतिवाद के विकल्प में बनाया.’ ‘बोल्शेवीवाद तीसरी इंटरनेशनल रूप में तब्दील हुई, सही सर्वहारा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के रूप में उसके सैद्धांतिक और कार्यनीतिक आधारों को बनाया.’ ‘बोल्शेवीवाद साम्राज्यवाद की युद्ध वीभत्सों से सही मुक्ति पाने की रास्ता दर्शाया !

‘सिर्फ बोल्शेविकों ने ही बुर्जआ जनवादी क्रांति और समाजवादी क्रांति के बीच अंतर का ठोस रूप से पहचान किया, पहली क्रांति को अंतिम तक पहुंचाकर, दूसरी क्रांति की द्वारों को खोल दिया. सिर्फ यही है क्रांतिकारी मार्क्सवाद.’ (लेनिन, सर्वहारा क्रांति-क्रांति का गद्दर काउटस्की).

मार्क्स और एंगेल्स के निधन के बाद, लेनिन अंतराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के महान नेता के रूप में, विश्व सर्वहारा वर्ग-उत्पीडित जनता के महान शिक्षक के रूप में उभर कर आए थे. 19वीं सदी की अंत और 20वीं सदी के शुरूआत में लेनिन जब अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां शुरू की, तब दुनिया साम्राज्यवाद, सर्वहारा क्रांति युग में प्रवेश कर रही थी. लेनिन, साम्राज्यवाद और सभी तरह के अवसरवादों, विशेषकर दूसरी इंटरनेशनल की संशोधनवाद के खिलाफ कई संघर्ष चलाया, मार्क्सवाद की विरासत को खड़ा कर, उसे बचाया और विकसित किया एवं उसे नयी और उच्च चरण लेनिनवाद के रूप में विकसित किया. इसके बारे में स्तालिन ने कहा – ‘लेनिनवाद, साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रांतिकारी युग का मार्क्सवाद है.’ लेनिन, साम्राज्यवाद के अंदर अंतरविरोधों का विश्लेषण कर, उसे संचालित करने वाली उसूल का भण्डाफोड्‌ किया. साम्राज्यवादी युग में सर्वहारा क्रांति से संबंधित कई मुख्य समस्याओं को सुलझा लिया. ‘एक या उससे ज्यादा देशों में जीत हासिल करने’ द्वारा समाजवाद की समस्या को सुलझा लिया. मानव इतिहास में एक नया युग का शुरुआत किया. सर्वहारा क्रांति के लक्ष्य के लिए लेनिन द्वारा की गयी सैद्धांतिक व्यावहारिक संशोधन बहुत ही महत्वपूर्ण है.

लेनिन का निधन के बाद, स्तालिन देश और विदेशों के वर्ग दुश्मनों और पार्टी में दक्षिणपंथी और वामपंथी अवसरवादियों के खिलाफ संचालित संघर्षों में लेनिनवाद की विरासत को ऊंचा उठाया और उसे बचा लिया. उन्होंने समाजवादी रास्ते में सोवियत जनता को आगे बढ़ाते हुए महान सफलताएं हासिल किया. दूसरी विश्व युद्ध के काल में सोवियत जनता स्तालिन के मातहत फासीवादी दुराक्रमण को हराने में मुख्य शक्ति बनी. मानव इतिहास में लम्बे समय तक खड़े होने वाली महान प्रयास किया.

माओ स्ते-तुडः ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद सिद्धांत को जोड़ते हुए चीनी क्रांति की मुख्य समस्याओं को रचनात्मक रूप से सुलझा लिया. बहुत ही लम्बे, गम्भीर, कठिन और जटिलतापूर्ण क्रांतिकारी आंदोलनों में और क्रांतिकारी युद्धों में जनता को नेतृत्व प्रदान किया. विश्व सर्वहारा के क्रांतिकारी इतिहास में अभूतपूर्व तरीके से पूर्वी एशिया इलाके के विशाल देश चीन में जनक्रांति में जीत हासिल किया. मार्क्सवाद-लेनिनवाद की सार्वजनिक सच्चाई और चीनी क्रांति के ठोस व्यवहार के बीच एकता पर निर्भर होकर माओ ने चीनी इतिहास, उसकी वास्तविक परिस्थितियों को समकालीन चीनी सामाज की मौलिक अंतरविरोधों को विश्लेषण किया. चीनी क्रांति की आक्रमण के लक्ष्य, उसकी कार्यभार, उसकी प्रेरक शक्तियां, उसकी स्वरूप, उसकी भविष्य, भविष्य में उसकी दिशा आदि समस्याओं का सही जवाब दिया. माओ ने बताया कि चीनी क्रांति अक्टूबर क्रांति का ही अगला रूप है और वह विश्व सर्वहारा समाजवादी क्रांति का हिस्सा है. मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा (अभी माओवाद) की समयकाल में समाजवाद को संगठित करना, आधुनिक संशोधनवाद के साथ लड़ना, पूंजीवाद की पुनःस्थापना को रोकने के लिए महान सर्वहारा के सांस्कृतिक क्रांति को संचालित करने वाले माओ का प्रयास महत्वपूर्ण था. इस तरह उन्होंने समाजवाद से सर्वहारा अधिनायकत्व में कई सांस्कृतिक क्रांतियों (वर्ग संघर्षों) द्वारा समाजवाद तक पहुंचने का रास्ता सुमग बनाया.

दूसरी विश्व युद्ध के बाद दुनिया के परिस्थितियों में कई बदलाव आए थे. उस युद्ध में बहुत बड़ा साम्राज्यवादी शक्तियों (अमेरिका को छोड़कर) की अर्थव्यवस्थाएं बड़े पैमाने पर ध्वस्त हुई. उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद अर्थव्यवस्था पर निर्भर होकर 1950 के बीच तक फिर से बहाली हो गयी. 1955-1970 के बीच विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में आंशिक तौर पर स्थिरता कायम हुआ. अमेरिकी साम्राज्यवाद महाशक्ति के रूप में उभर कर आयी. समाजवादी शिविर अस्तित्व में आयी. दूसरी विश्व युद्ध के बाद, एक दशक तक चली आयी क्रांतिकारी संकट की पृष्ठभूमि में उपनिवेशों और अर्धउपनिवेशों में अभूतपूर्व ढंग से जन-उभार आया, जिससे साम्राज्यवाद परेशान होकर अपनी दुम दबाकर भागना पड़ा. वह प्रत्यक्ष रूप से औपनिवेशिक शासन और बटमारी लूट के स्थान में उत्पीड़ित देशों की सम्पदाओं को लूटने के लिए परोक्ष शासन, लूट और नियंत्रण के नए औपनिवेशिक नीतियों को सामने लाया. इन उत्पीडित देशों के दलाल शासक वर्गों के अपने पिछलग्गुओं द्वारा साम्राज्यवाद ने व्यापक उत्पीड़ित जनता के पीठ पर अपनी संकट के बोझ लगाकर सारे के सारे देशों का शोषण जोर किया.

लेकिन, इतिहास का अपनी ही उतार-चढ़ाव, हार-जीत, टेढ़ा-मोड़ा, वापस आना-आगे बढ़ाना, पीछे हटना-छलांग लगाना होगा. इसके तहत मार्क्सवाद के महान शिक्षक एंगेल्स के निधन के बाद मार्क्सवाद को तिलांजलि देकर विश्वासघाती बेरनेस्टीन-काउटस्की की संशोधवाद का उद्भव हुआ. स्तालिन के निधन के बाद मार्क्सवाद-लेनिनवाद को तिलांजलि देकर विश्वाघाती खुश्चेव-ब्रेजनेव ने संशोनवादी बनकर, सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुनःस्थापना करते हुए, लेनिन के नाम पर, ‘सामाजवाद-युक्त’ साम्राज्यवाद, सामाजिक-फासीवाद और सामाजिक-सैनिकवाद को सामने लाया. वह एक महाशक्ति के रूप में तब्दील होकर, पूरी तरह अधिपत्यवाद को लेकर नयी औपनिवेशिक तरह की लूट को आगे बढ़ाया. माओ का निधन के बाद मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा को तिलांजलि देकर विश्वासघाती हुआ-डेडः ने संशोधनवादी बनकर चीन में पूंजीवाद की पुनःस्थापना किया. वह अभी माओ विचारधारा नाम को जप-माला की तरह जपते हुए एक नयी सामाजिक-साम्राज्यवाद के रूप में बदल गयी. वह विश्व के मजदूर-किसान आदि उत्पीड़ित जनता और राष्ट्रों का दुश्मन बन गयी.

