Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

जो गीतांजलि श्री को न जानते हैं, न मानते हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 29, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
जो गीतांजलि श्री को न जानते हैं, न मानते हैं
जो गीतांजलि श्री को न जानते हैं, न मानते हैं
प्रियदर्शन

गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को उसके अंग्रेज़ी अनुवाद ‘टूम ऑफ़ सैंड’ के लिए मिले अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान के आम तौर पर स्वागत के अलावा जो चित्र-विचित्र क़िस्म की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें तीन ध्यान देने योग्य हैं. पहली बात यह कही जा रही है कि इतनी महत्वपूर्ण लेखिका को हिंदी साहित्य और आलोचकों ने उपेक्षित रखा. यह राय रखने वाले लोग दरअसल समकालीन हिंदी साहित्य से कतई परिचित नहीं हैं, वरना उन्हें मालूम होता कि हिंदी में नब्बे के दशक में उभरे जिन कथाकारों की बहुत सम्मान के साथ चर्चा होती रही है, उनमें गीतांजलि श्री हैं.

उनकी पहली तीन कहानियां हिंदी की सबसे चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में छपी. उनकी पहली कहानी ‘बेलपत्र’ का दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुआ. उनके पहले उपन्यास ‘माई’ को भी ख़ासी प्रशंसा मिली और उसके अंग्रेज़ी अनुवाद को ‘क्रॉसवर्ड’ पुरस्कार की अंतिम सूची में जगह मिली. इन पंक्तियों के लेखक ने उनकी चार किताबों ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘वैराग्य’, ‘तिरोहित’, और ‘वहां हाथी रहते थे’ पर चार अलग-अलग टिप्पणियां हिंदी की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में की. उनको सम्मान भी मिलते रहे. पिछले ही महीने, उन्हें एक लाख रुपये के वनमाली कथा सम्मान से भोपाल में सम्मानित किया गया.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

तो गीतांजलि श्री हिंदी की दुनिया के लिए न कोई अनजाना नाम हैं और न ही उपेक्षित लेखक. चार साल पहले प्रकाशित उपन्यास ‘रेत समाधि’ पर भी काफ़ी कुछ लिखा गया और लिखने वालों में मृदुला गर्ग, अलका सरावगी, वीरेंद्र यादव और रवींद्र त्रिपाठी जैसे महत्वपूर्ण लोग शामिल रहे.

दूसरी दिलचस्प और लगभग मूर्खतापूर्ण बात यह कही जा रही है कि बुकर हिंदी के उपन्यास को नहीं, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद को मिला है. यह ऐसा कुतर्क है जिसका बस मनोरंजन के लिए जवाब दिया जा सकता है. इस तर्क से तो रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ को भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला- वह उसके अंग्रेज़ी अनुवाद- जिसका नाम ‘सांग ऑफ़रिंग्स’ था- को मिला. जबकि बुकर पुरस्कार समिति को गीतांजलि श्री को पुरस्कार दिए जाने में कोई संदेह नहीं है – पुरस्कार लेखक-अनुवादक में बराबर बंटा है – पुरस्कार समिति की जो अनुशंसा है, उसमें गीतांजलि श्री के लेखन की तारीफ़ है और बुकर के मंच से लेखकीय वक्तव्य भी गीतांजलि श्री का है.

निश्चय ही यह उनकी अनुवादक डेजी रॉकवेल की भूमिका को कम करके आंकने की बात नहीं है, उनका बहुत अच्छा अनुवाद न होता तो किताब इस मंच तक नहीं पहुंचती, लेकिन किताब अंततः गीतांजलि श्री की ही है. कुछ हैरान करने वाली बात यह भी है कि अंग्रेज़ी अनुवाद को ही पुरस्कार का मूल बताने वाले लोग बार-बार ‘टॉम्ब’ या ‘टूम्ब’ लिख रहे हैं, जबकि शब्द का सही उच्चारण ‘टूम’ है.

तीसरी बात यह कही जा रही है कि गीतांजलि श्री का उपन्यास बिल्कुल पठनीय नहीं है. कुछ उत्साही लेखक-पाठक उनकी किताब के एकाध पृष्ठों की तस्वीर डाल कर यह साबित भी करने में लगे हुए हैं कि वे बिना कॉमा, फुल स्टॉप के लिखे जा रही हैं. ऐसे लोगों को यह पता नहीं है कि लेखन में इस तरह के प्रयोग बहुत आम रहे हैं. जेम्स ज्वायस से लेकर सलमान रुश्दी तक ने ऐसे पन्ने लिखे हैं जिनमें कॉमा-फुल स्टॉप नहीं है. कुछ दूसरे लोग बहुत आक्रामकता के साथ आलोचकों पर यह छींटाकशी कर रहे हैं कि अब इस सम्मान के बाद वे गीतांजलि श्री के लेखन को महान साबित करने में जुट जाएंगे.

हालांकि न गीतांजलि श्री ने और न ही उनके पाठकों या प्रशंसकों ने कभी यह साबित करने की कोशिश की कि वे महान या अद्वितीय हैं. आप चाहें तो यह स्वस्थ बहस अब भी हिंदी में चला सकते हैं कि क्या इस दौर में गीतांजलि श्री जैसे दूसरे लेखक हमारे पास हैं ? तब संभवतः आप हिंदी साहित्य की उस समृद्ध परंपरा पर कुछ और विचार कर पाएंगे, जिसका ज़िक्र गीतांजलि श्री ने बुकर के मंच से अपने वक्तव्य में भी किया.

