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अरुंधति रॉय पर यूएपीए : हार से बौखलाया आरएसएस-भाजपा पूरी ताकत से जनवादी लेखकों-पत्रकारों पर टुट पड़ा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 15, 2024
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उपरोक्त दोनों तस्वीर को देखिये. बांयी ओर भारत की प्रसिद्ध लेखिका अरुन्धती रॉय है, और दूसरी ओर संविधान को माथे से चिपटाये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी, जो आरएसएस का सबसे विश्वसनीय एजेंट है, का संविधान में कतई भरोसा नहीं है और वह इस संविधान को पूरी तरह बदल डालना चाहता है. आरएसएस संविधान बदलने की कोशिश तभी से करता आ रहा है, जब से इस देश में संविधान को लागू किया गया था, लेकिन इसके लिए उसके पास पर्याप्त ताकत कभी नहीं हुआ.

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यहां एक विरोधाभास आपको दिख रहा होगा. आप सोच सकते हैं कि अगर आरएसएस और नरेन्द्र मोदी संविधान को बदलना ही चाहते हैं तो फिर वह इसे अपने माथे से चिपटाए हुए क्यों है ? यह सारा खेल ही मनोवैज्ञानिक है. इसे समझने के लिए हमें आरएसएस की उस संस्कृति को समझना होगा, जिस संस्कृति का वह झंडाबरदार होने का दावा कभी खुले तो कभी मूक होकर समर्थन करता है, वह है ब्राह्मणवादी संस्कृति.

ब्राह्मणवादी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है छलकपट. वह अपने शत्रुओं को खत्म करने के लिए किसी भी नैतिकता को नहीं मानता है और अगर वह प्रत्यक्ष युद्ध में पराजित हो जाता है या पराजित होने का खतरा महसूस करता है तब वह शांति का झंडा फहराता है और इसके बाद वह छद्म तरीकों से प्रचार-दुश्प्रचार का सहारा लेकर अपनी ताकत तबतक बढ़ाता है जब तक कि वह विरोधियों को खत्म नहीं कर देता है. इसके लिए झूठ, छल, ठगी, प्रलोभन और दंड तक का तमाम तरीका आजमाता है. यानी, बकरे को बलि देने से पहले उसकी खूब पूजा, सेवा का ढोंग करता है, ताकि शिकार असावधान हो जाये, और फिर उसे बिना किसी प्रतिरोध के खत्म कर सके.

हम यहां कुछ उदाहरणों में देखते हैं. मसलन, महात्मा गांधी की हत्या से पूर्व नत्थू राम गोडसे गांधी जी को प्रणाम करता है. संसद भवन को खत्म कर नया ‘सेन्ट्रल विस्टा’ बनाने से पूर्व संसद भवन में प्रवेश से पहले सष्टांग प्रणाम करता है. और संविधान को खत्म कर मानवद्रोही ‘मनुस्मृति’ को लागू करने लिए संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सत्ता के तमाम संस्थानों में अपने एजेंटो को पदस्थापित करता है और फिर संविधान को खत्म करने के लिए संवैधानिक नियमों का ही हवाला देते हुए ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा देते हुए 2024 के चुनाव में उतर जाता है. क्योंकि वह जानता है कि प्रत्यक्ष युद्ध में वह चाहकर भी संविधान को बदल नहीं सकता और संवैधानिक तरीके से संविधान को बदलने के लिए उसे संसद में तीन तिहाई अंक चाहिए होगा, लेकिन जब वह इसमें सफल नहीं होता है तब वह फिर से अपने मत्थे चिपटाने लगता है.

आरएसएस और मोदी की इस ‘400 पार’ के नारे का निहितार्थ देश की तमाम जनमानस जल्दी ही समझ गया, जिस कारण संविधान को बदलने के लिए अपेक्षित अंक उसे तमाम तिकड़मों के बाद भी हासिल नहीं हो सका. इससे स्तब्ध आरएसएस और मोदी ने पैतरा बदला और आरएसएस जहां खुद को मोदी से अलग दिखाते हुए भागवत के जरिए संविधान की बात करना शुरु किया तो वहीं मोदी संविधान को माथे पर चिपटाने लगा, जबकि यह मोदी ने चुनाव के दौरान कहा था कि – विपक्ष संविधान को माथे पर लेकर नाच रहा है.

यहां, एक और चीज जो ध्यान देने योग्य है, वह है इनकी धूर्तता. वह इस रुप में जाहिर होती है कि उसने चुनाव में पराजय की स्थिति में अपना ‘प्लान-बी’ भी बनाया था, जिसकी तैयारी वह चुनाव के पहले से कर रहा था. प्लान यह था कि अगर भाजपा संविधान बदलने योग्य अपेक्षित सीटें नहीं ला पाती है तब इसका असर आरएसएस पर न पड़े इसके लिए दोनों – यानी, आरएसएस-भाजपा को – को अलग दिखना चाहिए. यानी भाजपा के कुकर्मों में आरएसएस न घसीटा जा सके. इस.प्लान के तहत चुनाव से पूर्व आरएसएस मोदी के खिलाफ बोलता था तो भाजपा का अध्यक्ष नड्डा ‘हमें चुनाव जीतने के लिए आरएसएस का जरूरत नहीं है’ का बयान देता था.

