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कैसा दिखता है राजतंत्र से गणराज्य तक पहुंचना : नेपाल को लेकर 2022 में दर्ज कुछ प्रेक्षण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 12, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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कैसा दिखता है राजतंत्र से गणराज्य तक पहुंचना : नेपाल को लेकर 2022 में दर्ज कुछ प्रेक्षण
कैसा दिखता है राजतंत्र से गणराज्य तक पहुंचना : नेपाल को लेकर 2022 में दर्ज कुछ प्रेक्षण
चन्द्रभूषण

जिस काम के लिए मैं नेपाल गया था, वह लंबा है. कलम उठाने से पहले बहुत पढ़ना पड़ेगा, बहसें करनी होंगी और क्या पता, हफ्ता-दस दिन के लिए कुछ और जगहों पर धूनी भी रमानी पड़े. उससे पहले कुछ सामान्य अनुभवों का साझा करना चाहूंगा. यह यात्रा मैंने महेंद्रनगर से शुरू की, काठमांडू में छह रातें बिताईं और काम के सिलसिले में इस शहर के अलावा काठमांडू घाटी में ही नजदीकी कस्बों पाटन और बौद्धनाथ में एक-एक दिन गुजारा.

सातवें दिन भैरहवा और सिद्धार्थनगर होते दिल्ली-गाजियाबाद वापस लौटा. आवन-जावन में एक बात साझा रही कि बगल की सीट पर एक स्वप्नदर्शी नेपाली नौजवान बैठा मिला, जो हिंदी अच्छी तरह समझता था और कामचलाऊ ढंग से यह भाषा बोल भी सकता था.

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महेंद्रनगर से मेरे साथ बस में सवार हुआ शरद दूसरी बार काठमांडू जा रहा था. पहली बार धनगढ़ी से जहाज पकड़कर गया था. बस से काठमांडू का यह उसका पहला सफर था. दसवीं पास करने के बाद कॉलेज का एंट्रेंस टेस्ट देने के लिए अपने मुल्क की राजधानी के रास्ते पर था. टेंट हाउस का काम उसके परिवार में होता रहा है जबकि उसका इरादा डॉक्टरी पढ़ने का है. बीच में लैंडस्लाइड से घंटों रुकी रही बस का टेंशन हम दोनों में बराबर था.

वापसी में मेरे साथ आर्यन बैठा था, जो बुटवल का रहने वाला था और शरद से उम्र में सात-आठ साल बड़ा था. पांच घंटे का सफर पूरा हो जाने पर एक लंबा जंगल पार होने के बाद वह बस में चढ़ा था, कई वर्षों से ड्राइवरी कर रहा था और अभी नौ लाख रुपये किसी एजेंसी को देकर पोलैंड जाने का जुगाड़ लगाने दिल्ली आ रहा था.

वापसी की बस में बैठने से पहले कुछ नाश्ता-पानी के लिए स्वयंभू के बगल में तीन बुद्धमूर्तियों से सटी सड़क पर मैं आगे बढ़ा तो एक महिला को नाश्ते की दुकान खोलते देखा. उनसे कहा, आधे घंटे से भी कम समय बचा है, इतने में कुछ नाश्ता बन सके तो करा दें. उन्होंने कहा, ‘आपको देखते ही मैंने जान लिया था कि इंडिया से हैं. रोटी-सब्जी खाना चाहें तो बीस मिनट लगेगा, चाओमीन और चाय दस मिनट में दे दूंगी. आराम से बैठिए, आपको लिए बिना बस नहीं जाएगी.’

मैंने कहा, इतनी अच्छी हिंदी कहां से सीख गईं. बोलीं- ‘मोहाली के पास मनीमाजरा रोड पर ढाबा चलाती थी. हस्बैंड को अचानक अटैक पड़ा, डेथ कर गए. बच्चों को लेकर दो महीने पहले ही लौटी हूं.’ भारत के लोग उन्हें स्वभाव से ही मददगार जान पड़ते थे. नेपाल की महंगाई से दुखी थी. नाम पूछा तो ‘देवी थापा’ बताया.

यूरोप-अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया

बहुत सारे लोगों से लंबी-लंबी बातें हुईं. उनमें कुछ भिक्षु थे और कुछ सुदूर अतीत की खोजबीन में जुटे बुद्धिजीवी. कुछेक कार्यकर्ता भी थे, जिनकी धरती क्रांतिकारी भावना के अंतरिक्ष में विचारधारा के सूर्य का चक्कर काटती है. घर-परिवार की चर्चा करने वाले कुल तीन ही लोगों से बातचीत हो पाई और तीनों का ही कोई न कोई बच्चा विदेश में या तो सेटल हो गया था या होने की राह पर था. दो के ऑस्ट्रेलिया में और एक का अमेरिका में.

एक बौद्ध विहार का संचालन करने वाले सज्जन बता रहे थे कि उनके पंथ की एक बड़ी समस्या बच्चों के सात समुंदर पार जा बसने की भी है. ‘संघम शरणम गच्छामि’ वाला नेवार-बौद्ध गृहस्थ भिक्षुओं का यह संघ अपने सदस्यों के चलाने से ही चलता है. सदस्य ही कहीं दूर जा बसें तो फिर संघ कैसे चलेगा और विहार का क्या होगा ?

जाहिर है, इस दुःख में एक गौरव की गंध भी थी. अगर आप कभी साउथ दिल्ली में रह रहे समृद्ध बुजुर्गों से बात करें तो वे खुद पर मंडरा रहे जानलेवा खतरों की चर्चा करते हैं. देखरेख के लिए न आ सकने वाले बच्चों की मजबूरियां बताते हैं. लेकिन जैसे ही बच्चों के बारे में बात होने लगती है, उनकी आंखें चमक उठती हैं और अपनी संततियों के सुख और ऐश्वर्य का वर्णन करते वे नहीं अघाते. कुछ-कुछ उसी तरह का जटिल बोध, लेकिन जरा पहले वाली श्रेणी का. बच्चों का करिअर अभी बनने की प्रक्रिया में है. संघर्ष का दौर है. पार हो जाएगा तो सब अच्छा हो जाएगा.