जहां तक पठनीयता का सवाल है- यह दलील भी अब पुरानी हो चुकी कि न पठनीयता श्रेष्ठता की कोई शर्त है और न ही पठनीयता का कोई एक प्रकार होता है. पठनीयता दरअसल कोई ठोस या वस्तुनिष्ठ अनुभव नहीं, उसका एक व्यक्तिनिष्ठ रूप होता है. जो किताब दूसरों को पठनीय लगती है, वह हमें बकवास लग सकती है और जिसे हम पठनीय मान कर रीझते हैं, उसे बहुत सारे लोग बिल्कुल अपठनीय बता सकते हैं.

लेकिन यह मामला इतना आसान नहीं है. पाठ की भी प्रविधियां होती हैं. पाठ को ग्रहण करने का अभ्यास होता है. रंगमंच में कहते हैं कि दर्शक को भी रसज्ञ होना चाहिए. दुनिया भर की कलाओं में, सभी भाषाओं के साहित्य में ऐसे मूल्यवान लेखक रहे जो कम पढ़े गए लेकिन फिर भी बहुत बड़े लेखक कहलाए क्योंकि उन्होंने विचार और संवेदना के उन क्षेत्रों का संधान किया, जहां दूसरे नहीं पहुंच पाए बल्कि दुनिया के ज़्यादातर महान लेखक आसान या दिलचस्प लेखक नहीं रहे हैं. वे पाठकों को आकर्षित नहीं करते, पाठकों को उन तक जाना पड़ता है.

दरअसल यह लोकप्रिय और शास्त्रीय का फ़र्क है जो सभी साहित्यिक विधाओं में ही नहीं, कला और संस्कृति के दूसरे अनुभव में भी दिखाई पड़ता है. जिन लोगों को किशोर कुमार, मुकेश, रफ़ी, लता और कुमार शानू भाते हैं, वे कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसुर और किशोरी अमोनकर को सुन कर नाक-भौं सिकोड़ते हैं. जिन्हें नीरज के गीत अच्छे लगते हैं, उनके लिए मुक्तिबोध बेहद दुरूह पाठ हैं. पिकासो या वॉन गॉ के चित्र तो दुनिया के आम लोगों के लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं. वे समझ नहीं पाते कि ये महान क्यों हैं ? यश चोपड़ा और प्रकाश मेहरा की फिल्में देखने वालों को सत्यजित रे का सिनेमा बिल्कुल बेकार लगता है और दुनिया भर का महान सिनेमा अपने कारोबारी बॉलीवुडी-हॉलीवुडी संस्करणों के आगे पिट जाता है.

तो शास्त्रीयता की अपनी शर्तें होती हैं, जिनमें पठनीयता अनिवार्य नहीं होती. यह लिखना कहीं से लोक-साहित्य या संस्कृति को खारिज करना नहीं है- आख़िर शास्त्रीय लोक से ही आकार पाता है, गढ़ा जाता है लेकिन मनोरंजक या दिलचस्प साहित्य और संगीत की कल्पना और कामना करने वाले न लोक का रस ले पाते हैं न शास्त्रीयता की संवेदना से जुड़ पाते हैं.

इसमें संदेह नहीं कि गीतांजलि श्री अपने पाठकों को लुभाती नहीं हैं, वे बहुत आकर्षक कथा बुनने के फेर में नहीं पड़ती. लेकिन आप उनको ध्यान से पढ़ें तो वे आपको आमंत्रित करती हैं कि विचार और संवेदना के इस जंगल में दाख़िल हों और अनुभव को एक नए सिरे से ग्रहण करें. उनकी किताब ‘रेत समाधि’ भी कोई अबूझ पहेली नहीं है बल्कि वह लंबे समय तक बिल्कुल घरेलू कथा है- पति की मृत्यु के बाद अवसाद में चली गई पत्नी, उसको मनाने में जुटे बेटे-बेटी, जिनके बीच अनबोला है और पोते भी जो बिल्कुल नई पीढ़ी के हैं और इन सबके बीच नव्यता और पुरातनता के वे द्वंद्व जिन्हें हम लगभग रोज़ कई तरह से देखते हैं.

यह उपन्यास ऐसी हिंदी में भी नहीं लिखा गया है जिसे बहुत अमूर्त कहा जाए. बेशक, कहीं-कहीं लेखक को कुछ खिलवाड़ की छूट होनी चाहिए और कहीं-कहीं कथा की मांग से उसमें कुछ जटिलता चली आए तो उसका स्वागत करना चाहिए, लेकिन बड़ी कृतियां ऐसी ही होती हैं. वे आपको आकर्षक गिफ़्ट पैकेज की तरह नहीं मिलतीं, वे किसी नदी या पहाड़ की तरह आपसे यह उम्मीद करती हैं कि आप कुछ साहस, सब्र और संतुलन दिखाएं तो धारा और ऊंचाई के बीच दुनिया कुछ और दिखे.

Read Also –

बेगुनाह कैदी : भारत में नार्को टेस्ट की असलियत
स्त्रियों की मुक्ति और सामाजिक उत्पादन
शापित कब्र के अंदर दस करोड़ लोग
पलामू की धरती पर

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को बेचकर अडानी ड्रोन के लॉबिंग में मस्त मोदी

Next Post

अतीत के नाम पर पीठ थपथपाना बंद करो

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

अतीत के नाम पर पीठ थपथपाना बंद करो

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

ब्राह्मणों से ज्यादा खतरनाक ब्राह्मणवादी शुद्र है

May 2, 2022

पलायन

November 4, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.