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उपेक्षित संविधान नायक जयपाल सिंह मुंडा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 10, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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उपेक्षित संविधान नायक जयपाल सिंह मुंडा

kanak tiwariकनक तिवारी
यह नए इतिहास और विशेषकर आदिवासी बुद्धिजीवियों का फर्ज है कि वे अपने पूर्वज जयपाल सिंह मुंडा की आड़ में आदिवासियों के साथ हुए बौद्धिक अन्याय का मुकाबला करने के लिए नया रचनात्मक इतिहास गढ़ें.

भारत का नया इतिहास पुश्तैनी, परंपराप्रिय और ब्रिटिश बुद्धि के इतिहासकारों द्वारा भी लिखा गया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता. देश में लोकतंत्र और संविधान की हुकूमत की स्थापना के लिए भद्र वर्ग के कुछ सीमित नामों को तरजीह दी गई है मानो वे समाज के उद्धारक बनकर उभरे हैं.

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इसमें संदेह नहीं कि स्वतंत्रता के युद्ध के महान सैनिकों जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, मौलाना आज़ाद, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे असंख्य जननायकों का योगदान रहा है, फिर भी महानता की चकाचौंध में कई बार ऐसे वीरों को यादों में धूमिल कर दिया गया है जो रोशन होकर आज भी बियाबान में सही दमक रहे हैं. संविधान सभा के एक बेहद जागरूक, सक्रिय, समर्थ और आग्रही आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा की इतिहास के लेखकों ने जो उपेक्षा की है वह तो सामाजिक इतिहास में अपराध की तरह दर्ज होना चाहिए.

उन्होंने कहा था कि संविधान निर्माताओं को इस बात का घमंड नहीं होना चाहिए कि उन्होंने सभी वर्गों के साथ न्याय करते वक्त इंसाफ के तराजू आदिवासियों के खिलाफ झुका भी तो दिए हैं. आज देश के दस करोड़ आदिवासियों के अधिकार और सम्मान की ही बात नहीं है. अब तो इस मुल्क से आदिवासी के जीवन के सुरक्षित और कायम रहने का भरोसा ही नहीं रह गया है.

अगर जयपाल सिंह नहीं होते तो आज इतिहास के विद्यार्थी कभी नहीं जानते कि आदिवासी की नैसर्गिकता, उद्भव, विकास और मनुष्य होने की संभावनाओं के जितने फलक उद्घाटित हो गए उनके अभाव में आज करोड़ों आदिवासी गुमनाम इकाइयों की तरह सरकारी इतिहासकारों द्वारा दर्ज नहीं दफ्न कर दिए गए होते.

साफ कहा था जयपाल सिंह ने संविधान सभा में कि आप में से अधिकांश लोग जो यहां बैठे हैं, बाहरी है. घुसपैठिए हैं. आपके कारण हम आदिवासियों को अपनी उपजाऊ धरती को छोड़कर जंगलों में मजबूर होकर जाना पड़ा है. संविधान में प्रस्तावित लोकतंत्र आदिवासियों के लिए लोकतंत्र नहीं है. हमें आपसे कोई अधिकार नहीं लेना है लेकिन सदियों से जो हमारे अधिकार हैं, उन्हें छीन लिए जाने का आपको कोई अधिकार नहीं है. हिन्दुस्तान पाकिस्तान की समस्याएं आप शहरी लोगों ने पैदा की हैं, आदिवासियों ने नहीं.

जयपाल सिंह ने कहा कि पंडित नेहरू के शब्दों पर विश्वास करते हुए भी मैं कहूंगा कि हमारे लोगों (आदिवासियों) का पूरा इतिहास गैर-आदिवासियों द्वारा किए गए अंतहीन उत्पीड़न और बेदखली को रोकने के मुकाबिले के विद्रोहों का इतिहास है. हमें उस राजनीतिक दृष्टिकोण पर विचार करना चाहिए. मुझे वे सारे भाषण और संकल्प याद आ रहे हैं जिनमें आदिवासियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की बातें कही जाती रही हैं. यदि इतिहास ने हमें कोई सीख दी है तो वह मुझे संकल्प के प्रति अविश्वासी बना रहा है. मैं दोहराऊंगा कि आप आदिवासियों को लोकतंत्र नहीं सिखा सकते. आर्यों की फौज लोकतंत्र को खत्म करने पर तुली है.

सरदार वल्लभभाई पटेल ने जवाब दिया कि मेरा तो विचार है कि ‘ट्राइब‘ शब्द को ही हटा दिया जाय. ‘ट्राइब्ज’ (जातियों) के लिए पृथक प्रबंध करना भारतीय संस्कृति के लिए शोभनीय नहीं है. जयपाल सिंह ने फिर भी पलटवार करते कहा, मुझे खेद हो रहा है कि मैंने जो कुछ कहा है, उसका मतलब सरदार पटेल ने अपने ढंग से अलग लगाया है. मैं जानता हूं दस वर्ष बाद हम उसी जगह पर फिर से विचार करेंगे.

