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सुषमा स्वराज : मृत्यु किसी को महान नहीं बनाती

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2019
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केन्द्र की मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में दसियों हजार फौजियों की तैनाती करके और संचार माध्यमों को ध्वस्त करके धारा 307 में संशोधन क्या किया मारे खुशी के सुषमा स्वराज के प्राण-पखेरू ही उड़ गये. सुषमा स्वराज असाधारण प्रतिभा की धनी थी, इतनी धनी कि 39 भारतीय मजदूरों की हत्या की नृशंस खबर को दो साल तक छिपा गई. संबंधित परिवार को झूठे दिलासे देकर बरगलाये रखी. इसके लिए असाधारण प्रतिभा होनी चाहिए. आइये देखते हैं सुषमा स्वराज के विभिन्न प्रतिभाओं के बारे सामाजिक कार्यकर्ता क्या विचार रखते हैं.

सुषमा स्वराज : मृत्यु किसी को महान नहीं बनाती

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कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बंधुओं की मांं सुषमा स्वराज

फरीदी अल हसन तनवीर : ‘सोनिया गांधी अगर प्रधानमंत्री बनी तो मैं बाल मुंडा कर, विधवा का रूप धारण करके, चना-चबैना खाकर विरोध में वैधव्य का जीवन जियूंगी.’

लोकतंत्र में जीती हुई विपक्षी महिला का ऐसा गैर-लोकतांत्रिक विरोध करने की धमकी देने वाली नेत्री को लोग आज मृत्योपरांत महान लोकतांत्रिक नेता बताते नहीं थक रहे हैं. एक विदेशी महिला जिसने भारतीय पुरुष से प्रेम विवाह किया. आतंकवादी हमले में शहीद हुए नेता की विधवा थी, जिसने भारतीय संविधान के द्वारा प्रदत्त अधिकार के अनुसार चुनाव जीता व अपने दल को अपने नेतृत्व में चुनाव जिताया.

ऐसी आदर्श भारतीय विधवा नारी का जीवन जीने वाली महिला से चुनाव हार जाने की खुन्नस निकालने के चलते उसे विदेशी कह, स्त्री डाह के विकृत रूप को प्रदर्शित करने वाली एक महिला को आज मृत्योपरांत भारतीय परंपरा का संवाहक कहना कुटिलता है. मृत्यु किसी को महान नहीं बनाती.

व्यक्ति महान इससे बनता है कि जीवन के दौरान, शक्ति व सत्ता का केंद्र होने के दौरान और अपनी हार व कमज़ोर लम्हों के दौरान उसने कैसा बड़प्पन भरा आदर्श प्रस्तुत किया है.

मृत्योपरांत श्रद्धांजलि ही एक ऐसा समय होता है कि दिवंगत के वास्तविक अच्छे-बुरे कृत्य संतुलित और पक्षपातविहीन तरीके से लिपिबद्ध कर लिए जाएं ताकि दस्तावेजों में बेईमानी लिपिबद्ध हो, इतिहास न बन जाये.

भ्रष्टाचार के देवता रेड्डी ब्रदर्स की लूट को माता संयण स्नेह दे पोषित करना हो, या आर्थिक भगोड़े ललित मोदी को वीज़ा सहूलियतें दिलाकर बदले में भांजे-भतीजों-भतीजियों की शिक्षा के लिए पश्चिमी देशों में शैक्षिक सुविधाएं सुनिश्चित करनी हो, ये भी भ्रष्ट आचरण ही है.

मिडील ईस्ट में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की विदेश मंत्री की हैसियत के बावजूद, समझौता कर बुर्का और हिजाब जैसा आवरण पहनना, वार्ता करना किस भारतीय परंपरा का प्रदर्शन था ? उससे अच्छा तो वह भारतीय शूटर लड़की थी जिसने ईरान में हिजाब पहन खेलने के विरोध में प्रतियोगिता का ही बहिष्कार कर अपनी मैडल संभावनाओं की बलि दे, भारतीय लड़कियों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया था.