पूंजीवाद में सार्वजनिक संकट 1973 से तेज हो जाने की पृष्ठभूमि में विश्व राजनीति में महान बदलाव हुई हैं. इसके तहत आखरी समाजवादी स्थावर के रूप में रही चीन पीछे हटने के कारण समाजवादी स्थावर को खो गए थे. महाशक्ति के रूप में सोवियत संघ की पतन और उसकी राजनीतिक पतन हुई थी. अमेरिकी महाशक्ति कमजोर होती आई है. रूसी साम्राज्यवाद आर्थिक और राजनीतिक तौर पर थोड़ा बहाल हो गया है. चीन एक नयी सामाजिक-साम्राज्यवाद के रूप में पटल पर आ चुकी है. साम्राज्यवादी देशों में और पूंजीवादी देशों में आर्थिक क्षेत्र में रक्षात्मक नीति (protictinism), राजनीतिक क्षेत्र में रंगभेद (नस्लवाद), फासीवाद बढ़ गया हैं. पिछड़े देशों के संसाधनों और बाजारों को लूटने के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गया है. दुनिया को फिर से विभाजित करने के लिए अमेरीका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गया है. यूरोप में अपनी प्रभुत्व को कायम रखने के लिए जर्मनी और फ्रांस के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गया है. विश्व भर में फासीवाद बढ़ रही है. विश्व बाजार पर और संसाधनों पर अपने ही विशेष नियंत्रण के लिए अमेरिकी नेतृत्व में साम्राज्यवादी दुराक्रमण युद्ध और परोक्ष युद्ध जारी है. परिणास्वरूप विश्व भर में विकसित हो रहे क्रांतिकारी आंदोलनों के लिए अनुकूल परिस्थितियां दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं. दूसरी विश्व युद्ध के बाद देश आजादी, राष्ट्र मुक्ति और जनता क्रांति चाहने की समय में क्रांतियों से भटकाने के लिए साम्राज्यवादियों और उनके पिछलग्गुओं एवं उनके हितों के लिए प्रयासरत कुछ बुद्धिजीवी ‘कल्याणकारी राज्य’,.’सम्पदाओं से भरे-पड़े समाज या ऐश्वर्य समाज’, ‘जनता की पूंजीवाद’, ‘विशेष कल्याण-कार्य’ जैसे कई तरह के नामों से सामने लाए गए सभी धोखेबाजी सुधारवादी लाइनों (कार्य-दिशा) का जन आंदोलन में भण्डाफोड़्‌ और विफल हो चुकी हैं.

इस तरह दूसरी विश्व युद्ध के बाद अभी तक कई बदलाव आने के बावजूद, साम्राज्यवाद कमजोर हो जाने के बावजूद साम्राज्यवाद चरण की अंत नहीं हुई. उसी तरह साम्राज्यवाद जैसे काउट्स्की ने कहा ‘अति-साम्राज्यवाद’ या ‘उत्कृष्ट साम्राज्यवाद’ के रूप में, बिना-युद्धवाली साम्राज्यवाद के रूप में तब्दील नहीं हुई. लेकिन वर्तमान दुनिया में इस तरह काउट्स्कीवादी, आधुनिक संशोधनवादी, सुधारवादी, कुछ बुर्जुआ व पेटीबुर्जुआ बुद्धिजीवियों में ऐसा भ्रम एक रूझान की रूप में जारी है. विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवाद को जब तक पूरी तरह नष्ट नहीं करेंगे, तब तक उसकी अंत नहीं होगी. जब तक साम्राज्यवाद रहेगी, तब तक उसकी स्वभाव कभी नहीं बदलेगी. इस अवसर पर माओ द्वारा उल्लेखित निम्नलिखित इस उसूल को याद रखना उचित होगा, ‘हम अभी भी साम्राज्यवादी चरण और सर्वहारा क्रांति के चरण से गुजर रहे हैं. मार्क्सवाद के मौलिक उसूलों पर निर्भर होकर साम्राज्यवाद के बारे में लेनिन द्वारा सूत्रबद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण पूरी तरह सही है. लेनिनवाद का यह मौलिक उसूल अभी पुरानी नहीं हुई’ ! मार्क्सवाद के महान शिक्षक लेनिन और माओ द्वारा शिक्षित यह उसूल अभी भी हमारे सिद्धांत और कार्यप्रणाली का अधार बनी हुई है.

आज भारत वर्ष में लेनिनवाद की तिलांजलि देनेवाली गलत संशोधनवादी सिद्धांत को हराएंगे !

भारत वर्ष में पुराने और नए संशोधनवादियों द्वारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद के नाम पर सामने लाने वाली सिद्धांत निम्नलिखित बिन्दुओं पर आधारित है :

  1. वह साम्राज्यवादी युद्ध को क्रांति की सन्निकटता का एक जरूरी शर्त मानती है. वह कहती है कि वही लेनिनवाद सिद्धांत का आधार है.
  2. वह कहती है कि साम्राज्यवादी विश्व युद्ध नहीं होने और क्रांति का सन्निकटता नहीं होने की आज की स्थिति में, लेनिनवाद अमान्य या पुराना हो गयी है.
  3. वह कहती है कि वर्तमान परिस्थिति में भारतीय वामदल, माओवादियों सहित, अवसरवाद, गैरक्रांतिकारी और गठजोड़ों के आधार पर सुधारवादी कार्य-दिशा पर अमल करना है.

इस सुधारवादी कार्य-दिशा पहली विश्वयुद्ध के समयकाल में काउट्स्की द्वारा सामने लायी गयी विश्वासघाती ‘अति-साम्राज्यवादी’ सिद्धांत के सिवा और कुछ नहीं है. इसके जरिए वे क्रांति को अनन्त काल तक टालना चाहते हैं. इस संशोधनवादी कार्य-दिशा सुधारवादी विचारों और अवसरवादी व्यवहार का एक नमूना के रूप में रहेगा. भारतीय संशोधनवादी बुद्धिजीवी प्रभात पट्नायक 2016 में ‘साम्राज्यवाद के एक सिद्धांत’ (a theory of imperialism) के नाम पर लिखित एक निबंध में इसी सिद्धांत का ही वकालत किया। पश्चिम बंगाल राज्य के विधानसभा चुनावों में वामदल-कांग्रेस गठजोड़ पूरी तरह पतन हो जाने के कुछ दिन बाद प्रकाशित उनकी इस निबंध को इस पराजयवाद की राजनीतिक पृष्ठभूमि में ही समझना होगा. इसलिए इस सिद्धांति के जरिए प्रस्तावित विभिन्‍न दृष्टिकोणों और उससे जारी किए जाने वाले हिदायतों को सर्वहारा के क्रांतिकारी दृष्टिकोण से विश्लेषण कर भण्डाफोड़ करना जरूरी है. इसके लिए इस सिद्धांत के जरिए सामने लाने वाले विचारों को गहराई से जांच कर विश्लेषण करेंगे. मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की समझ से उसकी खोखलेपन का भण्डाफोड़ करेंगे.