प्रसंगवश, वापसी में साथ आए आर्यन से मैंने पूछा कि पोलैंड तो अभी लगभग लड़ाई की हालत में है, ऐसे में नौकरी तुम्हें वहां कैसे मिल पाएगी ? उसने कहा, ‘मिल जाएगी. अभी पैकिंग इंडस्ट्री में कुछ काम निकला है, सीख लूंगा.’ मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन भीतर एक डर सा पैदा हुआ कि यह सीधा-सादा चेन स्मोकर बच्चा कहीं दिल्ली में ठगों के किसी जाल में न फंस रहा हो !

गणतंत्र बनकर क्या पाया

पत्रकारों का जीवन उन्हें सीधे रास्ते पर कभी चलने नहीं देता. धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य नेपाल की यह पहली ही झलक मुझे हासिल हो पाई है, जबकि राजशाही के खिलाफ पहले बड़े आंदोलन से अपने लगाव को मैं प्रेक्षक से थोड़ा ज्यादा ही समझता था. 1990 में इस काम के लिए बीरगंज पहुंचा तो भारी उपद्रव के चलते वहीं से वापस लौटना पड़ गया. दूसरी बार फरवरी-मार्च 1991 में काठमांडू पहुंचा तो लोकतांत्रिक चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. पंचायती व्यवस्था समाप्त हो गई थी, हालांकि नई व्यवस्था का स्वरूप भी राजतांत्रिक हिंदू राष्ट्र का ही था.

तब से लेकर अब तक कई सरकारें आईं-गईं. दस साल लंबा गृहयुद्ध चला. अस्पष्ट घटनाक्रम में एक राजा सपरिवार मारा गया और लंबे प्रतिरोध के बाद दूसरे को हटाकर गणतंत्र कायम हुआ. जाहिर है, अभी का नेपाल 1991 के नेपाल से बहुत अलग है. हालांकि छह दिन वहां रहकर एक भी व्यक्ति मुझे ऐसा नहीं मिला, जिसने अपनी और अपने देश की स्थिति को लेकर भरपूर खुशी न सही, कामचलाऊ संतोष ही जताया हो. अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, मधेसी, बौद्ध, मुसलमान और ईसाई कहते हैं कि व्यवस्था बदलने से पहाड़ी ब्राह्मण-क्षत्रिय के सिवाय किसी को कुछ नहीं मिला. आबादी की शहरी मुख्यधारा में घुसें तो भ्रष्टाचार के दुःख सुनाई पड़ते हैं.

भविष्य का अंदाजा दिलाने वाली सबसे कारगर खिड़की शिक्षा ही है. बौद्ध संस्थाओं में लुंबिनी विश्वविद्यालय से कुछ उम्मीद देखी जा रही है लेकिन इसके समेत सारे शैक्षिक संस्थानों का जोर प्रफेशनल कोर्स चलाने पर ज्यादा है, क्योंकि पैसे उधर ही हैं. हालांकि जो लोग पढ़ाई के लिए पैसे लगा रहे हैं, उनमें कुछ खास उम्मीद ये संस्थान नहीं जगा पा रहे.

पता चला, ग्राहकों के भरपूर दोहन के लिए पश्चिम के कुछ नामी विश्वविद्यालयों ने भी नेपाल में अपने कैंपस खोल रखे हैं. खुद को शहरी मिडल क्लास मानने वाला तबका सबसे पहले इन्हीं में अपने बच्चों का दाखिला कराना चाहता है. ‘देसी संस्थानों से पढ़ाई तो करा दें, लेकिन काम कहां है ?’ ग्रैजुएशन के बाद बच्चे विदेश चले जाएं तो बंदा कृतकृत्य हो जाता है.

बहरहाल, काठमांडू की छवि मेरे मन में घनघोर सैद्धांतिक बहसों वाले शहर की ही बनी हुई है और 31 वर्षों का फासला भी इस इंप्रेशन में कोई खरोंच नहीं डाल पाया है. इस बार अपनी आखिरी शाम एक फिल्म ‘ऐना झ्यालको पुतली’ का प्रीमियर शो देखते हुए गुजारने का मौका मुझे मिला.

एक बच्ची के जीवन पर केंद्रित यह फिल्म कमर्शल मिजाज की नहीं थी, हालांकि पर्दे पर इसका पहला दृश्य आने से पहले बीस मिनट के विज्ञापन दिखाए जा चुके थे. दूसरी तरफ आर्ट फिल्मों जैसी दारुण सघनता भी इसमें नहीं थी. भाषा में कोई गति न होने के बावजूद इसके कई दृश्यों का भोलापन मन पर छपा रह गया.

खास बात यह कि जबरदस्त राजनीतिक और वैचारिक टकरावों के बावजूद काठमांडू का सारा बौद्धिक समाज यह फिल्म देखने के लिए उमड़ा हुआ था, जिसमें कई लोगों से बातों-बातों में मेरी पहचान भी निकलती गई.

छह महीने पहले ही भूतपूर्व हुई एक मुख्यमंत्री ने अपनी गाड़ी से मुझे मेरी ठहरने की जगह तक पहुंचाया. ऐसी किसी सुखद घटना की उम्मीद मैं न तो भारत में कर सकता हूं, न ही राजशाही-पंचायती नेपाल में कर सकता था. गणराज्य नेपाल में ऐसा हुआ और वहीं हो भी सकता था.

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