Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

उमर खालिद प्रकरण : संघियों के पापों को धोते कोर्ट को बंद करो और माओवादियों की जन अदालतों को मान्यता दो

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 24, 2022
in ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

कहा जाता है लोकतंत्र के चार स्तम्भ होते हैं. कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका तो पहले से ही भ्रष्ट और दुष्कर्म के गटर में डुबा हुआ है. लेकिन 2014 में संघियों के देश की सत्ता पर कब्जा करने के बाद पहले से ही दम फूल रही पत्रकारिता का दम निकल गया और अब वह केवल संघी ऐजेंडा पर कूदने वाला दंगाई से ज्यादा कुछ भी नहीं रह गया है.

न्यायपालिका, जिस पर देश की जनता को थोड़ी बहुत उम्मीद बांकी थी, लेकिन सत्ता के दिखाये मौत (जज लोया) या दलाली (जस्टिस गोगोई) के विकल्प में दलाली को चुनना बेहतर समझा और नंगे चिट्टे तौर पर संघी की दलाली मैं उतर गया. यहां यह बताना लाजिमी है कि तीन स्तरीय न्यायपालिका में निचली अदालतें तो पहले से ही भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात है, उसके बारे में तो बात करना भी घृणास्पद और समय की बर्बादी है.

You might also like

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

ऐसा नहीं है कि उच्च और उच्चतम न्यायालय कोई दूध का धुला था लेकिन वह कभी इतना निर्लज्ज भी नहीं था. 2014 के बाद जो नया बदलाव आया वह यह है कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के निर्लज्जता का एक से बढ़कर एक बनता मिसाल देश के सामने आया. इससे पहले एक आम धारणा होती थी कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के जज काफी पढ़े-लिखे होते हैं लेकिन यह धारणा भी तब खंडित हो गई और सुप्रीम कोर्ट के जज हास्यास्पद हो गये जब उन्होंने लेव टॉल्सटॉय लिखित विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ को आतंकवादी साहित्य करार दे दिया.

तो वहीं उच्च न्यायालय के अनेकों जजों ने बहियात फैसला सुनाया. मसलन, लडकियों के साथ स्क्रीन टू स्किन टच हुए बगैर छेडछाड नहीं माना जा सकता, सवर्ण दलितों (शुद्रों) की महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं कर सकता, मोरनी संभोग नहीं करती बल्कि मोर के आंसु पीकर गर्भवती होती है, वगैरह वगैरह जैसे अनेकों टिप्पणियों ने लोगों के सामने साफ कर दिया है कि ये जजों, जिसे जनता के मेहनत की कमाई से लाखों करोड़ों रुपयों और सुख-सुविधाओं से भरा जीवन दिया जाता है, दरअसल वे न केवल जाहिल ही हैं अपितु सामंतवादी मिजाज के सबसे बड़े किले भी हैं.

वहीं, अब ऐसे ही जजों की मूर्खता एक बार फिर बेनकाब हो गई जब उसने उमर खालिद को यह कहते हुए जमानत देने से इंकार कर दिया कि ‘आप कहते हैं कि आपके (संघियों के और खुद ऐसे जजों के भी) पूर्वज अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे, आपको नहीं लगता कि यह अपमानजनक है ?’ संघी मिजाज जज की इस टिपण्णी से साफ होता है कि इस जज को भारत के इतिहास खासकर संघियों के इतिहास के बारे में कुछ भी नहीं पता है. अगर पता है तो या तो वह बिका हुआ है या डरा हुआ है. एक बिका हुआ या डरा हुआ जज कभी भी न्याय नहीं कर सकता.