1. साम्राज्यवादी युद्ध क्रांति का सन्निकटता का जरूरी शर्त बताकर वह सर्वहारा आंदोलन में चोरीछिपे चरणबद्ध सिद्धांत का घुसाना चाहती है :

क्रांति का सन्निकटता लेनिनवादी सिद्धांत का आधार बताकर इस सिद्धांत ने खुद अपनी दकियानूसी और घटिया मार्क्सवादी-संशोधनवादी दृष्टिकोण का उजागर किया है. लेनिनवादी सिद्धांत के मौलिक विचार के अनुसार क्रांति का सन्निकटता होना चाहिए, लेकिन भारत वर्ष में किसी क्रांति का उभार दिखाई नहीं पड़ रहा है, इसलिए क्रांति का सन्निकटता होने तक सर्वहारा पार्टी को अपनी क्रांतिकारी पद्धति में गतिविधियां नहीं करना चाहिए, कहते हुए वह सर्वहारा के आंदोलन में चोरीछिपे चरणबद्ध को घुसाना चाहती है. वह चाहती है : ‘क्रांति का सन्निकटता होने तक क्रांतिकारियों को अपना क्रांतिकारी कार्य-दिशा (लाइन) को छोड़कर, व्यवहारात्मक संसदीय राजनीति को अपनाना होगा (कमांड में रखना होगा). बुर्जुआ और पेटीबुर्जुआ पार्टियों के साथ ‘आंदोलनों और मंचों पर एकताबद्ध हो जाना चाहिए और सरकार में भी शामिल होना चाहिए ! शीघ्र ही क्रांति होगी कहकर बैठे रहना सही क्रांतिकारी व्यवहार का आधार होगा. क्रांति निकट तक पहुंचने के बाद आंदोलन को क्रांतिकारी ‘पद्धति ! (mode) में बदलना होगा. यानी, क्रांति का सन्निकटता का पिछले चरण में अवसरवादी समझौते, कल्याणकारी कार्यक्रमों में डुबी हुई एक क्रांतिकारी पार्टी अचानक आंदोलन की प्रणाली अपनाना होगा. क्रांति का दावत देने के बाद, ‘उस दावत का पात्र होने के लिए’ दूसरों को पीछे धख्लेलते हुए जबरदस्ती से घुसकर सामने आना होगा.’

क्रांति का सन्निकटता के बारे में यह चरणबद्ध सिद्धांत एक ऐसी पक्की रणनीति है कि वह यह कायम कर देती है कि क्रांति कभी भी सम्भव नहीं होगा. लेनिनवादी सिद्धांत के आधार के बारे में अगर सही रूप से जाना है तो, क्रांति का सन्निकटता के बारे में नहीं बल्कि, क्रांति का वास्तविकता के बारे में लेनिन की विचारधारा का सारतत्व को समझना होगा.

क्रांति का सन्निकटता एक निश्चल भावना है. वह किसी ऐतिहासिक क्रमों से संबंध रखे बिना क्रांति निकट हो जाने की सूचना देती है. क्रांति की वास्तविकता एक गतिशील भावना है. यह इतिहास में स्थिर रूप से आने वाली बदलाव का हिस्सा है. यह – एक ऐतिहासिक क्रम में पूंजीवाद में निहित अंतरविरोध क्रमश: और स्थिर रूप से परिपक्व हो जाता है और सर्वहारा की ऐतिहासिक पार्टी विकसित हो जाती है – इस वास्तविकता से संबंधित आत्मगत शक्ति के रूप में उसकी सर्वहारा के वर्गचेतना को सूचित करता है.

क्रांति की वास्तविकता के बारे अगर जानना है तो, पूरी सामाजिक इतिहास में एक हिस्से के तौर पर हर दिन आने वाली हर एक समस्या को सर्वहारा की मुक्ति के तहत ही ठोस रूप से अध्ययन करना होगा. इसके विपरीत, क्रांति का सन्निकटता सिद्धांत क्रांतिकारी आंदोलन को पूरी तरह सामग्रिक रूप से न देखकर क्रांति का सन्निकटता से पहले की परिस्थितियां और निकट हो जाने के बाद की परिस्थितियां – के रूप में विभाजित करती है. वह इन परिस्थितियों के बीच (संबंध या) धारावाहिकता के बारे में नहीं बताती है. इन परिस्थितियों के सीमाओं पर आंदोलन उंगली से बटन दबाने के साथ-साथ सुधारवाद से क्रांतिकारी प्रणाली पर बदल जाती है. वास्तविकता क्रांतिकारी आंदोलन को पूरी तरह सामग्रिक रूप से देखती है. सन्निकटता उसको अलग-अलग भागों में विभाजित करता है और निष्क्रिय कर देता है. सन्निकटता सिद्धांत सन्निकटता से पहले की चरण में हर एक राजनीतिक समस्या को सिर्फ सुधारवादी समस्या के रूप में देखती है. इसके विपरीत, वास्तविकता का मतलब है, उस दिन सामने आने वाली हर एक समस्या को उस दिन सामने आने वाली समस्या के रूप में ही नहीं बल्कि, उसे क्रांति से संबंधित मौलिक समस्या के रूप में भी देखती है. लेनिन विचारधारा यह है कि वह ‘उस दिन सामने आने वाली समस्या’ ‘क्रांति से संबंधित मौलिक समस्या’ के बीच इुंद्वात्मक एकता को दर्शाता है. लेनिन की राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह फौरी राजनीतिक समस्यएं और अंतिम क्रांतिकारी आंदोलन के बीच दुंद्वात्मक एकता से संबंधित अध्ययन ही है.

लेनिन इस तरह स्पष्ट किये कि बुर्जुआ समाज के चुपचाप एक क्रम चलती रहती है, जिसमें मथना होते हुए स्वयं उसकी विध्वंस के लिए भूमिका तैयार करती है, इस वास्तविकता के बारे में चेतनाबद्ध होकर, इस वास्तविकता को साकार करने के लिए क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलनों द्वारा उचित रूप में फौलादी बनने वाली आत्मगत शक्ति को विकसित करने की जरूरत को समझती है. इससे खास बात यह है कि क्रांतिकारी वास्तविकता ने क्रांतिकारी मजदूरों की पार्टी के दैनंदिन राजनीतिक प्रयास को अपनी अंतिम लक्ष्य – सर्वहारा क्रांति से जोड़ती है. पट्नायक की धोखेबाजी (क्रांति का) सन्निकटता की सिद्धांत इस तरह की प्रयास पर किसी तरह की आशा नहीं प्रकट करती है.

लेनिन की राजनीतिक रणनीति में निहित स्थिरता में दो पहलू है : एक, लेनिन की राजनीतिक रणनीति हमेशा वर्तमान आर्थिक संबंधों को व्यापक रूप से वर्ग विश्लेषण करने पर निर्भर होती है. दो, लेनिन द्वारा तय करने वाली हर एक रणनीति उसकी अंतिम लक्ष्य के वास्तविकता यानी सर्वहारा के क्रांति का वास्तविकता द्वारा ही प्रकट होती है. लेनिन के अनुसार, सर्वहारा के अगली दस्ता के मुख्य कार्यभार ये हैं : हर एक राजनीतिक परिस्थिति में सामने आने वाले अवसरों को सामाजिक आर्थिक वास्तविकता से संबंधित वर्ग विश्लेषण पर निर्भर होकर पक्की आकलन करना, सर्वहारा आंदोलन को बहुत ही मौलिक विकास का साकार करने की दिशा में मोड़ना, वह मौलिक बदलाव हासिल करने की स्थिति तक पहुंचने में बाधा बनने वाले बुर्जुआ और पेटी बुर्जुआ वर्गों के प्रयासों के खिलाफ उसको सीधे तौर पर लक्ष्य बनाना.

लेनिन ने जब क्रांतिकारी परिस्थिति नहीं है, उस समय में कम्युनिस्टों की क्रांतिकारी कार्यभारों के बारे में सही रूप से, एक शब्द भी छुटे बिना इस तरह बताये थे : ‘… गैर-क्रांतिकारी (non-revolutionary) संगठनों में क्रांतिकारी हितों (प्रचार, आंदोलन और निर्माण के जरिए) को पूरा करने की योद्धा के रूप में खड़ा होना … वास्तविक, निर्णायक और अंतिम क्रांतिकारी संघर्ष के लिए जनता को आगे ले जाने वाली ठोस कार्य-दिशा (लाइन) या घटनाक्रम किस तरफ मोड्ती है, उस ठोस क्रम को जांच करना है, पहचान करना है, सही रूप से निर्धारण करना है.’ (लेनिन, left wing communism : an infentile disorder). कम्युनिस्टों ने ‘जनता को वास्तविक, निर्णायक और अंतिम क्रांतिकारी संघर्ष की तरफ ले जाने वाली ठोस कार्य-दिशा (लाइन) या घटनाक्रम किस तरफ मोड्ती है, उस ठोस क्रम को जांच करने और पहचान करने के लिए !’ इसपर निर्भर होकर आंदोलन की ठोस रणनीति का निर्देशन करने की प्रयास करते हैं; वही सुधारवादी सामाजिक जनवादियों ने अपनी पेटी बुर्जुआ वर्ग दृष्टिकोण के कारण अंधेरे में ढूंढने के कारण, वर्तमान को ही देखने कारण, ढुलमुल हो जाने के कारण, समझौता करने की विभिन्‍न विकल्पों को चुनने के कारण, ‘अंतिम क्रांतिकारी संघर्ष’ का वास्तविकता के प्रति किसी भी तरह की सकारात्मक विचार होने के बावजूद, उन सभी विचारों को खो जाते हैं, यथासंभव शीघ्र, किसी असाधारण घटनाएं न हो जाए, इसके लिए वर्तमान संकट की तीक्रता को कम करने की आसानी और प्रगति-निरोधक विकल्प चुन लेते हैं.

