
सुप्रीम कोर्ट के दो दिन में दो फ़ैसले जितने आधे अधूरे हैं, उसका फ़ायदा कम और नुक़सान ज़्यादा हैं और समाज को एक क़दम आगे ले जाने वाला नहीं है.
1. दिवाली में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी. यह सच है कि दिल्ली जाड़े में नर्क बन जाती है. अगर दिवाली में प्रदूषण आम तौर से 200 गुना बढ़ जाता है तो इसकी जानकारी कोर्ट को और माननीय चुने हुये चोर उचक्कों को थी, पर वे साल भर चुप रहे क्योंकि वोट ख़तरे में पड़ जाता.
अब जब दिवाली सर पर है, व्यापारी शिवकाशी के निर्माता को 6 महीने पहले अग्रिम भुगतान और एक-दो महीने पहले से पटाखे मंगाना शुरू कर देता है, तब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ़ हिंदू भावना को भड़काने के काम आने और देश की मूल समस्या बढ़ती बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्या, नोटबंदी के कारण नौकरी से निकाले जा चुके मज़दूर, शिक्षा से वंचित कराये जा रहे छात्रों, न्यूनतम मजदूरी से भी मरहूम होते अध्यापक, मौत बांटती स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में औने-पौने दामों में बेचती भ्रष्ट व दलाल सरकार को संजीवनी देने का काम करेगा.
अगर दिल्ली के प्रदूषण की इतनी चिंता है तो पटाखे सहित भलस्वा, ग़ाज़ीपुर के कूड़े के जलते पहाड़ क्या उसे दिखते नहीं ? मेट्रो का किराया दुगुना कर लाखों लोगों को दुपहिया, ओला, ऑटो और बस जैसी निजी सर्विस लेने पर मजबूर कौन कर रहा है ? सीवर हर जगह से यमुना को प्रदूषित कौन करा रहा है ?
सबसे महत्वपूर्ण, इस मंदी के दौर में भी अगर सरकारी छूट मिली तो वह कार निर्माता को मिली. वे लगातार 10% से ज़्यादा ग्रोथ कर रहे है. मतलब ज़हरीला शहर बनाते जा रहे हैं. क्या ये सब कुछ माननीय कोर्ट को नज़र नहीं आ रहा ? इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसे भी लोग न्यायाधीश बन बैठे हैं, जिन्होंने अमित शाह और मोदी सरीखे लोगों का वकील हुआ करते थे. जाहिर तौर पर ये ताकतें सुप्रीम कोर्ट की शाख का इस्तेमाल गुजरात में होने वाली चुनाव के दौरान साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही है.
2. सुप्रीम कोर्ट के फैैसले के अनुसार शादी के दौरान नाबालिग़ पत्नी अगर एक साल के भीतर यह शिकायत करती है कि उसके पति ने उससे ज़बर्दस्ती सेक्स किया तो पति बलात्कार का दोषी होगा. पहली बात, लड़की की शादी 18 साल से पहले करने पर ही पाबंदी होनी चाहिये.
दूसरा पत्नी चाहे नाबालिग़ हो या बालिग़ या अधेड़, अगर ज़बर्दस्ती पति सेक्स करता है तो वह बलात ही समझा जाना चाहिये. इसे इतना पेचीदा क्यों समझा और बनाया जा रहा है ? बेसिक मानवीय गुण और प्राकृतिक क़ानून यही है.
यह दोनों क़ानून दिखने में प्रगतिशील होकर भी समाज के पिछड़ेपन को मज़बूत ही करेंगे और एकांगी व्याख्या कोर्ट की गरिमा को जनसामान्य की नज़रों में समाज की काली शक्तियां गिराने के लिए भरपूर ज़ोर लगाएंगी.
(अपने मित्र रविन्द्र जी के सहयोग से)
Supreme Court, like any other institutions, has turned into a tool to farther the communal agenda of this fascist government. A lot of awareness is needed to defeat this design.
Aapka news bahut accha laga