Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

भगतों के अनंत दुःख का पारावार नहीं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 28, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
विष्णु नागर

भारत के ‘महान उपन्यासकार’ और माननीय मोदी जी के ‘चरमभक्त’ श्री-श्री चेतन भगत जी ने सवाल उठाया है कि हिंदुओं के दु:खों पर बात करने से परहेज़ क्यों ? भगत जी का मतलब दरअसल हिंदुवादियों के दु:खों से है क्योंकि जब से मोदी जी हैं, इनके दुःख भी कुछ ज्यादा बढ़ गए हैं. इनके दुःख सामान्य हिंदुओं के दुःख नहीं हैं क्योंकि उनके दुःख तो वही हैं, जो कि किसी भी आम हिंदुस्तानी के दुःख हैं – बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, झूठ आदि.

हिंदूवादी इन भौतिक दुःखों से परे रहते हैं. इनके फर्जी किस्म के स्थायी दुःख हैं, जो पिछले लगभग 100 सालों से इन्हें सता रहे हैं और अगले दो सौ वर्षो तक इन्हें सताते रहेंगे. चाहे सौ मोदी आ जाएं, चाहे दस हजार भगत इन दुःखों की भक्ति करते पाए जाएं. ये अविनाशी दुःख हैं, जैसे गोहत्या, धर्म परिवर्तन, लव जिहाद, मुसलमानों की बढ़ती आबादी वगैरह.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

दुनिया इधर से उधर हो जाए मगर इनके ये दुःख मिट सकते नहीं क्योंकि इनके दुःखों का स्थायी कनेक्शन भारत के मुसलमानों से जुड़ा है. जब तक इस धरती पर मुसलमान रहेंगे और हिन्दू भी और ये हमेशा रहेंगे इसलिए इनके ये लाइलाज़ दुःख भी सदैव रहेंगे. सौ साल से उम्र हुईं इन दुःखों की मगर तारीफ करना होगी कि इन्होंने इन बीमार-अशक्त दुःखों को छाती से चिपका कर रखा है, साथ नहीं छोड़ा !

अंग्रेज चले गए, कांग्रेसी भी सत्ता में नहीं रहे, मोदी जी भी आ गए मगर इनके दुःख वहीं के वहीं हैं. ये चूंकि निवारणीय दुःख हैं नहीं, अभिवृद्धात्मक हैं, इसलिए इनकी और आनेवाले सभी मोदियों की यह जिम्मेदारी है कि वे इन्हें बढ़ाते रहें और स्वयं आगे बढ़ते रहें. इनकी सेवा में नये-नये चेतन भगत भी आते रहेंगे. आज एक है, जल्दी ही डेढ़ सौ हो जाएंगे.

तो भगत जी महाराज, आपके सूचनार्थ निवेदन है कि पिछले दो-तीन हफ्तों से ‘कश्मीर फाइल्स’ के बहाने इन आरक्षित कोटि के चिरंतन हिंदू-दुःखों पर ही चर्चा हो रही है. इन्हीं दुःखों का सेलिब्रेशन चल रहा है. इन दुःखों पर बात करने का परहेज़ कहां दिखा आपको ? प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, भाजपाई मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक सभी तो आजकल दुःखी हैं. बुक्का फाड़कर रो रहे हैं.

कश्मीरी पंडितों का दुःख अब जाकर वोटदाता दुःख बना है, इसलिए अब ये छाती पीटने का कार्यक्रम कर रहे हैं. इस दुःख में कश्मीरी मुसलमानों के दुःख शामिल नहीं है, इसलिए ये दुःख मोस्ट इंपार्टेंट है. इसके विलेन मुसलमान हैं, इसलिए ये दुःख, दुःख हैंं. जो दुःख सबके होते हैं, उनसे इनका स्वार्थ नहीं सधता.

तीस बरस पुराना कश्मीरी पंडितों वाला यह दुःख, हिंदूवादियों के बाकी सभी दुःखों पर आजकल भारी है. इनके दुःख को देखकर कश्मीरी पंडितों की आंखें भी भर आई हैं. इस दुःख में भाजपाइयों की वोटात्मक खुशी छुपी है, जो इनके तन-मन में समा नहीं रही है. इस दु:ख के हिंदूवादियों की नई रामजन्म भूमि मंदिर दु:ख बन जाने की प्रबल संभावनाएं छिपी हुई हैं.