2. साम्राज्यवादी विश्व युद्ध नहीं होने, क्रांति का सन्निकटता नहीं होने की आज की स्थिति में, क्रांति को अनन्त काल तक टालने के लिए ही लेनिनवाद को पुराना बता रहे हैं :

संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं की और एक रूख है, ‘दूसरी विश्व युद्ध के बाद, कम्युनिस्ट खतरे से उबरने के लिए पूंजीवाद ने तीन मुख्य रियायती घोषणा की : औपनिवेशिक नीति को छोड़ देना, सार्वजनिक मतदान की नीति पर निर्भर होकर जनवाद को व्यवस्थित करना, अत्यधिक रोजगार अवसर मिलने की तरह ‘मांग का प्रबंधन’ में राज्य के द्वारा हस्तक्षेप करना. इससे ‘साम्राज्यवादियों के बीच दुश्मनी का अंत होने की युग !’  उभर कर आयी. ‘युद्धविहीन साम्राज्यवाद’ युग में वित्तीय पूंजी सामने आयी. वह विश्व भर में स्वेच्छा से चलने के लिए विभाजित दुनिया एक रूकावट के रूप में रही है. प्रतिस्पर्धी देशों के केन्द्र के रूप में रहे इजारेदार संगठनों के बीच दुनिया को विभाजित करने के लिए युद्ध लड़ने वाली युग की, उन संगठन अपनी केन्द्र स्थान को खो जाने के कारण, का अंत हो गया है. साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच वर्तमान संधी स्थायी है. वर्तमान में जारी युद्ध साम्राज्यवादी अंतरविरोधों को प्रतिबिंबित नहीं करती है. वे कम से कम परोक्ष युद्ध भी नहीं है.’ ‘लेनिनवादी सिद्धांत का आधार क्रांति का सन्निकटता है. साम्राज्यवादी युद्ध ही इस (क्रांति का) सन्निकटता का कारण है. वर्तमान में वित्तीय पूंजी पूरी तरह ऐसा कर दिया कि अभी साम्राज्यवादी वैरी-भाव नहीं होगी और साम्राज्यवाद युद्ध होने का सम्भावना नहीं है. समीप में क्रांति होने का सम्भावना नहीं है इसलिए लेनिनवाद की सिद्धांत पुराना हो गया है.’

यह विचार मार्क्सवाद-लेनिनवाद की स्फूर्ति को पूरी तरह गलत ढंग से पेश करना और क्रांतिकारी बदलाव के बारे में मार्क्स की विचारों को नग्नता से विकृत करने के सिवाय और कुछ नहीं है. यहां पहले कुछ ऐतिहासिक उदाहरणों को देखें. इससे उक्त विचार की वर्ग आधार स्पष्ट हो जाती है. 1915 में, क्रांतिकारी रास्ते में, साम्राज्यवादी पहली विश्व युद्ध विरोध नहीं करने वाली अपनी ‘मध्यमार्गीय’ कार्य-दिशा को, एक तरफ युद्ध जारी रहने के बावजूद, हास्यास्पद तरीके से, उनके द्वारा अपनायी गयी गलत तटस्थ नीति की बचाव में कार्ल काउट्स्की ‘अति-साम्राज्यवाद’ नामक अपनी सिद्धांत को सामने लाया.

‘अति-साम्राज्यवादी’ सिद्धांत लेनिनवाद के खिलाफ है क्योंकि, वह पूंजीवाद व्यवस्था के अंदर ही विश्व शांति के बारे में सपना करती है. पूंजीवाद की असमान वृद्धि के कारण साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच होने वाली किसी भी समझौता दुनिया को संयुक्त रूप से लूटने की उपलक्ष्य से ही होती है. वह सापेक्षिक रूप से अपने शक्तियों पर निर्भर होती है. समय बीतते ही वह पुराना हो जाता है. बल प्रयोग के जरिए और एक समझौता सामने आती है. साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच संघर्ष और युद्ध होना उसकी स्वाभाविक लक्षण है. युद्धविराम संधी होने की समयों में उनपर रोक लगाने के बावजूद वह अस्थायी विराम ही है. पूंजीवाद व्यवस्था में स्थायी शांति असम्भव है.

दूसरी विश्व युद्ध के बाद स्पष्ट रूप से यह बदलाव दिखाई पड़ रही है कि समूची दुनिया पर वित्तीय पूंजी का प्रभाव कई गुणा बढ़ी है. इससे साम्राज्यवाद में लचीलापन बढ़ी है. इससे साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच, साम्राज्यवादी शक्तियों और अन्य देशों के बीच शत्रुता में तेजी आयी है. वर्ष 2000 के बाद, बहुत छोटे कारणों से ही दुनिया में कई जगहों पर साम्राज्यवादी शक्तियां युद्ध पर युद्ध लड़ रहे हैं. इसके बावजूद, आश्चर्य रूप से इन संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं ने इन युद्धों और साम्राज्यवादियों के बीच किसी तरह की संबंध नहीं होने का दावा करते हैं. एक तरफ सिरिया में लम्बे समय से संघर्ष जारी है, विभिन्‍न साम्राज्यवादी गठजोड़ विभिन्‍न कार्यनीति को अपनाते हुए, विभिन्‍न हितों के लिए लड़ रहे हैं, परस्पर विरोध दलों को मदद दे रहे हैं, इसके बावजूद उनकी इस तरह की रवैया हास्यास्पद है.

उन्होंने काउट्स्की के ‘अति-साम्राज्यवाद सिद्धांत’ को मदद देते हुए, जानबूझकर दो पहलुओं को भुलाया जा रहा है : एक, पिछड़े देशों के खिलाफ वर्तमान साम्राज्यवाद द्वारा एकजुटता से संचालित युद्ध इजारेदार पूंजीवाद में गहराते जा रहे अंतरविरोधों का ही व्यक्तीकरण है. दो, इन संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं ने अपनी संशोधनवादी दुष्टिकोण से, लेनिन की इस उसूल के पीछे निहित सही स्फूर्ति को भुलाया जा रहा है कि ‘पूंजीवादी इजारेदार चरण में साम्राज्यवादों के बीच संघर्षों को रोकना असम्भव है.’

उदाहरण के लिए, चाहे, सभी साम्राज्यवादी देशों ने मिलकर एशिया के विभिन्‍न इलाकों को शांतिपूर्ण तरीके से ‘विभाजन करने’ के लिए एक गठजोड़ बनायी है. यह एक ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत वित्तीय पूंजी’ की गठजोड़ के रूप में रहेगी. इस पर ‘यकीन कर’ सकते हैं ? इससे दबाव, संघर्ष और युद्धों का अंत हो सकता है ? असम्भव है. क्योंकि, पूंजीवाद व्यवस्था में पूंजीपतियों का प्रभाव, हित, उपनिवेश आदि को विभाजित करने के लिए विश्वसनीय आधार इसपर ही निर्भर होगी कि इसमें शामिल होने वाले देशों की आर्थिक, वित्तीय और सैनिक बल कितना है. उसी तरह पूंजीवादी व्यवस्था में विभाजन करने के लिए इन हिस्सेदारों के बल कभी भी समान स्तर पर नहीं रहेगा. क्योंकि, पूंजीवादी व्यवस्था में सभी देश का एक समान विकास करना असम्भव है. हिस्सेदारी देशों में सापेक्षिक बलों में बदलाव आने के साथ-साथ पुनर-विभाजन जरूरी हो जाती है. यह जरूर युद्धों के तरफ ले जाती है. लेनिन ने साम्राज्यवादियों के बीच होने वाले समझौतों का अस्थिर स्वभाव का कारण ठीक यही बताये थे.