लेकिन,. अब जब देश की जनता के सामने आरएसएस-भाजपा की यह मिलीभगत साफ जाहिर हो गई है तबसे दोनों ही इसका हल ढूंढ़ने में लग गया. यह पूरी तरह संभव है कि आरएसएस-भाजपा अपनी इस पराजय का कारण इस देश में मौजूद हजारों बुद्धिजीवियों को समझा होगा, और इसलिए बिना समय गंवाये भाजपा ने उन बुद्धिजीवियों को निशाने पर लेना शुरु कर दिया और इसकी पहली शिकार बनी अन्तर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुंधती राय.

अरुंधती रॉय अभी केवल पहली शिकार बनी है, लेकिन बहुत ही जल्द हजारों लेखकों, पत्रकारों को खत्म किये जाने की तैयारियां शुरू हो चुकी है. मोदी सरकार ने पिछले दस सालों में सैकड़ों लेखकों, पत्रकारों को गोलियों से लेकर जेलों तक में भरकर रोकने का प्रयास किया था, लेकिन मौजूदा चुनाव ने दिखा दिया कि आरएसएस-मोदी का वह प्रयास नाकाफी था, यानी उसकी ‘तपस्या’ में कमी रह गई थी. इसलिए अब उस कमी को पूरा करने के लिए हजारों लेखकों-पत्रकारों को खत्म करने की योजना पर काम किया जा रहा है. इसी कड़ी में ‘समरभूमि’ के एक छोटे से यू-ट्यूबर पत्रकार को भी निशाना बनाया जा रहा है.

इसी बीच आज तुहिन, असीम गिरी, वेणुगोपाल के हस्ताक्षर से क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (RCF) की ओर से एक प्रेस बयान जारी किया गया है, जिसमें साफ कहा गया है कि असहमति की आवाज़ों को दबाने के एक और प्रयास में फासीवादी मोदी सरकार ने हिंदुत्व एजेंडे के खिलाफ मुखर प्रसिद्ध लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और आलोचक अरुंधति रॉय के खिलाफ़ अभियोजन की मंजूरी दे दी है. वे सत्ता में बैठे लोगों द्वारा की जाने वाली सभी जनविरोधी गतिविधियों के खिलाफ़ मुखर रही हैं.

नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के पूरा होने के बाद फासिस्ट भाजपा ने अपने दांत और नाखून निकलने शुरू कर दिए हैं. धुर दक्षिणपंथी नव फासीवादी भाजपा सरकार, अपने हर उस आलोचकों के खिलाफ़ हैं, जो सरकार के नापाक मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए आवाज उठाते हैं. खबर है कि दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने 2010 में हुई एक घटना के लिए अरुंधति रॉय पर कठोर यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है.

इसका मतलब है कि आम चुनावों में जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद आरएसएस-बीजेपी अब भी लेखकों, कलाकारों, विद्यार्थियों और उन सभी आलोचकों के खिलाफ दमन की अपनी नीति को रोकने के लिए तैयार नहीं है जो फासीवादी संघ परिवार और बहुसंख्यकवादी हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ मुखर हैं. क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच इस कृत्य की स्पष्ट रूप से निंदा करते हैं जो कि सभी जनपक्षीय और लोकतांत्रिक आवाजों को चुप कराने का एक ज़बरदस्त प्रयास है.

यह सरकार अपने पिछले अवतार की तरह सभी असहमत विचारों को दबाने की पुरजोर कोशिश कर रही है. क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच इस कायरतापूर्ण कदम का कड़ा विरोध करते हुए सभी लोकतांत्रिक जनता, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और संगठनों से आरएसएस के मार्गदर्शन में फासीवादी मोदी सरकार के इस घृणित प्रयास की निंदा करने का आग्रह किया है.

जाहिर है आरएसएस-भाजपा अपनी हार यानी, मौजूदा संविधान को बदलकर मनुस्मृति को संविधान की जगह स्थापित करने योग्य मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में पर्याप्त अंक न जुटा पाने की बौखलाहट में हजारों बुद्धिजीवी और पत्रकारों को खत्म करेगी. वह छोटे से लेकर बड़े लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को खत्म करने की दिशा में कदम उठा चुकी है. अर्थात, आरएसएस और भाजपा पूरी ताकत से इन जनवादी लेखकों-पत्रकारों पर टुट पड़ेगी, जिसकी शुरुआत अरुंधती रॉय के साथ हो चुकी है. यह जंग अब और विभत्स रुप धारण करेगा.

इस सब के बावजूद यह एक कड़वी हकीकत है जिसका सामना आरएसएस-भाजपा को करना होगा, वह है भारत में मौजूद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की सशस्त्र उपस्थिति. भारत की जनता के बीच मौजूद यह एक ऐसा दुर्ग है, जो जर्मनी के फासिस्ट के सामने नहीं था. लाखों करोड़ों लोगों की शहादतों के बाद भी आरएसएस द्वारा संचालित फासिस्ट मोदी सरकार इस दुर्ग को नष्ट नहीं कर सकता और जबतक यह दुर्ग है हर दिन हजारों बुद्धिजीवी, लेखकों, पत्रकारों को संजीवनी मिलती रहेगी, हजारों अरुंधती पैदा होती रहेगी, यह तय है.

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