ठीक यही उमर खालिद के इस मामले में हुआ है. ऐसा नहीं है कि बिका या डरा हुआ इस जज ने कोई पहली बार इस तरह का फैसला दिया है, इससे पहले भी सैकडों ऐसे मामले सामने आये हैं और आगे भी आना जारी रहेगा. लेकिन इस मामले में जो सबसे अनोखी बात हुई है वह यह कि इस दलाल जज को गांधी और भगत सिंह याद आ गया, जिनकी हत्या इस संघियों ने ही किया है. गांधी को गोली मारकर तो भगत सिंह के खिलाफ कोर्ट में फर्जी गवाही दिलवाकर. यह संघी दलाल जज गद्दार संघियों के पापों को छिपाने की गरज से कहता है –

क्या आपको नहीं लगता कि इस्तेमाल किए गए ये भाव लोगों के लिए अपमानजनक हैं ? यह लगभग ऐसा है जैसे कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल एक समुदाय ने लड़ी थी. पीठ ने सवाल उठाया कि क्या गांधी जी या शहीद भगत सिंह जी ने कभी इस भाषा का इस्तेमाल किया था ? क्‍या हमें गांधी जी ने यही सिखाया है कि हम लोगों और उनके पूर्वज के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करें ? क्या आपको नहीं लगता कि इससे विभिन्न समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है ?

इस जज ने सीधे तौर पर भगत सिंह और गांधी का सहारा लेकर संघियों के अंग्रेजों की दलाली को ढ़कने का प्रयास किया है. इस संघी जज देश के लोगों को मूर्ख समझता है और अपनी मूर्खता को ढंकने के लिए बकायदा संवैधानिक पद (न्यायाधीश) का इस्तेमाल करता है.

इतिहास बताता है भगत सिंह और गांधी ने जिस बुरी तरह अदालतों के जजों का बखिया उघेड़ कर रख दिया है, उससे भी बुरी तरह संघियों के चरित्र पर गहरी टिप्पणी दर्ज किया है. भगत सिंह के साथी और कमांडर चन्द्रशेखर आजाद ने संघियों के सिरमौर सावरकर को ‘हरामखोर’ बताया था और सुभाष चन्द्र बोस ने संघियों को देश के लिए खतरनाक बतलाया था. विदित हो कि सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे और गांधी को राष्ट्रपिता का सम्मान भी सुभाष चन्द्र बोस ने ही दिया था.

सुभाष चन्द्र बोस की नजर में संघी-हिंदू महासभा

सुभाष चन्द्र बोस आर एस एस और उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा से न केवल नफरत ही करते थे, अपितु वे उसे उखाड़ फेंकने का आह्वान भी किये थे. बतौर सुभाष चन्द्र बोस 12 मई 1940 को बंगाल के झाड़ग्राम में एक भाषण दिया था, जो 14 मई को आनंद बाज़ार पत्रिका में छपा था, उन्होंने कहा था –

‘हिंदू महासभा ने त्रिशूलधारी संन्यासी और संन्यासिनों को वोट मांगने के लिए जुटा दिया है. त्रिशूल और भगवा लबादा देखते ही हिंदू सम्मान में सिर झुका देते हैं. धर्म का फ़ायदा उठाकर इसे अपवित्र करते हुए हिंदू महासभा ने राजनीति में प्रवेश किया है. सभी हिंदुओं का कर्तव्य है कि इसकी निंदा करें. ऐसे गद्दारों को राष्ट्रीय जीवन से निकाल फेंकें. उनकी बातों पर कान न दें.’

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने संघियों के लिए ‘गद्दार’ शब्द का प्रयोग किया था, क्या आज के संघी जज आरएसएस की गद्दारी को छिपाने की कोशिश में सुभाष चन्द्र बोस और चन्द्रशेखर आजाद को ‘गद्दार’ बताना चाहता है ? निःसंदेह संघियों के टुकड़ों पर पलने वाले हाईकोर्ट के ये जज स्वयं देश का गद्दार है, जो गद्दार संघियों के पक्ष में अपने पद का दुरुपयोग करते हुए निर्लज्जतापूर्वक दलील दे रहा है कि संघियों के खिलाफ कुछ न कहा जायें.

आईये, देखते हैं संघियों के खिलाफ सुभाष चन्द्र बोस ने कितने कठोर बयान दिये थे. संघियों के पितृपुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी डायरी में लिखते हैं-

एक बार बोस उनसे मिले थे और उन्होंने यह कहा था कि यदि आप हिन्दू महासभा को एक राजनीतिक दल के रूप में गठित करते हैं तो मैं देखूंगा कि आप उसका राजनैतिक गठन कैसे करते हैं ? यदि आवश्यकता पड़ी तो में उस कदम के विरुद्ध बल प्रयोग करूंगा और यदि यह सच में गठित होती भी है तो मैं इसे लड़ कर भी तोडूंगा.