युद्धों की सम्भावनाओं के खिलाफ आम तौर पर सामने आने वाली रूख यह है कि उसकी साम्राज्यवादी वर्गीकरण में विदेशी भूभाग साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा सीधे तौर पर शासित नहीं है और वे विश्व भर में विस्तारित वित्तीय पूंजी पर निर्भर है. यानी अंतरराष्ट्रीय तौर पर अभी साम्राज्यवाद नहीं है, लेकिन वह उत्तर-साम्राज्यवाद भी नहीं है. वह ग्लोबल पूंजीवाद है. इसमें किसी एक देश से संबंध रखने वाली नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में गतिविधियां करने वालों (भारी कार्पोरेशनों) की भूमिका होने के कारण अलग-अलग देश इन कार्परेशनों के बीच युद्ध लड़ने की जरूरत नहीं होगी. वे सिर्फ उनकी गतिविधियां स्वेच्छा से होने, दुनिया भर में ‘लूटने का अधिकार’ कायम रखने के लिए रास्ता सुगम बनाने पर ही अपनी ध्यान केन्द्रित करते हैं. यह ‘एकीकृत’ साम्राज्यवादी गठजोड़ द्वारा कायम होती है. इस तरह की सोच परिस्थिति को सही तरीके से अध्ययन नहीं करने की वजह से पैदा होती है. हमारे देश में व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की रूझानें मौजूद है. इन्हें हम पूरी तरह खारीज करना चाहिए.

जब तक पूंजीवादी शासक वर्ग का युद्ध का मतलब है, दूसरों को अपने रास्ते में लाने के लिए एक प्रभावशाली मार्ग. क्रमशः दुनिया को निगलने वाले बहुराष्ट्रीय भीमकायों के जड़ अभी भी ठोस राज्य में ही मजबूती से गढ़ी हुई हैं. उसकी उच्च राजनीतिक वर्गों से वे बहुत ही नजदीकी संबंध रखते हैं. इस विषय को भुला जाने के कारण ही इस तरह की सोच पैदा हो रही है कि साम्राज्यवादियों के बीच शत्रुता का अंत करने के लिए वित्तीय पूंजी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गयी है.

जैसाकि लेनिन ने बताया कि, ‘…. ‘अंतर-साम्राज्यवादी” अथवा ‘अति साम्राज्यवादी’ गठजोड़ – उनका रूप चाहे कुछ भी हो, चाहे एक साम्राज्यवादी गठजोड़ के खिलाफ दूसरे साम्राज्यवादी गठजोड़ के रूप में हो या सभी साम्राज्यवादी ताकतों के आम गठजोड़ के रूप में – अनिवार्यत: युद्धों के बीच में ‘युद्ध विराम” से ज्यादा और कुछ नहीं होते. शांतिपूर्ण गठजोड़ युद्धों के लिए जमीन तैयार करते हैं और स्वयं भी इन्हीं युद्धों में से उत्पन्न होते हैं, एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और विश्व अर्थव्यवस्था तथा विश्व राजनीति के भीतर साम्राज्यवादी बंधनों तथा संबंधों के उसी एक आधार में से संघर्ष के शांतिपूर्ण तथा अशांतिपूर्ण रूपों को बारी-बारी से जन्म देते हैं. …. बुद्धिमान काउत्स्की एक ही श्रृंखला की एक कड़ी को दूसरी कड़ी से अलग कर देते हैं, …. सभी ताकतों के वर्तमान शांतिपूर्ण गठजोड़ को कल होनेवाले उस अशांतिपूर्ण झगड़े से अलग कर देते हैं. …. साम्राज्यवादी शांति की मुद्दों तथा साम्राज्यवादी युद्धों की मुद्दों के बीच जो सजीव संबंध है, उसे बताने के बजाय काउत्स्की मजदूरों के सामने एक निष्प्राण विविक्ति रखते हैं, ताकि उनके निष्प्राण नेताओं से उनका मेल करा दें.’ (लेनिन संकलित रचना : ग्रंथ-2, पृष्ठउ-49-50).

साम्राज्यवाद के प्रति लेनिन की आलोचनात्मक दृष्टिकोण तीन मुख्य पहलुओं पर प्रधान रूप से आधारित है. इसमें एक युद्धों की अनिवार्यता. बाकी दो पहुओं को छूने की किसी तरह की प्रयास संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं नहीं करते. क्योंकि, पाठकों को यह स्पष्ट होती है कि लेनिन विश्लेषण के उज्ज्वल सारतत्व क्या है ? पहली विषय, साम्राज्यवाद के बारे में लेनिन की आलोचना में प्राथमिक पहलू क्या है ? यही है कि उससे युद्ध होती है ? नहीं. वह भी मुख्य पहलू ही है, इसके बावजूद, वह प्राथमिक पहलू नहीं है. लेनिन के समझ के अनुसार प्राथमिक पहलू यह है कि सिर्फ सामाजिक क्रांति ही साम्राज्यवादी चरण से उबर पाने का एक मात्र रास्ता है. लेनिन के अनुसार, ‘यदि साम्राज्यवाद की यथासंभव संक्षिप्ततम परिभाषा करनी हो, तो हम कहेंगे कि पूंजीवाद की इजारेदाराना अवस्था साम्राज्यवाद है.’ (लेनिन संकलित रचना : ग्रंथ-2, पृष्ठ-110).

लेनिन ने घोषणा किया कि ‘इजारेदारियां, अल्पतंत्र, स्वतंत्रता की चेष्टा के बजाय प्रभुत्व की चेष्टा, मुटुठी भर सबसे धनवान तथा सबसे ताकतवर राष्ट्रों द्वारा बढ़ती हुई संख्या में छोटे या कमजोर राष्ट्रों का शोषण – इन सबने साम्राज्यवाद की उन लाक्षणिक विशेषताओं को जन्म दिया है, जिनके कारण हमें उसको परजीवी अथवा हासोन्मुख पूंजीवाद कहने पर विवश होना पड़ता है.’ (उक्त ग्रंथ, पृष्ठ-55). उस अवधारणा वर्तमान साम्राज्यवादी परिस्थिति को और स्पष्ट कर देता है. जैसाकि लेनिन द्वारा परिभाषित किया गया कि ‘मरणावस्था में छटपटा रही पूंजीवाद है’, जिसकी सही लिखित अर्थ वर्तमान में साबित हो जाता है.

पूंजीवाद अपनी साम्राज्यवादी चरण में अपनी सभी प्रगतिशील लक्षणों खो दिया. वर्तमान वह एक ‘जीवाश्म’ है. उसके पास मानव जाति को देने के लिए कुछ भी नहीं है. दरअसल यही लेनिन को इस आहवान देने में प्रोत्साहन दिया कि सामाजिक क्रांतियों का युग आ गया है. लेनिन ने बताया, ‘जब कोई बड़ा उद्यम विराट रूप धारण कर लेता है और सुनियोजित ढंग से, विपुल तथ्य-सामग्री की अचूक गणना के आधार पर मूलभूत कच्चे माल के संभरण को संगठित करता हैं तथा करोड़ों लोगों की जितनी कुल आवश्यकता है, उसका दो-तिहाई या तीन चौथाई भाग तक ही उन्हें सप्लाई करता है; जब कच्चा माल सुव्यवस्थित तथा संगठित ढंग से उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त स्थानों को, कभी-कभी सैकड़ों या हजारों मील दूर भी, भेजा जाता है; जब सामग्री के परिष्करण से लेकर विभिन्‍न प्रकार के तैयार माल बनाने तक की सारी अनुक्रमिक मंजिलों का निर्देशन एक ही केन्द्र से किया जाता है; जब ये चीजें एक ही योजना के अनुसार करोड़ों उपभोक्ताओं के बीच वितरित की जाती हैं (अमरीकी ‘तेल ट्रस्ट’ द्वारा अमरीका तथा जर्मनी में तेल का वितरण) – तब यह स्पष्ट हो जाता है कि चीजें ‘अंतर्गुधित” ही नहीं हो गयी हैं, बल्कि उत्पादन का समाजीकरण भी हो गया है; यह स्पष्ट हो जाता है कि निजी आर्थिक संबंध तथा निजी संपत्ति के संबंध एक ऐसा खोल बन गये हैं, जिसके अंदर की सामग्री अब उससे मेल नहीं खाती, एक ऐसा खोल बन गये हैं, जिसके विनाश को अगर कृत्रिम उपायों द्वारा रोकने की कोशिश की गयी, तो अवश्व ही उसका क्षय हो जाएगा; एक ऐसा खोल, जो काफी दीर्घकाल तक क्षय की दशा में रह सकता है (यदि हम हद से हद यह भी मान लें कि अवसरवादी फोड़े का इलाज बहुत लंबा खिंचेगा), परंतु जो फिर भी अनिवार्य रूप से हटाया जाएगा. (उक्त ग्रंथ, पृष्ठ-158-159 ).

