Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था में वेश्यालय क्यों ज़रूरी है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 1, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था में वेश्यालय क्यों ज़रूरी है ?
पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था में वेश्यालय क्यों ज़रूरी है ?
Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

शुरु में ही स्पष्ट कर दूं कि इस विवेचना का आधार नैतिक से ज़्यादा व्यावहारिक है. हालिया सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले, जिसके मुताबिक़ अगर कोई स्त्री स्वेच्छा से देह व्यापार में लिप्त है तो वह क़ानूनन जुर्म नहीं है, लेकिन संगठित और जबरन देह व्यापार में धकेलना जुर्म है, ने इस सदियों पुराने सवाल को फिर से ज़िंदा कर दिया है. इस फ़ैसले का मतलब यह हुआ कि किसी भी स्त्री या पुरुष को अपनी देह को पैसे के लिए बेचना अपराध नहीं है.

नैतिक दृष्टिकोण से यह फ़ैसला बहुत लोगों को नागवार गुजरा होगा, लेकिन, एक पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था में यह फ़ैसला समयानुकूल है. इसके पीछे हमारी वह सामंती सोच है, जिसके तहत स्त्री भोग की वस्तु है. हालांकि, दास प्रथा, जिसका विस्तार भारत के देवदासी प्रथा में दिखता है. उससे मौद्रिक विनिमय के बदले देह का सौदा करना एक क़दम आगे की बात है. इस सौदे बाज़ी में व्यक्ति अपनी देह की क़ीमत लगाने को स्वतंत्र है, यद्यपि यह समय, काल और परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

वैशाली की नगरवधू से लेकर आज की कॉल गर्ल्स, एस्कॉर्ट्स और जिगोलो, यानि पुरुष वेश्या इसी श्रेणी में आते हैं. इस व्यवस्था में सबसे बड़ी बात है कि इसमें किसी व्यक्ति के पास ना कहने का अधिकार अक्षुण्ण रहता है. दूसरी बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने संगठित देह व्यापार को ग़ैरक़ानूनी माना है, जबकि भारत में रेड लाइट एरिया लाइसेंस के तहत चलते हैं.

फ़ैसले के इस हिस्से में सुप्रीम कोर्ट ने संगठित देह व्यापार को मानव तस्करी के लिए कारक माना है. NCRB के डेटा के मुताबिक़ भारत में हरेक 8 मिनट में एक बच्चा अगवा हो जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने का रैकेट या देह व्यापार में देर सबेर धकेल दिया जाता है. आपको जान कर आश्चर्य होगा कि दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार न तो हथियार का है और न ही तेल का, दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार मानव तस्करी का है. इससे आप संगठित वेश्यावृत्ति की भयावहता को समझ सकते हैं.

नैतिक मूल्यों के आधार पर हम वेश्यालय या वेश्यावृत्ति का विरोध कर सकते हैं, लेकिन नैतिक मूल्यों के असर में मध्यम वर्ग रहता है, जो कि पूरी दुनिया की जनसंख्या का मात्र 15% है. धनी वर्ग, मध्यम वर्ग के नैतिक मूल्यों को घास नहीं डालता और ग़रीबों को देह से नैतिकता को जोड़ने की फ़ुर्सत नहीं है.

आख़िर वेश्यालय किसके लिए ज़रूरी है ?

सवाल ये है कि आख़िर वेश्यालय किसके लिए ज़रूरी है ? इसके जवाब में मुझे समाज शास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान और व्यक्तिगत जुगुप्सा की कई परतों को खोलना पड़ा. पहली बात तो ये है कि भारत जैसे सेक्स कुंठित समाज में अपनी यौन इच्छाओं के निर्वाध अभिव्यक्ति के लिए वेश्यालय से ज़्यादा मुफ़ीद और कोई जगह नहीं है.

एक आम आदमी, जो अपनी नैसर्गिक यौन इच्छाओं की अभिव्यक्ति साधारण सामाजिक जीवन में नहीं कर सकता है, वह एक लाल वृत्त के अंदर जाकर, वही काम बिना किसी कुंठा के कर सकता है. इस तरह से वेश्यालय उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. इस विषय पर ज़्यादा शोध करने की ज़रूरत है.