दरअसल, धार्मिक आधार पर राजनीति करना सुभाष चन्द्र बोस की नज़र में ‘राष्ट्र के साथ द्रोह’ था. 24 फरवरी 1940 के फार्वर्ड ब्लाक में हस्ताक्षरित संपादकीय में उन्होंने कहा –

‘सांप्रदायिकता तभी मिटेगी, जब सांप्रदायिक मनोवृत्ति मिटेगी. इसलिए सांप्रदायिकता समाप्त करना उन सभी भारतीयों-मुसलमानों, सिखों, हिंदुओं, ईसाइयों आदि का काम है जो सांप्रदायिक दृष्टिकोण से ऊपर उठ गए हैं और जिन्होंने असली राष्ट्रवादी मनोवृत्ति विकसित कर ली है, जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए युद्ध करते हैं, निस्संदेह उनकी मनोवृत्ति असली राष्ट्रवादी होती है.’                                                                  (पेज नंबर 87, नेताजी संपूर्ण वाङ्मय, खंड 10)

बिहार के रामगढ़ में 19 मार्च 1940 को ‘अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन’ का अध्यक्षीय भाषण देते हुए उन्होंने कहा –

‘इस समय की समस्या है- क्या भारत अब भी दक्षिणपंथियों के वश में रहेगा या हमेशा के लिए वाम की ओर बढ़ेगा ? इसका उत्तर केवल वामपंथी स्वयं ही दे सकते हैं. अगर वे सभी खतरों, कठिनाइयों और बाधाओं की परवाह किए बिना साम्राज्यवाद के खिलाफ अपने संघर्ष में निर्भीक रहने और समझौता न करने की नीति अपनाते हैं तो वामपंथी नया इतिहास रचेंगे और पूरा भारत वाम हो जाएगा.’                                                (पेज नंबर 94, नेता जी संपूर्ण वाङ्मय, खंड 10, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार)

लो हाईकोर्ट के संघी दलाल जज महोदय, आपने जिस गद्दार संघियों की हिफाजत के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उमर खालिद और उनके साथियों को जिस ‘अपराध’ की सजा देना चाह रहे हैं, उससे भी बड़ा अपराध सुभाष चन्द्र बोस ने किया था. वे तो संघियों को बलपूर्वक मिटा देना चाहते थे, उन्हें आप कौन सा सजा देंगें महोदय ?

भगत सिंह की नजर में संघी

उमर खालिद के जमानत को अस्वीकार करते हुए संघी दलाल जज ने जिस भगत सिंह के नाम का सहारा लिया है, खुद आरएसएस उन्हीं भगत सिंह को ‘छिछोरा’ और ‘प्रसिद्धि की लालसा’ वाला बतलाता है. संघ वृक्ष के बीज (आर. एस. एस. प्रकाशन), लेखक – केशवराम बलिराम हेडगेवार भगत सिंह के बारे में लिखता है –

भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव का जेल जाना, फांसी चढ़ना कोई देशभक्ति नहीं बल्कि छिछोरी देशभक्ति और प्रसिद्धि की लालसा है.

तो वहीं दूसरा संघी गोलवलकर अपनी पुस्तक बंच ऑफ थाट्स (आर. एस. एस.प्रकाशन) में लिखता है कि –

भगतसिंह और साथियों की कुर्बानी से देश का कोई हित नहीं होता.

क्या बात है हेडगेवार और गोलवलकर ! तुम जिस भगत सिंह को कुछ नहीं समझते थे, जिनको फांसी पर लटकाने के लिए फर्जी गवाह पैदा किया था, आज तुम्हारे पापों और तुम्हारी गद्दारी से भरे कलंक को धोने के लिए तुम्हारा अनुयायी जज की कुर्सी पर बैठकर उन्हीं ‘छिछोरे और प्रसिद्धि की लालसा’ वाले भगत सिंह और उनके साथियों ‘जिनके कुर्बानी से देश का कोई हित नहीं होता’ के सामने नतमस्तक है और उनका सहारा ले रहा है.

