
यह कितना हास्यास्पद है कि जब संस्कृत का जन्म भी नहीं हुआ था, संस्कृत की व्याकरण भी नहीं बनी थी, उस समय वेद संस्कृत में लिख दिये गये थे. उसी तरह जैसे मोदी की डिग्री उस समय उस फोंट में प्रिंट हो गयी थी, जब उस फोंट का जन्म भी नहीं हुआ था.
सम्राट अशोक के समय संस्कृत का जन्म नहीं हुआ था, इसलिए उनका कोई भी शिलालेख संस्कृत में नहीं मिलता है. अशोक के सभी शिलालेख पाली भाषा और धम्मलिपि (खरोष्ठी) लिपि में मिलते हैं, क्योंकि उस समय न संस्कृत थी, न देवनागरी लिपि.
पुरातात्विक, ऐतिहासिक साक्ष्यों और तार्किक आधारों की कसौटी
1400 ईस्वी के बाद संस्कृत साहित्य का उदय इतिहास कल्पनाओं से नहीं, बल्कि पुरालेखशास्त्र (Palaeography) और पुरातत्व से प्रमाणित होता है. सम्राट अशोक के काल से लेकर मध्यकाल तक के भाषाई विकासक्रम का सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान संस्कृत साहित्य आधुनिक युग की रचना है.
1. भौतिक साक्ष्यों का अभाव और 1400 ई. का सत्य
इतिहास में ‘प्राचीनता’ सिद्ध करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य पांडुलिपियां (Manuscripts) होती हैं.
कागज और लेखन सामग्री:
भारत में कागज़ का बड़े पैमाने पर प्रयोग और उस पर ग्रंथों का संग्रह 12वीं-13वीं शताब्दी के बाद शुरू हुआ.
कार्बन डेटिंग का प्रमाण:
दुनिया के किसी भी संग्रहालय में वेदों या स्मृतियों की ऐसी कोई पांडुलिपि नहीं है, जो 1400 ईस्वी से पहले की प्रमाणित हो सके. ऋग्वेद की सबसे पुरानी प्रति (मैक्स मूलर और अन्य द्वारा संदर्भित) 15वीं शताब्दी (1464 ईस्वी) के आसपास की है.
यदि ये ग्रंथ अशोक (300 BCE) से भी पुराने होते, तो उनका कोई न कोई भौतिक अवशेष मौर्य या गुप्त काल का अवश्य मिलता. इनका 1400 ई. के बाद मिलना ही इनके वास्तविक लेखन काल को दर्शाता है.
2. सम्राट अशोक और भाषाई वास्तविकता
सम्राट अशोक के समय का भारत पाली और प्राकृत का भारत था. उनके 33 से अधिक शिलालेख इस बात का जीवित प्रमाण हैं कि उस समय ‘संस्कृत’ नामक किसी परिष्कृत भाषा का अस्तित्व नहीं था.
धम्मलिपि का प्रभुत्व:
अशोक ने ब्राह्मी लिपि (धम्मलिपि) का प्रयोग किया. आज जिस देवनागरी लिपि में संस्कृत लिखी जाती है, वह अशोक के 1000 साल बाद तक भी अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं आई थी.
सांस्कृतिक अंतराल:
अशोक के शिलालेखों में बुद्ध की शिक्षाएं हैं, लेकिन वहां रामायण के राम, महाभारत के कृष्ण या वेदों के इंद्र का कोई उल्लेख नहीं है. यह प्रमाणित करता है कि अशोक के समय यह साहित्य या तो अस्तित्व में ही नहीं था या फिर इसे बहुत बाद में रचा गया.
3. संस्कृत का कृत्रिम विकास और सामाजिक षड्यंत्र
संस्कृत (अर्थात संस्कारित या बनाई गई भाषा) का विकास जनभाषाओं को दबाकर एक विशेष सामाजिक ढांचे को थोपने के लिए किया गया. जन्म आधारित अमानवीय वर्ण व्यवस्था को स्थाई बनाने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता थी जिसे आम जनता न समझ सके.
1400 ईस्वी के आसपास, जब मध्यकालीन भारत में सामाजिक परिवर्तन हो रहे थे, तब इन स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति) और पुराणों को संस्कृत में लिपिबद्ध किया गया ताकि ऊंच-नीच की व्यवस्था को ‘ईश्वरीय’ और ‘अति-प्राचीन’ सिद्ध किया जा सके.
4. व्याकरण का बाद में आना
यह तर्क अकाट्य है कि संस्कृत का व्याकरण वेदों के कथित काल के बहुत बाद का है. बिना व्याकरण के किसी भाषा में इतने विशाल और जटिल ग्रंथ (जैसे वेद) नहीं लिखे जा सकते. यह विरोधाभास साफ करता है कि वेदों का वर्तमान संस्कृत स्वरूप बहुत बाद में, परिष्कृत व्याकरण के आधार पर तैयार किया गया.
सारांश
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि सम्राट अशोक के समय केवल पाली भाषा और धम्मलिपि का अस्तित्व था. संस्कृत का विकास, उसकी व्याकरण की रचना और वेदों-पुराणों का लेखन 1200-1400 ईस्वी के बाद की वह प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य वास्तविक इतिहास को दबाकर एक नई सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करना था.
- लाला बौद्ध
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