बाक़ी जो भी मरता है आस्तिक दुनिया उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना तो करती ही है, उनके परिवार और चाहने वालों के लिए हिम्मत की प्रार्थना भी करती है.

एक नास्तिक की हैसियत से हम भी ऐसी ही विनम्र कामना करते हैं. दस्तूर और परंपरा केवल यही है. न कि परंपरा के नाम पर चंद्रवरदाई बन भाटगीरी करना.

जितेंद्र नारायण : कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बंधुओं की मांं समान. अपनी बेटी बांंसुरी स्वराज के मुवक्किल आईपीएल घोटालेबाज़ ललित मोदी को अपने रिश्तेदार के ससेक्स यूनिवर्सिटी लंदन में एडमिशन कराने के एवज में मानवीय आधार पर पुर्तगाल का पासपोर्ट दिलाकर मदद करने वाली. एक महिला होकर दूसरी महिला सोनिया गांंधी के प्रति दुर्भावना के स्तर तक गिरने वाली, सुषमा स्वराज नहीं रहीं. सादर श्रद्धांजलि !!!

रकेश प्रभात : वाकपटु, सौम्य महिला नेता आदरणीय सुषमा स्वराज जी के निधन पर मन दुःखी है. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे. अचानक दिल का दौरा पड़ा था. वो बहुत खुश थी क्योंकि दो घण्टे पहले उन्होंने ट्वीट कर मोदी जी को धारा 370 हटाने पर बधाई दी थी और लिखा था कि वो जीवन में इसी पल का इंतजार कर रही थी. उनके कुछ कार्य बहुत याद आते हैंं –

1. पेट्रोल-डीजल के बढ़े हुए दामों के खिलाफ बापू की समाधी पर किया गया वो ऐतिहासिक नृत्य आज रह-रह कर याद आता है. हालांकि जब वे सरकार में थी, पेट्रोल-डीजल के बढ़े हुए दामों का कभी विरोध नहीं किया, जो आज भी बहुत ज्यादा है.

2. संसद में डॉक्टर मनमोहन सिंह के खिलाफ उनका वो हमला भी याद आता है कि ‘जैसे-जैसे रुपया गिर रहा है, वैसे-वैसे मनमोहन जी आपकी साख गिर रही है. जब वो सरकार में थी, पूरे 5 साल तब रुपया और ज्यादा गिरा लेकिन वो मोदी जी को यह बोलने की हिम्मत नहीं कर सकी थी.

3. संसद में एक के बदले दस सिर वाला बयान भी चर्चित रहा लेकिन जब वे सत्ता में आई तो उनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा सैनिक मारे गए. सैनिकों के सर काट कर ले गए, तब वे नहीं बोल पाई.

4. कर्नाटक में सबसे भ्रष्ट बेल्लारी के रेड्डी बन्धु उन्हें अपनी मांं कहते थे. बीजेपी ने यदि दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाई. वो उन्हीं बेल्लारी के खनिज मॉफ़िया सबसे भ्रष्ट रेड्डी बन्धु की वजह से. वे आदरणीय सुषमा जी के बहुत करीब थे क्योंकि सुषमा जी जब बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी तो वे सुषमा के करीब आये थे.

5. वे आडवाणी जी की शिष्या थी लेकिन आडवाणी का समय-समय पर हुए अपमान का वे विरोध नहीं कर पाई.

6. वे विदेश मंत्री थी लेकिन उन्हें केवल पासपोर्ट और वीसा के कार्यों तक ही सीमित कर दिया था लेकिन वे पार्टी के प्रति इतनी समर्पित नेता थी कि उसका विरोध नहीं किया.