याद रखें, इस विषय को लेनिन ने 100 वर्ष पहले ही, कम्प्यूटरों का आविष्कार होने की दसियों साल पहले ही लिखा. वर्तमान, ऊपर उल्लेखित सारे क्रमों की व्यापकता, तेजगति जितना है और जिस प्रभावशाली स्तर पर अमल हो रही हैं बता नहीं सकते.

साम्राज्यवाद के बारे में लेनिनवाद इस आलोचनात्मक पहलू को जानबूझकर संशोधनवादी सिद्धांतकारों ने छोड़ दिया, जिसके जरिए इस क्रांतिकारी निर्धारण छिपाने की प्रयास कर रहे हैं. इसके विपरीत, वे बेशर्म लेनिन की विचारधारा को विकृत कर रहे हैं. वे ऐसा कहकर क्रांति को नकार रहे हैं कि वर्तमान में साम्राज्यवादी युद्ध के रूप में कोई नहीं होगी. क्रांति को अनन्त काल तक पीछे धकेलते हुए, वे कहते हैं कि ‘जनवाद को मजबूत करने’ की दिशा में हमें पीछे की तरफ मूडना एक मुख्य पहलू होगा. क्रांति को स्थायी तौर पर टालने वाले इस तरह के लोगों को आंखों से दिखाई देने वाले सच्चाइयों को भी नहीं देखते हैं और ऐसा कहकर अंतहीन अन्वेषण को जारी रखते हैं कि वस्तुगत परिस्थितियां कब तक परिवक्व होगा. वे समाजवाद की भविष्य को किसी सुदूर, अप्रासंगिक और अस्पष्ट लक्ष्य के रूप में दर्शाता है.

इसलिए साम्राज्यवाद पर लेनिनवाद की रूख में महत्वपूर्ण पहलू ये है : साम्राज्यवाद मरणावस्था में छटपटाने वाली पूंजीवाद है. वह समाजवादी क्रांति को अवश्यभांवी बनाता है. साम्राज्यवाद के जरिए परिपक्व होने वाले वस्तुगत परिस्थितियां समाजवादी क्रांति को संभव बनाता है. इजारेदारी पूंजीवाद के अंदर निहित अंतरविरोधों के जरिए फूटने वाली साम्राज्यवादी युद्धें समाजवादी क्रांति को अनिवार्य कर देती हैं.

क्रांति का सन्निकटता के लिए साम्राज्यवादियों के बीच संघर्ष को एक जरूरी शर्त बताने वाले संशोधनवादी सिद्धांतकारों की सिद्धांत से मार्क्सवाद-लेनिनवाद सहमत होती है क्या ? कभी ऐसा नहीं हो सकता. साम्राज्यवादी युद्धें क्रांति को अनिवार्य कर देती हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि किसी भी तरह युद्धों के जरिए ही वह अनिवार्य हो जाती है. रूस में साम्राज्यवादी युद्ध क्रांति का फौरी कारण के रूप में काम किया. लेकिन इसे वे उल्टा-सीधा करा रहे हैं.

लेनिन की रूख में, ‘उदाहरण के लिए, इंग्लैंड के बारे में, वहां वास्तविक सर्वहारा क्रांति जितना शीघ्र फूट पड़ेगी, अभी सुप्त चेतनावस्था में रहे व्यापक जनता को जागरूक करने, सुलगाने और संघर्ष में उतारने के लिए सबसे असरदार होने वाली फौरी कारण क्‍या होगी, हम नहीं बता सकते. – पहले से कोई बता नहीं सकते …. संसदीय संकट के कारण हो या एक दूसरे से उलझने वाले और क्रमशः दर्दभरा और गहरा होने वाले औपनिवेशिक और सात्राज्यवादी अंतरविरोधों के कारण हो या यथासंभव किसी तीसरी कारण से आदि से हो, दरार पैदा करना, बरफ पिघलना संभव है.’ (लेनिन, left wing communism : an infantile disorder). यह बहुत ही स्पष्ट है कि लेनिन का सोच था कि क्रांति सुलगने में ट्रिगर के रूप में काम करने वाली कई कारणों में एक है साम्राज्यवादी संकट.

3. वर्तमान परिस्थिति में भारतीय वामदल, माओवादी सहित, अवसरवादी, गैरक्रांतिकारी और गठजोड़ों के आधार पर सुधारवादी कार्य-दिशा को अपनाने की दिवालियापन रूख :

संशोधनवादी सिद्धांतकारों की रूख के अनुसार ‘दुनिया में हर जगह पर स्वतःप्रवर्ती के तौर पर विभिन्‍न तबकों की आंदोलनें सामने आने के बावजूद, उसमें पूंजीवाद के खिलाफ स्थिर रूख अपनाने में कमी है. सिर्फ सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के जरिए ही वर्तमान अंतरविरोधों को सुलझाने की व्यावहारिक रास्ता है – इस तरह की चेतना उसमें नहीं है. उसमें अभी भी ‘आर्थिकवाद’ की स्वभाव निहित है. उसमें से ज्यादा आंदोलनों की मांग है कि उत्पादन की तरीके को बदलने के सिवाय संपदा को न्यायपूर्ण पुन:बंटवारा करने की है. इसका कारण है उत्पीडित वर्ग द्वारा सामना करने वाले इन आर्थिक समस्याओं की सामाजिक और राजनीतिक जड़ों का भण्डाफोड़ कर सकने वाली और स्वत:प्रवर्ती आंदोलनों को एक व्यापक और एक लक्ष्य के साथ सामाजिक संघर्ष के रूप में एकताबद्ध करने की वर्गचेतना होने वाली सर्वहारा के अगली दस्ता अस्तित्व में नहीं होना.’

वे आगे चलकर इस हद तक पहुंचे हैं कि ‘साम्राज्यवादी युद्ध नहीं हैं, क्रांति का सन्निकटता नहीं है, इसलिए क्रांतिकारी वामदल की जरूरत ही नहीं है.’ इस परिस्थिति में वे कहते हैं कि ‘अगर कम्युनिज्म व्यावहारिक तौर बचके रहना है तो, उत्तर-लेनिनवादी युग द्वारा लगाए गए शर्तों पर निर्भर होकर नए मार्गों को खोजना चाहिए और अपने आप को पुनरव्यवस्थित करना चाहिए. यह तो मुश्किलभरा कार्य ही है. व्यावहारिक राजनीति से अलग होने और नैतिक स्वच्छता को ऊपर रखने और इस पहलू को नकार कर कि क्रांति होने की स्थिति नहीं है, के साधारण और अवांछनीय रूझान क्रांतिकारियों में होने के कारण यह और मुश्किलभरा कार्य हो जाता है !’