यह आश्चर्य नहीं, हाईकोर्ट का संघी जज आरएसएस के जिस गद्दारी भरे इतिहास को उजागर करना अपराध बता रहा है और इसके लिए गांधी भगत सिंह का सहारा ले रहा है, इस जज को यह बताना चाहिए था कि उसी गांधी और भगतसिंह की हत्या का इंतजाम इसी संघियों ने किया था, जिसकी तरफदारी करते हुए इसने उमर खालिद और उनके साथियों को जेलों में बंद कर रखा है.

उमर खालिद और अन्य के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून, गैर कानूनी गतिविधि (रोक) अधिनियम के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई दंगे का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया गया है. इस दंगे में 53 लोग मारे गए थे और करीब 400 घायल हुए थे. उमर के अलावा, एक्टिविस्ट खालिद सैफी, JNU के छात्र नताशा नरवाल और देवांगना कालिता, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी मेंबर्स सफोरा जरगर, AAP के पार्षद रहे ताहिर हुसैन पर केस दर्ज किया गया है.

संघ मुख्यालय में बदलता सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट

संघियों की सेवा में तत्पर भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का न केवल न्यायिक चरित्र खत्म हो गया है अपितु मानवता पर भी कलंक बन गया है. यह देश की मेहनत से इकट्ठा की गई लाखों करोड़ों रुपए पर मौज उड़ाने वाली कुछ अय्यासों के पुरजोर इंतजाम का अय्याशगाह बन गया है अपितु हर दिन लाखों मानव श्रम को निगलने और मेहनतकश जनता पर भार बन गया है. संघियों का मालिक कॉरपोरेट घरानों के आपसी झगड़ा सुलझाने का दलान बन गया है.

हमें याद है वह दिन जब एक मरते हुए 84 वर्षीय बीमार बुजुर्ग फादर स्टेन स्वामी को पानी पीने के लिए स्ट्रॉ तक न देने वाला यह संघी दलाल अपने संघी कुत्ता अर्नब गोस्वामी को जेल से रिहा करने के लिए कोहराम मचा दिया था. सारे मान-मर्यादा व परंपराओं को ताक पर रखकर आनन-फानन में जेल से बाहर निकाला था, उस संघी दलान भला आम मेहनतकश जनता क्या उम्मीद कर सकता है !

माओवादियों का जन-अदालत है अंतिम विकल्प

भारत की मेहनतकश जनता पर गैर-जरूरी बोझ की तरह सवारी कसे इस न्यायपालिका और उसके संघी जजों की कोई जरूरत नहीं है. जितनी जल्दी हो सके बाबा के इस दलान को बंद कर देश भर में माओवादियों की जन-अदालतों को मान्यता प्रदान कर देश के तमाम न्यायिक प्रक्रिया को उसके हवाले किया जाये, ताकि देश का लाखों करोड़ रुपया और लाखों मानव श्रम की बचत हो सके. इसके साथ ही देश के आम जनता को सस्ती और तुरंत न्याय मिल सके.

तभी और केवल तभी देश के लुटेरों को दंडित किया जा सकता है और देश के मेहनतकश जनता को सच्ची न्याय मिल सकती है. केवल और केवल तभी उमर खालिद जैसों को न्याय मिल सकेगा. तभी भगत सिंह के सपनों का भारत बन सकेगा, तभी गांधी के हत्यारों को दंडित किया जा सकेगा.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

भविष्य महापुराण : पत्नियां कामासक्त हो गई तो कसूर किसका होगा ?

Next Post

क्या यही है इन्साफ ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
ब्लॉग

आख़िर स्तालिन के अपराध क्या था ?

by ROHIT SHARMA
November 6, 2025
Next Post

क्या यही है इन्साफ ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘राष्‍ट्र के नाम सम्‍बोधन’ में फिर से प्रचारमन्‍त्री के झूठों की बौछार और सच्‍चाइयां

April 14, 2020

प्रतिशोध

March 27, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.