7 ) उनसे मुझे यह उम्मीद थी कि चूंकि वो समाजवादी विचारधारा से थी और दबंग नेता थी जब मोदी के 5 साल के कार्यकाल में नोटबन्दी , मोब लिंचिंग जैसे मुद्दों पर अपना विरोध जता सत्ता से बाहर आ दबाव बना सकती थी उससे अन्य नेताओं को भी हिम्मत मिलती मोदी शाह जोड़ी के खिलाफ बोलने की लेकिन वो ऐसा नही कर पाई क्या मजबूरी थी नही पता ..शायद उन्हें ललित मोदी और रेड्डी बन्धु के भ्रस्टाचारों की फाइल दिखा चुप करवा दिया हो .

सुषमा जी को बहुत बहुत श्रद्धांजलि .

श्याम मीरा सिंह : बात कोई 2009-10 की रही होगी. कांग्रेस द्वारा एफडीआई (foreign Direct investment) बिल लाया जा रहा था, जिस पर वोटिंग होनी थी उस दिन. मोटी बिंदी लगाए सुषमा स्वराज टीवी पर आ रही थी. इसमें दो-राय नहीं कि सुषमा के भाषण सदन में बोले गए ओजस्वी भाषणों के चुनिंदा अध्यायों में रखे जाएंगे. सुषमा FDI के विरोध में अत्यधिक प्रभावी ढंग से अपनी बात सदन में रख रहीं थी. उन्होंने तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर इंगित करते हुए एक शेर कहा ‘तू इधर-उधर की बात न कर, बता ये काफिला क्यों लूटा ?’

इसी बीच सुषमा ने एक और गजब का शेर संसद की उन तमाम तालियों के बीच पढ़ा, जिसकी आवाज टीवी के सहारे हमारे घर के छोटे से कमरे तक पहुंच रही थी. सुषमा स्वराज उस दिन FDI के पक्ष-विपक्ष में वोट करने वाले लोकसभा सदस्यों से ये कहते हुए अपील कर रही थीं कि ‘ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई.’ हिंदी भाषा का कौन ही ऐसा श्रोता होगा जो उन पंक्तियों को सुनकर ताली न पीटेगा.

लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनती है, जिसमें स्वराज विदेश मंत्री बनी. 2014 के बाद इंडियन इकॉनमी का जितना उदारीकरण (विदेशियों के निवेश के लिए खुलापन) किया गया, उतना पहले कभी 1991 में केवल मनमोहन सिंह द्वारा किया गया था, जबकि भारत बैलेंस ऑफ पेमेंट की समस्या से गुजर रहा था. लेकिन इस बार की सरकार ने इतना अधिक प्राइवेटाइजेशन किया है कि इसका अंत होता दिखाई नहीं देता. बीमा से लेकर डिफेंस सेक्टर में FDI निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को एकदम ओपन कर दिया. नरेंद्र मोदी सरकार ने FDI से आए निवेश (इन्वेस्टमेंट) को अपनी सफलता बताकर न्यूज एंकरों से लेकर एडिटोरियल लिखने वाले एडिटरों तक पर अपना कंधा सहलवाया. अगर सुषमा स्वराज के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI, 2009 में इतना घातक हुआ करता था, फिर वह 2014 में घातक क्यों नहीं रहा ?
FDI, जिसके पक्ष में वोट करने पर देश को सदियों तक गुलामी झेलनी थी, तो सुषमा ने क्यों एकबारगी भी अपनी सरकार के खिलाफ ये बात संसद में नहीं कही ? ये दोहरे मानदंड हैं. ये हिप्पोक्रेसी है.