दूसरा पक्ष यह है कि भारत में अक्सर लोगों की शादी जवान होते ही कर दी जाती है और पैंतीस साल की उम्र होते होते वह दो तीन बच्चों का बाप बन जाता है. अक्सर उनकी पत्नियां बच्चों की परवरिश और घर के देखभाल में इतना मशगूल हो जातीं हैं कि अपने पर ध्यान नहीं दे पातीं है. ग्रामीणों के बीच यह बड़ी समस्या है. नतीजा यह होता है कि पुरुषों में कुछ लोग वेश्यागमन करते हैं. अगर सर्वे किया जाए तो देखा जाएगा कि रेड लाइट एरिया में ज़्यादातर अधेड़ उम्र के लोग जाते हैं. स्त्री की अपेक्षा में पुरुषों का देर से बूढ़ा होना एक नैसर्गिक कारण है.

क्या वेश्यालय का कोई विकल्प नहीं है ?

अब सवाल यह है कि क्या वेश्यालय का कोई विकल्प नहीं है ? हम जानते हैं कि थाईलैण्ड जैसे देशों ने वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता दे कर टूरिज़्म व्यवसाय को बढ़ावा दिया और अपनी अर्थव्यवस्था को संभाला. दूसरी तरफ़ हम यह भी जानते हैं कि सोवियत संघ के सत्तर सालों में वहां कोई वेश्यावृत्ति नहीं थी. मानव तस्करी पूरी तरह से बंद था. समाजवादी व्यवस्था में रोटी कमाने के लिए शरीर बेचने की ज़रूरत नहीं होती है.

1980 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां तेज़ी से आर्थिक असमानता बढ़ी और सामाजिक सुरक्षा के ढांचे के ध्वस्त होने के बाद युवतियां फिर से देह व्यापार में धकेल दी गईं. पूर्व सोवियत संघ और टर्की की लड़कियां दिल्ली भी आ गईं और आज भी आप उन्हें महिपालपुर के सस्ते होटलों और बार में देख सकते हैं. पांच सितारा होटलों में भी मिल जाएंगी.

कहने का तात्पर्य यह है कि वेश्यावृत्ति के सामाजिक और आर्थिक दोनों कारण हैं. जब कोई ये कहता है कि वेश्यालय नहीं हो तो समाज में व्यभिचार बढ़ जाएगा, वे वेश्यागमन को क्या सदाचार की परिभाषा में लाते हैं ?

दूसरी तरफ़, वेश्यालय या वेश्या वृत्ति के खिलाफ नैतिक मूल्यों की दुहाई देने वालों के पास क्या ऐसी कोई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सोच है क्या जो दुनिया के इस सबसे प्राचीन व्यवसाय को नहीं पनपने देने के लिए कोई ज़मीन मुहैया करा सकें ? जवाब है, नहीं.

एक आख़िरी बात. सिर्फ़ देह से देह का अर्थोपार्जन के लिए मिलना ही देह व्यापार नहीं होता. फेनिल समुद्र के तट पर कंडोम का प्रचार करती कोई अर्द्ध नग्न महिला भी प्रकारांतर में वही कर रही है. ये औरत उस कोठे वाली से ज़्यादा घातक है, क्योंकि उसने आपकी जुगुप्सा को बढ़ा कर आपको एक विकृति दी है और उस कोठे वाली ने आपकी जुगुप्सा को शांत कर आपको मानसिक रूप से एक बेहतर हालत में लाकर छोड़ा है.

दमित यौन इच्छाओं से उत्पन्न विकृतियों पर तो पूरी किताब लिखी जा सकती है. आपको यह जानना काफ़ी है कि हिंसा के मूल में यही है साधारण परिस्थितियों में.

Read Also –

वेश्‍यावृत्ति को वैध रोजगार बताने वाले को जानना चाहिए कि सोवियत संघ ने वेश्यावृत्ति का ख़ात्मा कैसे किया ?
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामंतवाद का कामुकता से, पूंजीवाद का अर्द्धनग्नता (सेमी पोर्नोग्राफी) से और परवर्ती पूंजीवाद का पोर्नोग्राफी से संबंध
महिलाओं के प्रश्न पर लेनिन से एक साक्षात्कार : क्लारा जे़टकिन
महिला, समाजवाद और सेक्स 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

अब सावरकर पर बहस जरूरी है

Next Post

तुमने कभी कोई बुलडोजर देखा है ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

तुमने कभी कोई बुलडोजर देखा है ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अदानी के बाद वेदांता : क्या लोकतंत्र, क्या सत्ता और क्या जनता–सब इस पूंजीवाद के गुलाम हैं

February 27, 2023

कुरआन और प्रिंटिंग प्रेस : शिक्षा एवं कला में मुसलमान 500 साल पीछे

December 26, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.