विश्व में वामदल की पतन के जड़ें इस में निहित हैं कि क्रांतिकारी वास्तविकता पर निर्भर होकर समकालीन हितों को पूरा करने, मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी सिद्धांत की प्रासंगिकता को जानने ओर उसे बचाने में वह असमर्थ हुई; वह क्रांति का सवाल को छोड़ दिया; उसकी स्वभाव सामाजिक जनवादी के रूप में तब्दील हुई; वह ‘सुधारवादी’ कतारों में पतन हुई. यानी ‘क्रांतिकारी वामदल’ एक ‘क्रम पद्धति में सामाजिक जनवादीकरण’ हुई. वह सामाजिक जनवादी की राजनीति को अपनाया. संकट को महान परिवर्तनों की दिशा में नहीं, बल्कि उसे प्रबंधन करने की तरह उसकी राजनीतिक दृष्टिकोण बदलाव आया. वामदल की पार्टियां दूसरी इंटरनेशनल के सामाजिक जनवादी पार्टियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं. उन्हें गैर-क्रांतिकारी रोजमर्रा की गतिविधियां ही सब कुछ हो गया. वे जनवादी पूंजीवादी राज्य एजेंसियों को बचाने के लिए पूंजीवादियों और मध्यम वर्ग के उदारवादियों के साथ गठजोड़ें बना रहे हैं. सामूहिक और जुझारू आंदोलनों के जरिए नहीं बल्कि संसदीय गतिविधियों के जरिए, रोजमर्रे के तौर सामूहिक सौदेबाजी करने के जरिए सुधारों पर अमल करने चाहते हैं.

इस ‘सामाजिक जनवादीकारण’ के पीछे स्पष्ट राजनीतिक और आर्थिक कारण मौजूद हैं. दूसरी विश्व युद्ध के बाद 1955-1970 के बीच पूंजीवादी विकास (boom) के साथ आंशिक स्थिरता उभर कर आयी. वह ‘पूंजीवाद की स्वर्णिम युग’ के रूप में जाना जाता है. वह कई बुद्धिजीवियों में भ्रम पैदा किया. उनका रूख यह है कि पूंजीवाद में मार्क्स द्वारा खोज निकाली गयी अंतरविरोध का निपटारा हुआ. संकट को निपटाने के लिए अर्थव्यवस्था में सरकारें हस्तक्षेप करने की जान मिनार्ड कीन्स सिद्धांत को सामने लाया गया. इसी वजह से वह क्रांति का वास्तविकता को भूल गया; मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी सिद्धांत को छोड़ दिया. पूंजी की तर्क के सामने घुटने टेक दिया और सुधारवादियों के रूप में तब्दील हुए. लेकिन, जब ऐसा एक सोच का संचालन हुआ कि इतिहास की कुड़ेदान में संकट को फेंका जा रहा है, के क्रम में, वह 1960 की दशक के अंत और 1970 दशक के शुरूआत में मुख्य फाटक को तोड़कर फिर वापसी की और सुधारवादियों की नींद हराम किया.

लेनिनवादी दृष्टिकोण के अनुसार, भौतिक परिस्थितियां परिपक्व नहीं होने के बावजूद, सर्वहारा के अगली दस्ता स्थिरता से मजदूर वर्ग में वर्गचेतना को विकसित करते हुए, क्रांति का आवश्यकता और सम्भवता के बारे में उन्हें प्रभावित करने के लिए प्रयास करना चाहिए. जैसाकि लेनिन ने बिना थके बार-बार शिक्षित किया कि सर्वहारा के अगली दस्ता की क्रांतिकारी कार्यभार है ‘क्रांति की जरूरत, उसके लिए फौरी तौर पर प्रयास करने की जरूरत, उसकी अनिवार्यता’ पर उत्पीड़ित वर्ग को चेतनाबद्ध करना. एक तरफ संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं यह कहकर मजदूर वर्ग को धोखे दे रहे हैं कि क्रांति किसी भी सूरत पर एजेंडे में नहीं है और उसे साबित करने के लिए ‘घटनाओं को उल्लेखित’ कर रहे हैं, दूसरी तरफ लेनिन क्रांति की अनिवार्यता के बारे में उन मजदूरों के बीच दृढ़ता से ले जा रहे हैं. संशोधनवादी सिद्धांतकर्ता मजदूर वर्ग को लोरी गाने गाते हुए सुला रहे हैं, लेनिन उन्हें कठिन वास्तविकता बताकर जागरूक कर रहे हैं. इस अंतर का लेनिन की शब्दों में ही स्पष्ट रूप से हम देख सकते हैं : क्रांति नहीं होने के बावजूद, वह होने की सिर्फ सम्भावना ही होने के बावजूद’ … परिपक्व होती जा रही क्रांति की आवश्यकता के बारे में अशिक्षित जनसमुदायों को शिक्षा दिलाने, उसकी अनिवार्यता को साबित करने, उसकी फायदों के बारे में लोगों को बताने, श्रमिक वर्ग, शारीरिक श्रम करने व शोषण झेलने वाले लोगों को उस (क्रांति) के लिए तैयार करने में एक क्रांतिकारी मार्क्सवादी अपनी काबिलियत की वजह से पेटीबुर्जुआ अबौद्धिक व्यक्ति से अलग होता है’ (लेनिन, सर्वहारा क्रांति और गद्दार काउत्स्की).

संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं की यह आहवान, जो वामदल को क्रांतिकारी के रूप में नहीं रहने की हिदायत देता है, से लेनिन की शब्दों में यह स्पष्ट हो जाती है कि वामदल को पहली श्रेणी की पेटीबुर्जुआ अबौद्धिक व्यक्ति के रूप में रहने की हिदायत देने के बराबर ही है. इस तरह बहुत ही गहरी साम्राज्यवादी संकट के बीच यथास्थितिवाद को आगे बढ़ा रहे हैं. सार्वजनिक मतदान नीति पर निर्भर होकर उदारवादी जनवाद को मजबूत करने की संसदीय रास्ते को उत्पीड़ित जनता के सामने ला रहे हैं. भारत वर्ष में केन्द्रीकृत राज्ययंत्र और बहुत ही मजबूत आधुनिक सेना होने की स्थिति में है. संसदीय जनवाद का पूरी तरह भण्डाफोड़ हो गया है कि वह सिर्फ बुर्जुआ वर्ग के धोखेबाजी के सिवाय और कुछ नहीं. इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि एक सर्वहारा क्रांतिकारी पार्टी ने संसद में बहुसंख्यक स्थान जीत कर सत्ता पर काबिज होना, वह समाजवादी संविधान को बनाना, राज्ययंत्र के दमनकारी साधनों को तटस्थ करना, अंत में उस राज्ययंत्र को उखाड़ कर सर्वहारा के अधिनायकत्व की स्थापना करना असंभव है. अगर सर्वहारा नेतृत्व के मजदूर-किसान आदि उत्पीड़ित जनता द्वारा उखाड़ने के सिवाय, साम्राज्यवादियों को मदद हासिल भारतीय शासक वर्ग अपने आप अपने सम्पदाओं और सत्ता को कभी नहीं छोड़ेंगे. 1970 और 1980 में चीली और निकरागुवा का अनुभव हमारे सामने मौजूद हैं. इसलिए संशोधनवादी सिद्धांतकर्ताओं द्वारा सामने लाने वाली सभी तकों को बेहिचक नकारना होगा और उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना होगा.

शस्त्र-बल द्वारा राजनीतिक सत्ता छीनने के रास्ते पर डटे रहें !

मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की यह धारणा कि क्रांति का बुनियादी सवाल राजनीतिक सत्ता का सवाल होता है. क्रांति का केन्द्रीय कार्य व सर्वोच्च रूप शस्त्र-बल द्वारा राजनीतिक सत्ता छीनना होता है. यह मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की विश्वव्यापी सच्चाई है. जो कोई भी इस सच्चाई को अस्वीकार करता है या केवल जुबानी तौर पर स्वीकार करता है लेकिन वास्तव में अस्वीकार करता है, वह एक सच्चा मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी नहीं है.

क्रांति को सफल बनाने के लिए भारत वर्ष की ठोस परिस्थिति क्या है ? विभिन्‍न देशों में वहां की ठोस परिस्थितियों के अनुरूप क्रांतियां किस तरह जीत हासिल कर पायी है ? लेनिन ने अक्टूबर क्रांति के महान व्यवहार के आधार पर नवम्बर 1919 में ‘पूर्व की राष्ट्रों के कम्युनिस्ट संगठनों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस में भाषण’ में पूर्व की विभिन्‍न राष्ट्रों के कम्युनिस्टों को यह बताया था कि उनके लिए यह जरूरी है कि वे अपनी-अपनी जगहों की विशिष्टताओं को देखें, कम्युनिज्म के आम सिद्धांतों व व्यवहारों पर भरोसा रखते हुए अपने आपको उन विशिष्ट स्थितियों के अनुरूप बनाएं, जो यूरोपीय देशों में मौजूद नहीं है. लेनिन ने जोर देते हुए कहा था कि यह ‘एक ऐसा कार्य है, जिसका सामना दुनिया के कम्युनिस्टों ने पहले कभी भी नहीं किया था.’