इसी बीच सुषमा जब यूएन में भाषण देने गईं तो उनके भाषण को इसलिए सराहा गया चूंकि उन्होंने वह भाषण हिंदी में दिया था. केवल इससे ही देश में रहने वाले सांस्कृतिक मूर्खों के कंधे ऊपर हो गए. भले ही इनकी खुद की संसद में इनका वित्तमंत्री अंग्रेजी में बड़-बड़ करके चला जाए लेकिन विदेश में हिंदी में भाषण देने से इनकी छाती चौड़ी हो जाती है. उस भाषण को भी देश भर में सराहना मिली. उस भाषण में स्वराज संस्कृत का एक श्लोक सुनाते हुए कहती हैं कि –

‘सर्वे साम सवस्थिर भवन्तु, सर्वेसाम शांति भवन्तु,

सर्वेसाम पूर्णम भवन्तु, सर्वेसाम मंगलम भवन्तु’

जिसका हिंदी अर्थ है कि ‘सबका सुख हो, सबको शांति मिले, सबको पूर्णता प्राप्त हो, सबका मंगल हो, सबका ही कल्याण हो.’

लेकिन 2014 से लेकर 2018 के बीच जबकि सुषमा स्वस्थ्य थी, जिम्मेदारी वाले पद पर भी थी लेकिन किस एक मुद्दे पर उन्होंने प्रोग्रेसिव बात कही ? यूएन में संस्कृत के श्लोक द्वारा विश्वकल्याण की कामना करने वाली पार्टी ने म्यांमार से भगाए जा रहे रोहिंग्या मुस्लिम पर क्या रुख रखा था, सबको मालूम है. सुषमा उस समय विदेश मंत्री थी और विश्वकल्याण पर कविताएं गा रही थीं. उसी पार्टी ने हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर जिस तरह से सब्जी उगाई है, क्या वह विश्वकल्याण जैसी आदर्श बातों की परिधि में आती है ? इस सरकार के दौरान क्या-क्या घटनाएं हुईं, यह गिनाने का यहां मतलब नहीं बनता लेकिन सुषमा स्वराज ने अपने समय की कौन-सी ऐसी घटना पर अप्रत्याशित पक्ष रखा, जिसके लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए ?

ये भी हमें सोचना होगा कि हम केवल कलाईदार कविताओं और शायरियों के आधार पर किए जाने वाले सस्ते मूल्यांकन में कब तक भावुक होते रहेंगे ? कोई नेता भाषण या नृत्य कला के कारण महान नहीं होता. वह अपने स्टैंड के कारण महान बनता है. भले वह बात उसने तुतलाकर बोली हो या बोलते समय उसके हाथ पैर हिल रहे हों. अगर वह अपने समय के स्थापित मूल्यों के खिलाफ नहीं बोलता, अगर वह अपने दौर में आदमी के द्वारा आदमी के मारे जाने की घटनाओं पर भी मुंंह नहीं खोलता तो उसके सूखे भाषणों की प्रतियों को कचरे के डिब्बे में डाल देना चाहिए. सुषमा ने किसी एक भी मुद्दे पर अपना ऐसा मत नहीं रखा जो प्रगतिशील हो, जो समाज को वर्तमान समय से एक कदम आगे ले जाता हो.

मुझे मालूम है इन बातों को कहने के क्या जोखिम हैं लेकिन ताकि प्रशंसाओं के दौर में आलोचनाओं की एक आवाज बची रहे इसलिए अभिव्यक्ति के इस नाजुक समय में संभावित खतरे को उठाने की जिम्मेदारी इस बार मेरी ही सही, लेकिन कहा जाएगा.

विनम्र मन से सुषमा जी को अंतिम विदाई.

कविता कृष्णापल्लवी : हाय, मैं क्या करूंं ? मेरा हृदय कितना संकुचित और संकीर्ण है ! मैं किसी फासिस्ट को, हत्या, उन्माद और बर्बरता की राजनीति करने वाले किसी भी व्यक्ति को, या उनके गिरोह में शामिल किसी पढ़े-लिखे शरीफ़ चेहरे वाले या वाली को मरने पर श्रद्धांजलि दे ही नहीं पाती ! खुशी भी नहीं मनाती, क्योंकि व्यक्ति के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता ! असम्पृक्त रहती हूंं.