जयपाल सिंह ने दो टूक कहा कि आपने ही उन्हें अपनी भूमि से निकाल बाहर किया है. ऐसी विधियां बनाई हैं जिनसे उनके अधिकार छिन गये हैं. असम, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार से निकाले हुए लगभग दस लाख लोग एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते फिर रहे हैं. कारण यह है जो लोग आदिवासी नहीं हैं, उन्होंने उनकी भूमि उनसे ठग कर ले ली है और अब भी वे उन्हें ठग रहे हैं.

24 जनवरी, 1947 को संविधान सभा ने एडवाइजरी कमेटी (सलाहकार समिति) का चुनाव किया. गोविन्द वल्लभ पंत ने प्रस्ताव रखा. दरअसल पंत ने कुछ महत्वपूर्ण द्वैधजनक बातें कह दीं जिनका संविधान निर्माण की बुनियाद को लेकर संकेत था. पंत ने कहा ‘अल्पसंख्यकों को अपनी रक्षा के लिये बाहरी शक्तियों की ओर नहीं देखना चाहिए. उनकी ऐसे लोगों से ही रक्षा हो सकती है, जिनके बीच ये रहते हैं.’

जयपालसिंह मुंडा ने पण्डित गोविन्दबल्लभ पंत के बाहरी शक्तियों द्वारा फुसलाने वाले कटाक्ष पर कड़ी अप्रसन्नता प्रकट की. छः हजार वर्षों से हमारे साथ क्रूर मजाक किया जा रहा है. इतिहास इस बात को भूलना नहीं चाहेगा कि आदिवासी हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर बूझने के बदले शुरू से ही संविधान सभा की कार्यवाहियों में एक ढीला-ढाला अप्रोच बार-बार दिखाई देता है. मुख्य कारण यही रहा है कि सभा में प्रखर और मुखर तो क्या सामान्य संख्या में भी आदिवासी प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं हो पाया था, क्योंकि ऐसे संभावित प्रतिनिधि चयन हेतु उपलब्ध ही नहीं थे.

संविधान-सभा में 14 सितम्बर, 1949 को भाषायी उपबन्धों की बहस के सिलसिले में जयपाल सिंह ने अनुसूची 7क में कुछ आदिवासी भाषाओं को भी शामिल करने की मांग की क्योंकि उन्हें लाखों लोग बोलते हैं. उन्होंने 14 मुंदरी, 15 गोंडी, 16 ओरांव भाषाओं को संविधान में शामिल करने की मांग की.

तीखे तेवर लेकर जयपाल सिंह ने कहा कि संविधान की कई इबारतें केवल शब्दों की बाजीगरी हैं. हम आदिवासी अल्पसंख्यक नहीं हैं और न हमें अहसान बताकर वंचित वर्ग कहा जाए. हम इस देश की सभ्यता के सबसे पुराने हस्ताक्षर हैं. हमें बाकी अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों के साथ जोड़ने का मैं विरोध करूंगा.

दरअसल 24 जनवरी, 1947 को अपने शुरूआती भाषण में गोविंद वल्लभपंत ने कह दिया था कि देश के अल्पसंख्यकों को उनके भविष्य के लिए बहुसंख्यकों पर भरोसा करना चाहिए. जयपाल सिंह ने इस तर्क की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि यह कटाक्ष है. यह कथित अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है. उन्होंने कहा कि यह कैसी संविधान सभा है जिसमें 300 सदस्यों में केवल 6 या 7 आदिवासी हैं. मुख्य सलाहकार समिति और प्रारूप समिति में एक भी आदिवासी सदस्य नहीं है.

यह उन जयपाल सिंह का कहना था जो ऑक्सफोर्ड से डाॅक्टरेट की उपाधि लेकर आए थे और 1928 में भारतीय ओलंपिक हाॅकी टीम के कप्तान थे. इस महान सक्रिय आदिवासी सदस्य की संविधान के इतिहास और सुप्रीम कोर्ट की नजीरों तक में उपेक्षा हुई है. जो अवधारणाएं जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के संबंध में रची थीं उनका कोई अता पता बौद्धिक बहस में नहीं है. यह नए इतिहास और विशेषकर आदिवासी बुद्धिजीवियों का फर्ज है कि वे अपने पूर्वज जयपाल सिंह मुंडा की आड़ में आदिवासियों के साथ हुए बौद्धिक अन्याय का मुकाबला करने के लिए नया रचनात्मक इतिहास गढ़ें.

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