यह स्पष्ट है कि अगर मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की विश्वव्यापी सच्चाई को हमारी देश की क्रांति के ठोस व्यवहार के साथ नहीं मिलाया जाता, तो राजनीतिक सत्ता छीनने और क्रांति की विजय का सवाल ही नहीं उठता. चीन में इस सिद्धांत का सृजनात्मक रूप से माओ नेतृत्ववाली सीपीसी ने अमल किया और नवजनवादी क्रांति में जीत हासिल कर कम्युनिस्ट लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए समाजवाद को मजबूत करने कौ प्रक्रिया में कूद पड़ी थी.

भारत वर्ष में भाकपा (माओवादी) के व्यवस्थापक नेताद्वय कामरेड सी.एम. और कामरेड के.सी. के नेतृत्व में कई क्रांतिकारियों ने भाकपा, भाकपा (मार्क्सवादी) की संशोधनवाद को हराते हुए पारिस कम्यून, अक्टूबर क्रांति और चीनी क्रांति का जारी रूप में नक्सलबाड़ी रास्ता और दीर्घकालीन सशस्त्र संघर्ष के रास्ता को चुन लिया. वही आज भारत वर्ष में भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व में जारी नवजनवादी क्रांति, वह विश्व सर्वहारा सामाजवादी क्रांति का एक अंग है.

अर्धऔपनिवेश और अर्धसामंती व्यवस्था वाली भारतीय क्रांति को अनिवार्यतः दो मंजिलों से गुजरना होगा. पहली, नवजनवादी क्रांति और दूसरी, समाजवादी क्रांति. ये भिन्‍न स्वरूप वाली दो ऐसी क्रांतिकारी प्रक्रियाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्‍न होते हुए भी आपस में सम्बन्ध रखती है. हमारी पार्टी के भारतीय क्रांति के रणनीति-कार्यनीति शीर्षक दस्तावेज में भारत की अर्धऔपनिवेश और अर्धसामंती समाज के चार स्वाभाविक लक्षण के बारे में, भिन्‍न जातियों में विभाजित उसकी विशिष्टताओं के बारे में, उसके अंदर मौजूद विशेष सामाजिक तबकें और राष्ट्रों के वास्तविक परिस्थितियों के बारे में, वर्तमान भारत की अर्धऔपनिवेशिक और अर्धसामंती समाज के प्रमुख अंतरविरोध, दो मौलिक अंतरविरोध के बारे में और उसमें प्रधान अंतरविरोध के बारे में विश्लेषण किया गया. भिन्‍न विशेष समस्याओं को निपटने के लिए विशेष नीतियां बनायी गयी है. उसी तरह भारतीय क्रांति के लक्ष्यों के रूप में साम्राज्यवाद, दलाल नौकरशाही पूंजीवाद और सामंतवाद को बताकर, उन्हें ध्वस्त करने के बारे में, भारतीय क्रांति की प्रेरक शक्तियों, क्रांति के मौलिक कर्तव्य, दीर्घकालीन लोकयुद्ध के जरिए राजनीतिक सत्ता को कब्जा करना, कृषि-क्रांति नवजनवादी क्रांति की धुरी, जनसेना-स्थावर इलाकें, तीन जादूई हथियारें (पार्टी, जनसेना और संयुक्त मोर्चा), क्रांति के स्वरूप और उसकी भविष्य तथा भविष्य में उसका विकास आदि विषयों के बारे में विस्तार से बताते हुए रणनीति-कार्यनीति को बनाया गया है.

पिछले 50 वर्षों में भाकपा (माओवादी) ने मालेमा सिद्धांत को देश की ठोस परिस्थितियों से जोड़ने और लागू करने द्वारा सही कार्यदिशा के रूप ले लिया है. इस क्रांतिकारी व्यवहार में दक्षिणपंथी और वामपंथी अवसरवाद के गलत कार्यदिशों को हराने द्वारा ही सही कार्यदिशा का विकास हुआ. इस संघर्ष के क्रम में सभी सच्चे कम्युनिस्ट एकताबद्ध होने के बाद भाकपा (माओवादी) का गठन हुआ और कांग्रेस का आयोजन कर सही कार्यदिशा को अपनाया. कई हत्याकांडों से डरपोक होकर वह कभी आत्मसमर्पण नहीं किया और हथियार नहीं डाला. कुछ नकारात्मक शिक्षकों के उदाहरणों से सीख लेते हुए, इस सच्चाई को ऊंचा उठाते हुए कि सशस्त्र संघर्ष के सिवाय क्रांति को सफल बनाना असंभव है, आज वह देश में क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ा रही है. चांग-काई-शेक के खिलाफ जनमुक्ति युद्ध में माओ ने कहा, ‘जनता की हथियारबंद ताकतें, हरेक बंदूक और हरेक कारतूस सबके सब सुरक्षित रखे जाने होंगे, उन्हें कतई समर्पित नहीं किया जाना चाहिए.’

समाज में और क्रांतिकारी आंदोलन में बदलती परिस्थिति के अनुरूप उचित कार्यनीतियों को विकसित करना चाहिए. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन से दूर कमरे में बैठे कुछ मुट्ठीभर लोग कम्युनिस्ट पार्टी के लिए सही और दृढ़ कार्यनीति को बनाना सभव नहीं है. तीव्र वर्ग संघर्षों में जनयुद्ध में-जनसंघर्षों में भाग लेने के क्रम में ही कार्यनीति को बना सकते हैं. यानी व्यावहारिक अनुभव से ही, वर्गशक्तियों के बारे में सही आकलन से ही सही और दृढ़ सघर्षरत कार्यनीति को बना सकते हैं. ऐसी कार्यनीति क्रांति की जीत के लिए भरोसा देती है. इसके लिए सभी संदर्भों में समाज के परिस्थितियों को हमें समझने की जरूरत है. सीधे तौर पर जांच-पड़ताल करने की जरूरत है. यही सिद्धांत को व्यवहार से जोड़ने की मार्क्सवादी-लेनिनवादी- माओवादी शैली है, वास्तविक विषयों से सच्चाई को निकालने की शैली है.

जनयुद्ध का आधार भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ही निहित है. छोटी शक्ति कई गुणा मजबूत दुश्मन का मुकाबला करने के क्रम में ही आज भाकपा (माओवादी) कई उतार-चढ़ावों का शिकार हो सकती है. कई ज्वार-भाटों होने के बावजूद, यह एक समझौताविहीन मौलिक संघर्ष है. इस क्रम में वह अपने लिए होने वाले सही और गलत पहलुओं से सबक लेकर कमी-कमजोरी-सीमितताओं से उबरने के लिए भूल सुधार अभियानों के जरिए वर्गसंघर्ष के विश्व दृष्टिकोण वचनबद्धता और आत्मबलिदान की चेतना से आंदोलन को आगे बढ़ा रही है.

साम्राज्यवाद, आधुनिक संशोधनवाद और देश के प्रतिक्रियावादियों (सामंतवाद और दलाल नौकरशाही पूंजीवाद) के खिलाफ हमें मजबूत होने में काबिलियत हासिल करना चाहिए. हमारी गतिविधियों को परिमाणात्मक और गुणात्मक तौर पर बढ़ाना चाहिए. नयी उदारीकरण, बढ़ती राज्य हिंसा (राज्य आतंक), साम्राज्यवादियों के दुराक्रमण युद्धों और परोक्ष युद्धों के पृष्ठभूमि में इजारेदार पूंजीवादी वर्ग और वित्तीय अल्पतंत्र (finantial oligarchy) की सीमाहीन लोभ-लालच से वर्गीकृत दीर्घकालीन और पहले के मुकाबले तेज होती जा रही विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आर्थिक संकट हमें मांग करती है कि हम और दृढ़ता और जुझारू तरीके से लड़े और जनता की नवजनवादी क्रांति को पूरा कर, समाजवादी क्रांति की तरफ आगे बढ़े.

  • बीआर
    4 नवम्बर, 2017

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