‘कश्मीर फाइल्स’ ने फिल्म निर्माताओं को भाजपा के संरक्षण में हिंदू दुःखों से मोटी कमाई करने का नया रास्ता दिखाया है, इसलिए अब ऐसे दुःख हर दूसरे-तीसरे महीने पधारा करेंगे. इससे आज फिल्म निर्माता कमाई करेंगे और 2024 में मोदी वोट की बंपर कमाई करेंगे.

अब तो लगता है कि दुःख किसी और के पास बचे ही नहीं. सारे दुःख हिंदू-दुःख हो चुके हैं क्योंकि बाकी सब तो मोदी जी के आने से सुखी हो चुके हैं, दुःखी केवल ये हैं. किसानों की आय अब दुगुनी हो चुकी है. मनरेगा मजदूरों को तत्काल और बढ़ी हुई मजदूरी मिल रही है. छोटे कारोबारी लाकडाउन में अपना धंधा सिमट जाने से बहुत सुखी हैं. कश्मीरी मुसलमान धारा 370 के हटने से इतने अधिक सुखी हैं कि यह समझना कठिन है कि हिंदुत्ववादी अधिक खुश हैं या ये ? हिंदुस्तान के मुसलमान तो सेक्युलरिज्म की अर्थी उठ जाने से इतने अधिक खुश हैं कि बेचारे हिंदुओं के दुःखों की उन्हें परवाह तक नहीं रही.

वैसे भगत जी भक्ति-रस में डूबने के कारण आपको यह नहीं दिखा कि हिंदुओं के दुःखों पर बात करने से हिंदुवादियों को पहले भी कभी परहेज़ नहीं रहा. परहेज़ शब्द से तो इनकी स्थायी रूप से परहेज़ है. अंग्रेजों का साथ देने और स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध करने से उन्हें कभी परहेज़ नहीं रहा. गांधी जी की हत्या हुई तो इन्हें मिठाई बांटने-खाने से परहेज़ नहीं रहा. परहेज़ खाकी चड्ढी से जरूर अब हो चला है मगर यह स्वैच्छिक है. बाकी परहेज़ और संघ, परहेज़ और मोदी का हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है.

भगत जी आजकल आपके ये सारे मित्र-हितचिंतक छाती कूट-कूट कर अपने दुःख रो रहे हैं बल्कि नये-नये नकली दुःखों का आयात कर रहे हैं, ताकि वे स्थायी रूप से छातीकूटू मुद्रा में सुखपूर्वक रह सकें. जैसे जुमे की नमाज़ प्रशासन की अनुमति लेकर मुसलमान कहीं पढ़ें तो इससे ये दुःखी. मुसलिम छात्राएं हिजाब पहनें तो ये दुःखी. मंदिर परिसर से बाहर पर्व-त्योहार पर लगे मेले में मुसलमान दुकान लगाएं तो ये दुःखी. उनकी दाढ़ी से ये दुःखी, उनकी टोपी से ये दुःखी. और दुखी होने के लिए यह फिल्म भी आ गई है.

वैसे ये नानमोदी, सेक्युलर हिंदुओं से भी दुःखी हैं. अगर कोई साहू महिला व्यासपीठ पर बैठकर भागवत बांचे तो उससे भी ये दुःखी. इतने अधिक दुःखी हैं कि उसे मुजरा करने की सलाह दे रहे हैं. दलित दूल्हा सवर्ण बस्ती से घोड़े पर बैठकर जुलूस निकाले तो उससे भी ये दुःखी. इनके दुःखों का पारावार नहीं. दुःख ही इनके जीवन का कथा रही. इन्हें सुखदायक-कुर्सीदायक मगर जनता को दुःखदायक इनके दुःखों के लिए हार्दिक…. !

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

मोतिहारी फाइल्स : लाइट-साउंड-रोल कैमरा-एक्शन

Next Post

सपने बेचने वाला

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

सपने बेचने वाला

Recommended

‘कौन जात हो भाई ?’ दलित स्वाभिमान को मिट्टी में मिलाती एक कविता

August 17, 2023

यहां उजालों के अंधेरे हैं

March 24, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.