एक बात बताइये ! कोई पुरुष या महिला खूब सुशिक्षित और सुसंस्कृत हो, लोगों की मदद करने वाला/वाली हो, शरीफ़ और मृदुभाषी हो; लेकिन बर्बरों का साथ देता/देती हो, रथ-यात्रा, बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात-2002 जैसी घटनाओं का/की पुरजोर समर्थक हो, बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं जैसे आपराधिक भ्रष्टाचारियों का/की पितृवत/मातृवत संरक्षक हो, तो क्या उसे ज्यादा ‘मानवीय’ फासिस्ट मानकर कुछ श्रद्धा-सुमन अर्पित किये जा सकते हैं ?

भई, मेरा तो दिल-जिगर कोशिश करने पर भी इतना बड़ा नहीं हो पाता ! लेकिन हमारी पवित्र भारत-भूमि पर ऐसे बड़े दिल वाले पुण्यात्मा प्रगतिशीलों-वामियों की कमी नहीं है ! इन विशाल-हृदय लोगों में दया-भाव का सोता इस कदर अविरल बहता रहता है कि जब बर्बरों और हत्यारों की नयी पीढ़ी बूढ़े हो चुके बर्बरों और हत्यारों को रिटायरमेंट देकर मार्गदर्शक-मंडल में बैठा देती है, या उनमें से किसी का लोटा घुमा देती है, तो उन पुराने, बूढ़े पापियों की दयनीय स्थिति को देखकर वे लोग दया-करुणा और सहानुभूति से भर जाते हैं !

जबकि इस मामले में मुझे महान चीनी लेखक लू शुन का यह सुझाव ज्यादा मुफ़ीद लगता है कि कुत्ता जब पानी में गिरा हो तो उस पर दया दिखाने की जगह दो डंडे और रसीद कर देने चाहिए !

बहरहाल, अभी तो मैं ग्लानि में डूबी बैठी हूंं कि मेरे भीतर से शोक की कोई लहर उठ ही नहीं रही है.

हिमांशु कुमार : सुषमा स्वराज नारी शक्ति का प्रतीक नहीं थी. वह आरएसएस संचालित भारतीय जनता पार्टी की एक आत्मसम्मान खो चुकी, दब्बू कार्यकर्ता थी.

सोनिया गांधी और उनके दल के बहुमत से चुने जाने के बाद सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना मात्र से सुषमा स्वराज ने बहुत बदसूरती भरी बातें बोलनी शुरू की और कहा कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनी तो मैं अपना सिर मुंडा लूंगी क्योंकि सोनिया गांधी का जन्म विदेश में हुआ था.

यह सीधे-सीधे भारतीय संस्कृति का अपमान था जो सुषमा स्वराज द्वारा किया जा रहा था. जब सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भरे गए. सोनी सोनी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जमानत देने के बाद दिल्ली आई सोनी सोरी ने मुझे एक पत्र सुषमा स्वराज को पोस्ट करने के लिए दिया, जिसमें उन्होंने सुषमा स्वराज से मिलने का समय मांगा था लेकिन क्योंकि सोनी सोरी के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अत्याचार करवाया था इसलिए सुषमा स्वराज ने सोनी सोरी के पत्र का कभी कोई जवाब नहीं दिया और न ही सोनी सोरी को मिलने के लिए बुलाया.

मैं सुषमा स्वराज को कभी नारी शक्ति का प्रतीक नहीं मान सकता. कर्नाटक में बेल्लारी मे रेड्डी बंधुओं ने अवैध माइनिंग करके अरबों खरबों रुपए काला धन कमाया और कर्नाटक को बर्बाद कर दिया. तब सुषमा स्वराज ने उन दोनों को अपना बेटा कहा और राजनैतिक संरक्षण दिया.

वह एक भ्रष्ट, आत्माविहीन, दक्षिणपंथी क्रूर नेता थी, जिसका न संस्कृति से कोई लेना देना था ना महिलाओं से. मुझे मरे हुए लोगों के शरीर के मर जाने का कोई दुख नहीं होता.

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